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दुनिया भर के प्रेम के लिए – लवली गोस्वामी की कविताएं

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दुनिया भर के प्रेम के लिए
लवली गोस्वामी की कविताएं


10982066_10205980191812776_7742250801963854610_nइस बार प्रस्तुत हैं लवली गोस्वामी की कुछ कविताएं। दर्शन, मनोविज्ञान एवं मिथकों पर वे गंभीर लेखन करती रही हैं और अब सामने आई उनकी कविताएं भी चर्चा में हैं। उनके सामाजिक सरोकार और ज़मीनी सक्रियता के हासिल, उनकी कविताओं में और अधिक मुखर हो उठते हैं, स्पष्टता से अभिव्यक्त होते हैं। इन दिनों उनकी प्रेम और मिथकों पर भी कुछ कविताएं पढ़ने में आईं जिनमें वर्तमान संदर्भों में इन्हें एक अलहदा नज़रिये से देखा गया है। वे फिर कभी यहां प्रस्तुत की जाएंगी, फिलहाल इन तीन कविताओं से गुजर लिया जाए।


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कायांतरण

याद करती हूँ तुम्हें
जब उदासीनता के दौर धूल के बग़ूलों की तरह गुजरतें हैं
स्मृतियों की किरचें नंगे पैरों में नश्तर सी चुभती हैं
याद करती हूँ और उपसंहार के सभी अनुष्ठान झुठलाता
प्रेम गुजरता है आत्मा से भूकम्प की तरह

अब भी सियासत गर्म तवे सी है
जिसमे नाचती है साम्प्रदायिकता और नफरत की बूँदे
फिर वे बदलती जातीं हैं अफवाहों के धुएं में
दंगों के कोलाहल में

अब भी नाकारा कहे जाने वाले लोगों की जायज – नाजायज औलादें
कुपोषण से फूले पेट लेकर शहरों के मलबे में बसेरा करती हैं
होठों पर आलता पोतती वेश्याएं अभी भी
रोग से बजबजाती देह का कौड़ियों के मोल सौदा करती है
मैं वहां कमनीयता नही देखती
मैं वहां वितृष्णा से भी नही देखती
उनसे उधार लेती हूँ सहने की ताक़त

दुःख की टीस बाँट दी मैंने
प्रेमियों संग भागी उन लड़कियों में
जिन्हे जंगलों से लाकर प्रेमियों ने
मोबाइल के नए मॉडल के लिए शहर में बेंच दिया
उन किशोरियों में जिनके प्रेम के दृश्य
इंटरनेट में पोर्न के नाम पर पाये गए

तिरिस्कार का ताप बाँट दिया उनमे
जो बलात्कृत हुईं अपने पिताओं – दाताओं से
जिनकी योनि में शीशे सभ्यता की रक्षा के नाम पर डलवाये गए

तुम्हे याद करती हूँ कि
दे सकूँ अपनी आँखों का जल थोड़ा – थोड़ा
पानी मर चुकी सब आँखों में

हमारी राहतों के गीत अब
लगभग कोरी थालियों की तृप्ति में गूंजते हैं
देह का लावण्य भर जाता है सभ्यता के सम्मिलित रुदन में
कामना निशंक युवतियों की खिलखिलाहट का रूप ले लेती है

अक्सर याद करती हूँ तुम्हे
सभ्यताओं से चले आ रहे
जिन्दा रह जाने भर के युद्ध के लिए
दुनिया भर के प्रेम के लिए
उजली सुबह के साझा सपने के लिए
फिर मर जाने तक जिन्दा रहने के लिए।
०००००

प्रेम के बिंब

यह चाँद के लिए चकोर होने सा नहीं है
प्रेम समय के लिए गोधूलि की बेला है
अँधेरे – उजाले का संधिकाल है
जहाँ न सूरज है न चाँद है
वह समय जब सांध्य तारा अपना अस्तित्व तलाशता है

प्रेम है चीनी कथाओं का वह फल जिससे मन्दाकिनी निकली
जो बहा ले गई आकाश के सबसे अधिक चमकीले दो तारों के मध्य आकाश गंगा
अब एक दिन मुअय्यन है उनके मिलन को पूरे साल में
और मिलन का वह दिन लोगों के लिए उत्सव है

