Tag Archives: कविता-पोस्टर

हमारी आंखों में ख़ून नहीं उतरता – महेन्द्र नेह

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हमारी आंखों में ख़ून नहीं उतरता – महेन्द्र नेह
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

पिछले दिनों मथुरा में कोटा के ख्यातिनाम गीतकार महेन्द्र नेह की कविता पुस्तक ‘थिरक उठेगी धरती’ का विमोचन संपन्न हुआ था। वहां कविता पोस्टर प्रदर्शनी भी लगाई गई थी, जिसमें उनकी कविताओं पर बनाए गए पोस्टर समसामयिक प्रमुखता से थे।

महेन्द्र नेह की कविता पंक्तियों पर बनाया गया एक पोस्टर यहां प्रस्तुत है।

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रवि कुमार

ये कैसी मंदी सजन – शिवराम के दोहे

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ये कैसी मंदी सजन – शिवराम के दोहे
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

पिछली बार शिवराम की कविताओं से गुजरना हुआ था.  इस बार शिवराम के ही कुछ दोहों पर बनाया गया एक कविता पोस्टर यहां प्रस्तुत है. यह अभी हाल ही में लोकसंघर्ष पत्रिका पर पृष्ठांकित हो चुका है, इसलिए हो सकता है कुछ मित्र इससे गुजर चुके हों.                                                     परंपरागत शिल्प में देखिए किस तरह समसामयिक संदर्भ अपनी अभिव्यक्ति की छटा बिखेरते हैं.
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रवि कुमार

असली इंसान की तरह जिएंगे – मार्क्स

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असली इंसान की तरह जिएंगे – मार्क्स
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, मार्क्स की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

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रवि कुमार

 

यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म

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यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhta )

यहां-वहां कई जगह आजकल बरतनों की खनखनाहट का दौर जारी है. दादी जी कहा करती थी रसोईघर से आती ऐसी आवाज़े बताती हैं कि कौरानी का ध्यान आज और कहीं है, किसी और बात पर नाराज़ी है और कहीं और उलझ गई है.

वर्तमान दौर की समस्याएं पुरजोर तरीके से हमारे सामने मुंह बाए खड़ी हैं. हमें अक्सर वह अनुपस्थित कारण समझ नहीं आता जो कि मूल में होता है, और हम दिखती सी या दिखाई जाती चीज़ों में उलझ कर अपना बचा खुचा तिया-पांचा करते रहते हैं, यह हमारे दादाजी कहा करते थे.

दादाजी नहीं रहे, पर दादी जी हैं जो अभी भी सब कुछ ठीक रहे, शांति रहे, चोंचों को चुग्गा-पानी मिलता रहे, बगिया में मीठा कलरव गूंजता रहे, इसकी लगातार प्रार्थना करती रहती हैं.

कुछ चोंचों को ज़्यादा चुग्गा-पानी नसीब हो रहा है, कुछ चोंचों के पास फ़ाकामस्ती का आलम है. चारों तरफ़ चीं-चां-चां-चूं छाई हुई है, लहुलुहान होना ही कहीं सुकून का वायस बना हुआ है. बाजों की बन आई है, इससे बेहतर अभीष्ट पूर्ति उन्हें और क्या नसीब हो सकती है.

बाजों और गिद्धों को साम्राज्य पूरी दुनिया को गिरफ़्त में ले रहा है. कबूतरों की शामत है.

अपनी-अपनी लुकाठी दबाए, हम अल्मस्त हैं.

एक कविता पोस्टर देखिए, और क्या कहा जाए….मज़ा लीजिए?

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रवि कुमार