Tag Archives: रवि कुमार

बादलों की बस्ती में अलसाये से पहाड़ – छायाचित्र – रवि कुमार

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बादलों की बस्ती में अलसाये से पहाड़
( photographs by ravi kumar, rawatbhata )

अभी पहाड़ी इलाके की यात्रा के दौरान लिये गये कुछ छायाचित्र यहां प्रस्तुत हैं.

कुछ चहरे भी……….

और यह भी……

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रवि कुमार


देखना ख़ुद को दर्पण में, कैमरे की नज़र से…

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देखना ख़ुद को दर्पण में, कैमरे की नज़र से
( self photographs by ravi kumar, rawatbhata )

अभी कुछ दिनों पहले जयपुर प्रवास के दौरान एक अलसुबह, जबरदस्ती कराए गये स्नान के बाद, खिडकी से आती धूप की एक लहर के साये में ख़ुद को दर्पण में देखा. हाथ में कैमरा था, उसने भी अपनी नज़र ड़ाली…और ये छायाचित्र नमूदार हो गये…

देखिए, धूप का साया कैसी अभिव्यंजना रचता है…
साधारण को कैसी असाधारण आभा से भर देता है…

छाया चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छाया चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

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रवि कुमार

एक ऐसे समय में – कविता – रवि कुमार

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एक ऐसे समय में
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

एक ऐसे समय में
जब काला सूरज ड़ूबता नहीं दिख रहा है
और सुर्ख़ सूरज के निकलने की अभी उम्मीद नहीं है

एक ऐसे समय में
जब यथार्थ गले से नीचे नहीं उतर रहा है
और आस्थाएं थूकी न जा पा रही हैं

एक ऐसे समय में
जब अतीत की श्रेष्ठता का ढ़ोल पीटा जा रहा है
और भविष्य अनिश्चित और असुरक्षित दिख रहा है

एक ऐसे समय में
जब भ्रमित दिवाःस्वप्नों से हमारी झोली भरी है
और पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक रही है

एक ऐसे समय में
जब लग रहा है कि पूरी दुनिया हमारी पहुंच में है
और मुट्ठी से रेत का आख़िरी ज़र्रा भी सरकता सा लग रहा है

एक ऐसे समय में
जब सिद्ध किया जा रहा है
कि यह दुनिया निर्वैकल्पिक है
कि इस रात की कोई सुबह नहीं
और मुर्गों की बांगों की गूंज भी
लगातार माहौल को खदबदा रही हैं

एक ऐसे समय में
जब लगता है कि कुछ नहीं किया जा सकता
दरअसल
यही समय होता है
जब कुछ किया जा सकता है

जब कुछ जरूर किया जाना चाहिए

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रवि कुमार

फिर से लौटेंगे भेड़िए – रवि कुमार

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फिर से लौटेंगे भेड़िए – रवि कुमार
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

एक कविता पोस्टर ख़ुद की कविता पर भी लिख मारा था.

इस बार अपनी कोई कविता ही देना चाहता था, सोचा चलो यह पोस्टर ही पोस्ट कर दूं.

बडे़ आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें……

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रवि कुमार

अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द

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अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

nakabiliyato ke babjood

जो अपना ज़मीर नहीं मार सकते
वे इस मौजूदा दौर में
ज़िन्दा रहने के काबिल नहीं
मैं उन्हीं में से एक हूं

मेरा वज़ूद मुझसे ख़फ़ा है
क्योंकि मैंने रूह से वफ़ा करनी चाही
और अपना ज़मीर नहीं मार पाया

इतनी अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द
मैं ज़िन्दा हूं
यह एक खोजबीन का मसअला है
उन तमाम खु़दावंद माहिरीन के लिए
जिन्होंने इस्पात के ऐसे मुजस्समें ईज़ाद किए
जिनके कि सीने में धड़कन नहीं होती
और जिनकी दिमाग़ जैसी चीज़
उनकी उंगलियों की हरकतों की मोहताज़ है

मैं यह राज़
लोगों में फुसफुसाता हूं
वे चौंक उठते हैं सहसा
फिर मुस्कुरा देते हैं
एक हसीन मज़ाक समझकर

मैं चौराहों पर चीख़ चीख़ कर
लोगों की तरफ़
उछालता रहता हूं यह राज़
अजीब नज़रों से बेधा जाता है मुझे

बेखौ़फ़ हैं सभी खुदावंद माहिरीन
क्योंकि अभी यह क़यामतख़ेज राज़
लोगों के गले नहीं उतर रहा
और मेरे सरफिरा होने की
अफ़वाहें जोरों पर हैं

चाहे वे मेरी तरफ़ से
अपने आपको कितना भी बेपरवाह दिखाएं
पर एक-एक हरकत मेरी
पूरी शिद्दत से परखी जा रही है

जिस दिन भी मैं
इतनी अहम नाक़ाबिलियतों के बाबजू्द
अपना ज़िन्दा होना
साबित कर सकने की क़ूवत पा लूंगा

मुझे मुर्दा करार दे दिया जाएगा
०००००
रवि कुमार