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लेखक होने का मतलब – एदुआर्दो गालेआनो

लिखने के लिए
निबंध : एदुआर्दो गालेआनो

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उरुग्वे में जन्में एदुआर्दो गालेआनो ( १९४० ) ने लेखन की शुरुआत प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं में लिखने से की और इसी वज़ह से सैन्य तानाशाही के दमन का शिकार बनकर देश छोड़ने को मजबूर होना पड़ा. लेखन और सक्रिय भागीदारी से उन्होंने सामाजिक बदलाव के संघर्षों में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई और वे महत्त्वपूर्ण समकालीन लातिन अमरीकी लेखकों में शुमार किए जाते हैं.

स्पेनिश से पी.कुमार मंगलम द्वारा अनुवादित उनका महत्त्वपूर्ण आलेख “लिखने के लिए” समयांतर के अक्तूबर’२०११ अंक में प्रकाशित हुआ था. इसमें उन्होंने लेखन और साहित्य से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को लातिन अमेरिकी संदर्भों में उठाया है, जो अपने कलेवर में सार्विक रूप ग्रहण कर लेते हैं. यहां उस आलेख के कुछ ऐसे ही सार्विक अंश प्रस्तुत किए जा रहे हैं.

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“जब भी कोई लिखता है तो वह औरों के साथ कुछ बांटने की जरूरत ही पूरी कर रहा होता है। यह लिखना अत्याचार के ख़िलाफ़ और अन्याय पर जीत के सुखद अहसास को साझा करने के लिए होता है। यह अपने और दूसरों के अकेले पड़ जाने के अहसास को ख़त्म करने के लिए होता है। यह माना जाता है कि साहित्य ज्ञान और समझ को फैलाने का ज़रिया है और यह पढ़ने वालों की भाषा और आचरण पर असर डालता है। लेकिन ‘बाकी लोगों’ और ‘दूसरों’ जैसे शब्द बड़े हे भ्रामक हैं, खासकर संकट के समय जब सही और ग़लत की पहचान जरूरी हो जाती है तब तो ऐसे भ्रामक शब्द झूठे भी हो सकते हैं। दरअसल, लिखा उन्हीं के लिए जाता है जिनके नसीब या बदनसीबी के साथ जुड़ाव महसूस किया जाता है। ये वो लोग हैं जो न ढंग का खा सकते हैं न सो सकते हैं, वे इस दुनिया के सबसे दबे-कुचले, अपमानित और इसलिए सबसे भयंकर विद्रोही लोग हैं।

इनमें से ज़्यादातर पढ़ना नहीं जानते हैं। थोड़े से पढ़े-लिखे लोगों में से कितनों के पास इतना पैसा है कि वे किताबें खरीद सकें? तब कोई भी क्या सिर्फ़ यह कहकर कि वह “आम लोगों” ( जो अभी के दौर में एक भ्रामक लेकिन बहुत प्रचलित रहने वाला शब्द है ) के लिए लिख रहा है, इस भयंकर सच्चाई से मुंह मोड़ सकता है?”

“सवाल यह है कि हम जैसे लोग जो बेआवाज़ लोगों की आवाज़ बनना चाहते हैं वे इस भयानक माहौल में कैसे काम करें? जब डंडे और बाज़ार के ज़ोर से सबको गूंगा-बहरा बनाया जा रहा है तब क्या हम अपनी बात सुना सकते हैं? आज के हमारे लोकतंत्र दरअसल चुप्पी और डर पैदा करने वाले लोकतंत्र हैं। ऐसे में लेखकों के लिए जो भी थोड़ी से जगह बची है क्या वह व्यवस्था के आगे समर्पण और इसलिए इनकी हार का सबूत नहीं है? हमारी लेखकीय आज़ादी की सीमा क्या है और हम इससे किन लोगों को फायदा पहुंचा रहे हैं? न्याय और आज़ादी के लिए भूख तथा खुले प्रत्यक्ष-परोक्ष दमन करने वाली व्यवस्था के ख़िलाफ़ बात करना और लिखना है तो बहुत अच्छा लेकिन सत्ता हमें यह छूट किस हद तक और कब तक देती है? ऐसे और भी कई सवाल हैं।”

“….लेखक एक संस्कृति उद्योग के दिहाड़ी मजदूर हैं जो भद्र अभिजात वर्ग की उपभोक्तावादी जरूरतों को पूरा करते हैं, वे ख़ुद भी इसी तबके से आते हैं और इसी के लिए लिखते हैं। यही लेखकों की नियती है कि उनका लिखना ले-देकर सामाजिक गैरबराबरी कायम रखने वाली विचारधारा द्वारा तय सीमा के भीतर ही होता है। साथ ही, हम जैसे लेखक जो इन हदों को तोड़ना चाहते हैं उनका भी यही हाल है।

हम जैसे समाज में रहते हैं वहां आबादी के बड़े हिस्से की रचनात्मक क्षमताओं और संभावनाओं को लगातार ख़त्म किया जा रहा है। कुछ नया रचने-गढ़ने का काम जो जीने के दर्द को साझा करने और मौत से लड़ने के लिए जरूरी है अब चंद पेशेवर ‘विशेषज्ञों’ या ‘बुद्धिजीवियों’ के भरोसे छोड़ दिया गया है। हम जैसे कितने ऐसे ‘बुद्धिजीवी’ लातिन अमेरिका में हैं? हम लिखते किनके लिए हैं और किनकी बात करते हैं? हमारा लिखा किन लोगों की आवाज़ बनना चाहिए? तालियों की गड़गड़ाहट और पुरस्कारों के सपने से आगे बढ़कर हमें ये सवाल ख़ुद से पूछने होंगे। क्योंकि कभी-कभी हमारी तारीफ़ सबसे ज़्यादा वही करते हैं जिन्हें हमारे लिखने से कोई ख़तरा नहीं महसूस होता।

दरअसल, लिखना कुछ-कुछ मौत से लड़ने जैसा है। यह लड़ाई है हमारे अंदर और बाहर फैली मुर्दा उदासी और बेरुखी के ख़िलाफ़। लेकिन यह आने वाली पीढ़ियों के काम तभी आ सकता है जब यह अपनी पहचान के लिए संघर्षरत समुदाय की जरूरतों से ख़ुद को जोड़ लेता है। मेरी समझ में एक लेखक का मौत की तरह तारी होती उदासी से ख़ुद को बचाना और अपने लिखे की ताकत पहचानना ही बाकियों को उनकी पहचान देता है। इस तरह, इंसानियत की इस लड़ाई में कला और साहित्य हथियार लेकर चलने वाले अगुआ पंक्ति के सिपाही की तरह हैं, किसी राजा के आरामगाह की चीज़ नहीं।”

“थोपी गई बाहरी संस्कृति के हाथों अपनी पहचान हारने और अपने पसीने, खून और सपने की कीमत पर पूंजी और मुनाफ़ा बनाती-बांटती व्यवस्था को ज़िंदा रखने वाले ऐसे ही लोगों के लिए ‘मास कल्चर’ का झुनझुना तैया किया गया है। यह और कुछ नहीं बल्कि ‘मास’ के लिए ‘कल्चर’ के नाम पर लोगों के बोलने, विचारने, कुछ कहने और करने की भावनाओं को नियंत्रित करना ही है। जनता के लिए पेश यह ‘मास कल्चर’ सच देख सकने की हमारी क्षमता को ही कुंद करता है और बदले में हमें कुछ करने, बनाने और नया रचने के झूठे अहसास से भर देता है।

यह जाहिर है कि यह लुभावना मास कल्चर हमें अपनी अस्मिता को पाने की दशा में आगे नहीं बढ़ाता, उल्टे अलग-अलग तरीक़े से हमें एक खास ढंग से जीने को बाध्य करता और खरीददार बनाता यह मास कल्चर हमें इस लड़ाई से ही अनजान और उदासीन बना देता है। शासक वर्ग द्वारा विकसित देशों से सीधे-सीधे आयातित और ‘वैश्वीकरण’ और ‘विश्व-सभ्यता’ करार दिए गए बेचने-खरीदने और मुनाफ़ा कमाने की संस्कृति को ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ का नाम दे दिया गया है। हमारे दौर की यह तथाकथित ‘विश्व सभ्यता’ बाज़ार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खुली छूट और टी.वी. तथा अन्य संचार माध्यमों के फैलते जाल से चुनिंदा विकसित देशों के हित साधने वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था के शिकंजे का पूरी दुनिया पर कसते जाने का ही दूसरा नाम है। यही चुनिंदा और दुनिया के मालिक बने बैठे देश पूरी दुनिया को मशीनें, पेटेंट और साथ ही इस पूरी व्यवस्था को चलाने के लिए कुछ मंत्र भी बेचते हैं जिसे वह ‘विचारधारा’ का नाम देते हैं।”

“हालात यह हैं कि सिर्फ़ कुछ ही लोग सुख-सुविधाओं के पहाड़ पर बैठे हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि बाकी सारे लोग नीचे रहकर उन्हें देखें और किसी दिन ऊपर पहुंच जाने का सपना देखते रहें। यहां गरीबों को अमीरी, गुलामों को आज़ादी, हारे हुओं को जीतने और जिनकी हड्डियां तक चूस ली गई हैं उन्हें दुनिया पर राज करने के सपने बेचे जाते हैं। गैरबराबरी पैदा करने वाली व्यवस्था को बनाए रखने की जरूरत का अहसास टी.वी., रेडियो और फिल्में कराती हैं जो दिन-रात सबकी समझ में आ सकने वाले अंदाज़ में व्यवस्था का संदेश फैलाती रहती हैं। हर एक मिनट में बीमारी और भूख से एक बच्चे की हत्या करने वाली यह व्यवस्था हमें अपने हिसाब से ढाल लेने और इस अन्याय का हिस्सा बनाने के सभी उपाय करती है। हमें यह सिखाया जाता है कि दुनिया हमेशा से ऐसी ही रही है और सबकुछ ठीक चल रहा है। शासन करने वाला दल ही देश हो जाता है और विरोध की आवाज़ उठाने वालों को बड़ी ही आसानी से गद्दार या विदेशी जासूस करार दिया  जाता है। ‘जंगल के कानून’ को ‘कानून का राज’ घोषित कर दिया जाता है ताकि लोग सबकुछ क़िस्मत का खेल मानकर चुपचाप बैठे और सहते रहें।”

“रोज जब टी.वी. और सिनेमा के पर्दे पर हारने वाले को ‘कमज़ोर’ और हराने वाले ‘मजबूत’ बताए जाते हैं तब यह इतिहास में दर्ज़ कुछ देशों द्वारा दूसरे देशों को खोखला कर कमज़ोर बना देने के अनेकों ‘बहादुर’ और ‘मजबूत’ कारनामों को जायज़ ठहराने के लिए ही होती हैं। पैसे की बर्बादी, भद्दा प्रदर्शन और अच्छे बुरे का खयाल न करते हुए सिर्फ़ अपना मतलब निकालना अब कोई बुरी बात नहीं बल्कि ‘कामयाब’ इंसान की पहचान मानी जाती है। यहां सब कुछ खरीदा, बेचा, किराये पर लिया और खाया-पचाया जा सकता है। यहां तक कि आत्मा भी।….टी.वी. और सिनेमा के पर्दे देशों की सामाजिक समस्याओं और ज़मीनी राजनीतिक हालात से कोसों दूर बनावटीपन और अश्लीलता की एक अलग ही दुनिया रचते हैं। पश्चिमी देशों से लाए गए टी.वी. कार्यक्रम योरोप और अमेरीका छाप लोकतंत्र का पाठ पढ़ाते हैं और वह भी बंदूक और फास्ट फूड की जय-जयकार के साथ।”

“देशों की आबादी का बड़ा हिस्सा काम की तलाश में भटक रहे नौजवानों का है जिनके गुस्से के किसी दिन फूट पड़ने का डर सरकार चला रहे लोगों की नींद उड़ाए हुए है। यहीं से इस संभावित आक्रोश को कुंद करने की सारी साजिशें शुरू हो जाती हैं। नशे की लत लगाकर युवाओं को उनके समाज से ही काट देना और कुछ कर गुजरने की इच्छा-शक्ति ख़त्म कर देना लगातार किए जा रहे ऐसे ही उपायों में से एक है। इसलिए बेतहाशा बढ़ रही आबादी को रोकने की बजाए, यहां लोगों के सोचने-समझने की क्षमता ज़्यादा कारगर तरीक़े से नियंत्रित की जाती है।….पुरानी, बदलाव की घोर विरोधी और पुलिसिया दमन पर टिकी सरकारों वाले देशों में नई पीढ़ी का व्यवस्था में कोई दखल ही नहीं है।”

