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यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म

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यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhta )

यहां-वहां कई जगह आजकल बरतनों की खनखनाहट का दौर जारी है. दादी जी कहा करती थी रसोईघर से आती ऐसी आवाज़े बताती हैं कि कौरानी का ध्यान आज और कहीं है, किसी और बात पर नाराज़ी है और कहीं और उलझ गई है.

वर्तमान दौर की समस्याएं पुरजोर तरीके से हमारे सामने मुंह बाए खड़ी हैं. हमें अक्सर वह अनुपस्थित कारण समझ नहीं आता जो कि मूल में होता है, और हम दिखती सी या दिखाई जाती चीज़ों में उलझ कर अपना बचा खुचा तिया-पांचा करते रहते हैं, यह हमारे दादाजी कहा करते थे.

दादाजी नहीं रहे, पर दादी जी हैं जो अभी भी सब कुछ ठीक रहे, शांति रहे, चोंचों को चुग्गा-पानी मिलता रहे, बगिया में मीठा कलरव गूंजता रहे, इसकी लगातार प्रार्थना करती रहती हैं.

कुछ चोंचों को ज़्यादा चुग्गा-पानी नसीब हो रहा है, कुछ चोंचों के पास फ़ाकामस्ती का आलम है. चारों तरफ़ चीं-चां-चां-चूं छाई हुई है, लहुलुहान होना ही कहीं सुकून का वायस बना हुआ है. बाजों की बन आई है, इससे बेहतर अभीष्ट पूर्ति उन्हें और क्या नसीब हो सकती है.

बाजों और गिद्धों को साम्राज्य पूरी दुनिया को गिरफ़्त में ले रहा है. कबूतरों की शामत है.

अपनी-अपनी लुकाठी दबाए, हम अल्मस्त हैं.

एक कविता पोस्टर देखिए, और क्या कहा जाए….मज़ा लीजिए?

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रवि कुमार

धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत ज्ञात कीजिए

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धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत ज्ञात कीजिए – अष्टभुजा शुक्ल
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, अष्टभुजा शुक्ल की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

बडे़ आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें……

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रवि कुमार

कल्याण ! मानव मात्र का कल्याण !

सामान्य

कल्याण ! मानव मात्र का कल्याण !
(a short story by ravi kumar, rawatbhata)

गुरू जी प्रवचनरत थे.”शास्त्रों के अनुसार…”, वे कह रहे थे,
“धर्म का उद्देश्य मानव कल्याण है.”
चेला मननरत था,बोल उठा,
“मतलब ये गुरू जी कि अपने हिंदू धर्म का उद्देश्य हिन्दुओं का कल्याण करना है.”
गुरू जी थोड़ा सा खीझ गये,
“नासमझ, कल्याण ! मानव मात्र का कल्याण !”
चेला असमंजस में था,
“यानि कि गुरू जी,मानव कल्याण से जो विरत हो वह धर्म नहीं अधर्म है.”
गुरू जी मुस्कुराए, चेला सही दिशा में था.
“यानि कि गुरू जी, हिंदू धर्म यदि किसी अन्य धर्म के मानव मात्र के कल्याण
की गारन्टी नही दे सकता तो वह भी धर्म नही अधर्म है?”
गुरू जी के माथे पर बल पड गये.
“यानि कि धर्म की ध्वजा उठाये ये सब लोग जो नफ़रत फैला रहे हैं, मार-काट
मचा रहे हैं, असल में सभी अधर्मी हैं गुरू जी?”

चेला पूरी श्रद्धा से गुरू जी की ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहा था.
पांडा़ल स्तब्ध था.
गुरू जी आंखें चौडा़ए चुप थे.

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रवि कुमार