असली इंसान की तरह जिएंगे – मार्क्स

असली इंसान की तरह जिएंगे – मार्क्स
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, मार्क्स की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

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०००००

रवि कुमार

 

दीपावली फिर टल गई

दीपावली फिर टल गई
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

deep

आफ़ताब का दम भरने वाले
दिए की लौ से खौफ़ खा गए

आखिर ब्लैकआउट के वक्त
उनके ही घर से
रौशनी के आग़ाज़ का जोखिम
वे कैसे उठा सकते थे

आफ़ताब के सपने संजोती
उनकी ओर ताक रही निगाहें
नागहां बौखला गईं
और चूल्हों की आंच को
राख में रपेट दिया गया

दीपावली
एक बार फिर टल गई

०००००
रवि कुमार

आफ़ताब – सूर्य, आग़ाज़ – शुरूआत, नागहां – अचानक

यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म

यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhta )

यहां-वहां कई जगह आजकल बरतनों की खनखनाहट का दौर जारी है. दादी जी कहा करती थी रसोईघर से आती ऐसी आवाज़े बताती हैं कि कौरानी का ध्यान आज और कहीं है, किसी और बात पर नाराज़ी है और कहीं और उलझ गई है.

वर्तमान दौर की समस्याएं पुरजोर तरीके से हमारे सामने मुंह बाए खड़ी हैं. हमें अक्सर वह अनुपस्थित कारण समझ नहीं आता जो कि मूल में होता है, और हम दिखती सी या दिखाई जाती चीज़ों में उलझ कर अपना बचा खुचा तिया-पांचा करते रहते हैं, यह हमारे दादाजी कहा करते थे.

दादाजी नहीं रहे, पर दादी जी हैं जो अभी भी सब कुछ ठीक रहे, शांति रहे, चोंचों को चुग्गा-पानी मिलता रहे, बगिया में मीठा कलरव गूंजता रहे, इसकी लगातार प्रार्थना करती रहती हैं.

कुछ चोंचों को ज़्यादा चुग्गा-पानी नसीब हो रहा है, कुछ चोंचों के पास फ़ाकामस्ती का आलम है. चारों तरफ़ चीं-चां-चां-चूं छाई हुई है, लहुलुहान होना ही कहीं सुकून का वायस बना हुआ है. बाजों की बन आई है, इससे बेहतर अभीष्ट पूर्ति उन्हें और क्या नसीब हो सकती है.

बाजों और गिद्धों को साम्राज्य पूरी दुनिया को गिरफ़्त में ले रहा है. कबूतरों की शामत है.

अपनी-अपनी लुकाठी दबाए, हम अल्मस्त हैं.

एक कविता पोस्टर देखिए, और क्या कहा जाए….मज़ा लीजिए?

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०००००

रवि कुमार

रौशनी का महाविस्फोट – महेन्द्र नेह

रौशनी का महाविस्फोट – महेन्द्र नेह
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, महेन्द्र नेह की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

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०००००

रवि कुमार

समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता

हरीश भादानी जी नहीं रहे. कल २ अक्टूबर को उनका निधन हुआ.

जो उन्हें जानते हैं, वे सब जानते ही हैं.
वे जन-आंदोलनों के प्रिय जनकवि रहे हैं. कई कला-विधाओं के जरिए जन-जन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने और जागॄति की अलख जगाने वाले, बीकानेर (राजस्थान) के भादानी जी सामाजिक व राजनैतिक जागरुकता के लिए सदैव संघंर्षरत रहे.

उनका एक गीत हम बचपन में खूब गाया करते थे:

रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है
बोले खाली पेट की, करोड़-करोड़ कुंदियां
खाकी वर्दी वाले भोपें, भरे हैं बंदूकियां
राज के विधाता सुन, तेरे ही निमत हैं
रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है
०००००

आज की यह कविता उन्हीं की स्मृति को समर्पित।

समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता
( a poem by ravi kumar, rawatbhata)

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समन्दर
कभी ख़ामोश नहीं हुआ करता

उस वक़्त भी नहीं
जबकि सतह पर
वह बेहलचल नज़र आ रहा हो
लाल क्षितिज पर सुसज्जित आफ़ताब को
अपने प्रतिबिंब के
समानान्तर दिखाता हुआ
बनाता हुआ
स्याह गहराते बादलों का अक़्स