“सत्तर के दशक में योरोप और अमेरिका की ठहरी और पुरानी पड़ चुकी व्यवस्थाओं के ख़िलाफ़ हुए युवा संघर्षों के नारे, उनके प्रतीक, उनका मिजाज़ और सपने अब बाज़ार के कब्ज़ें में है। नया संसार उभारने वाली छवियां अब ‘आज़ादी’ के नारे साथ बेची और खरीदी जाती हैं। इसी तरह, उनका संगीत, उनके पोस्टर, बाल बनाने और कपड़े पहनने का उनका खास अंदाज़ अब नशे की लत में सपने ढूंढ़ने वाली पीढ़ी और ‘तीसरी दुनिया’ में ऐसे ही सामानों के फैल रहे कारोबार में काम आ रहे हैं।….उद्योगप्रधान समाज के द्वारा राजनीतिक-आर्थिक सच्चाइयों से पूरी तरह काट दिए गए तबके की दबी-छुपी बेचैनियों से जन्मी इस भ्रामक ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ का हमारी अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है। यह तो अधिक से अधिक लोगों को कुछ कर दिखाने का भ्रम ही देती है…यह सभी सामाजिक बंधनों और जिम्मेदारियों को नकार कर हमें आस-पास की सच्चाइयों से दूर कर देती है, और होता यह है कि सबकुछ यूं ही चलता रहता है और हम अपनी ही रची इस नकली दुनिया के खयालों में खोए रह जाते हैं जो हमें बिना लड़े और तकलीफ़ झेले सबकुछ पाने की ख़ुशफहमी से बांधे रखता है।”

“तो लोगों को झकझोरकर जगा देने और उन्हें आस-पास की सच्चाई से रू-ब-रू करने का काम कैसे किया जाए? जब दुनिया इस दौर के कठिन हालात से रू-ब-रू है तो क्या साहित्य हमारे काम आ सकता है?….ऐसे समय में जब हम अपनी अलग-अलग इच्छाओं और सपनों के साथ एक-दूसरे को सिर्फ़ फायदे और नुकसान के नज़रिए से देख-समझ और परख पा रहे हैं तब सबको साथ लेकर चलने और दुनिया की तस्वीर बदलने का ख़्वाब संजोने वाले साहित्य की क्या भूमिका हो? हमारे आस-पास के हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लिखना और कुछ नहीं बल्कि एक के बाद दूसरी समस्याओं की बात करना और उनसे भिड़ना हो गया है। तब हमारा लिखना किन लोगों के ख़िलाफ़ और किनके लिए हो?….हम जैसे लेखकों की क़िस्मत और सफ़र बहुत हद तक बड़े सामाजिक बदलावों की जरूरत से सीधे-सीधे जुड़ा है। लिखना इस बदलाव के लिए लड़ना ही है क्योंकि यह तो तय है कि जब तक गरीबी, अशिक्षा और टी.वी. तथा बाकी संचार माध्यमों के फैलते जाल पर बैठी सत्ता का राज कायम रहेगा तब तक हमारी सबसे जुड़ने और साथ लड़ने की सभी कोशिशे बेकार ही रहने वाली हैं।”

“जब किसानों-मज़दूरों सहित आबादी के बड़े हिस्से की आज़ादी ख़त्म की जा रही है तब सिर्फ़ लेखकों के लिए कुछ रियायतों या सुविधाओं की बात से मैं सहमत नहीं हूं। व्यवस्था में बड़े बदलावों से ही हमारी आवाज़ एलीट महफ़िलों से निकलकर खुले और छिपे सभी प्रतिबंधों को भेद कर उस जनता तक पहुंचेगी जिसे हमारी जरूरत है और जिसकी लड़ाई का हिस्सा हमें बनना है। अभी के दौर में तो साहित्य को इस गुलाम समाज की आज़ादी की लड़ाई की उम्मीद ही बनना है।”

“इसी तरह, यह सोचना भी ग़लत होगा कि जीने के रोज के संघर्षों से जूझ रही बदहाल जनता सिर्फ़ साहित्य और कला के माध्यम से अपनी छीनी जा चुकी सृजन-क्षमता को दोबारा पा सकेगी। जीवन की कड़वी सच्चाइयों के मारे कितने ही प्रतिभाशाली लोग कुछ करने से पहले ही समय के अंधेरे में खो जाते हैं।….कभी न पूरे होने वाले सपने के जाल में फंसी और अपने आस-पास की सच्चाइयों से अनजान जनता आखिर बदलाव लाए तो कैसे? यह उम्मीद करना तो बेमानी ही होगा कि यह जनता अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की जरूरत ख़ुद ही समझ जाएगी। तो क्या ऐसे में लोगों को लड़ने की जरूरत का अहसास – चाहे प्रत्यक्ष हो या परोक्ष – साहित्य नहीं करा सकता? मेरी समझ से यह बहुत कुछ इस बात से भी तय होता है कि लेखक अपने लोगों की पहचान, उनके कामकाज और उनकी क़िस्मत को बनाने-बदलने वाले हालात के साथ कितनी गहराई से जुड़े हैं?”

“हमारी असली पहचान इतिहास से जन्मती और आकार लेती है जो पत्थर पर पड़े और सुरक्षित हो चुके पैरों के निशान की तरह समय के अलग-अलग पड़ावों से होकर गुजरे हमारे सफ़र का गवाह बना रहा है। लेकिन, इतिहास से यह जुड़ाव पुरानी चीज़ों और यादों से चिपके रहना नहीं है जो बड़ी आसानी से कट्टरता का रूप भी ले सकता है। इसी तरह, यह भी तय है कि अब तक दबी हुई पहचान कुछ खास तरह के कपड़ों, रीति-रिवाजों, और चीज़ों से हमारे दिखावटी मोह से भी जाहिर नहीं होती। ये सब तो विकास की दौड़ में हरा और पछाड़ दिए गए देशों के बाज़ारों में विदेशी पर्यटकों को लुभाने के काम ही आते हैं। हम वही हैं जो हम करते हैं, खासकर हम जो हैं उसे बदलने के लिए जो कुछ करते हैं। हमारी पहचान हमारे इन्हीं कामों और हमारे संघर्षों से बनती है। इसलिए पहचान की यह लड़ाई व्यवस्था के उन सभी रूपों से लोहा लेना है जो हमें सिर्फ़ एक आज्ञाकारी कामगार और खरीददार बनाती है। तब लेखक होने का मतलब इस चुनौती और प्रतिरोध की आवाज़ बनना ही है।”

“अपने दौर के तमाम संकटों और बदलाव की चाह को समेटे तथा सभी तरह के खतरों से भिड़ने वाला साहित्य ही नयी और बेहतर दुनिया की तस्वीर दिखा सकता है और ख़्वाब देखने की हिम्मत और हुनर वाले लेखकों के ज़रिए वह इस दुनिया को हासिल करने का रास्ता भी दिखा सकता है। जाहिर है, ….अन्याय और उदासी के माहौल में साहित्य का अपना एक अलग महत्त्व है।”

“आबादी का बड़ा हिस्सा जब जीने के संघर्षों में लगा है तब कुछ लेखक ‘विशिष्ट’ होने का दावा करते हुए अपने लिए सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। कुछ ऐसे भी लेखक हैं जो सरकारी दमन की स्थिति में साहित्य को ही कोसते हुए सत्ता के साथ हो लेते हैं। मैं इन दोनों ही बातों के बिल्कुल ही ख़िलाफ़ हूं। लेखक न तो कोई भगवान होता है और न ही व्यवस्था की मर्जी का गुलाम। यह सही है कि हम आसपास की घटनाओं से प्रेरणा लेकर अपना साहित्य बुनते हैं लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि हम अपने को सिर्फ़ यहीं तक सीमित रखें। देखा जाए तो लिखना एक गतिविधी ही है, यह अपने आप में कोई जादुई चीज़ नहीं है, लेकिन जब एक लेखक हमें इस दुनिया का असली रंग देखने और बेहतर दुनिया बसाने का हौसला देने वाले लोगों और अनुभवों के साथ ला खड़ा करता है तब उसके लिखे का असर किसी जादू से कम भी नहीं होता। साथ ही, अगर उसका लिखा लोगों को विद्रोही और सत्ता के लिए ‘अपराधी’ बनाने के साथ-साथ उनकी सोच बदलता या उसे नए आयाम देता है तब वह बदलाव की लड़ाई का हिस्सा जरूर बन सकता है। संघर्षों से ऐसे सहज रूप से जुड़े लेखक अभिमान और ख़ुद को अच्छा साबित करते रहने की होड़ में नहीं रहते क्योंकि वे जानते हैं कि उनका सफ़र औरों से अलग और ज़्यादा कठिन है।”

“मेरे ख़्याल से सिर्फ़ अपनी सोच और अंतहीन उलझनों को जाहिर करने के लिए शब्दों की बाजीगरी करने वालों को लिखना छोड़ देना चाहिए। शब्द तो अपने पूरे अर्थ के साथ अन्याय के ऊपर ज़िंदगी जा जश्न मनाने वालों के लिखे में ही आकार लेते हैं। हमें पास बैठ कर बात करने वाले चाहिए, दूर बैठ कर तमाशा देखने वाले नहीं। हम बातचीत और मेलजोल बढ़ाने के लिए हैं सिर्फ़ तालियां पाकर, बाकी सबकुछ अपनी जगह छोड़कर, ख़ुश होने को मजबूर तमाशा दिखाने वाले नहीं। लिखना लोगों से मिलने की हमारी जरूरतें पूरी करता है, कुछ इस तरह से कि हमें पढ़ने वाले हमसे अपने जज़्बात शब्दों के ज़रिए साझा करें जिन्हें हम उम्मीदों और सपनों की शक्ल देकर उन तक पहुंचाएं।”

“साहित्य अपने-आप सबकुछ ठीक कर देगा यह मानना खामख्याली ही होगी। लेकिन बदलाव की लड़ाई में साहित्य की भागीदारी को सिरे से खारिज करना भी सरासर बेवक़ूफ़ी होगी। लिखते समय हम इस व्यवस्था से तय होती हमारी सीमाओं से अच्छी तरह वाकिफ़ होते हैं। सच कहें तो यही सीमाएं समाज की सच्चाइयों को हमारे सामने खोलती भी हैं। हम अपनी इन्हीं सीमाओं के साथ हताशा और निराशा से भरे इस दौर में व्यवस्था से भिड़ते हुए अंततः इन सीमाओं को भी ध्वस्त कर सकते हैं।….हमारे लिखने की सार्थकता तभी है जब हम अपनी बात बिना डरे, पक्के इरादे के साथ और बेबाकी से रख पाएं और एक बेहतर दुनिया का सपना देकर लोगों को लड़ने का हौसला दे पाएं। हमारी ख़्वाहिश ऐसी भाषा गढ़ने की है जो जनसंघर्षों से डरी और पराजित हो रही व्यवस्था की चाकरी करने वाले लेखकों की वाह-वाह और जय-जयकार के उलट कहीं ज़्यादा बेख़ौफ़ और खूबसूरत हो।”

“लेकिन सवाल सिर्फ़ भाषा का ही नहीं है। सवाल यह भी है कि हम अपनी बात रखते कैसे हैं। प्रतिरोध की संस्कृति को अपनी बात रखने के लिए सभी मौजूद तरीक़े काम में लाने होंगे और संवाद के किसी भी माध्यम या अवसर को छोटा समझने की ‘एलीट’ सोच से बचना होगा। हमारे पास समय कम है, लड़ाई मुश्किल और करने को बहुत कुछ है। सामाजिक बदलाव के लिए लड़ रहे लोगों के लिए लिखना इस लड़ाई के बहुत से मोर्चों में से एक है। हम यह नहीं मानते कि साहित्य सिर्फ़ बुर्जुआ वर्ग के घरों की शेल्फों में सजाकर रखी जाने वाली कोई चीज़ भर है।….लोगों को सुपर मार्केट और हवाई ज़िंदगी की मदहोशी देकर सच से बेख़बर बना देने वाले संचार माध्यमों के फैलते-कसते जाल से लड़ती-भिड़ती अपनी आवाज़ बुलंद करती जनवादी पत्रकारिता एक बेहतर दुनिया का सपना देने वाली कितनी ही आवाज़ों के बलिदान की गवाह बनी है। अपनी रचनात्मकता और प्रभाव में यह किसी भी ‘महान’ और ‘बेस्टसेलर’ करार दिए गए उपन्यासों या कहानियों से कम नहीं है।”

“मुझे विश्वास है अपने काम पर और शब्द के अपने हथियार पर। मैं यह कभी नहीं समझ पाया कि भुखमरी और बेकारी के इस दौर में साहित्य की सीमाओं की दुहाई देने वाले लोग फिर लिखते ही क्यों हैं? या फिर यह भी कि क्यों लोग शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने या चंद नारों या पार्टी दस्तावेज़ों के लिए अपनी भक्ति दिखाने के लिए करते हैं? शब्द तो एक हथियार की तरह हैं, यह हम पर निर्भर करता है कि हम चाहें तो इससे व्यवस्था को उलट देने का हौसला दे दें या ‘सबकुछ अच्छा चल रहा है’ मानकर प्रकृति और ईश्वर का गुणगान करते रहें।”

“सच कहूं तो अभी के….साहित्य के लिए सबसे बड़ा काम बेहतर दुनिया की हमारी साझी समझ के ख़िलाफ़ बेधड़क और खुलेआम चल रहे सरकारीकरण और बाज़ारीकरण से शब्दों को बचाना है। क्योंकि आजकल ‘आज़ादी’ मेरे देश की एक जेल का नाम है और तानाशाह सरकारों ने ख़ुद को
‘लोकतंत्र’ घोषित कर रखा है। अब ‘प्यार’ इंसान का अपनी गाड़ी से लगाव और ‘क्रांति’ बाज़ार में आए किसी नये ब्रांड़ के धमाकेदार प्रचार के काम आ रहे हैं। अब हमें खास और मंहगे ब्रांड का साबुन रगड़ने पर ‘गर्व’ और फास्ट-फूड खाने पर ‘ख़ुशी’ का अहसास होता है। ‘शांत देश’ दरअसल बेनाम कब्रों की लगातार बढ़ते जाने वाली कतार है और ‘स्वस्थ’ इंसान वह है जो सबकुछ देखता है और चुप रहता है।”

