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माफ़िया ये समय – महेन्द्र नेह के दो गीत

सामान्य

महेन्द्र नेह के दो गीत
( उदयपुर से निकलने वाले पाक्षिक ‘महावीर समता संदेश’ से साभार )

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( एक )

माफ़िया
ये समय
हमको नित्य धमकाता

छोड़ दो यह रास्ता
ईमान वाला
हम कहें वैसे चलो
बदल दो सांचे पुराने
हम कहें जैसे ढलो
माफ़िया यह समय
हमको नित्य हड़काता

त्याग दो ये सत्य की
तोता रटन्ती
हम कहें वैसा कहो
फैंक दो तखरी धरम की
हम कहें जैसा करो
माफ़िया ये समय
हमको नित्य दहलाता

भूल जाओ जो पढ़ा
अब तक किताबी
हम कहें वैसा पढ़ो
तोड़ दो कलमें नुकीली
हम कहें जैसा लिखो
माफ़िया ये समय
हमको नित्य धमकाता

०००००
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( दो )

रो रहे हैं
ख़ून के आंसू
जिन्होंने
इस चमन में गंध रोपी है

फड़फड़ाई सुबह जब
अख़बार बनकर
पांव उनके पैडलों पर थे
झिलमिलाई रात जब
अभिसारिका बन
हाथ उनके सांकलों में थे
सी रहे हैं फट गई चादर
जिन्होंने इस धरा को चांदनी दी है

डगमगाई नाव जब
पतवार बनकर
देह उनकी हर लहर पर थी
गुनगुनाए शब्द जब
पुरवाइयां बन
दृष्टि उनकी हर पहर पर थी
पढ़ रहे हैं धूप की पोथी
जिन्होंने बरगदों को छांह सौंपी है

छलछलाई आंख जब
त्यौहार बनकर
प्राण उनके युद्ध रथ पर थे
खिलखिलाई शाम जब
मदहोश होकर
कदम उनके अग्नि पथ पर थे
सह रहे हैं मार सत्ता की
जिन्होंने इस वतन को ज़िंदगी दी है

०००००

महेन्द्र नेह

एक अच्छी नींद – नचिकेता

सामान्य

नचिकेता के गीत

पत्रिका उदभावना के पन्ने पलटते हुए, बहुत समय के बाद नचिकेता के गीत पढ़ने को मिले.
उनका हर गीत कई आयामों से बावस्ता होता है और पाठक से सीधे संवाद करता है. इनको गुनगुनाना इनके प्रभाव को कई गुना कर देता है.
इस बार उनका एक गीत प्रस्तुत है.

एक अच्छी नींद

एक अच्छी
नींद सोना चाहता हूं

चाहकर ही
सदा हासिल हँसी होती
बिना चाहे है मिली
बेबसी होती
घाम से तम
घना धोना चाहता हूं

बिना चाहे
कब हुए हैं स्वप्न पूरे
काहिलों के कर्म होते
हैं अधूरे
पकड़ माथा
मैं न रोना चाहता हूं

चाहने से
रुख़ पलट जाता हवा का
कथानक भी बदल जाता
है कथा का
मैं न आया
वक्त खोना चाहता हूं

एक अच्छी
नींद सोना चाहता हूं

०००००
नचिकेता
द्वारा प्रेमचंद प्रसाद,
पथ सं. १, आज़ाद नगर
कंकड़बाग, पटना-८०००२०

प्रस्तुति – रवि कुमार