प्रेम का होना वसंत की मीठी बयार नहीं है
यह पतझड़ के पत्तों का रूखापन भी नहीं है
यह बरसात की खदबदाती टपकती हंसी नहीं है
तो शीत की कंपकपाती उजली रात भी नहीं है

यह ऋतुओं का संधिकाल है
वह समय जब लगता है
सुख – दुःख ग्लानि – क्लेश मान – अवमानना का सबसे तीव्र संक्रमण
जब सबसे तुनकमिज़ाज होते हैं सब ख्याल
अपनी ही तासीर अजनबी लगती है
और सबसे प्रिय भोजन भी अरुचि पैदा करता है
जब सब अगले मौसम के फूल फूटने वाले होते

और हवाओं में आने वाले मौसम की आहट होती है
यह न नया होता है न पुराना होता है
घर की औरत के लिए औसारे की तरह
जो न उसका अपना होता है
न बेगाना होता है

प्रेम का होना फूल खिलने सा नहीं है
यह पत्ते झड़ने सा भी नहीं है
अगर यह पूर्णतः पल्ववित पेड़ नहीं
तो बीज से अलग अस्तित्व तलाशता अंकुर भी नहीं
यह आंधी से लड़ता किशोरवय पौधा है
जिसमें लचक है
और टूट जाने का भय भी
जिसमें सामर्थ्य है
और फिर से सँभल जाने का आशय भी

प्रेम तुम्हारी चंचल आँखों की ताब नहीं है
यह मेरी नज़र का मान भी नहीं है
यह कामनाओं के उपवन में उगी अवांछित पौध नहीं
तो ज़रुरत से सींच कर उगाया गया अलंकरण भी नहीं
यह चाय बागान में लगाया गया सिल्वर ओक है
वह विश्राम स्थल जो हमारी निरीहता के पलों में
खुद टूट कर हमारी आत्मा को निराशा की तेज़ धूप
और हक़ीक़तों की उत्ताल हवा से बचाता है

०००००

स्वीकृतियाँ

मैं हमेशा अपने भाव छिपाती रही खुद से
भावनाओं का आना कविताओं का आना था
मुझे भय लगता रहा मन में कविता के आने से
कटुता और रुक्षता के रीत जाने से
तितलियों के रंगों से अधिक उनकी निरीहता से
फूलों की महक से अधिक उनकी कोमलता से
बारिश की धमक से अधिक ख़ुद भींग जाने से

शक्तिशाली होने का अर्थ उन्माद के क्षणों में एकाकी होना है
विस्तृत होने का अर्थ आघात के लिए सर्वसुलभ होना है
सबसे गहरी अँधेरी खाईयों की तरफ बारिश का पानी प्रचंड वेग से बहता है
ऊँचे और विस्तृत पहाड़ सबसे अधिक भूस्खलन के शिकार होते हैं
बड़े तारे सबसे शक्तिशाली ब्लेक हॉल में बदलते हैं
ठूँठ कठोरता और पौधे लचक के कारण बचे रहते हैं
फलों से लदे विशाल हरे पेड़ आंधी में सबसे पहले टूटते हैं

महानता के रंग -रोगन नही चाहिए थे मुझे
पर इंकार के सब मौके मुट्ठी से रेत की तरह फिसल गए
घोषणापत्रों पर मुझे आह्वान के नारों की तरह उकेर दिया गया
कोई व्यंग्य से हँसा मैं कालिदास हुई
किसी ने अपमानित किया मैं शर्मिष्ठा हुई
किसी ने नफ़रत की मैं ईसा हो गई
जब-जब किसी ने अनुशंसा की
मैं सिर्फ सन्देश रह गई
मैं सिर्फ शब्द बनी रही
सबने अपने-अपने अर्थ लिए
मैं सापेक्ष बनी रही
सब मुझे अपने विपक्ष में समझते रहे

जब भी मौसम ने दस्तक दी मैंने चक्रवात चुने
जब गर्मियाँ आई मुझे दोपहर की चिलचिलाती धूप भली लगी
जब सर्दियाँ आई माघ की ठंढ
(यूँ ही नही कहते हमारे गांव में माघ के जाड़ बाघ नियर)
सामर्थ्य नही था मुझमे पर विवशता में हिरण भी आक्रामक होता है
मुझे उदाहरण भी नही बनना था पर मिसालों के आभाव ने समाज की बुद्धि कुंद कर दी
और मुझे योग्यता के विज्ञापन में बदल दिया गया