“धीरे-धीरे….एक नए तरह का साहित्य आकार ले रहा है। ऐसा साहित्य जो लोगों को सबकुछ ख़त्म हो चुकने की उदासी नहीं बल्कि कुछ नया करने की ताकत दे रहा है। यह मार दिए गए हमारे लोगों को इतिहास में दफ़न नहीं करता बल्कि उन्हें हमारे सामने ला खड़ा करता है, यह सबकुछ भूल जाना नहीं बल्कि बल्कि इतिहास के पन्नों से बदलाव की हमारी साझा लड़ाई की वज़हें और जरूरतें ढूंढना सिखाता है। यही साहित्य लड़ने की हमारी परंपरा और उसके गवाह रहे अनगिनत लोकगीतों और कहानियों में गूंज रहे शब्दों का सच्चा साथी और पहरुआ है। अगर हम यह मानते हैं कि इतिहास सिर्फ़ यादें खरौंचने से कहीं ज़्यादा उम्मीद जगाने की कोई चीज़ है तो यह उभरता हुआ साहित्य उन तमाम सारे लोगों को हाथ दे सकेगा जो आज नहीं तो कल किसी भी तरह से उलटबांसियों से भरे हमारे इतिहास को बदल देने वाले हैं।”

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एदुआर्दो गालेआनो
प्रस्तुति – रवि कुमार

‘अनाम’ की नाट्य प्रस्तुति – शिवराम को रचनात्मक श्रृद्धांजलि

अनाम’ की नाट्य प्रस्तुति
“ईश्वर अल्लाह तेरो नाम” का प्रभावी मंचन
सुप्रसिद्ध रंगकर्मी साथी शिवराम को दी गई रचनात्मक श्रृद्धांजलि

shivram - sketch by ravi kumar, rawatbhata२५ दिसंबर २०११. कोटा की रंगकर्मी संस्था ‘अनाम’ अभिव्यक्ति नाट्य एवं कला मंच के रंगकर्मी साथियों ने ‘अनाम’ के संस्थापक, प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं रंगकर्मी साथी शिवराम के निधन के पश्चात हर वर्ष उनके जन्मदिवस पर उनकी स्मृति को समर्पित एक नाट्य प्रस्तुति करने का संकल्प किया था। इसी श्रृंखला में शिवराम के ६३वें जन्मदिवस ( २३ दिसंबर ) के अवसर पर उनको रचनात्मक श्रृंद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन ऐलन इंस्टिट्यूट स्थित सद्‍भाव सभागार में किया गया। इस आयोजन में गीत-दोहों की संगीतमयी प्रस्तुति और प्रबोध जोशी लिखित मशहूर नाटक ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ का मंचन किया गया।

संचालन करते हुए ‘विकल्प’ के अध्यक्ष महेन्द्र नेह ने शिवराम के संघर्षमयी जीवन और क्रांतिकारी मूल्यों पर एक संक्षिप्त वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि शिवराम एक उच्च कोटि के विचारक, सृजनधर्मी, संघर्षशील साथी तो थे ही, लेकिन इससे भी बढ़कर इंसानियत का गहरा जज़्बा और संवेदशीलता उनके रोम-रोम से व्यक्त होती थी। मेहनतकश जन-गण की मुक्ति तथा शोषण-विहीन, पाखण्ड रहित, ज्ञान-विज्ञान-कला और संस्कृति से समृद्ध एवं समानता पर आधारित उन्नत भारत उनके सपनों और संकल्पों की घुरी था। अपने सपनों और संकल्पों को ज़मीन पर उतारने के लिए उन्होंने कई सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्थाओं, ट्रेड यूनियनों-किसान-युवा-छात्र एवं तानाशाही व सांप्रदायिकता विरोधी जन-अधकार संगठनों में स्वयं को खपा कर काम किया और देश भर में अपने सह-विचारकों, सह-कर्मियों, मित्रों व शुभ-चिंतकों का एक विशाल कारवां तैयार किया। उन्होंने कहा कि नाटक के मोर्चे पर उनकी जलाई इस मशाल को कोटा में आशीष मोदी, कपिल सिद्धार्थ, पवन कुमार, अज़हर अली और अनाम के अन्य नौजवान साथियों ने जलाए रखने तथा उनके संकल्पों तथा कार्यों को आगे बढ़ाने का जो संकल्प लिया है और उसे चरितार्थ कर रहे हैं वही उनके प्रति एक सच्ची साथियाना श्रृद्धांजलि है।

कार्यक्रम की शुरुआत में शिवराम द्वारा लिखित गीतों और दोहों को कोटा के ही वरिष्ठ गीतकार एवं संगीतज्ञ शरद तैलंग ने संगीतबद्ध स्वर प्रदान कर उनके प्रभाव को अधिक मार्मिक बना कर प्रस्तुत किया। डॉ.राजश्री गोहटकर ने भी गीत प्रस्तुत किये।

अनाम के साथियों ने इस बार अपनी प्रस्तुति के लिए प्रबोध जोशी के नाटक ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ को चुना। आज की परिस्थितियों में जबकि साम्प्रदायिक और विघटनकारी शक्तियां उभार पर हैं और समाज में नकारात्मक परिदृश्य रचना चाहती हैं, ऐसे में यह नाटक और अधिक मौजूं बनकर सामने आता है। आज़ादी के समय के विभाजन की पृष्ठभूमि में एक पागलखाने पर इसके असरों की पड़ताल के जरिए यह नाटक विभाजन का, सांप्रदायिक और विघटनकारी मूल्यों का मखौल उड़ाता है और साम्प्रदायिक सौहार्द और एकता के नये तर्क गढ़ता है।

इस नाटक में एक पागलखाने में विभिन्न प्रतीकात्मक चरित्र हैं जो अपनी सामान्य पर विशिष्ट दिनचर्याओं में हैं। विभाजन के वक़्त पागलों की भी अदला-बदली का एक आदेश पागलखाने में हड़कंप मचा देता है और शुरुआत होती है नाटकीयताओं से भरपूर दृश्यों की जिनमें डूबते-उतरते दर्शक सभ्य-समाज के साम्प्रदायिक एवं विघटनकारी जैसे पागलपनें के मूल्यों के मखौल और पागलों के सहज मानवतावादी सौहार्द के मूल्यों के साथ अपने को एकाकार करते जाते हैं। कोटा के ही प्रमुख नाट्य-निर्देशक ललित कपूर के सधे हुए निर्देशन में इस नाटक की कोलाज़मयी प्रस्तुति और भी प्रभावशाली हो गई थी जिसको दर्शकों ने भी भरपूर सराहा।

ईश्वर और अल्लाह की मुख्य चरित्र भूमिकाओं में आशीष मोदी और अज़हर अली ने अपने मार्मिक अभिनय द्वारा दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। सुपरिटेण्डेंट की भूमिका में डॉ.पवन कुमार स्वर्णकार, अनामी की भूमिका में राजेश शर्मा (आकाश), विनोद की भूमिका में राजकुमार चौहान, आइजैक की भूमिका में अभियंक व्यास तथा युवती की भूमिका में राजकुमारी ने अपने सराहनीय अभिनय के द्वारा दर्शकों की खूब दाद पाई। संगीत की कमान मनीष सोनी और मोहन सिंह ने संभाली। मैकअप व मंच की अन्य व्यवस्थाएं रोहित पुरुषोत्तम, शिवकुमार एवं रवि कुमार के हाथों में थी।

इस अवसर पर ही अर्जुन कवि स्मृति संस्थान ( राजस्थान ) द्वारा शिवराम को उनके साहित्य एवं रंगकर्म के क्षेत्र में दिये गये विशिष्ट सृजनात्मक योगदान के लिए निधन उपरांत ‘अर्जुन कवि जनवाणी सम्मान’ से सम्मानित भी किया गया। यह सम्मान शिवराम की मां कलावती देवी और पत्नी सोमवती देवी ने ग्रहण किया।

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रवि कुमार

अनुभवी पिता की सीख – शिवराम

अनुभवी पिता की सीख

रेखाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

एक चुप्पी
हजार बलाओं को टालती है
चुप रहना सीख
सच बोलने का ठेका
तूने ही नहीं ले रखा है

दुनिया के फटे में टांग अडाने की
क्या पडी है तुझे
मीन मेख मत निकाल
जैसे और निकाल रहे हैं
तू भी अपना काम निकाल

जैसा भी है
यहां का तो यही दस्तूर है
ये नैतिकता-फैतिकता का चक्कर छोड़
सब चरित्रवान भूखों मरते हैं
कोई धन्धा पकड़
एक के दो, दो के चार बना
सिद्वान्त और आदर्श नहीं चलते यहां
ये व्यवहार की दुनिया है
व्यावहारिकता सीख
अपनी जेब में चार पैसे कैसे आएं
इस पर नजर रख

‘‘मतलब पड़ने पर
गधे को भी बाप बनाना पड़ता है’’
यह कहावत अब पुरानी पड़ गई है
अब कोई गधा बाप बनना पसन्द नहीं करता
आजन्म कुंवारा रहता है
जिन्दगी को भोगता है
बाप का तमगा लिए नहीं फिरता है
इसलिए मतलब पड़ने पर
अब गधे को बाप नहीं
किसी सभा का अध्यक्ष बनाया जाता है
और बताया जाता है
कि ऐसे महापुरूष धरती पर कभी-कभी ही
अवतरित होते हैं
तू भी यह करना सीख

अक्ल का दुश्मन मत बन
ये दीन-दुनिया, देश और समाज के गीत गाना छोड़
किसी बड़े आदमी की दुम पकड़
बड़ा आदमी बन
तेरे भी दुम होगी
दुमदार होगा तो दमदार भी होगा
दुम होगी तो दुम उठाने वाले भी होंगे
रुतबा होगा
कार-कोठी-बंगले भी होंगे
इसीलिए कहता हूं
ऐरों-गैरों नत्थूखैरों को मुँह मत लगा

जो सुख चावे जीव कू तो भौंदू बन के रह
हिम्मत और सूझबूझ से काम ले
और भगवान पर भरोसा रख

शिवराम

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प्रस्तुति – रवि कुमार

उन्हें बिटिया मुर्मू पहचानों – निर्मिला पुत्तुल

उन्हें बिटिया मुर्मू पहचानों – निर्मिला पुत्तुल
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

कोलाज़ - रवि कुमार, रावतभाटा

( यह कंप्युटर अनुप्रयोगों द्वारा तैयार किया गया एक कोलाज़ है )

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रवि कुमार

सब रिस रहे हैं चुप चुप…शमशेर बहादुर सिंह

सब रिस रहे हैं चुप चुप – शमशेर बहादुर सिंह
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

कविता पोस्टर - रवि कुमार, रावतभाटा

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रवि कुमार

ऐसे माहौल में शीशे का मकाँ ठीक नहीं – शकूर अनवर

ऐसे माहौल में शीशे का मकाँ ठीक नही
( gazals by shakoor anavar )

शकूर अनवर, कोटाइस दफ़ा पेश हैं कोटा (राजस्थान) से शायरी के एक अदद हस्ताक्षर जनाब शकूर अनवर की ग़ज़लें. उनके अश्आर अपने सरोकार और रवानगी के साथ सीधे श्रोता से जुड़ जाते हैं, और यही उनकी शायरी का महत्त्वपूर्ण तेवर है. अधिकतर महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में मौज़ूदगी, कुछ दीवान और मुशायरों एवं कवि-सम्मेलनों में शिरकत के साथ-साथ नगर की विभिन्न साहित्यिक सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी उन्हें कोटा का एक अज़ीम शायर बनाते हैं. देखिए किस तरह उनके अश्आर ज़ुबां पे चढ़े जाते हैं.

