November 1, 2009 at 9:44 PM (कविता-पोस्टर)
Tags: इंसान, कविता, कविता-पोस्टर, कार्ल मार्क्स
असली इंसान की तरह जिएंगे – मार्क्स
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)
शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.
इस बार का कविता-पोस्टर है, मार्क्स की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.
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०००००
रवि कुमार
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October 17, 2009 at 6:58 PM (कविताएं)
Tags: आफ़ताब, दिया, दीपक, दीपावली, रौशनी
दीपावली फिर टल गई
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

आफ़ताब का दम भरने वाले
दिए की लौ से खौफ़ खा गए
आखिर ब्लैकआउट के वक्त
उनके ही घर से
रौशनी के आग़ाज़ का जोखिम
वे कैसे उठा सकते थे
आफ़ताब के सपने संजोती
उनकी ओर ताक रही निगाहें
नागहां बौखला गईं
और चूल्हों की आंच को
राख में रपेट दिया गया
दीपावली
एक बार फिर टल गई
०००००
रवि कुमार
आफ़ताब – सूर्य, आग़ाज़ – शुरूआत, नागहां – अचानक
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October 13, 2009 at 10:31 AM (कविता-पोस्टर)
Tags: कविता, कविता-पोस्टर, धर्म
यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhta )
यहां-वहां कई जगह आजकल बरतनों की खनखनाहट का दौर जारी है. दादी जी कहा करती थी रसोईघर से आती ऐसी आवाज़े बताती हैं कि कौरानी का ध्यान आज और कहीं है, किसी और बात पर नाराज़ी है और कहीं और उलझ गई है.
वर्तमान दौर की समस्याएं पुरजोर तरीके से हमारे सामने मुंह बाए खड़ी हैं. हमें अक्सर वह अनुपस्थित कारण समझ नहीं आता जो कि मूल में होता है, और हम दिखती सी या दिखाई जाती चीज़ों में उलझ कर अपना बचा खुचा तिया-पांचा करते रहते हैं, यह हमारे दादाजी कहा करते थे.
दादाजी नहीं रहे, पर दादी जी हैं जो अभी भी सब कुछ ठीक रहे, शांति रहे, चोंचों को चुग्गा-पानी मिलता रहे, बगिया में मीठा कलरव गूंजता रहे, इसकी लगातार प्रार्थना करती रहती हैं.
कुछ चोंचों को ज़्यादा चुग्गा-पानी नसीब हो रहा है, कुछ चोंचों के पास फ़ाकामस्ती का आलम है. चारों तरफ़ चीं-चां-चां-चूं छाई हुई है, लहुलुहान होना ही कहीं सुकून का वायस बना हुआ है. बाजों की बन आई है, इससे बेहतर अभीष्ट पूर्ति उन्हें और क्या नसीब हो सकती है.
बाजों और गिद्धों को साम्राज्य पूरी दुनिया को गिरफ़्त में ले रहा है. कबूतरों की शामत है.
अपनी-अपनी लुकाठी दबाए, हम अल्मस्त हैं.
एक कविता पोस्टर देखिए, और क्या कहा जाए….मज़ा लीजिए?

०००००
रवि कुमार
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October 9, 2009 at 11:00 PM (कविता-पोस्टर)
Tags: कविता, महेन्द्र नेह, रौशनी, शिशु
रौशनी का महाविस्फोट – महेन्द्र नेह
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)
शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.
इस बार का कविता-पोस्टर है, महेन्द्र नेह की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.
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०००००
रवि कुमार
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October 3, 2009 at 8:11 PM (कविताएं)
Tags: समन्दर, हरीश भादा्नी
हरीश भादानी जी नहीं रहे. कल २ अक्टूबर को उनका निधन हुआ.
जो उन्हें जानते हैं, वे सब जानते ही हैं.
वे जन-आंदोलनों के प्रिय जनकवि रहे हैं. कई कला-विधाओं के जरिए जन-जन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने और जागॄति की अलख जगाने वाले, बीकानेर (राजस्थान) के भादानी जी सामाजिक व राजनैतिक जागरुकता के लिए सदैव संघंर्षरत रहे.
उनका एक गीत हम बचपन में खूब गाया करते थे:
रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है
बोले खाली पेट की, करोड़-करोड़ कुंदियां
खाकी वर्दी वाले भोपें, भरे हैं बंदूकियां
राज के विधाता सुन, तेरे ही निमत हैं
रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है
०००००
आज की यह कविता उन्हीं की स्मृति को समर्पित।
समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता
( a poem by ravi kumar, rawatbhata)