उस वक़्त भी सतह के नीचे
गहराइयों में
जहां कि आसमान
तन्हाई में डूबा हुआ लगता है
एक दुनिया ज़िन्दा होती है
अपनी उसी फ़ितरत के साथ
जिससे बावस्ता हैं हम

कई तूफान
करवटें बदल रहे होते हैं वहां
कई ज्वालामुखी
मुहाने टटोल रहे होते हैं वहां

ज़िंदगी और मौत के
ख़ौफ़नाक खेल
यूं ही चल रहे होते हैं वहां

उस वक़्त भी
जबकि समन्दर
बेहद ख़ामोश नज़र आ रहा होता है

०००००
रवि कुमार

भगतसिंह – हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली

हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली
( a poster on bhagatsingh by ravi kumar, rawatbhata)

हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली

ये मुश्ते ख़ाक है फ़ानी रहे या ना रहे

bhagatsingh

०००००००००

रवि कुमार

ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा

ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

roohom mein

मैं आऊंगा
जब चाक हो जाएगी हर राह
कि जब हर तरफ़ बिछी होंगी
बारूदी सुरंगें
और जबकि हमेशा के लिए
चुक जाएगी बारिश की उम्मीद

मैं आऊंगा
जब तुम्हारे सुर्ख़ लब तड़पने लगेंगे
एक तवील बोसे के लिए
कि जब तुम समझ चुकी होगी
चारों तरफ़ दीवारें होने का सबब
जबकि तुम तन्हाई में
कर रही होगी मौत की दुआ

मैं आऊंगा
फिर हम तुम गाएंगे मिलकर
ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा
और क़त्लगाह के
ख़ूं से सने हर सुतून पर
कर देंगे तहरीर
शबे-वस्ल की महक को

इससे पहले कि
हमारे मुख़ालिफ़ीन
सफ़्फ़ाकी से मुक़र्रर करें
हमारे लिए
सज़ा-ए-मौत

हम रूहों में तब्दील हो जाएंगे

०००००
रवि कुमार

तवील बोसा – लंबा चुंबन,  मुकद्दस – पवित्र,  सुतून – खंभा
तहरीर करना – लिखना,  शबे-वस्ल – मिलनरात्रि,  मुख़ालिफ़ीन – विरोधी,  सफ़्फ़ाकी – निष्ठुरता

घूम रहे हैं राजपथों पर डाकू अंगुलीमाल – नागार्जुन

घूम रहे हैं राजपथों पर डाकू अंगुलीमाल – नागार्जुन
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, नागार्जुन की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

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०००००००

रवि कुमार

आसमान फिर सिमट रहा है

आसमान फिर सिमट रहा है
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

n2

आसमान जब भी उतरता है धरा पर
उसके पास होते हैं
सूरज, चाँद, सितारे
और एक असीमित फैलाव
उन्मुक्त उड़ान के लिए

धरा
चाँद सितारों से दमकती
अनन्त ओढ़नी को
क्षण भर भी अपने पर
लिपटे रहने के रोमांच में
अभिभूत हो उठती है

इस अभिभूत क्षण में
आसमान सिमटता है चुपचाप
झुकता है तेजी से
और धरा में समा जाता है

जब तक धरा
लौटती है आपे में
आसमान फैल चुका होता है
वैसे ही
दूर बहुत दूर
उसी निर्लिप्तता से

और धरा
एक हसीं ख़्वाब टूट जाने की तरहा
ठगी सी रह जाती है

हमें ऐसा ही लगता है
कितना मधुर मिलन हो कर चुका है
क्षितिज पर
धरा और आसमान का

उफ़
आसमान फिर से सिमट रहा है
एक और क्षितिज पर…

०००००
रवि कुमार

फिर से लौटेंगे भेड़िए – रवि कुमार

फिर से लौटेंगे भेड़िए – रवि कुमार
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

एक कविता पोस्टर ख़ुद की कविता पर भी लिख मारा था.

इस बार अपनी कोई कविता ही देना चाहता था, सोचा चलो यह पोस्टर ही पोस्ट कर दूं.

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०००००

रवि कुमार

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