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क़यामत ढा दिया करता है इक टूटा सितारा भी – पुरुषोत्तम यक़ीन

सामान्य

क़यामत ढा दिया करता है इक टूटा सितारा भी
( gazals by purushottam yaqeen )

इस बार प्रस्तुत है कोटा (राजस्थान) के एक महत्त्वपूर्ण रचनाकार पुरुषोत्तम यक़ीन के कुछ अश्‍आर। ढेर सारी किताबों, उस्तादगी और एक बड़ी पहचान के बावज़ूद वे जिस सहजता और सरलता के साथ सभी के लिए उपलब्ध होते हैं उसी सहजता के साथ वे दुनिया की पेचीदगियों से भी पूरी जिम्मेदारी से बाबस्ता होते हैं। यही उनके गीतों-गज़लों की ताक़त है और उनकी विशिष्ट पहचान भी।

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( 1 )

इक कहानी थी हक़ीक़ी-सी लगी
इक हक़ीक़त भी कहानी-सी लगी

उस ने जो बोला वो सच होगा ज़रूर
उस की इक-इक बात चुभती-सी लगी

ग़ौर से डाली जो दुनिया पर नज़र
मुझ को इक-इक आंख भीगी-सी लगी

हर कोई तपता है इक अंगार-सा
दुनिया इक जलती अंगीठी-सी लगी

( 2 )

किस क़दर तंग ज़माना है कि फ़ुरसत ही नहीं
वो समझते हैं हमें उन से मुहब्बत ही नहीं

दोपहर सख़्त है, सूरज से ठनी है मेरी
ऐसे हालात में आराम की सूरत ही नहीं

शाम से पहले पहुंचना है उफ़ुक़ तक मुझ को
मुड़ के देखूं कभी इतनी मुझे मुहलत ही नहीं

देखा कुछ और था महफ़िल में बयां और करूं
ये न होगा कभी, ऐसी मेरी फ़ितरत ही नहीं

यूं तो बनते भी हैं क़ानून यहां रोज़ नये
न्याय मुफ़्लिस को मिले ऐसी हुकूमत ही नहीं

( उफ़ुक़ – क्षितिज )

( 3 )

हम समझते थे जिसे ताबो-तवाँ का पैकर
वक़्त पर निकला वही आहो-फ़ुग़ाँ का पैकर

मतलबो-मौक़ापरस्ती के हैं किरदार सभी
किस बलंदी पे है देखो तो जहाँ का पैकर

हर तरफ़ अब तो नज़र में हैं लहू के धब्बे
कितना बदरंग हुआ अम्नो-अमाँ का पैकर

( ताबो-तवाँ – ओजस्व और सामर्थ्य, पैकर – आकृति, मूर्ति )

( 4 )

लोग रहते भी हैं वीरान मकाँ लगते हैं
क्यूं सभी अपने सिवा ग़ैर यहाँ लगते हैं

इन दरीचों को ज़रा खोल दो आने दो हवा
वर्ना दम घुटने के आसार अयाँ लगते हैं

नक़्शे-पा जिन पे तू चल के चला आया है
वो तेरे अपने ही क़दमों के निशाँ लगते हैं

( दरीचों – खिड़कियों, अयाँ – स्पष्ट, नक़्शे-पा – पद-चिह्न )

( 5 )

ग़मों के इस समुंदर का कहीं होगा किनारा भी
सफ़र जारी है, हम पायेंगे मंज़िल का इशारा भी

दिया दिल का तो है रोशन कि नफ़रत के अंधेरों में
है काफ़ी डूबतों को एक तिनके का सहारा भी

तुम्हारे फ़ैसलों पर सर बहुत हमने कटाये हैं
मुक़द्दर अब हमें लिखना है अपना भी तुम्हारा भी

मेरी हस्ती पे मत जाना, कभी ऐसा भी होता है
क़यामत ढा दिया करता है इक टूटा सितारा भी

( 6 )

हम अंधेरे में चरागों को जला देते हैं
हम पे इल्ज़ाम है हम आग लगा देते हैं

कल को खुर्शीद भी निकलेगा, सहर भी होगी
शब के सौदागरों ! हम इतना जता देते हैं

बीहडों में से गुज़रते है मुसलसल जो क़दम
चलते-चलते वो वहां राह बना देते हैं

जड़ हुए मील के पत्थर ये बजा है लेकिन
चलने वालों को ये मंज़िल का पता देते हैं

अब गुनह्गार वो ठहराऐं तो ठहराऐं मुझे
मेरे अशआर शरारों को हवा देते हैं

एक-एक जुगनू इकट्ठा किया करते हैं ‘यक़ीन’
रोशनी कर के रहेंगे ये बता देते हैं

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( रेखाचित्र – पुरुषोत्तम यक़ीन – द्वारा रवि कुमार )

०००००
पुरुषोत्तम यक़ीन