शकूर अनवर, कोटा

दौरे हाजि़र में सुख़नवर ये बयाँ ठीक नहीं

साफ कहता हूँ सुनो जि़क़्रे-बुताँ ठीक नहीं

वक़्त के हाथ में पत्थर है यह महसूस करो

ऐसे माहौल में शीशे का मकाँ ठीक नही

गज़ल – एक

खुशनसीबी  से   दम   नहीं  निकला
वरना क़ातिल भी कम नहीं निकला

लोग  निकले  हैं  ले  के  तलवारें
और हम से क़लम नहीं निकला

उसकी   बातों  में   है   गुरूर  बहुत
उसके लहजे से ‘हम’ नहीं निकला

जिनकी दानिशवरों में गिनती थी
उनकी  बातों में दम नहीं निकला

हमने कोशिश तो की  बहुत ‘अनवर’
दिल से दुनिया का ग़म नहीं निकला

गज़ल – दो

उनको छूते ही गिरीं सारी की सारी उँगलियाँ
लम्स की तलवार ने  काटी हमारी उँगलियाँ

थी  हवाओं  की शरारत  फिर भी  मेरे  नाम  को
रेत पर लिखने की कोशिश में बिचारी उँगलियाँ

ये  तुम्हारे  इश्क़  के  आसार  कुछ  अच्छे नहीं
दिन में तारे गिन रही हैं फिर तुम्हारी उँगलियाँ

जब तक़ाज़ा अद्ल का हो दस्ते-मुन्सिफ़ क्या करे
मौत  का  फ़रमान  भी  करती  हैं  जारी  उँगलियाँ

बात  सच  है  जिन इशारों से  जलीं  ये बस्तियाँ
उनमें कुछ तो थीं तुम्हारी कुछ हमारी उँगलियाँ

लग रहा है यूँ मुझे ज़ालिम का पंजा देखकर
नौच कर खा जाएँगी जैसे शिकारी उँगलियाँ

जिसकी जो आदत है ‘अनवर’ उससे वो छुटती नहीं
ताश   के    पत्ते    ही    पकड़ेंगी    जुआरी   उँगलियाँ

गज़ल – तीन

देखा जहाँ-जहाँ  वही ख़ंजर बहुत मिले
ख़ूँरेजि़यों के हर कहीं मंज़र बहुत मिले

वौ हौसला  वो अज़्म किसी में नहीं मिला
लोगों के यूँ तो नाम सिकन्दर बहुत मिले

इंसान कम मिले मुझे दुनिया की भीड़ में
या रब  तेरी ज़मीं पे  पयम्बर बहुत मिले

मोती  तुम्हारे  वस्ल  के  नायाब  ही  रहे
लेकिन तुम्हारे हिज्र के गौहर बहुत मिले

हम   से    मसर्रतों   के    रहे   दूर    क़ाफि़ले
‘अनवर’ ग़मों के, राह में लश्कर बहुत मिले

रवि कुमार, रावतभाटा

गज़ल – चार

गाती हुई  कोयल  न  कोई  मोर मिलेगा
शहरों में मशीनों का फ़क़त शोर मिलेगा

आसान नहीं है  तेरा  उस पार पहुँचना
मँझधार में तूफाँ का बड़ा ज़ोर मिलेगा

ऐसे  ही  निगाहों  को   झुकाया  नहीं  करते
जब दिल को टटोलोगे तो इक चोर मिलेगा

बैठे  से  तो दुख-दर्द  कभी ख़त्म न होंगे
हिम्मत जो रखोगे तो कहीं छोर मिलेगा

तपते हुए सहराओं में क्या पाओगे ‘अनवर’
पानी   तो   मेरे   यार   कहीं   और   मिलेगा

गज़ल – पांच

हाथ उस के  बड़ा  अनमोल  गुहर  आ जाये
जिसको इस दौर में जीने का हुनर आ जाये

ग़ौर से देखना बादल भी अगर आ जाये
ईद का चाँद है  शायद  वो नज़र आ जाये

जिसकी मंज़िल पे मुहब्बत के दिये जलते हों
ज़िदगी  में   कोई  ऐसा  भी    सफ़र  आ  जाये

कितना मुश्किल है कड़ी धूप में तनहा चलना
काश   आ   जाए ,  तेरी   राहगुज़र   आ   जाये

काश पढ़ ले वो सितमगर मेरे चेहरे की किताब
काश   उसको  भी   मेरा  दर्द     नज़र  आ  जाये

मैं  बहुत  दूर  किनारे  से  अभी  हूँ   लेकिन
अज़्म रक्खूँ तो ये सहारा मेरे सर आ जाये

यूँ   अचानक   वो   ख़यालों   में   चले  आते  हैं
जिस तरह दिल में किसी बात का डर आ जाये

सालहा  – साल  के   मंसूबे    बनाने     वाले
कौन कह सकता है तू शाम को घर आ जाये

क़ाफ़िला अब मेरा मंज़िल पे रूकेगा ‘अनवर’
अब  नहीं  चाहिए  रस्ते  में  शजर  आ  जाय

शब्दार्थ :
सुख़नवर – कवि, शायर ; दानिशवर – बुद्धिमान, विद्वान ; लम्स – स्पर्श, सहवास
अद्ल – न्याय ; दस्ते-मुन्सिफ़ – इंसाफ़ करने वाले का हाथ ; अज़्म – संकल्प, दृढ़-निश्चय
पयम्बर – ईश-दूत, अवतार, पैग़म्बर ; मसर्रतों – ख़ुशियों ; शजर – वृक्ष, दरख़्त

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शकूर अनवर
प्रस्तुति – रवि कुमार

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – अंतिम भाग

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – अंतिम भाग
शिवराम

( शिवराम का भारतीय समाज के संदर्भों में जनसंस्कृतियों की विकास-अवस्थाओं और साम्राज्यवादी अपसंस्कृतिकरण पर लिखा गया यह महत्त्वपूर्ण आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है अंतिम भाग. )

देखिए : जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति : पहला भाग, दूसरा भाग, तीसरा भाग

उच्च स्तरीय वैश्विक संस्कृति का निर्माण दुनिया के समाजवादी वैश्वीकरण के भविष्य की कोख में पल रहा है। और उसके लिए जरूरी है कि विभिन्न मानव सभ्यताओं द्वारा अर्जित सांस्कृतिक श्रेष्ठ की, ज्ञान-विज्ञान के श्रेष्ठ की, इतिहास की हिफाजत की जाए। वही उच्च कोटि की मानवीय समाजवादी वैश्विक संस्कृति का आधार बनेंगे। हजारों फूलों के बीजों को बचाया जाए ताकि भविष्य के बगीचे में हजारों फूल अपने रंगों और रूपों की छटा बिखेरते हुए साथ-साथ महकें-दमकें। समाजवादी निर्माण के प्रयत्नों में मिली पराजय और विफलताएं घोर निराशा का कारण नहीं होनी चाहिएं। दुनिया की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्थाओं में आमूल-चूल परिवर्तन, एक शोषण विहीन संस्कृति का निर्माण, एक नये समाजवादी जनतांत्रिक मनुष्य का निर्माण जो हर प्रकार के व्यक्तिवाद से मुक्त हो, एक झटके में ही सम्भव नहीं हो जाएगा। असफलताओं और पराजयों की श्रृंखला को पार करके ही निर्णायक सफलताएं और विजय हासिल होती हैं।

विचारधारा और दर्शन के क्षेत्र में वह एक ओर तो ‘विचारधारा के अंत’ की घोषणा करता है दूसरी ओर ‘उत्तर आधुनिकतावाद’ और ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की विचारधारा लेकर आता है। वह मार्क्सवाद को भी वि्कृत करता है। वह वैश्वीकरण-उदारीकरण- निजीकरण और एक ध्रुवीय दुनिया की विचारधारा लेकर आता है। वह साम्राज्यवाद की विकल्पहीनता ‘देयर इज नो आल्टरनेटिव’ लेकर आता है। वह सामाजिक अनुशासनों को ध्वस्त करने और समाज विरोधी व्यक्तिवादी स्वच्छंदता का विचार लेकर आता है। वह निष्कर्ष विहीन अनन्त विमर्श की विचारधारा लेकर आता है। कुल मिलाकर वह विचारधारा के क्षेत्र में संभ्रमों और विभ्रमों की दुनिया रचता है। विचार शून्यता और चिन्तनहीनता की स्थिति पैदा करता है। वास्तविकता को भ्रम और भ्रम को वास्तविक बनाकर पेश करने की विचारधारा लेकर आता है। वह ‘इतिहास के अंत’ की घोषणा करता है और ‘फुनगियों की ओर बढ़ने’ का नहीं ‘जड़ों की ओर लौटने’ का आह्नान करता है। अतीतोन्मुखता को जगाता है, अज्ञान, अंधविश्वास और धर्म के पाखण्ड में आस्था जगाता है। उसकी समस्त विचारधाराएं, सभी दर्शन, दुनिया की हजारों साल में अर्जित संस्कृति के श्रेष्ठ को विकृत करने की जंग छेड़े हुए है।

वह धर्मों और नस्लों के बीच विग्रह, विघटन, दंगे और युद्ध छेड़ने के षड़यंत्र रचता है। सभ्यताओं के संघर्ष का हटिंगटन का दर्शन विभिन्न संस्कृतियों को परस्पर युद्धरत करने का विध्वंसक दर्शन है। वह मानव अधिकारों की बात करता है लेकिन मानवता के विरूद्ध पतन की सभी सीमाओं को लांघ जाता है। वह मानव अंगों के अमानवीय अपहरण और व्यापार तक ही सीमित नहीं रहता, नर मांस भक्षण, नर शिशु मांस भक्षण और नर भ्रूण मांस भक्षण के स्वादों के भोग तक जाता है। मनुष्य के उत्कृष्ट सौन्दर्यबोध को ध्वस्त कर, निकृष्ट भोग बोध जगाता है। मूल्यविहीन संवेदनहीन भोगवादी मानसिकता ही उसके लिए उपभोक्ता समाज का निर्माण करेगी। साम्राज्यवादी संस्कृति, संस्कृति का नहीं विकृतियों का संसार रच रही है। कलाओं की दुनिया में वह अनुभव, विचार, मूल्य, संवेदना और ज्ञान को विस्थापित करने को प्रवृत्त होती है। वह तकनीक, सूचना, शिल्प-कौशल, भाषाई चमत्कार, अर्थहीनता, कोरी काल्पनिकता और निरर्थक अमूर्तन की दिशा में प्रवृत्त करती है। सामाजिक यथार्थ और ज्ञानात्मक संवेदना तथा संवेदनात्मक ज्ञान को हतोत्साहित, उपहासित और तिरस्कृत करती है।

रेखाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटासाम्राज्यवादी संस्कृति, साहित्य और कलाकर्म को व्यापारिक और बाजारवादी दृष्टिकोण से युक्त करती है। बाजार यानी तिकड़म, विज्ञापन कौशल, लाभ- हानि का गणित। रूपवाद और कलावाद तो पहले भी थे, अब वह ऐसे रूपवाद को पोषित करती है जो घटिया वस्तु तत्व के भी बढि़या होने का भ्रम पैदा करे। रचना-रूप से भी ज्यादा महत्वपूर्ण अब पैकिंग और प्रस्तुति का रूप है। पैकिंग का सौन्दर्य, पैकिंग का शिल्प, पैकिंग का रूप विधान। इस सबके ऊपर माल खपाने और लाभ कमाने का कौशल। ज्ञान, साहित्य और कलाओं को लोक से, जन साधारण से विलग करती है। साम्राज्यवादी संस्कृति कलाकर्मियों को सम्पादकों-प्रकाशकों को टैकल करने की कला सिखाती है। पुरस्कार प्रदाताओं और सम्मानदाताओं से सम्मान प्राप्त करने, खरीदने के गुर सिखाती है। कला कर्म का उद्देश्य धनार्जन और यशार्जन है, यह सिखाती है। सामाजिक दायित्व बोध मूर्खता है,  उसका उपहास-तिरस्कार करती है।

यह गौर करने योग्य बात है कि आजकल दूरदर्शन चैनलों पर अधिकतर मुख्य कार्यक्रम उबाऊ, निरर्थक और फालतू लगते हैं, कलाहीन और सौन्दर्यविहीन, लेकिन ‘एड’ यानी विज्ञापन कितने कलात्मक आ रहे हैं। सारी कलाएं, क्या अभिनय, क्या संगीत, सब विज्ञापन के लिए समर्पित। विज्ञापन जो झूठ की चित्ताकर्षक प्रस्तुति होती है। स्त्री देह के उत्तेजक उभार, उसकी नग्नता, तक ही बात नहीं है। विकसित और साम्राज्यवादी जगत में पोर्न, ब्लू फिल्में आम हो गई हैं। इंगलैंड की एक सर्वे रिपोर्ट है कि वहां 98 प्रतिशत महिलाएं पोर्न और ब्लू फिल्में देखती हैं ( पुरुषों की तो बात छोडि़ए ), चौंकाने वाली ही नहीं डराने वाली भी है। यह है साम्राज्यवादी संस्कृति और उसकी महानता, जिसके नशें में हमारा अभिजन समाज डूबा जा रहा है।

शिक्षा संस्कृति का मुख्य आधार है। हम ब्रिटिश साम्राज्यवाद की शिक्षा नीति से खूब परिचित हैं कैसे उस शिक्षा पद्धति ने हमारे समाज की मानसिकता को उपनिवेशीकृत किया। सामंती युग में हमने देखा उनकी शिक्षा पद्धति ने कैसे लोगों में सामंती शोषण और वर्णव्यवस्था के दिल दहलाने वाले अत्याचारों को सहने के अनुकूल मानसिकता बनाई गई। आज भी पिछले जन्मों के कर्मफल में उसका विश्वास टूटा नहीं है। वह सामंती-पूंजीवादी शोषण-उत्पीड़न को ईश्वर का विधान और पिछले जन्म के कर्मों का फल मानकर और अगले जन्म को सुखी बनाने के लिए सहता रहता है। उसकी इस विकट सहनशीलता को देखकर कठोर हृदयी मनुष्य की भी संवेदना जाग जाती है, उसकी करूणा द्रवित हो उठती है। वह उनके पक्ष में सोचने लगता है। लेकिन शोषित-पीडि़त जन सहर्ष सब सहे जा रहे हैं। भाग्य का विधान ही ऐसा है। साम्राज्यवादी संस्कृति भी ऐसी शिक्षा पद्धति का प्रसार करती है।

