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ऐसे माहौल में शीशे का मकाँ ठीक नहीं – शकूर अनवर

सामान्य

ऐसे माहौल में शीशे का मकाँ ठीक नही
( gazals by shakoor anavar )

शकूर अनवर, कोटाइस दफ़ा पेश हैं कोटा (राजस्थान) से शायरी के एक अदद हस्ताक्षर जनाब शकूर अनवर की ग़ज़लें. उनके अश्आर अपने सरोकार और रवानगी के साथ सीधे श्रोता से जुड़ जाते हैं, और यही उनकी शायरी का महत्त्वपूर्ण तेवर है. अधिकतर महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में मौज़ूदगी, कुछ दीवान और मुशायरों एवं कवि-सम्मेलनों में शिरकत के साथ-साथ नगर की विभिन्न साहित्यिक सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी उन्हें कोटा का एक अज़ीम शायर बनाते हैं. देखिए किस तरह उनके अश्आर ज़ुबां पे चढ़े जाते हैं.

शकूर अनवर, कोटा

दौरे हाजि़र में सुख़नवर ये बयाँ ठीक नहीं

साफ कहता हूँ सुनो जि़क़्रे-बुताँ ठीक नहीं

वक़्त के हाथ में पत्थर है यह महसूस करो

ऐसे माहौल में शीशे का मकाँ ठीक नही

गज़ल – एक

खुशनसीबी  से   दम   नहीं  निकला
वरना क़ातिल भी कम नहीं निकला

लोग  निकले  हैं  ले  के  तलवारें
और हम से क़लम नहीं निकला

उसकी   बातों  में   है   गुरूर  बहुत
उसके लहजे से ‘हम’ नहीं निकला

जिनकी दानिशवरों में गिनती थी
उनकी  बातों में दम नहीं निकला

हमने कोशिश तो की  बहुत ‘अनवर’
दिल से दुनिया का ग़म नहीं निकला

गज़ल – दो

उनको छूते ही गिरीं सारी की सारी उँगलियाँ
लम्स की तलवार ने  काटी हमारी उँगलियाँ

थी  हवाओं  की शरारत  फिर भी  मेरे  नाम  को
रेत पर लिखने की कोशिश में बिचारी उँगलियाँ

ये  तुम्हारे  इश्क़  के  आसार  कुछ  अच्छे नहीं
दिन में तारे गिन रही हैं फिर तुम्हारी उँगलियाँ

जब तक़ाज़ा अद्ल का हो दस्ते-मुन्सिफ़ क्या करे
मौत  का  फ़रमान  भी  करती  हैं  जारी  उँगलियाँ

बात  सच  है  जिन इशारों से  जलीं  ये बस्तियाँ
उनमें कुछ तो थीं तुम्हारी कुछ हमारी उँगलियाँ

लग रहा है यूँ मुझे ज़ालिम का पंजा देखकर
नौच कर खा जाएँगी जैसे शिकारी उँगलियाँ

जिसकी जो आदत है ‘अनवर’ उससे वो छुटती नहीं
ताश   के    पत्ते    ही    पकड़ेंगी    जुआरी   उँगलियाँ

गज़ल – तीन

देखा जहाँ-जहाँ  वही ख़ंजर बहुत मिले
ख़ूँरेजि़यों के हर कहीं मंज़र बहुत मिले

वौ हौसला  वो अज़्म किसी में नहीं मिला
लोगों के यूँ तो नाम सिकन्दर बहुत मिले

इंसान कम मिले मुझे दुनिया की भीड़ में
या रब  तेरी ज़मीं पे  पयम्बर बहुत मिले

मोती  तुम्हारे  वस्ल  के  नायाब  ही  रहे
लेकिन तुम्हारे हिज्र के गौहर बहुत मिले

हम   से    मसर्रतों   के    रहे   दूर    क़ाफि़ले
‘अनवर’ ग़मों के, राह में लश्कर बहुत मिले

रवि कुमार, रावतभाटा

गज़ल – चार

गाती हुई  कोयल  न  कोई  मोर मिलेगा
शहरों में मशीनों का फ़क़त शोर मिलेगा

आसान नहीं है  तेरा  उस पार पहुँचना
मँझधार में तूफाँ का बड़ा ज़ोर मिलेगा

ऐसे  ही  निगाहों  को   झुकाया  नहीं  करते
जब दिल को टटोलोगे तो इक चोर मिलेगा

बैठे  से  तो दुख-दर्द  कभी ख़त्म न होंगे
हिम्मत जो रखोगे तो कहीं छोर मिलेगा

तपते हुए सहराओं में क्या पाओगे ‘अनवर’
पानी   तो   मेरे   यार   कहीं   और   मिलेगा

गज़ल – पांच

हाथ उस के  बड़ा  अनमोल  गुहर  आ जाये
जिसको इस दौर में जीने का हुनर आ जाये

ग़ौर से देखना बादल भी अगर आ जाये
ईद का चाँद है  शायद  वो नज़र आ जाये

जिसकी मंज़िल पे मुहब्बत के दिये जलते हों
ज़िदगी  में   कोई  ऐसा  भी    सफ़र  आ  जाये

कितना मुश्किल है कड़ी धूप में तनहा चलना
काश   आ   जाए ,  तेरी   राहगुज़र   आ   जाये

काश पढ़ ले वो सितमगर मेरे चेहरे की किताब
काश   उसको  भी   मेरा  दर्द     नज़र  आ  जाये

मैं  बहुत  दूर  किनारे  से  अभी  हूँ   लेकिन
अज़्म रक्खूँ तो ये सहारा मेरे सर आ जाये

यूँ   अचानक   वो   ख़यालों   में   चले  आते  हैं
जिस तरह दिल में किसी बात का डर आ जाये

सालहा  – साल  के   मंसूबे    बनाने     वाले
कौन कह सकता है तू शाम को घर आ जाये

क़ाफ़िला अब मेरा मंज़िल पे रूकेगा ‘अनवर’
अब  नहीं  चाहिए  रस्ते  में  शजर  आ  जाय

शब्दार्थ :
सुख़नवर – कवि, शायर ; दानिशवर – बुद्धिमान, विद्वान ; लम्स – स्पर्श, सहवास
अद्ल – न्याय ; दस्ते-मुन्सिफ़ – इंसाफ़ करने वाले का हाथ ; अज़्म – संकल्प, दृढ़-निश्चय
पयम्बर – ईश-दूत, अवतार, पैग़म्बर ; मसर्रतों – ख़ुशियों ; शजर – वृक्ष, दरख़्त

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शकूर अनवर
प्रस्तुति – रवि कुमार