हमारा समय और सांस्कृतिक चुनौतियां

सामान्य

शिवराम स्मृति समारोह
“हमारा समय और सांस्कृतिक चुनौतियां” पर परिचर्चा
“हमारे पुरोधा : शिवराम” का लोकार्पण


कोटा, २ अक्टूबर. २०१४

शिवरामसुप्रसिद्ध रंगकर्मी एवं साहित्यकार शिवराम के चतुर्थ स्मृति-दिवस पर विकल्प जन सांस्कृतिक मंच, कोटा द्वारा गत १ अक्टूबर, २०१४ को एम. डी. मिशन कॉलेज के सभागार में एक समारोह का आयोजन किया गया। “हमारा समय और सांस्कृतिक चुनौतियां” विषय पर एक सार्थक परिचर्चा और राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित एवं महेन्द्र नेह द्वारा लिखित पुस्तक “हमारे पुरोधा : शिवराम” का लोकार्पण इस समारोह के मुख्य आकर्षण रहे। इस अवसर पर रवि कुमार द्वारा शिवराम की रचनाओं पर केंद्रित एक कविता पोस्टर श्रृंखला का प्रदर्शन भी किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार प्रो० मोहन श्रोत्रिय ने परिचर्चा का समाहार करते हुए कहा कि हमारा देश-समाज इस समय गहरे सांस्कृतिक संकट से गुजर रहा है। संस्कृति और धर्म का घालमेल किया जा रहा है, धर्म को संस्कृति की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। जबकि संस्कृति कहीं अधिक व्यापक संकल्पना है जिसका कि धर्म एक संकीर्ण अवयव मात्र है। हमारी विविधता से भरी समावेशी संस्कृति निशाने पर है और इस पर कट्टरवादी सामंती धार्मिक प्रभुत्व का संकट हमारे समय की सबसे बड़ी सांस्कृतिक चुनौती है। इस संकट के लिए मात्र कुछ संगठनों और मीडिया को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि संकट की जड़ो को तलाशना होगा। उन्होंने विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहा कि वर्तमान बाज़ारवादी संस्कृति के साथ धार्मिक उन्माद पैदा करने वाली पतित संस्कृति का ताना-बाना बुनकर देशवासियों को विकास के दुस्वप्न दिखाये जा रहे हैं। इसके पीछे देश के शासक-वर्ग हैं, जो साम्राज्यवादी आर्थिक-राजनैतिक ताकतों के साथ दुरभि संधि करके देश के संसाधनों की अंधी लूट के लिए सांस्कृतिक विभ्रमों की सृष्टि कर रहे हैं। हमें फासीवाद की आहटों को सुनना, पहचानना सीखना-सिखाना होगा और उनके खिलाफ़ एक व्यापक राजनैतिक और संस्कृतिकर्म की लामबंदी करनी होगी। कलाकर्म को व्यक्तिगतता के दायरे से बाहर निकालना होगा, क्योंकि हर व्यक्तिगत कर्म अंततः राजनैतिक होता ही है, पर्सनल इज़ पॉलिटिकल। कला जगत को वर्तमान राजनीति के प्रतिकार की राजनीति में उतरना होगा, यही हम कला और संस्कृतिकर्मियों के लिए हमारे समय की चुनौतियों के खिलाफ़ एक सक्रिय और सचेत प्रतिरोध की राह हो सकती है।

वरिष्ठ शायर और विकल्प के अध्यक्ष अखिलेश अंजुम के स्वागत वक्तव्य के बाद परिचर्चा की शुरुआत करते हुए रंगकर्मी संदीप राय ने कहा कि शिवराम ने वर्तमान शोषक-शासक व्यवस्था के जन-विरोधी चरित्र को बेनकाब करने तथा उसके विरुद्ध प्रतिरोध जगाने के लिए सर्वाधिक प्रभावी माध्यम के रूप में नुक्कड़ नाटक को चुना। उनके नाटकों में आज के समय के संकटों की स्पष्ट अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। उन्होंने सत्तापोषित मीडिया के मुक़ाबले जन-मीडिया की आवश्यकता पर जोर दिया। साथी नारायण शर्मा ने कहा कि हमें वैचारिक प्रखरता एवं श्रमिकों-किसानों के बीच संस्कृति कर्म द्वारा नव जागरण की धार को विकसित करना होगा। व्यंग्यकार डॉ. अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि साहित्य और संस्कृति के लिए स्थापित जनसंचार माध्यमों में जगह लगातार कम हो रही है और वर्तमान समय की सांस्कृतिक चुनौतियों के पीछे नई तकनीक और हाई फाई ब्रेन योजनाबद्ध ढंग से काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं को प्रगतिशील और जनपक्षधर संस्कृति के मूल्यों से परिचित कराना समय की मांग है।