हैरी कैली, दि मॉडर्न स्कूल इन रिट्रास्पेक्ट ( 1925 ) में कहते हैं – ‘‘सार्वजनिक विद्यालय प्रणाली व वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को स्थायी बनाने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है…बच्चे को शिक्षा दी जाती है ताकि वह सत्ता के नीचे झुके, दूसरों की इच्छा के अनुसार काम करने की आदत डाले, फलतः उसके मन की कुछ ऐसी आदतें बन जाती हैं, जिनका उसके वयस्क जीवन में शासक वर्ग पूरा लाभ उठाता है।’’ मार्टिन कारनाय की पुस्तक ‘‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और शिक्षा’’ ( अनुवादक कृष्णकांत मिश्र ) इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मार्टिन कारनाय कहते है कि – ‘‘पश्चिमी तर्ज की औपचारिक शिक्षा अधिकांश देशों में मुक्ति का साधन न बन कर केवल साम्राज्यवादी प्रभुत्व का उपकरण बनी। यह शिक्षा साम्राज्यवाद के लक्ष्यों के अनुरूप थी….’’, वे आगे कहते हैं – ‘‘हमारा विश्वास है कि ज्ञान का भी उपनिवेशीकरण किया गया। उपनिवेशीकृत ज्ञान समाज के सोपानात्मक ढांचे को स्थाई बनाता है।’’

सुसांत गुणतिलक की पुस्तक ‘‘पंगु मस्तिष्क – शिक्षा पर औपनिवेशिक संस्कृति का दबाव’’ ( अनुवाद – स्वयं प्रकाश ) इस विषय पर एक और महत्वपूर्ण शोधपूर्ण पुस्तक है। सुसांत गुणतिलक पुस्तक की भूमिका में कहते है – ‘‘आम तौर पर व्यापारिक, औद्योगिक और मौजूदा नव औपनिवेशक रूपों में प्रकट होने वाले विभिन्न आर्थिक हमलों के माध्यम से पिछले पांच सौ वर्षों के यूरोपीय विस्तार ने प्रायः सारी दुनिया को सांस्कृतिक स्तर पर लगभग पूरी तरह आच्छादित कर लिया है। इस सांस्कृतिक एकछत्रता ने स्थानीय संस्कृति, स्थानीय कलाओं तथा वैध और प्रासंगिक विज्ञानों की स्थानीय प्रणालियों का दमन किया है और इसका परिणाम एक वास्तविक सांस्कृतिक आनुवंशिक सफाए के रूप में सामने आया है। यूरोपीय संस्कृति का आधिपत्य बढ़ने के साथ ही विविधता और मौलिकता, कलाएं और गैर यूरोपीय मूल के विचार गायब हैं। संस्कृति आवेष्टित हो रही है और सुगम्य रूपों में परोसी जा रही है।’’ वे इस पुस्तक में ‘सांस्कृतिक एकछत्रता की छानबीन’ करते हैं। ‘औपनिवेशिक विश्व की स्थापना से पहले यूरोप के बाहर की सांस्कृतिक दुनिया की छानबीन’ करते हैं। ‘औपनिवेशिक संस्कृति के वाहक के रूप में प्रविधि की भूमिका की शिनाख्त करते हैं और ‘सांस्कृतिक स्तर पर उपनिवेशीकृत राष्ट्रों के कपट प्रबंध’ की पहचान कराते हैं।

वर्तमान में औद्योगिक प्रबंधन और उच्च सूचना तकनीक की शिक्षा का अभियान अपने लिए उपयोगी कार्मिकों की भीड़ खड़ी करने का एक ऐसा ही अभियान है। वे अलगाव, असंलग्नता, तटस्थता और सहनशीलता सिखाती है। मनुष्य के स्व-विवेक और स्व-निर्णय की प्रवृत्ति को समाप्त करती है। उसे विचारहीन संस्कृतिविहीन बनाती है। साम्राज्यवादी संस्कृति हमारे बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का उपनिवेशीकरण करती है। सवाल सिर्फ यही नहीं है कि हमारी संस्कृति को हम साम्राज्यवादी संस्कृति द्वारा किए जा रहे ध्वंस से कैसे बचाएं? सवाल यह भी है कि हम हमारी संस्कृति को साम्राज्यवादी संस्कृति बनाये जाने और उसे दूसरी नस्लों या जातीयताओं की संस्कृति को नष्ट करने के उपकरण बनाए जाने से भी कैसे बचाएं?

मानव समाज, कबीलाई जन संस्कृतियों से शुरु होकर जनपदीय, जातीय और बहुराष्ट्रीय जातीय अवस्थाओं से गुजरता हुआ अब वैश्विक संस्कृति की ओर अग्रसर है। यह मानव समाज, विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है, इसे रोका नहीं जा सकता। देखना यह है कि साम्राज्यवादी वर्चस्व के अंतर्गत वैश्विक संस्कृति और विश्व समाज अथवा समाजवादी-जनवादी वैश्विक संस्कृति और वैश्विक समाज।

साम्राज्यवादी पूंजीवाद राष्ट्र राज्यों, जातीय संस्कृतियों और विभिन्न भाषाओं को कुचलता हुआ एक ऐसी दुनिया का निर्माण करने में लगा है जिसकी संस्कृति शोषण-उत्पीड़न-विस्थापन पर आधारित एक गैर जनतांत्रिक, अमानवीय, अपसंस्कृति होगी। भोगवाद और वर्चस्ववाद जिसकी मुख्य प्रवृत्ति होंगी। वित्तीय पूंजी के वर्चस्व तले एक गुलाम दुनिया। अनिश्चय और असुरक्षा के आतंक के साये में जीती तनावग्रस्त सभ्यताएं। हिंसा-नशा-भोग, संवेदनहीनता-असहिष्णुता-अलगाव। युद्ध और आतंक। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण एक उच्च विकासशील वैश्विक संस्कृति की ओर अग्रसर नहीं है बल्कि एक पतनशील और संकीर्ण वैश्विक अपसंस्कृति की ओर अग्रसर है। एक स्वस्थ समृद्ध उन्नतशील उच्च मानवीय वैश्विक संस्कृति वैश्विक समाजवादी व्यवस्था के अंतर्गत स्वरूप ग्रहण करेगी। एक शोषण विहीन समतावादी वैश्विक व्यवस्था में ही यह सम्भव होगा।

विविध संस्कृतियों को विस्थापित और विखण्डित कर वर्चस्ववादी एकरूपता स्थापित करती हुई वैश्विक संस्कृति नहीं, बल्कि ऐसी वैश्विक संस्कृति जो विविध संस्कृतियों का संघबद्ध समाजवादी जनवादी गुलदस्ता हो, होना चाहिए।
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( समाप्त )

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आलेख – जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – शिवराम

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jansanskrutiyan aur samrajyavadi sanskruti– shivaram.pdf

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आलेख – शिवराम

shivram - sketch by ravi kumar, rawatbhata

शिवराम - २३ दिसंबर, १९४९ - १ अक्टूबर, २०१०

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प्रस्तुति – रवि कुमार

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – तीसरा भाग

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – तीसरा भाग
शिवराम

( शिवराम का भारतीय समाज के संदर्भों में जनसंस्कृतियों की विकास-अवस्थाओं और साम्राज्यवादी अपसंस्कृतिकरण पर लिखा गया यह महत्त्वपूर्ण आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है तीसरा भाग. )

देखिए : जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति : पहला भाग, दूसरा भाग

हिन्दी भाषा और हिन्दी जातीयता के प्रभुतावादी व्यवहार का भय फैलाए जाने ने भारत की विभिन्न जातीयताओं के एक संघीय बहुराष्ट्रीय आधुनिक महाजाति के निर्माण में भारी बाधा पहुंचाई है। ‘हिन्दु राष्ट्रवाद’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का उसका चिन्तन साम्राज्यवादी चिन्तनधारा का ही विष बीज है। जो हिन्दु-मुस्लिम धार्मिक अंतर्विरोधों और भारतीय जातीयताओं के बीच अविश्वसनीयता और संदेह को तीव्र कर साम्राज्यवाद की ही मदद करता है। यह भारतीय शासकों के फासीवादी-साम्राज्यवादी भविष्योन्मुखी मंतव्यों की भी अभिव्यक्ति है। राज्यों के साथ भेदभाव और उनके असमान विकास ने इस ऐतिहासिक दायित्व के पूरा होने में दूसरी बड़ी बाधा खड़ी की है। शासक वर्गों द्वारा संघीय गणराज्य के अंतर्गत राज्यों के जनतांत्रिक अधिकारों के दमन ने इस कार्य में तीसरी बड़ी बाधा उत्पन्न की है। क्षेत्रिय राजनैतिक दलों का उदय इन्हीं परिस्थितियों की उपज है। शासक वर्गों की सुकेन्द्रित संघीय राज्य सत्ता निरंतर क्षीण हुई है। इन स्थितियों ने भी साम्राज्यवाद के आर्थिक राजनैतिक षड़यंत्रों और साम्राज्यवादी अपसंस्कृति के प्रसार के लिए उपजाऊ जमीन बनाई है।

हमें साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण को अलग-अलग जनपदीय संस्कृतियों के बरअक्स अलग-अलग रूपों के साथ संघबद्ध बहुराष्ट्रीय महाजातीयता के बरअक्स भी देखना चाहिए और साथ में यह भी देखना चाहिए कि राष्ट्रीय संघबद्ध महाजातीयताओं के अंतर्विरोधों का साम्राज्यवादी संस्कृति कैसे अपने हित में उपयोग करती हैं और उसकी अलग-अलग राष्ट्रीय जातीयताओं और जनपदों की संस्कृति के बरअक्स क्या व्यवहार करती है। विखंडनवादी नजरिया भी तो साम्राज्यवादी संस्कृति का ही एक नजरिया है, जिसका वह उपयोग कर रही है।

हमें देखना चाहिए कि हमारे छोटे-छोटे जनपद अलग-अलग रूप से साम्राज्यवादी संस्कृति के आक्रमण का मुकाबला नहीं कर सकते। यदि साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण का मुकाबला करना है तो हमें हमारी बहुराष्ट्रीय संघबद्ध महाजातीयता को एकताबद्ध करना होगा। हिन्दी भाषी जातीयता को भी जनपदों और राज्यों की भौगोलिक सीमा से ऊपर उठकर एकताबद्ध होना होगा। हिन्दी जातीयता को प्रभुतावादी सामंती मानसिकता से बाहर निकालना होगा। हिन्दी जातीयता को अन्य भारतीय जातीयताओं में जनतांत्रिक व्यवहार का विश्वास जगाना होगा। यह वास्तविकता है कि वह भारत की बहुराष्ट्रीय संघबद्ध महाजाति की सबसे बड़ी जातीयता है और अतीत में तथा वर्तमान में भी उसने ही साम्राज्यवादी राजनैतिक-सांस्कृतिक आक्रमणों को सर्वाधिक झेला है। भविष्य में भी उसे ही झेलने होंगे। हिन्दी भाषी जातीयता का यह ऐतिहासिक दायित्व है कि वह साम्राज्यवादी उपनिवेशीकरण के इस दौर के आक्रमण के विरूद्ध जिम्मेदार भूमिका निभाए।

यह उसी का दायित्व था और आज भी यह उसी का दायित्व है कि वह भारत की समस्त जातीयताओं की वृहद बहुराष्ट्रीय संघबद्ध महाजाति के निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ाए और पूरा करे। यह प्रभुत्ववादी दृष्टिकोण और आचरण से नहीं जनतांत्रिक संघवादी आचरण से ही सम्भव है। इसलिए विभिन्न हिन्दी भाषी प्रदेशों और जनपदों के बीच यह दायित्व बोध जागृत होना चाहिए। यही दायित्व बोध उन्हें एकता के रास्ते पर ले जाएगा। धर्म और भाषा की साम्प्रदायिकता को केन्द्र में लाया जाना मतभेदों को तीव्र करना है।

व्यवहार में जन साधारण के बीच, श्रमजीवी समाज के बीच, व्यवसायियों-व्यापारियों के बीच हिन्दी का प्रयोग निरंतर व्यापक हो रहा है। वह विभिन्न जातीयताओं के बीच सम्पर्क भाषा के रूप में किसी भी अन्य भारतीय भाषा की तुलना में अधिक स्वीकार्य हुई है। हिन्दी जातीयता की प्रभुत्ववादी आशंकाओं के कारण अन्य भारतीय जातीयताएं राज-काज और सम्पर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी का पक्ष ग्रहण करती हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि अंग्रेजी विभिन्न भारतीय जातीयताओं के अभिजन समाज की ही सम्पर्क भाषा है। ज्यादा से ज्यादा थोड़ा बहुत मध्य वर्ग के ऊपरी संस्तरों तक उसका प्रसार माना जा सकता है। अंग्रेजी की इस स्थिति ने भारत में एक मार्शल समाज का निर्माण जरूर कर दिया है जिसके लिए राज-काज के प्रमुख पद आरक्षित हैं।

साम्राज्यवादी संस्कृति के वर्तमान दौर के लिए भारत की यह भाषाई स्थिति बहुत लाभदायक सिद्ध हो रही है। उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण और अत्यधिक महंगी होने के कारण वह उच्च मध्य वर्ग और अभिजन समाज के लिए आरिक्षत हो गई है। इस स्थिति ने भारतीय समाज में एक अलग तरह का भाषाई और सांस्कृतिक विभाजन उपस्थित कर दिया है जिसका वर्गीय स्वरूप भी है।

