Tag Archives: घर

स्त्री बीमार भी नहीं होना चाहती – कविता – रवि कुमार

सामान्य

स्त्री बीमार भी नहीं होना चाहती
( a poem by ravi kumar )

rk10

स्त्री बाहर नहीं है
वह सिर्फ़ बीमार है

जब स्त्री बीमार होती है
पूरा घर अस्तव्यस्त सा हो जाता है

पुरूष स्त्री बनने के प्रयासों में
चिड़चिड़ा रहे होते हैं

बच्चे यह नहीं समझ पा रहे होते हैं
कि वे खुश हैं या दुखी

स्त्री बीमार भी नहीं होना चाहती

वह नहीं चाहती
कि घर को उसके बिना दुरस्त रहने की
आदत हो जाए

पुरुष भी यही चाहते हैं
बच्चे भी इसी में भलाई सी महसूसते हैं

आम सहमति से
आम घरों की स्त्रियां
घर में ही तब्दील हो जाना चाहती है

०००००
रवि कुमार