साथी बी.एम. शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि शिवराम ने अपने विचारों तथा संस्कृतिकर्म से एक वैकल्पिक रास्ता दिखाया था और हमें इसे और आगे बढ़ाना चाहिये। महेन्द्र नेह ने कहा कि शासक-वर्ग की की संस्कृति मरणशील संस्कृति है, साम्राज्यवाद का आर्थिक-जहाज डूब रहा है। पूंजी और सत्ता का फासीवादी गठजोड़ इस बात की स्पष्ट अभिव्यक्ति है कि आर्थिक संकट अब लाइलाज होता जा रहा है। हमें मीडिया के दुष्प्रचार से हताश न होकर जन-गण के बीच शासक-वर्ग के झूठ-फरेब के विरुद्ध न्याय व सचाई की अलख जगानी चाहिये। कार्यक्रम का संचालन करते हुए मशहूर शायर शकूर अनवर ने शिवराम के संस्कृतिकर्म को धर्म जाति, संप्रदाय की सीमाओं को तोड़कर एक न्यायपरक व समतामूलक समाज के सपने जगानेवाला प्रेरणादायक संस्कृतिकर्म बताया।

hamare purodha‘हमारे पुरोधा : शिवराम’ पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए कवि-समीक्षक हितेश व्यास ने कहा कि शिवराम ने अपने नाटकों के जरिये जनता की सोई हुई चेतना को जगाने का काम किया और उनकी कविताओं में भी लोक नाट्य और जन चेतना की प्रखर कलात्मकता है जो जीवन के यथार्थ से उपजी है। डा. प्रेम जैन ने पुस्तक-परिचय के रूप में अपनी लिखित टिप्पणी में कहा कि महेन्द्र नेह ने इस पुस्तक के ज़रिये शिवराम के जीवन, कविताओं, नाटकों व गद्य से न केवल हमें परिचित कराया है, अपितु उनके लेखन में गुंथी हुई युगपरिवर्तनकामी ऊर्जा को भी पाठकों तक पहुंचाने का कार्य किया है। डॉ. ओम नागर ने कहा कि शिवराम के नाटकों का हाड़ौती भाषा में अनुवाद करते समय उन्होंने अनुभव किया कि शिवराम में जन मनोविज्ञान और लोक मुहावरों को चित्रित करने की अपूर्व क्षमता थी, और यही कारण था कि उनके नाटक जनता से सीधे संवाद करते थे, उनकी चेतना में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करते थे।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यात कवि अंबिकादत्त ने कहा कि परिवर्तनकामी चेतना को अपने साहित्य व नाटकों के जरिये व्यापक जन तक ले जाने वाले शिवराम जैसे रचनाकार विरल ही होते हैं। उनके सानिध्य की ऊर्जा अभी तक हमें इस तरह आंदोलित करती है कि लगता ही नहीं कि वे अब हमारे बीच में नहीं है। वरिष्ठ रचनाकार निर्मल पाण्डेय ने शिवराम को जीता-जागता जन-मीडिया और समय के आगे चलने वाले संस्कृतिकर्मी बताया। विशिष्ट अतिथि डॉ. नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी ने संस्कृति और साहित्य के संबंधों को व्याख्यायित करते हुए शिवराम के योगदान को रेखांकित किया। अध्यक्ष मंडल के सदस्य दिनेश राय द्विवेदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिवराम के जीवन और रचनाकर्म में कोई विलगाव नहीं था। वे जैसा देखते और विश्लेषित करते थे, वैसा लिखते थे और जैसा लिखते थे वैसा ही अपने जीवन में उतारते और सक्रिय रहा करते थे। समय के द्वंद्वों और अंतर्विरोधों को समझने और उन्हें अपनी रचनाओं में सहजता से ढ़ालने की क्षमता उनके अंदर गहरे से पैबस्त थी। उन्होंने अपने नाटकों व कविताओं से जनता को प्रतिरोध की संस्कृति से संस्कारित करने, भयमुक्त होने तथा विद्रोह की ओर आगे बढ़ने की राह प्रशस्त की।

अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए विकल्प के महासचिव महेन्द्र नेह ने सभी अतिथियों और भागीदारों का आभार व्यक्त किया। समारोह में कोटा शहर के साहित्य-कला-संस्कृति कर्मियों और प्रेमियों के साथ-साथ शिवराम के परिवारजनों ने भी सक्रिय भागीदारी की।

विकल्प जन सांस्कृतिक मंच, कोटा

IMG_3 IMG_11IMG_7IMG_9 IMG_10IMG_5

साधों, मिलीजुली ये कुश्ती – महेन्द्र नेह के पद

सामान्य

साथी, संस्कृति एक न होई – महेन्द्र नेह के पद

mahendra nehइस बार प्रस्तुत हैं कोटा ( राजस्थान ) से ही साहित्यकार और जनगीतकार महेन्द्र नेह के कुछ नई पद-रचनाएं। जनआंदोलनों में संघर्षशील अवाम और साथी जिन बहुत से जनगीतों से ऊर्जा पाया करते थे और हैं, उनमें महेन्द्र नेह के कई मशहूर जनगीत भी शामिल रहे हैं। जनसंघर्षों में स्वयं अपना जीवन होम कर देने वाले साथी महेन्द्र नेह आज भी भरसक सक्रिय रहते हैं और विभिन्न स्तरों पर कई कार्रवाइयों में लगे हुए हैं। ‘विकल्प’ अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक-सामाजिक मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, और कई संगठनों में भी सक्रिय हैं। साथ ही ‘अभिव्यक्ति’ पत्रिका का संपादन भी उन्हीं के जिम्मे हैं।

123

( १ )

साथी, संस्कृति एक न होई ।
जो संस्कृति लुट्टन खोरन की अपनी कैसे होई ।।

हमरा किया शिकार, रोंधते और पकाते हमको ।
देते हैं उपदेश, भगाना भू-तल से है तम को ।।

जो हम को चंडाल समझते, छुआछूत करते हैं ।
उनका भाग्य चमकता है, हम बिना मौत मरते हैं ।।

उनकी संस्कृति राजे-रजवाड़ों, सेठों की गाथा ।
उनकी संस्कृति अधिनायक है, जन-गण ठोके माथा ।।

उनकी संस्कृति भ्रम रचती है, सिर के बल चलती है ।
अपनी संस्कृति सृजन-कर्म, परिवर्तन में ढलती है ।।

उनकी संस्कृति सच पूछें तो दुष्कृति है, विकृति है ।
अपनी संस्कृति सच्चे माने जन-जन की संस्कृति है ।।

( २ )

साधों, मिलीजुली ये कुश्ती ।
लोकतंत्र की ढपली ले कर करते धींगामुश्ती ।।

जनता की मेहनत से बनती अरबों-खरबों पूंजी ।
उसे लूट कर बन जाते हैं, चन्द लुटेरे मूँजी ।।

उन्ही लुटेरों की सेवा में रहते हैं ये पंडे ।
जनता को ताबीज बाँटते कभी बाँटते गंडे ।।

इनका काम दलाली करना धर्म न दूजा इनका ।
भले लुटेरा पच्छिम का हो या उत्तर-दक्खिन का ।।

धोखा दे कर वोट मांगते पक्के ठग हैं यारों ।
इनके चक्रव्यूह से निकलो नूतन पंथ विचारो ।।

1234

( ३ )