साम्राज्यवाद का आर्थिक आक्रमण मुख्य रूप से अभी श्रमजीवी जनगण के विरूद्ध केन्द्रित है। मजदूर और किसान तथा उनकी युवा पीढ़ी इस आक्रमण से तबाह हो रहे हैं। जबकि मध्य वर्ग के ऊपरी संस्तर और अभिजन समाज, साम्राज्यवादी लूट का एक हिस्सा प्राप्त करके खुशहाल हो रहा है। यही नव औपनिवेशिक विकास है। यही ‘भारत के महाशक्ति बनने’ का अनोखा भ्रम है।

साम्राज्यवादी संस्कृति अपने रंगरूट इसी वर्ग से भर्ती करती है। साम्राज्यवाद द्वारा संचालित एन.जी.ओ.’ज इन्हीं रंगरूटों के माध्यम से मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के आदर्शवादी मानवीय मन वाले प्रतिभाशाली बेरोजगार युवक-युवतियों को अपनी सेवा में लगा रहे हैं। उनकी श्रमजीवी जनगण के पक्ष में वास्तविक सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता बनने की स्वाभाविक प्रक्रिया को भंग करके उन्हें आभासी कार्यकर्ता बना कर छोड़ देते हैं। नव धनाढ्य उच्च और मध्य वर्ग उसकी भोगवादी उपभोक्ता संस्कृति और बाजारवादी संस्कृति का वाहक है।

एन.जी.ओ.’ज केन्द्रीय मुद्दों पर छिड़ने वाले वर्ग संघर्षों को हाशिए पर डालने और अन्य मुद्दों को केन्द्र में लाने की भूमिका अदा करते हैं जैसे साक्षरता, पर्यावरण, स्वास्थ्य आदि। वे शिक्षा, साम्प्रदायिक सद्भाव, आदिवासी विस्थापन, बाल श्रम और असंगठित श्रमिकों के लिए भी काम करते दिखाई देते हैं। यह भी आभासी संघर्ष, आभासी अभियान होते हैं। जिनका ‘डॉक्यूमेन्टेशन’ बड़ा प्रभावशाली होता है लेकिन जिनके काम और प्रभाव डॉक्यूमेन्टेशन लायक भी महत्वपूर्ण नहीं होते। वास्तविकता का आभासी से विस्थापन भी साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण का एक हथियार है। गौर से देखा जाए तो उनका यह मानवीय व्यवहार उपभोक्तावादी समाज के विस्तार का ही साम्राज्यवादी उपक्रम है।

वे जन-आंदोलनों के गैर-राजनीतिक रहने का दर्शन गढ़ते हैं और जनांदोलनों के क्रांतिकारी राजनीति से अलगाव हेतु सायास प्रयत्न करते हैं। वे संसदीय राजनीति से मोह भंग को एक ऐसे राजनीतिक शून्य में बदलने की कोशिश करते हैं जिसका कोई क्रांतिकारी विकल्प सम्भव नहीं दिखाई दे। क्रांतिकारी विचारधारा को सुधारवादी विचारधारा के विभ्रमों से युक्त करना और क्रांतिकारी शक्तियों को सुधारवादी सक्रियता में लिप्त कर देना भी साम्राज्यवादी संस्कृति की रणनीति है, जिसे वह अनेक विचारधारात्मक विमर्शों के जरिये अंजाम दे रही है। नव मार्क्सवाद, उत्तर आधुनिकतावाद, विखंडनवाद आदि उसके ऐसे ही विमर्श हैं। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की क्रांतिकारी धार का लगातार भोंथरे होते जाना और उसमें संसदीय वामपंथी-सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों का विस्तार, जो स्वयं को विद्यमान साम्राज्यवादपरस्त पूंजीवादी व्यवस्था का बेहतर प्रबंधक सिद्ध करने को लालायित दिखाई देते हैं, इस तथ्य का द्योतक है कि साम्राज्यवादी रणनीति किस तरह प्रभावी हो रही है।

जिस प्रकार विमर्शवाद निष्कर्षविहीन अनन्त विमर्श की संस्कृति पैदा करता है और मुक्ति संघर्षों के चिंतन को विस्थापित करता है। वैसे ही एन.जी.ओ. संस्कृति क्रांतिकारी चेतना से पूर्णतया मुक्त गैर राजनैतिक यथास्थितिवादी-सुधारवादी-आभासी जनआंदोलनों की संस्कृति पैदा करती है। दलित मुक्ति, नारी मुक्ति, आदिवासी मुक्ति के संघर्षों को नपुंसक विमर्शों में बदला जा रहा है, वर्गीय विमर्शों को विस्थापित किया जा रहा है और हमारी अनेक प्रगतिशील, जनवादी पत्रिकाएं भी इसमें लिप्त हो गई हैं।

साम्राज्यवादी संस्कृति के आक्रमण की रणनीति को समझने के लिए कार्ल मार्क्स और नोम चोमस्की के निम्नांकित दो उद्धरण गौरतलब है – ‘‘पूंजीवादी सभ्यता की आंतरिक बर्बरता और उसकी गहरी धूर्तता हमारी आंखों के सामने खुली पड़ी है। अपने घर में वह अच्छे रूप धारण कर लेती है, उपनिवेशों में वह नंगी होकर घूमती है।’’ – कार्ल मार्क्स। यह मार्क्स ने भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 पर अपनी प्रतिक्रिया ‘दी फर्स्ट इण्डियन वार ऑफ इन्डिपिन्डेंस’ में कहा था। आज का साम्राज्यवाद तो तब के साम्राज्यवाद से कहीं अधिक कुटिल और क्रूर है। ‘‘अमेरिका अपना साम्राज्य उसी ढंग से फैलाना चाहता है जिस ढंग से कभी उसने अमेरिका को बसाते समय अमेरिका के लाखों मूल निवासियों को मौत की नींद में सुला दिया था।’’ – नोम चोमस्की। नोम चोमस्की का यह बयान वर्तमान साम्राज्यवाद की बर्बरता को लक्षित करता है।

लेकिन उस दौर के साम्राज्यवाद और वर्तमान साम्राज्यवाद की अंतर्वस्तु में पूंजीवादी होते हुए भी काफी भिन्नताएं है। पहले वह दुनिया का बंटवारा करने के लिए संघर्षरत-युद्धरत हुआ था अब वह एकध्रुवीय होकर सारी दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने को संघर्षरत-यु्द्धरत है। पहले वह राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करता आता था। उपनिवेशों की जनता को साफ दिखाई देता था कि किसी ने उन्हें गुलाम बना लिया है। अब वह पहले आर्थिक आधिपत्य जमाता है, साथ में सांस्कृतिक वर्चस्व का अभियान छेड़ता है, परोक्ष राजनैतिक आधिपत्य बाद में जमाता है। अब उसके पास सूचना तंत्र का सांस्कृतिक महाआयुध है जो पहले नहीं था। पहले भी वह वित्तीय पूंजी का ध्वजाधारी था अब भी वह वित्तीय पूंजी का ध्वजाधारी है, लेकिन वित्तीय पूंजी का चरित्र अब पहले से काफी बदल गया है। अब वह अनुत्पादक सटोरिया जुआरी वित्तीय पूंजी अधिक है, उत्पादक कम। वह प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन और बाजार, तीनों का दोहन पहले भी करती थी, अब भी करती है। परन्तु अब वह बहुत अधिक तीव्र है।

अब वह मरणासन्न अवस्था के अंतिम चरण में है उसके पास मानव सभ्यता को देने के लिए बर्बरता, तबाही और युद्ध के सिवाय कुछ भी नहीं बचा है। वह अब तक जन्मे सभी निकृष्ट और पतित मूल्यों-आचरणों का वाहक बन गया है। प्रगतिशलीलता के नाम पर अब उसके पास कुछ भी शेष नहीं है। पहले वह ‘फासीवाद’ की विचारधारा के साथ आया था, अब भी वह फासीवाद के सारतत्व को अमली जामा पहना रहा है, लेकिन और अधिक क्रूरता और बर्बरता के साथ। नस्लों को कुचलता, राष्ट्रीय राज्यों की सम्प्रभुता को नेस्तनाबूत करता और उन्हें गुलाम बनाता, मजदूर वर्ग को अधिकार विहीन गुलाम बनाता, विभिन्न सभ्यताओं के बीच संघर्ष फैलाता। उसने दुनिया को आतंकवाद का तोहफा दिया है। जो उसके विरूद्ध लड़ता हुआ दिखता है लेकिन जो उसके लक्ष्यों में उसका मददगार साबित होता है।

सामंती साम्राज्यवादी संस्कृति भी अन्य संस्कृतियों के साथ वर्चस्ववादी व्यवहार करती थी लेकिन पूंजीवादी साम्राज्यवादी संस्कृति का व्यवहार अधिक आक्रामक, विघटनकारी और विनाशकारी है। सामंती साम्राज्यवाद का लक्ष्य जनपदीय संस्कृतियों को लघु जातीय संस्कृति और लघु जातीय संस्कृतियों को राष्ट्रीय जातीय संस्कृतियों में विकसित करना था। इसलिए वह अन्य संस्कृतियों को नष्ट नहीं करता था बल्कि उनके श्रेष्ठ को संजोता था और कुल मिलाकर एक बड़ी-व्यापक उच्च स्तरीय संस्कृति का निर्माण करता था। पूंजीवादी साम्राज्यवाद उच्च स्तरीय वैश्विक संस्कृति के निर्माण के लिए बिल्कुल प्रस्तुत नहीं होता। वह अपनी भोगवादी पतनशील संस्कृति का वर्चस्व स्थापित करने और अन्य राष्ट्रीय जातीयताओं की संस्कृति के विखण्डन और विनाश के लिए उद्धत होता है। संस्कृति को मुनाफे के लिए व्यापार की एक वस्तु बना देता है। साम्राज्यवादी संस्कृति, दुनिया की सांस्कृतिक विविधता को नष्ट कर देने को उद्धत है। वह उसे वि्कृत और विस्थापित करने को उद्धत है।

( अगली बार – लगातार – अंतिम भाग )

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आलेख – शिवराम
प्रस्तुति – रवि कुमार

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – दूसरा भाग

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – दूसरा भाग
शिवराम

( शिवराम का भारतीय समाज के संदर्भों में जनसंस्कृतियों की विकास-अवस्थाओं और साम्राज्यवादी अपसंस्कृतिकरण पर लिखा गया यह महत्त्वपूर्ण आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है दूसरा भाग. )

देखिए : जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति : पहला भाग

अब जब दुनिया अमेरिकन साम्राज्यवाद के आर्थिक-राजनैतिक और सांस्कृतिक हमले की चपेट में है और भारत भी इस हमले का शिकार है, हमें समझना चाहिए कि भारत एकताबद्ध राष्ट्र राज्य के रूप में ही पूंजीवादी साम्राज्यवाद के वर्तमान हमले का मुकाबला कर सकता है। शासक वर्ग इस एकता के प्रति बेहद लापरवाह है। भाषावार राज्यों का गठन हुआ और राष्ट्रीय राज्य में गणसंघीय स्वरूप को संवैधानिक मान्यता भी दी गई लेकिन विभिन्न जातीयताओं और भाषाओं के साथ भेदभाव रहित न्याय नहीं किया गया। शासक वर्ग अपने राजनैतिक नियंत्रण और आर्थिक लाभ के अनुरूप भेदभावपूर्ण नीतियां अपनाता रहा।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर साम्प्रदायिक फासीवाद ने धार्मिक आधार पर सामाजिक अलगाव को चिन्ताजनक स्थिति में पहुंचा दिया है। राज्य सरकारों को विदेशी साम्राज्यवादी सरकारों और साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से सीधे समझौते करने और अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी वित्तीय संस्थाओं से सीधे ऋण लेने की छूट सुकेन्द्रित राष्ट्र राज्य को कमजोर ही नहीं करता, साम्राज्यवाद को हमारे जातीय अंतविरोधों को बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करता है। भारतीय शासक पूंजीपति वर्ग, साम्राज्यवाद के साथ गठजोड़ बनाए हुए है और वह उसे आगे बढ़ा रहा है। विभिन्न जातीयताओं के साथ भेदभाव और उनकी सांस्कृतिक पहचान तथा विकास की चिन्ताओं को गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा है। विभिन्न राज्यों के असमान विकास की स्थितियां भी विभिन्न जातीयताओं के बीच वैमनस्यपूर्ण अंतर्विरोधों को बढ़ा रहे हैं। ये स्थितियां हमें साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण के समक्ष कमजोर स्थिति में खड़े किए हुए हैं।

जनपदीय संस्कृतियां, जातीय संस्कृतियां और जनजाति संस्कृतियां और समग्र रूप में देश की बहुराष्ट्रीय जातीय संस्कृति, सभी साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण से क्षतिग्रस्त हो रही हैं, वे विकृत की जा रही हैं। उनका अपसंस्कृतिकरण किया जा रहा है। भाषाई साम्राज्यवाद फैल रहा है। लेकिन साम्राज्यवादी सांस्कृतिक हमले के विरूद्ध, बहुराष्ट्रीय भारत की विभिन्न राष्ट्रीय जातीयताएं, जनपद और जनजातियां एकताबद्ध प्रतिरोध, प्रतिकार, संगठित नहीं कर पा रही हैं। वे साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण के बरअक्स अपनी सांस्कृतिक नीति सुनिश्चित नहीं कर पा रही हैं। आर्थिक राजनैतिक क्षेत्र में भी साम्राज्यवादी घुसपैठ और आक्रमण का स्थानीय प्रतिरोध और प्रतिकार तो प्रत्यक्ष होता हैं लेकिन वे व्यापक रूप धारण नहीं कर पाते भारतीय बहुराष्ट्रीय राज्य की केन्द्रीय और राज्य सरकारें इन प्रतिरोधों-प्रतिकारों में साम्राज्यवाद विरोधी जन पक्षधर भूमिका निभाने के बजाय प्रतिरोधी जनता का दमन करती दिखाई देती है। हिन्दू उग्रवादी मानसिकता पश्चिमी संस्कृति का जिस तरह का विरोध संगठित करती है वह अपने मूल चरित्र में गैर-जनतांत्रिक एवं फासीवादी होता है। वे साम्राज्यवादी अपसंस्कृति से नहीं लड़ रहे होते हैं, बल्कि हिन्दुत्ववादी सामंती संस्कृति की रक्षा हेतु सामंती लठैतों की तरह व्यवहार कर रहे होते हैं।