सिर्फ इसलिए किसी को गैरजरुरी सी शुरुआत में बदल जाना था
महानताओं ने धीरे से क्षमा कर दी उसकी गलतियाँ
पलायन एक सुविधापूर्ण चयन होता है
चुनौतीपूर्ण चयन अहम का आहार होता है

जिसकी बलि चढ़ा दी जाये वह समर्थ नही कहलाता
वरना समाज अभिमन्यु की जगह अरावन की प्रशस्ति गाता

०००००

लवली गोस्वामी


दर्शन और मनोविज्ञान की गहन अध्येता. ब्लॉग तथा पत्र-पत्रिकाओं में गंभीर लेखन. दखल प्रकाशन से एक पुस्तक ‘प्राचीन भारत में मातृसत्ता और यौनिकता’ प्रकाशित. वाम राजनीति में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता. इन दिनों बैंगलोर में.


 

उसे शांति की चाह है मुझे बगावत की

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शिवराम की कुछ कविताएं

शिवरामइस बार प्रस्तुत हैं शिवराम की ही कुछ कविताएं. ये कविताएं कुछ समय पहले ही लिखी हुई थीं. ‘कथन’ ने अपने जनवरी-मार्च, २०११ अंक में शिवराम को याद करते हुए, राजाराम भादू का उन पर स्मृति-आलेख और यह कविताएं प्रकाशित की हैं.

चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा


चाह

वह
तट खोज रहा है
मैं
समन्दर
वह
दो गज ज़मीन
मैं
दो पंख नवीन

उसे शांति की चाह है
मुझे बगावत की

०००००

तृप्ति-अतृप्ति

आदर
उम्मीद से सौ गुना अधिक
प्यार
चाहत से बहुत-बहुत कम

यही तृप्ति-अतृप्ति
अपनी ज़िंदगी का दम-खम

पल-पल को जिया
विष भी – अमृत भी
यूं नहीं
तो यूं पिया

असंतुष्ट भी हूं
संतुष्ट भी

जो पाना चाहा नहीं मिला
जो करना चाहा कर लिया

०००००


जैसा भी था वैसा ही हूं

पंख नहीं थे
फिर भी मैंने भरी उड़ानें

पैर नहीं थे
फिर भी मैंने दौड़ लगाई

हाथ नहीं थे
फिर भी मैंने पर्वत खिसकाए

आंख नहीं थी
फिर भी मैंने देखी जग की गहराई
नापी – जानी

सिखलाया मुझे तैरना
थपेड़ों दर थपेड़ों ने लहरों के
डूबा नहीं
तैर-तैर कर करी सफाई
कीचड़ – काई
जलकुंभी
छाई वनस्पति भांति-भांति की
बिना जड़ों की
बिना अर्थ की
बोईं बेल सिंघाड़े की

ह्र्दय नहीं था
फिर भी मैंने प्यार किया सृष्टि से
वक़्त नहीं था
फिर भी मैंने हर दायित्व निभाया
जितना खोया उतना पाया

जैसा भी था वैसा ही हूं
निकट भविष्य आसन्न युद्ध हित
अस्त्र चलाना – शस्त्र चलाना
सीख रहा हूं

०००००

यह कब पता चला

तेरे दिल में जहर भरा है
यह कब पता चला
मेरे दिल का घाव भरा है
यह कब पता चला

पानी नहीं बचा आंखों में
यह कब पता चला
थोथा जीवन बचा जगत में
यह कब पता चला

दरिया नहीं है दलदल है ये
यह कब पता चला
लाल नहीं वह नीला रंग है
यह कब पता चला

गली प्रेम की बहुत तंग है
यह कब पता चला
प्रेम नहीं यह दीर्घ जंग है
यह कब पता चला

इंतज़ार किसका पल-पल है
यह कब पता चला
मैं भी संग हूं कहा था किसने
यह कब पता चला

०००००

तुम्हारे बाद

जैसे झक्क दोपहरी में
डूब जाए सूरज

जैसे सूख जाए अचानक
कोई कल-कल बहती नदी

जैसे किसी पर्वत की छाती से
देखते-देखते अदृश्य हो जाए
कोई उछलता हुआ झरना

जैसे दमकते चांद को
निगल जाए आसमान

पीठ थपथपाता कोई स्नेहिल हाथ
आंख पोंछती खुरदरी अंगुलियां
आगे-आगे चलते दृढ़ कदम
अचानक लुप्त हो जाएं जैसे