साधो, घर में घुसे कसाई ।
बोटी-बोटी काट हमारी हमरे हाथ थमाई ।।

छीने खेत, जिनावर छीने, छीनी सकल कमाई ।
भँवरों की गुनगुन-रस छीना, तितली पंख कटाई ।।

मधु छीना, छत्तों को काटा, नीचे आग लगाई ।
इतना धुँआ भरा आँखों में, देता नहीं दिखाई ।।

नदियाँ गँदली, पोखर गँदले, गँदले ताल-तलाई ।
पानी बिके दूध से मँहगा, कैसी रीत चलाई ।।

नये झुनझुनों की सौगातें, घर-घर में बँटवाई ।
इतनी गहरी मार समय की, देती नहीं सुनाई ।।

किससे हम फरियाद करें, अब किससे करें दुहाई ।
नंगों की महफिल में, नंगे प्रभुओं की प्रभुताई ।।

( ४ )

साधो, यह कैसा मोदी ।

जिसने दिया सहारा पहले उसकी जड़ खोदी ।
फसल घृणा की, फूटपरस्ती की गहरी बो दी ।।

नारे हैं जनता के, बैठा धनिकों की गोदी ।
कौन महावत, किसका अंकुश किसकी है हौदी ।।

विज्ञापन करके विकास की अर्थी तक ढो दी ।
नहीं मिला खेतों को पानी, धरती तक रो दी ।।

ख़ुद के ही अमचों-चमचों ने मालाएं पो दीं ।
ख़ुद ही पहना ताज, स्वयं ही बन बैठा लोदी ।।

० महेन्द्र नेह

क़यामत ढा दिया करता है इक टूटा सितारा भी – पुरुषोत्तम यक़ीन

सामान्य

क़यामत ढा दिया करता है इक टूटा सितारा भी
( gazals by purushottam yaqeen )

इस बार प्रस्तुत है कोटा (राजस्थान) के एक महत्त्वपूर्ण रचनाकार पुरुषोत्तम यक़ीन के कुछ अश्‍आर। ढेर सारी किताबों, उस्तादगी और एक बड़ी पहचान के बावज़ूद वे जिस सहजता और सरलता के साथ सभी के लिए उपलब्ध होते हैं उसी सहजता के साथ वे दुनिया की पेचीदगियों से भी पूरी जिम्मेदारी से बाबस्ता होते हैं। यही उनके गीतों-गज़लों की ताक़त है और उनकी विशिष्ट पहचान भी।

sprk3

( 1 )

इक कहानी थी हक़ीक़ी-सी लगी
इक हक़ीक़त भी कहानी-सी लगी

उस ने जो बोला वो सच होगा ज़रूर
उस की इक-इक बात चुभती-सी लगी

ग़ौर से डाली जो दुनिया पर नज़र
मुझ को इक-इक आंख भीगी-सी लगी

हर कोई तपता है इक अंगार-सा
दुनिया इक जलती अंगीठी-सी लगी

( 2 )

किस क़दर तंग ज़माना है कि फ़ुरसत ही नहीं
वो समझते हैं हमें उन से मुहब्बत ही नहीं

दोपहर सख़्त है, सूरज से ठनी है मेरी
ऐसे हालात में आराम की सूरत ही नहीं

शाम से पहले पहुंचना है उफ़ुक़ तक मुझ को
मुड़ के देखूं कभी इतनी मुझे मुहलत ही नहीं

देखा कुछ और था महफ़िल में बयां और करूं
ये न होगा कभी, ऐसी मेरी फ़ितरत ही नहीं

यूं तो बनते भी हैं क़ानून यहां रोज़ नये
न्याय मुफ़्लिस को मिले ऐसी हुकूमत ही नहीं

( उफ़ुक़ – क्षितिज )

( 3 )

हम समझते थे जिसे ताबो-तवाँ का पैकर
वक़्त पर निकला वही आहो-फ़ुग़ाँ का पैकर

मतलबो-मौक़ापरस्ती के हैं किरदार सभी
किस बलंदी पे है देखो तो जहाँ का पैकर

हर तरफ़ अब तो नज़र में हैं लहू के धब्बे
कितना बदरंग हुआ अम्नो-अमाँ का पैकर

( ताबो-तवाँ – ओजस्व और सामर्थ्य, पैकर – आकृति, मूर्ति )