भारतीय समाज की सामाजिक संरचना मुख्यतया सामंती है। वह जनतांत्रिक आधुनिक समाज में विकसित नहीं हो सका। जिसे आधुनिक समाज कहा जाता है वह पश्चिमी संस्कृति की नकल जरूर करता है। रहन-सहन के आधुनिक ढंग तो उसने सीख लिए हैं, ऊपरी आचरण की सभ्यता भी सीख ली है, लेकिन उसकी चित्तवृत्ति सामंती ही बनी हुई है। औरों की तो बात छोडि़ए हमारे साम्यवादी भी सामंती अहं, व्यक्तिवाद और प्रभुतावादी प्रवृत्तियों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। विचारों से साम्यवादी और व्यवहार में सामंती प्रवृत्ति साम्यवादी आंदोलन की एक बड़ी समस्या के रूप में आज भी बनी हुई है। गैर साम्यवादियों की तो बात ही छोडि़ए। विकसित पूंजीवादी देशों में जो आधुनिक संस्कृति अस्तित्व में आयी वह उनके शासकों के साम्राज्यवादी व्यवहार ने विकृत कर  दी हैं, भोगवादी, उपभोक्तावादी, वर्चस्ववादी और कुंठित।

जनपदीय संस्कृति, सामंती संस्कृति ही होती है। सवाल उनकी सामंती संस्कृति को बचाने का नहीं है, उनकी संस्कृति के श्रेष्ठ की रक्षा करते हुए उसे आधुनिक जनतांत्रिक संस्कृति में विकसित करने का है। आधुनिकता का अभिप्राय पश्चिम की नकल नहीं होता, तर्कसंगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है। रूढि़यों-अंधविश्वासों-निरर्थक धार्मिक कर्मकाण्डों से मुक्ति होता है। समानता-स्वतंत्रता और भाई-चारे के मूल्यों से युक्त जीवन दर्शन को ग्रहण करना होता है। लिंग भेद, वर्ण भेद, जाति भेद, क्षेत्रियता भेद और वर्ग भेद विरोधी समानता की पक्षधर चेतना होता है। जनतांत्रिक व्यवहार होता है। ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान होता है।

ब्रिटिश साम्राज्वाद के दौर में हम पश्चिम के आधुनिक चिन्तन के सम्पर्क में तो आए, विभिन्न प्रकार के सामाजिक सुधारवादी आंदोलन भी हुए। लेकिन भारतीय समाज का सामंती ढांचे में और खासकर सामंती संस्कृति में अत्यल्प मात्रात्मक परिवर्तन ही सम्भव हो पाया।

भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आज़ादी के बाद तेजी से बढ़नी थी, वह नहीं बढ़ी। शासक वर्गों ने सामंतवाद और भूस्वामी वर्ग से गठजोड़ किया। भारतीय पूंजीवाद तब अस्तित्व में आया जबकि पूंजीवाद, वैश्विक स्तर पर अपनी पतनशील साम्राज्यवादी अवस्था में प्रवेश कर गया। दुनिया को वह दो बार व्यापक और लम्बे विश्वयुद्धों की तबाही दे चुका। वह फासीवाद का तोहफा लिए अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े दौड़ाने लगा। उसकी अपनी प्रगतिशील भूमिका समाप्त हो गई और वह पतनशील भूमिकाओं के साथ पूरी तीव्रता के साथ सक्रिय हो गया। चूंकि दुनिया में उसका समाजवादी विकल्प विचारधारात्मक स्तर पर ही नहीं जमीनी स्तर पर भी जड़ें जमाकर सारी दुनिया के जन-गणों के बीच लोकप्रियता अर्जित करने लगा, इसलिए अपनी मृत्यु को प्रत्यक्ष देखकर वह बर्बरता की तरफ बढ़ने लगा।

भारतीय पूंजीवादी शासक वर्ग भी अपनी सत्ता के छिनने और मेहनतकश जनता के सच्चे जनतंत्र की स्थापना के भय से अपनी प्रगतिशील भूमिका को छोड़कर सामंतों, राजे-रजवाड़ों और प्रतिक्रियावादी शक्तियों के साथ खड़ा हो गया। राजा-महाराजाओं और प्रतिक्रियावादी शक्तियों के पुरातनपंथी विचारों, धार्मिक अंधविश्वासों और ग्राम्य जीवन के स्तर पर सामंती व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जातिवादी चेतना को पुष्ट किया। जाति और धर्म की सामंती सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं को बल प्रदान किया। किसानों और मजदूरों का दमन किया। हैदराबाद निजाम के पक्ष में तेलंगाना के किसान आंदोलन को कुचलना, केरल की जनतांत्रिक ढंग से निर्वाचित साम्यवादी सरकार को भंग करना, देश भर में जगह-जगह मजदूर आंदोलनों पर पुलिस की गोलियां चलना, इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

पूंजीवादी विकास ने श्रमजीवी जन-गण की झोली में कोई उल्लेखनीय लाभ नहीं डाले। दलितों पर अत्याचार और वर्ण-भेद का व्यवहार, महिलाओं पर अत्याचार और लिंग-भेद का व्यवहार, आदिवासियों का विस्थापन और उनका उत्पीड़न निरंतर जारी ही नहीं रहा, बढ़ता गया। औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए जो शिक्षा व्यवस्था खड़ी की गई उसने एक मध्य वर्ग जरूर बनाया। आरक्षण ने दलितों के बीच भी एक मध्य वर्ग बनाया और कुछ आदिवासी जन भी शिक्षा और आधुनिक ज्ञान के नजदीक आए। यह मध्य वर्ग भी भारतीय समाज को आधुनिक सांस्कृतिक वातावरण निर्मित करने के बजाय खुद भी सामंती संस्कृति को ही जीता रहा। पूंजीवादी-सामंती राजसत्ता में हिस्सेदारी और अपना अभिजनीकरण ही उनका लक्ष्य बनकर रह गया। जबकि इस मध्यवर्ग की ऐतिहासिक जिम्मेदारी बहुत बड़ी है, उन्हें श्रमजीवी जन-जन के इन अस्सी प्रतिशत लोगों को पूंजीवाद-सामंतवाद से मुक्ति के क्रांतिकारी पथ पर आगे बढ़ाना था।

विभिन्न भारतीय जातीयताएं, केन्द्रीय शासक वर्ग के अविश्सनीय, पक्षपातपूर्ण, चालबाज और गैर जनतांत्रिक, व्यवहार के कारण अपनी जातीय स्वायत्तता और विकास तथा सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए सन्नद्ध होने लगीं। हिन्दु तत्ववादियों ने हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान जैसे नारों के साथ हिन्दी जाति के प्रभुताशील व्यवहार का डर फैलाया। फलस्वरूप राज-काज और अन्तरप्रान्तीय सम्पर्क की भाषा के रूप में अंग्रेजी न केवल जारी रही बल्कि दक्षिण भारतीय जातीयताओं ने उसे ही बनाए रखने का दबाव भी जारी रखा। यह स्थिति भारत में वर्तमान साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण के लिए काफी सहायक सिद्ध हुई। बल्कि उसने अंग्रेजीदां प्रभुत्वशाली लोगों के माध्यम से अपनी राह को बेहद आसान बना लिया।

भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती वह संस्कृति का माध्यम भी होती है। पश्चिमी संस्कृति के पतनशील तत्व और व्यवहार, उसके माध्यम से भारतीय संस्कृति पर सहज ही आरूढ़ होते रहे। पश्चिमी साम्राज्यवादी शासकों को भारतीय शासक वर्ग को अपनी पतनशील संस्कृति में ढालने का काम आसान हो गया। भारत में एक ऐसा अंग्रेजी भाषी समाज अस्तित्वमान हो गया जिसके हाथ में राज्यसत्ता के तमाम सूत्र हैं और जो पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण में लिप्त है। यह तबका भारत में साम्राज्यवादी संस्कृति का वाहक बना हुआ है। उसे पश्चिम की घटिया, निकृष्ट और सड़ांधयुक्त चीजें भी उच्च कोटि की नजर आती हैं और भारतीय संस्कृति का श्रेष्ठ भी हीन और त्याज्य नजर आता है।

हमें इस वास्तविकता को भी समझना चाहिए कि जनपदीय संस्कृतियां जब एक-जातीय संस्कृति में समाहित होने की प्रक्रिया से गुजर रही होती है तो उनमें से एक संस्कृति प्रमुख रूप धारण कर लेती है और अन्य संस्कृतियां उसमें समाहित होने लगती हैं। हिन्दी जातीयता के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं होने के पीछे विभिन्न जनपदों की संस्कृति की अपनी समृद्ध अवस्था और किसी दूसरी संस्कृति के वर्चस्व के प्रति उनकी सजग सक्रियता भी एक मुख्य कारण रही दिखाई देती है। अन्य सांस्कृतिक तत्व तो उनके मध्य परस्पर अपनाये जाते दिखते हैं, लेकिन भाषा के स्तर पर वे हिन्दी के वर्चस्ववाद और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक इकाई की पहचान के प्रति काफी सजग और चिन्तित दिखाई देते हैं। विभिन्न जनपदीय भाषायें संविधान की आठवीं सूची में शामिल होना चाहती हैं। अतः आंचलिक बोलियों और जनपदीय भाषाओं के संरक्षण की आश्वस्ति आवश्यक हो गई है।

हिन्दी जातीयता एक बहुजनपदीय संघबद्ध जातीयता के रूप में विकसित हुई है और उसका यही स्वरूप स्वाभाविक प्रतीत होता है। सामंती साम्राज्यवादी समय में उसके तमिल, मराठी, बंगाली, मलयाली, तेलगू जातियताओं की तरह एकमेक जातियता का रूप ग्रण करने के अवसर ज्यादा थे। अब उनके बीच संघबद्धता ही जनतांत्रिक व्यवहार के अनुकूल है।

दूसरी तरफ वैश्वीकरण की स्थितियां रोजगार के लिए अंग्रेजी भाषा को अनिवार्य बनाती जा रही है। इसलिए सभी जनपदों और जातीयताओं में ठेठ ‘प्रेप लेवल’ से ही अंग्रेजी माध्यम के स्कूल शिक्षा का मुख्य आधार बनते जा रहे हैं। अंग्रेजी भाषा में व्यवहार हेतु भी अनेक प्रकार के कोचिंग इंस्टीट्यूट और इंगलिश स्पीकिंग कोर्स चल रहे हैं। हिन्दी जातीयता के जनपद और दूसरी जातीयतायें हिन्दी के मुकाबिल अपनी स्वतंत्र पहचान के प्रति तो भारी सजगता दिखाते दिखते हैं, लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व को उत्साहपूर्वक स्वीकार किया जा रहा है। इस स्थिति में हिन्दी का वर्चस्ववादी व्यवहार, अंग्रेजी के साम्राज्यवादी वर्चस्ववाद को स्वीकार बनाने में परोक्ष सहायक दिखाई देता है।

( अगली बार – लगातार – तीसरा भाग )

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आलेख – शिवराम
प्रस्तुति – रवि कुमार.