समन्दर
कभी ख़ामोश नहीं हुआ करता
उस वक़्त भी नहीं
जबकि सतह पर
वह बेहलचल नज़र आ रहा हो
लाल क्षितिज पर सुसज्जित आफ़ताब को
अपने प्रतिबिंब के
समानान्तर दिखाता हुआ
बनाता हुआ
स्याह गहराते बादलों का अक़्स
उस वक़्त भी सतह के नीचे
गहराइयों में
जहां कि आसमान
तन्हाई में डूबा हुआ लगता है
एक दुनिया ज़िन्दा होती है
अपनी उसी फ़ितरत के साथ
जिससे बावस्ता हैं हम
कई तूफान
करवटें बदल रहे होते हैं वहां
कई ज्वालामुखी
मुहाने टटोल रहे होते हैं वहां
ज़िंदगी और मौत के
ख़ौफ़नाक खेल
यूं ही चल रहे होते हैं वहां
उस वक़्त भी
जबकि समन्दर
बेहद ख़ामोश नज़र आ रहा होता है
०००००
रवि कुमार
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September 28, 2009 at 1:22 PM (कविता-पोस्टर)
Tags: भगतसिंह
हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली
( a poster on bhagatsingh by ravi kumar, rawatbhata)
हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली
ये मुश्ते ख़ाक है फ़ानी रहे या ना रहे

०००००००००
रवि कुमार
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September 26, 2009 at 7:19 PM (कविताएं, छाय़ाचित्र)
ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

मैं आऊंगा
जब चाक हो जाएगी हर राह
कि जब हर तरफ़ बिछी होंगी
बारूदी सुरंगें
और जबकि हमेशा के लिए
चुक जाएगी बारिश की उम्मीद
मैं आऊंगा
जब तुम्हारे सुर्ख़ लब तड़पने लगेंगे
एक तवील बोसे के लिए
कि जब तुम समझ चुकी होगी
चारों तरफ़ दीवारें होने का सबब
जबकि तुम तन्हाई में
कर रही होगी मौत की दुआ
मैं आऊंगा
फिर हम तुम गाएंगे मिलकर
ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा
और क़त्लगाह के
ख़ूं से सने हर सुतून पर
कर देंगे तहरीर
शबे-वस्ल की महक को
इससे पहले कि
हमारे मुख़ालिफ़ीन
सफ़्फ़ाकी से मुक़र्रर करें
हमारे लिए
सज़ा-ए-मौत
हम रूहों में तब्दील हो जाएंगे
०००००
रवि कुमार
तवील बोसा – लंबा चुंबन, मुकद्दस – पवित्र, सुतून – खंभा
तहरीर करना – लिखना, शबे-वस्ल – मिलनरात्रि, मुख़ालिफ़ीन – विरोधी, सफ़्फ़ाकी – निष्ठुरता
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September 19, 2009 at 8:10 PM (कविता-पोस्टर)
Tags: नागार्जुन
घूम रहे हैं राजपथों पर डाकू अंगुलीमाल – नागार्जुन
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)
शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.
इस बार का कविता-पोस्टर है, नागार्जुन की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.
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०००००००
रवि कुमार
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September 15, 2009 at 8:13 PM (कविताएं)
Tags: आसमान, क्षितिज, धरा, मिलन
आसमान फिर सिमट रहा है
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

आसमान जब भी उतरता है धरा पर
उसके पास होते हैं
सूरज, चाँद, सितारे
और एक असीमित फैलाव
उन्मुक्त उड़ान के लिए
धरा
चाँद सितारों से दमकती
अनन्त ओढ़नी को
क्षण भर भी अपने पर
लिपटे रहने के रोमांच में
अभिभूत हो उठती है
इस अभिभूत क्षण में
आसमान सिमटता है चुपचाप
झुकता है तेजी से
और धरा में समा जाता है
जब तक धरा
लौटती है आपे में
आसमान फैल चुका होता है
वैसे ही
दूर बहुत दूर
उसी निर्लिप्तता से
और धरा
एक हसीं ख़्वाब टूट जाने की तरहा
ठगी सी रह जाती है
हमें ऐसा ही लगता है
कितना मधुर मिलन हो कर चुका है
क्षितिज पर
धरा और आसमान का
उफ़
आसमान फिर से सिमट रहा है
एक और क्षितिज पर…
०००००
रवि कुमार
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September 5, 2009 at 8:05 PM (कविता-पोस्टर, कविताएं)
Tags: अंधेरा, भेडिये, रवि कुमार, ravi kumar, ravikumarswarnkar
फिर से लौटेंगे भेड़िए – रवि कुमार
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)
एक कविता पोस्टर ख़ुद की कविता पर भी लिख मारा था.
इस बार अपनी कोई कविता ही देना चाहता था, सोचा चलो यह पोस्टर ही पोस्ट कर दूं.
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०००००
रवि कुमार
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