( 4 )

लोग रहते भी हैं वीरान मकाँ लगते हैं
क्यूं सभी अपने सिवा ग़ैर यहाँ लगते हैं

इन दरीचों को ज़रा खोल दो आने दो हवा
वर्ना दम घुटने के आसार अयाँ लगते हैं

नक़्शे-पा जिन पे तू चल के चला आया है
वो तेरे अपने ही क़दमों के निशाँ लगते हैं

( दरीचों – खिड़कियों, अयाँ – स्पष्ट, नक़्शे-पा – पद-चिह्न )

( 5 )

ग़मों के इस समुंदर का कहीं होगा किनारा भी
सफ़र जारी है, हम पायेंगे मंज़िल का इशारा भी

दिया दिल का तो है रोशन कि नफ़रत के अंधेरों में
है काफ़ी डूबतों को एक तिनके का सहारा भी

तुम्हारे फ़ैसलों पर सर बहुत हमने कटाये हैं
मुक़द्दर अब हमें लिखना है अपना भी तुम्हारा भी

मेरी हस्ती पे मत जाना, कभी ऐसा भी होता है
क़यामत ढा दिया करता है इक टूटा सितारा भी

( 6 )

हम अंधेरे में चरागों को जला देते हैं
हम पे इल्ज़ाम है हम आग लगा देते हैं

कल को खुर्शीद भी निकलेगा, सहर भी होगी
शब के सौदागरों ! हम इतना जता देते हैं

बीहडों में से गुज़रते है मुसलसल जो क़दम
चलते-चलते वो वहां राह बना देते हैं

जड़ हुए मील के पत्थर ये बजा है लेकिन
चलने वालों को ये मंज़िल का पता देते हैं

अब गुनह्गार वो ठहराऐं तो ठहराऐं मुझे
मेरे अशआर शरारों को हवा देते हैं

एक-एक जुगनू इकट्ठा किया करते हैं ‘यक़ीन’
रोशनी कर के रहेंगे ये बता देते हैं

purushottam yaqeen4

( रेखाचित्र – पुरुषोत्तम यक़ीन – द्वारा रवि कुमार )

०००००
पुरुषोत्तम यक़ीन

सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प – शिवराम

सामान्य

सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प

970657_4963759506469_1278915223_n

मनमोहन की नाव में, छेद पचास हजार।
तबहु तैरे ठाठ से, बार-बार बलिहार॥
नाव में नदिया डूबी
नदी की किस्मत फूटी
नदी में सिंधु डूबा जाए
सिंधु में सेतु रहा दिखाय
सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।

वाम झरौखा बैठिके, दांयी मारी आंख।
कबहुं दिखावे नैन तो, कबहुं खुजावे कांख॥
नयन से नयन लड़ावै
प्रम बढ़तौ ही जावै
नयनन कुर्सी रही इतराय
‘सेज’ में मनुवा डूबौ जाय
सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।

माया सच्ची, माया झूठी, सिंहासन की माया।
ये जग झूठा, ये जग सांचा, ये जग ब्रह्म की माया॥
माया ब्रह्म अंग लगे
ब्रह्म माया में रमे
ब्रह्म की माया बरनी न जाय
ब्रह्म को माया रही लुभाय
सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।

अड़-अड़ के वाणी हुई, अडियल, चपल, कठोर।
सपने सब बिखरन लगे, घात करी चितचोर॥
चित्त की बात निराली
तुरुप बिन पत्ते खाली
चेला चाल चल रहा
गुरू अब हाथ मल रहा
सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।