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – पहला भाग

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – पहला भाग
शिवराम

( शिवराम का भारतीय समाज के संदर्भों में जनसंस्कृतियों की विकास-अवस्थाओं और साम्राज्यवादी अपसंस्कृतिकरण पर लिखा गया यह महत्त्वपूर्ण आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है पहला भाग. )

प्राचीन जन-समाज, जिनके अपने-अपने जनपद भी हुआ करते थे परस्पर युद्धरत भी होते थे और संघबद्ध भी होते थे। युद्ध भी और संघबद्धता भी दो या अधिक जनपदों के मध्य सांस्कृतिक अन्तःक्रिया की स्थिति उत्पन्न करते थे। लेकिन दोनों स्थितियों में मूलभूत अंतर होता था। युद्धजनित स्थिति में ‘विजेता’ जन समाज की, ‘पराजित’ जन समाज के युद्धबन्दियों के साथ अन्तःक्रिया होती थी। विजेता जन समाज द्वारा युद्धबंदी अपने में मिला तो लिए जाते थे, लेकिन विजेता जन समाज यहां प्रभुतापूर्ण प्रभावशाली स्थिति में होता था और पराजित युद्धबंदी लघुतापूर्ण उपकृत स्थिति में होते थे।

ये ‘जन समाज’ आदिम साम्यवादी समाज थे जिनमें किसी भी प्रकार के भेदभाव अभी उत्पन्न नहीं हुए थे। दूसरे जनपद के युद्धबन्दी थोड़े ही समय में घुलमिल जाते थे। इनके बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी होता था। युद्धबंदियों के पास अपने जनपद से लाया हुआ जो महत्वपूर्ण ज्ञान, कौशल और मूल्यगत-व्यवहारगत बातें होती थीं, उन्हें विजेता जनपद के लोगों द्वारा सहज रूप में ग्रहण कर लिया जाता था। पराजित युद्धबंदियों को तो विजेता जनपद की संस्कृति में ढलना ही होता था। जबकि जनपदों की संघबद्धता की स्थिति में संघबद्ध हुए जनपद लगभग समान स्तर पर होते थे और उनके बीच होने वाली अंतःक्रिया हर प्रकार के दबाव से मुक्त होती थी। दबाव मुक्त अवस्था में होने वाले इस मेल-जोल में उनकी संस्कृतियों का श्रेष्ठ ही पुष्पित-पल्लवित होता था और निकृष्ट या क्षीण और हीन मुरझाता जाता था। दोनों संस्कृतियां मिल कर एक नयी समृद्ध संस्कृति का निर्माण करती थीं। जब कई जनपद संघबद्ध होते थे तो बड़े और अधिक समृद्ध जनपद की नेतृत्वकारी स्थिति होती थी।

यह जनसंस्कृतियों का प्रारम्भिक पारस्परिक व्यवहार था, जो जनतांत्रिक प्रकार का भी था और साम्राज्यवादी प्रकार का भी। लेकिन साम्राज्यवादी प्रकार भी बाद के साम्राज्यवादी व्यवहारों जैसा वर्चस्ववादी नहीं था।

फ़्रेडरिक एंगेल्स इस विषय में अमरीका की आदिवासी जातियों के बारे में लिखते हुए बताते हैं कि – ‘‘जनसंख्या का घनत्व बढ़ने से यह आवश्यकता उत्पन्न हुई कि आंतरिक रूप से और बाहरी दुनिया के विरूद्ध संघबद्ध हुआ जाय। हर जगह सम्बन्धित जातियों का संघ आवश्यक हुआ और शीघ्र ही उनका परस्पर घुल-मिलकर एक होना भी आवश्यक हो गया। तब कबीलों के विभिन्न प्रदेश ‘जनपद’, जनता के एक ही विशाल प्रदेश ‘महाजनपद’ में घुलमिल कर एक हो गए।’’ साथ ही एंगेल्स यह भी बताते हैं कि – ‘‘प्राचीन जनों का एकीकरण समानता और भाईचारे के आधार पर सदा जनतांत्रिक ढंग से नहीं होता। शक्तिशाली जन दूसरों पर विजय प्राप्त करके भी यह एकीकरण की प्रक्रिया पूरी करते थे।’’

दरअसल, प्राचीन ‘जन-समाज’ कोई स्थिर जन समाज नहीं होते थे। प्राचीन कबीलाई ‘जन’ जो रक्तसम्बन्धों पर आधारित  थे, वे रक्त सम्बन्धों पर आधारित होते हुए भी क्रमशः शुद्ध रक्त वाले नहीं रह गये थे। अजनबियों और युद्धबंदियों को सम्मिलित करने और दूसरे ‘जन-समाजों’ के साथ संघबद्ध होते रहने की प्रक्रिया में वे मिश्रित नस्लों वाले होते गये। इस दौरान दस्तकारी और कृषि के विकास के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वामित्व और व्यक्तिगत सम्पत्ति का आविर्भाव भी होने लगा। कार्य विभाजन आवश्यक हो गया और वर्णव्यवस्था अस्तित्व में आई। आदिम साम्यवादी ‘जन-समाज’ सामंती समाज में बदलने लगे। जन समाजों का विघटन होने लगा और महाजनपदों का गठन हुआ।

यद्यपि प्राचीन जन समाजों का यह विघटन सर्वत्र न तो एक साथ हुआ और न ही पूर्णरूपेण हुआ। नए सामंती जन-पद, प्राचीन जन-समाजों के अनेक अवशेषों के साथ अस्तित्वमान हुए। बल्कि भारत की भौगोलिक राजनैतिक स्थितियों ने विकास के विभिन्न स्तरों के जन-समाजों को भी सामान्य विकासशील उथल-पुथल से दूर रहकर अस्तित्वमान रहने की सुविधा भी प्रदान की। इन नये जनपदों के निर्माण की प्रक्रिया को देखें तो पाते हैं कि वहां भी समर्थ-शक्तिशाली ‘जन’ और दूसरे ‘जनों’ के बीच साम्राज्यवादी व्यवहार भी था। यह सामंती साम्राज्यवादी व्यवहार था। यह प्रक्रिया उत्तर भारत में चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर समुद्रगुप्त तक के साम्राज्यों के स्थापना काल में पूरी हो गई थी। डॉ. के.पी. जायसवाल ( हिन्दु पोलिटी, बंगलोर, 1943 ) के अनुसार ‘मौर्य साम्राज्यवाद’ और ‘हिन्दू यूनानी क्षत्रपों’ ने अधिकांश प्राचीन गणराज्यों यानी ‘जन-समाजों’ का विनाश किया।

यहां दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। एक तो यह कि जब सामंती साम्राज्यवाद ने अपने समय में प्राचीन ‘जन-समाजों’ को नए सामंती साम्राज्य में एकीकृत किया तो सामंती साम्राज्यवादी संस्कृति ने प्राचीन जनपदों की संस्कृति के साथ कैसा व्यवहार किया और साथ ही यह भी देखना चाहिए कि पूंजीवादी साम्राज्यवाद आज विभिन्न राष्ट्रीय राज्यों की जातीय और जनपदीय संस्कृतियों से कैसा व्यवहार कर रहा है। इन दोनों साम्राज्यवादी व्यवहारों में क्या भेद हैं? ये भेद मात्रात्मक ही हैं या गुणात्मक भी। दूसरे यह कि जैसे प्राचीन गण समाजों के विघटन और महाजनपदों तथा लघुजातियों के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई और सामंती साम्राज्यों के समय में भी ‘जन’ समाजों के न केवल अनेक अवशेष अस्तित्वमान रहे बल्कि अनेक जन जातियां भी अस्तित्वमान रहीं, वैसे ही आधुनिक समय में महाजनपदों और लघु जातीयताओं के एकीकरण और राष्ट्रीय जातीयताओं के निर्माण की प्रक्रिया भी यहां पूरी नहीं हुई। अनेक लघु जातीयताएं, जनपद और जन-जातियां अपने विशिष्ट स्वरूप को आज भी बनाए रखे हुए हैं।

हम आज भी अनेक अंचलों को जन-पद कहते हैं। यद्यपि अपनी जनपदीय अवस्था की अनेक विशिष्टताओं से युक्त होते हुए भी इन जनपदों ने महाजनपदों, लघु जातियों और जातीय तथा राष्ट्रीय बहुजातीय पुनर्गठनों की लम्बी राजनैतिक-सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा की है। ब्रज, बुंदेलखण्ड, मिथला, भोजपुर आदि ऐसे ही अंचल है। छत्तीसगढ़, झारखण्ड और राजस्थान एवं  अन्य प्रदेशों में भी अनेक जनजातियां प्राचीन सांस्कृतिक-सामाजिक मूल्यों के साथ अब भी अस्तित्वमान है। इसी प्रकार विभिन्न राष्ट्रीय जातीयताएं संघबद्ध तो हुई हैं लेकिन एक आधुनिक बहुराष्ट्रीय जातीयता के रूप में घुल मिल जाने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।

भारत में हिन्दी जातीय एकीकरण का काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है। बल्कि उल्टी प्रक्रिया भी दिखाई देने लगती है। जनपदीय-आंचलिक भाषा-बोलियों की मान्यता और अलग राज्य के रूप में राजनैतिक इकाई के रूप में गठन की मांग के लिए जो आंदोलन दिखाई पड़ते हैं वे इस बात के द्योतक हैं कि जनपदों के जातीय सांस्कृतिक विकास में उल्लेखनीय अधूरापन रह गया है। वे रच-पच कर एकमेक नहीं हो पाए। साथ ही इस बात के द्योतक भी हैं कि आंचलिक और उपजातीय संस्कृतियां देश के भीतर से भी साम्राज्यवादी किस्म के राजनैतिक भेदभाव और सांस्कृतिक उपेक्षा महसूस कर रही हैं। वे इस बात के भी द्योतक हैं कि अब पूंजीवाद आधुनिक जातीयताओं के निर्माण की जनतांत्रिक प्रक्रिया को बल प्रदान करने के बजाय उनके विखण्डन की अवसरवादी राजनीति को प्रश्रय दे रहा है।

इन जनपदों में स्वतंत्र पहचान की प्रवृत्ति क्यों रही? क्या यह सच नहीं है कि उनकी अपनी भाषा साहित्य और संस्कृति एक समृद्ध जातीय इकाई के रूप में विकसित हुई, और जनपदीय सांस्कृतिक इकाई के बजाय वे जातीय इकाई की तरह व्यवहार करती रहीं?

भारतीय बहुराष्ट्रीय राज्य की संरचना की विशिष्टताओं को भली-भांति समझा जाना चाहिए। तमिल जातीयता का गठन 1310 ई. से पहले ही हो गया था। 1669 में शिवाजी ने मराठा राज्य स्थापित किया। कार्ल माक्र्स ने ‘नोट्स आन इण्डियन हिस्ट्री’ में कहा ‘‘इस प्रकार मराठे एक जाति बने जिन पर स्वतंत्र राजा राज्य करता था।’’ दक्षिण की अन्य जातीयताओं और बंगाली जातीयताओं के गठन की प्रक्रिया भी काफी पहले पूरी हो गई लेकिन कुछ अन्य एवं हिन्दी भाषा-भाषी प्रदेशों के बीच जातीयता के निर्माण की प्रक्रिया अभी भी अधूरी है। जबकि सामंती साम्राज्यवाद के काल में ही लघु जातीयताओं के सम्मिलन और बड़े प्रदेशों के गठन की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए थी। जबकि उत्तर भारत की लघु जातीयताओं वाले जनपदों में ऐसी अनेक आधारभूत समानताएं हैं कि उनका महाप्रदेश के रूप में संगठित होना स्वाभाविक था। मुगल शासन के अंतर्गत यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। लगभग पूरा उत्तर भारत एक हुकूमत के अधीन रहा।  वैसे तुर्कों के समय में भी उत्तर भारत काफी केन्द्रबद्ध हो गया था। यह इतिहास की जरूरत थी। एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता इस क्षेत्र के विकास की अनिवार्यता थी। डॉ. रामविलास शर्मा ‘‘भाषा और समाज’’ में उल्लेख करते हैं कि – ‘‘राजपूत सामंतों की यह बुनियादी कमजोरी थी कि वे न तो राजस्थान को एक सुकेन्द्रित शासन व्यवस्था में ला सके न समूचे उत्तर भारत ( या हिन्दी भाषी प्रदेश ) का एक राज्य कायम कर सके। राजस्थान या हिन्दी भाषी प्रदेश में वे एक संयुक्त जातीय राज्य कायम नहीं कर सके।’’

जबकि यह उनका ऐतिहासिक दायित्व था। इस दायित्व को विदेशी हमलावर राजनैतिक शक्तियों ने पूरा किया। संभवतः इस अनिवार्यता के लिए बनी रिक्तता ने ही उन्हें यह अवसर दिया। ‘‘जागीरदारों और सामंतों के स्वतंत्र राज्यों का अलगाव खत्म किये बिना व्यापार की उन्नति और उसका प्रचार सम्भव नहीं था।’’ ( डॉ. रामविलास शर्मा ) महाजनी पूंजीवाद की विकासशीलता के लिए सुकेन्द्रित राज्य व्यवस्था आवश्यक थी।

फिर यह सवाल उठता है कि बावजूद मुगलों के नेतृत्व में संकेन्द्रित राज्य व्यवस्था के हिन्दी महाजातीयता का गठन पूर्णता को क्यों नहीं प्राप्त कर सका? ब्रिटिश साम्राज्य के आविर्भाव और मुगल सत्ता के कमजोर होते ही वह लघुजातीयताओं वाले पुराने सामंती राज्यों में क्यों बंट गया? 1857 में अगर ये राज्य एकजुट होकर एक सुगठित जातीयता के रूप में अंग्रेजी ताकत से लड़े होते तो यह निश्चित लगता है कि 1857 के बाद के भारत का इतिहास कुछ और ही रूप में हमारे सामने आता।

दक्षिण भारतीय जातीयताएं स्वतंत्र राष्ट्र राज्यों के रूप में रहने को प्रवृत्त रहती दिखाई देती थीं। वर्ण व्यवस्था के लम्बे, निर्मम और बर्बर व्यवहार ने दलित जातियों में सम्पूर्ण समाज के प्रति भेदभाव और अत्याचार जन्य अलगाव का बोध था। सामंती राजाओं और नवाबों की पतनोन्मुख प्रवृत्तियों ने ब्रिटिश साम्राज्य को स्थापित होने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाईं। जातीय संस्कृतियां शक्तिशाली राजनैतिक इकाई के रूप में अस्तित्वमान नहीं रह पाती तो दूसरी शक्तिशाली जातीयतायें आक्रामक साम्राज्यवादी व्यवहार करने का अवसर पा जाती हैं।

( अगली बार – लगातार – दूसरा भाग )

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आलेख – शिवराम
प्रस्तुति – रवि कुमार

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