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किधर गये वो वायदे? सुखों के ख़्वाब क्या हुए? – शलभ श्रीराम सिंह

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किधर गये वो वायदे? सुखों के ख़्वाब क्या हुए? – शलभ श्रीराम सिंह
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, शलभ श्रीराम सिंह की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

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०००००००

रवि कुमार

शोला हो चुकी निगाहों के जरिए

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शोला हो चुकी निगाहों के जरिए
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

n6

मैं नींद खोजता रहा
नींद एक ख़्वाब
बिल आखिर कंटीली झाड़ियों के इक सहरा में
मुझे नींद मिली
और वस्ल के ख़ामोश समन्दर की गहराई में
नींद को ख़्वाब

पर कंटीली झाड़ियों की नींद में
वस्ल का ख़्वाब
रेत के घर की मानिंद बिखर गया
रात को मिली उदासी
दिन को बेकरारी
मेरे हिस्से हिज़्र का रेगिस्तान आया
क्योंकि सब बेशुमार पानी चाहते थे

नागफनी के पौधे सा
मैं तरसता रहा
एक नाज़ुक छुअन के अहसास के लिए
मेरे अश्क जो बहते
जुगनू सा चमक कर रेत का ज़र्रा हो जाते
मैंने मोतियों की आस छोड़ दी

मैं चलना चाहता था
पर दरख़्त हो गया
और फलों से लद गया

मैं खिलना चाहता था
पर पत्थर हो गया
और बुत में ढ़ल गया

मैं दुनिया को
आगोश में लेना चाहता था
पर शून्य हो गया
और दुनिया की मुट्ठी में सिमट गया

मैंने तारे तोडने चाहे
चांद मुझसे खफ़ा हो गया

मैंने चांद को लपकना चाहा
सूरज मुझसे खफ़ा हो गया

मैंने सूरज को मसल देना चाहा
मेरे हाथ झुलस गये
और मैं
औंधे मुंह ज़मीं में धंस गया

मैं गहरा
और गहरा धंसना चाहता हूं
ताकि हो सकता है
मैं ज़मीं के दूसरे छोर पर जा निकलूं
और अपने पैरों पर फिर से
सीधा खडा़ हो जाऊं

मैं अपनी
शोला हो चुकी निगाहों के जरिए
फ़लक की बुलन्दियों से
फिर से मुख़ातिब होना चाहता हूं

०००००
रवि कुमार

और शायद मैं फौरी नतीज़ों से खौफ़ज़दा हूं

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मेरे पास कई ख़्वाब हैं
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

n4

मेरे पास कई ख़्वाब हैं
ख़्वाबों के पास कई ताबीरें
पर लानतें भेजने वाली बात यह है
मुझे मेरे ख़्वाबों की ताबीर नहीं मालूम

मैंने उसे अपने ख़्वाब बताए
और ताबीर जाननी चाही
वह फ़िक्रज़दा हो गई
और मकडियों के जालों से भरी
पुरानी अटारी को देर तक खखोरती रही
फिर उसने हर मर्तबान उलट कर देखा

बिल आखिर
जब कुछ बूझ पाना बेमानी हो गया
ज़िद करके उसने मेरी बांह पर
काले डोरे से एक ताबीज बांधा
जिसे उसने किसी फकीर से
तमाम बलाओं को पल में उडा़ देने वाली
एक फूंक के साथ
चार आने के बदले में लिया था
और मेरे बिस्तर के नीचे
चुपचाप एक खंजर रख दिया
जैसा कि अक्सर मेरी दादी
फिर मेरी माँ करती आई थी
जब मैं बचपन में
सोते में डर जाया करता था
और सुब्‍हा बिस्तर गीला मिलता था

मैं उसकी हर हरकत को
अपने ख़्वाबों की ताबीर तस्लीम कर रहा था

अब वह सोते वक्त
मेरी पेशानी का बोसा लिया करती है
और मेरे बालों में उंगलियां फिराते
सीने पर सिर टिका कर
जाने कब सो जाया करती है
उसके चिंतित न्यौछावर स्नेह के चलते
मैं अपनी सपाट छातियों में
लबालब दूध महसूस करता हूं

उसे नहीं मालूम शायद
ख़्वाब रात के अंधेरे और
नींद के मुंतज़िर नहीं होते

उसे यह भी नहीं मालूम
कि सुर्ख़ आफ़ताब को
नीले आसमां में ताबिन्दा होता देखने के ख़्वाब
स्याह आफ़ताब के सामने ही
गदराया करते हैं
पर वह रोज़ाना मेरे लिए
ख़्वाबों की ताबीर पा जाने की
दुआ मांगा करती है

मेरे पास ऐसे कई ख़्वाब हैं
ख़्वाबों के पास ऐसी कई ताबीरें
और शायद मैं
फौरी नतीज़ों से खौफ़ज़दा हूं

०००००
रवि कुमार

ख़्वाब – सपने, ताबीर – ख़्वाबों का मतलब, नतीज़ा, बिल आखिर – अंततः
तस्लीम करना – मानना, मुंतज़िर – इंतज़ार में, ताबिन्दा – प्रतिष्ठित