००००००

शिवराम

रेखाचित्र – कोरल बीच, अंड़मान का दृश्य

सामान्य

रेखाचित्र – कोरल बीच, अंड़मान

लगभग सात वर्ष पूर्व एक बार अंड़मान जाना हुआ था, वहां की मनोरम दृश्यावलियों के ताज़ा प्रभाव में यह तय किया था कि इन पर पेन-स्कैच की एक श्रृंखला तैयार करनी चाहिए। सिर्फ़ एक चित्र बनाया जा सका, दूसरा अधूरा ही रह गया…और जोश ख़त्म। यह वही रेखाचित्र है, जो कि अंड़मान के कोरल बीच का है।

corel beach andmaan

०००००
रवि कुमार

भगत सिंह – संक्षिप्त जीवन-यात्रा

सामान्य

“क्रांति से हमारा अर्थ है – अंत में समाज की ऐसी व्यवस्था की स्थापना जिसमें किसी प्रकार के हड़कम्प का भय न हो, जिसमें मज़दूर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए, और उसके फलस्वरूप विश्व संघ पूंजीवाद के बंधनों, दुखों तथा युद्धों की मुसीबतों से मानवता का उद्वार कर सके…”  – भगत सिंह

भगत सिंह – संक्षिप्त जीवन-यात्रा

प्रस्तुत है भगत सिंह की जीवन-यात्रा को संक्षिप्त रूप से प्रदर्शित करते हुए, कुछ पुराने पोस्टर जो कि शहादत-दिवस के मौके पर ही किए जाने वाले कार्यक्रमों में प्रदर्शन के लिए बनाए गए थे.

bs1

bs2

bs3

r.k.s 1a

मैं पुरुष खल कामी

सामान्य

मैं पुरुष खल कामी

००००००

चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

मैं पुरुष हूं
एक लोहे का सरिया है
सुदर्शन चक्र सा यह
बार-बार लौट आता है, इतराता है

यह भी मैं ही हूं
आदि-अनादि से, हजारों सालों से
मैं ही हूं जो रहा परे सभी सवालों से

मैं सदा से हूं
मैं अदा से हूं

मैं ही दुहते हुए गाय के स्तनों को
रच रहा था अविकल ऋचाएं
मैं ही स्खलित होते हुए उत्ताप में
रच रहा था पुराण गाथाएं

मैं ही रखने को अपनी सत्ता अक्षुण्ण
गढ़ रहा था अनुशासन स्मृतियां
मैं ही स्वर्गलोक के आरोहण को
गढ़ रहा था महाकाव्य-कृतियां

मैं ही था हर जगह
शासन की परिभाषाओं में
शोर्य की गाथाओं में
मैं ही था स्वर्ग के सिंहासन पर
अश्वमेधी यज्ञों पर
चतुर्दिक लहराते दंड़ों पर

मैं ही निष्कासनों का कर्ता था
मैं ही आश्रमों-आवासों में शील-हर्ता था
मैंनें ही रास रचाए थे
मैंने ही काम-शास्त्रों में पात्र निभाए थे

मै ही क्षीर-सागर में पैर दबवाता हूं
मैं अपनी लंबी आयु के लिए व्रत करवाता हूं
मैं ही उन अंधेरी गंद वीथियों में हूं
मैं ही इन इज्ज़त की बंद रीतियों में हूं

मैं ही परंपराएं चलाती खापों में हूं
गर्दन पर रखी खटिया की टांगों में हूं
ये मेरे ही पैर हैं जिसमें जूती है
ये मेरी ही मूंछे है जो कपाल को छूती हैं

ये मेरा ही शग़ल है, वीरता है
ये मेरा ही दंभ है जो सलवारों को चीरता है
कि नरक के द्वार को
मैं बंद कर सकता हूं तालों से
मैं पत्थरों से इसे पाट सकता हूं
मैं इसे नाना तरीक़ों से कील सकता हूं

मैं ब्रह्म हूं, मैं नर हूं
मैं अजर-अगोचर हूं
मेरी आंखों में
हरदम एक भूखी तपिश है
मेरी उंगलियों में
हरदम एक बेचैन लरजिश है

मेरी जांघों में
एक लपलपाता दरिया है
मेरे हाथों में
एक दंड है, एक सरिया है

मैं सदा से इसी सनातन खराश में हूं
मैं फिर-फिर से मौकों की तलाश में हूं…

०००००

रवि कुमार