कुछ वैसा ही लग रहा है कामरेड़
तुम्हारे बाद
सब कुछ उदास-उदास
बाहर भीतर, दूर-दूर, आस-पास

०००००

शिवराम
( जाने-माने नुक्कड़ नाटककार और साहित्यकार. ‘अभिव्यक्ति’ पत्रिका का संपादन. सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेपों के ज़रिए निरंतर परिवेश को आंदोलित करते रहने वाले गंभीर अध्येता और कुशल वक्ता. जन्म : 23 दिसंबर, 1949. निधन : 01 अक्टूबर, 2010.)
उनके बारे में थोड़ा अधिक जानने के लिए इस लिंक पर जाएं. ‘शिवराम : एक संक्षिप्त जीवन वृत्त’

प्रस्तुति – रवि कुमार

ईश्वर एक बड़ी सुविधा है – हरीशचन्द्र पाण्डे की कविताएं

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अभी ‘इतिहास बोध’ में हरिशचन्द्र पाण्ड़े की कविताओं से गुजरना हुआ। छोटे कलेवर की तीन बेहतरीन कविताओं को यहां साभार प्रस्तुत कर रहा हूं। शायद पसंद आएं।

ईश्वर एक बड़ी सुविधा है

चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

देवता

पहला पत्थर
आदमी की उदरपूर्ति में उठा

दूसरा पत्थर
आदमी द्वारा आदमी के लिए उठा

तीसरे पत्थर ने उठने से इंकार कर दिया
आदमी ने उसे देवता बना दिया

ईश्वर

उसकी आंखे बंद समझ
डंडी मार लो
बलात्कार कर लो
या गला रेत दो आदमी का
ईश्वर एक बड़ी सुविधा है

विचार

तुमने दिया एक विचार
और उसे फूलों से लाद दिया

तुमने अगरबत्ती दिखाई उसे
उसकी रक्षा के लिए कवच बनाए
उसके संकेत के लिए
लंबी पताका फहराई शीर्ष पर

उसकी पावनता की अक्षुण्णता के लिए
तुमने
ईंट-गारे से लेकर संगमरमर तक के आलय बनाए

उसकी आराधना में फूल चढ़े थे सबसे पहले
फिर जानवर चढ़े
और फिर आदमी ही आदमी

एक से अनेक तो हुए
मगर मूर्त न हुए विचार

मूर्ति हो गए

०००००

हरीशचन्द्र पाण्ड़े

प्रस्तुति – रवि कुमार

हम कवि और हमारी कविताएं – रवि कुमार

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हम कवि और हमारी कविताएं
( a poem by ravi kumar, rawatabhata )

कलाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

हम सभी संवेदनशील हैं
विचारशील भी
हमारा सौन्दर्यबोध
हर कुरूपता पर हमें द्रवित करता है

हमारे पास शब्द हैं
और कहने की बाजीगरी भी
हम लिख लेते हैं कविता

पर हमारी बदनसीबी
हमारा समय क्रांतिकारी नहीं है
यह इस नपुंसक दौर की
नियति ही है शायद
कि हमारी कविताएं
परिवर्तन का औजार बनने की बजाए
श्रेष्ठता बोध की तुष्टि का
जरिया बनकर उभरती हैं

पूंजी को चुनौती देती
हमारी कविताएं
धीरे-धीरे तब्दील होती जाती हैं
हमारी सबसे बड़ी पूंजी में

व्यवस्था के ख़िलाफ़ लिखी
अपनी इन्हीं कविताओं के जरिए
हम इसी व्यवस्था में
बनाना चाहते हैं अपना मुकाम

किसी प्रकाशक
या मूर्धन्य आलोचक की कृपा-दृष्टि
को टटोलते हम
श्रेष्ठ कवियों की गिनती में
शामिल हो जाना चाहते हैं

०००००
रवि कुमार