अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 3

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( तीसरा भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

parliamentattack-1_121311071046( दूसरे भाग से जारी…) पांच महीने तक, उसकी गिरफ़्तारी से लेकर उस समय तक जब पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाख़िल किया, एक उच्च सुरक्षा जेल ( हाई सिक्योरिटी प्रिज़न ) में बंद मोहम्मद अफ़ज़ल को किसी क़िस्म की क़ानूनी सहायता या क़ानूनी सलाह उपलब्ध नहीं थी। कोई नामी वकील नहीं, कोई बचाव समिति नहीं ( न भारत में, न कश्मीर में ) और कोई अभियान नहीं। चारों आरोपियों में उसकी स्थिति सबसे कमज़ोर थी, उसका मामला गिलानी के मामले से कहीं ज़्यादा जटिल था। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस दौरान ज़्यादातर वक़्त अफ़ज़ल के छोटे भाई हिलाल को कश्मीर में स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप ( एस.ओ.जी.) ने ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से हिरासत में रखा हुआ था। उसे अफ़ज़ल के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाख़िल करने के बाद ही छोड़ा गया ( यह इस पहेली का एक सिरा है जो कहानी के आगे बढ़ने के साथ ही पकड़ में आयेगा )।

प्रक्रिया की एक गंभीर अवहेलना करते हुए 20 दिसम्बर, 2001 को जांच अधिकारी, सहायक आयुक्त पुलिस राजबीर सिंह ने ( जिसे इतनी तादाद में ‘आतंकवादियों’ को एनकाउंटरों-मुठभेड़ों-में मारने के कारण प्रेम से ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’-मुठभेड़ विशेषज्ञ कहा जाता है ) स्पेशल सेल में एक पत्रकार सम्मेलन बुलाया।16 मोहम्मद अफ़ज़ल को मीडिया के सामने अपना ‘अपराध स्वीकार’ करने के लिए मजबूर किया गया। पुलिस आयुक्त अशोक चन्द ने प्रेस से कहा कि अफ़ज़ल ने पुलिस के सामने पहले ही अपना अपराध मान लिया है। यह बात सच्ची साबित नहीं हुई। पुलिस के सामने अफ़ज़ल की औपचारिक स्वीकारोक्ति अगले दिन जाकर ही हुई ( जिसके बाद वह लगातार पुलिस हिरासत में रहा – यंत्रणा के आगे बेबस – जो कि एक और गंभीर प्रक्रियागत चूक थी ) मीडिया के सामने की गयी अपनी ‘स्वीकारोक्ति’ में अफ़ज़ल ने पूरी तरह से अपने को संसद पर आक्रमण में शामिल होने का दोषी मान लिया था।17

मीडिया के सामने की गयी इस स्वीकारोक्ति के दौरान एक अजीब बात हुई। एक सीधे प्रश्न के उत्तर में अफ़ज़ल ने कहा कि गिलानी का आक्रमण से कोई लेना-देना नहीं है, वह पूरी तरह से बेक़सूर है। इस पर एसीपी राजबीर सिंह ने चीख़कर उसे जबरन चुप करवा दिया और मीडिया से गुज़ारिश की कि अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति के इस हिस्से को नज़रअन्दाज़ कर दें। और उन्होंने मान भी लिया। यह कहानी, तीन महीने के बाद उस समय सामने आयी जब टीवी चैनल ‘आज तक’ ने स्वीकारोक्ति को ‘हमले के सौ दिन’ नामक कार्यक्रम में दुबारा प्रसारित किया और जाने कैसे इस हिस्से को भी बना रहने दिया। इस बीच सामान्य जनता की नज़रों में – जो क़ानून और दंड प्रक्रिया के बारे में बहुत कम जानती है – अफ़ज़ल की सार्वजनिक ‘स्वीकारोक्ति’ ने उसके अपराध की ही पुष्टि की। ‘समाज के सामूहिक अंतःकरण के फ़ैसले’ के बारे में कोई दूसरा अनुमान लगाना मुश्किल नहीं रहा होगा।

इस मीडिया स्वीकारोक्ति के अगले दिन, अफ़ज़ल की आधिकारिक स्वीकारोक्ति करवायी गयी। परिनिष्ठित अंग्रेजी में, डीसीपी अशोक चंद को बोलकर लिखवाये गये ( डीसीपी के शब्दों में ‘वह बतलाता गया और मैं लिखता गया’) निर्दोष ढंग से रचे, एकदम प्रवाहमान वक्तव्य को एक सीलबंद लिफ़ाफ़े में न्यायिक मैजिस्ट्रेट को दिया गया। अफ़ज़ल इस स्वीकारोक्ति में, जो अब अभियोजन पक्ष के मुक़दमें की रीढ़ हो गयी है, एक ग़ज़ब का किस्सा बुनता है जो ग़ाज़ी बाबा, मौलाना मसूद, अज़हर, तारिक़ नाम के एक आदमी और पांच मारे गये आतंकवादियों को जोड़ता है; उनका साज़-सामान, हथियार और गोला-बारूद, गृहमंत्रालय के अनुमति-पत्र, एक लैपटॉप और नक़ली पहचान-पत्र, ठीक-ठीक कौन-सा रसायन उसने कहां से ख़रीदा इसकी विस्तॄत सूची, वह ठीक-ठीक अनुपात, जिसमें उन्हें मिलाकर विस्फोटक बनाया गया और ठीक-ठीक समय जब उसने किस मोबाइल नम्बर को फ़ोन किया और किस नम्बर से उसे फ़ोन आया ( किसी कारणवश, तब तक अफ़ज़ल ने गिलानी के बारे में अपना दिमाग़ बदल लिया था और उसे षड्यंत्र में पूरी तरह से शामिल कर लिया था )।

‘स्वीकारोक्ति’ का हर बिंदु पुलिस द्वारा पहले ही से जमा किये गये साक्ष्य से हू-ब-हू मेल खाता था। दूसरे शब्दों में अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति उस प्रारूप में एकदम फ़िट बैठती थी, जो पुलिस ने कुछ दिन पहले प्रेस के सामने पेश किया था, जैसे कांच की जूती में सिंड्रेला का पैर ( अगर कोई फ़िल्म होती तो आप कह सकते थे कि यह ऐसी पटकथा थी जो अपने साज़-सामान का पिटारा ख़ुद अपने साथ लायी थी। दरअसल, जैसा कि अब हम जानते हैं, इस पर एक फ़िल्म बनायी भी गयी। ज़ी टीवी अफ़ज़ल को इसके लिए कुछ रॉयल्टी का देनदार है )।

अन्ततः, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय, दोनों ने अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति को ‘प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपायों में चूक और उनकी अवहेलना’ के कारण ख़ारिज कर दिया। लेकिन जाने कैसे, अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति अब तक बची रह गयी है – अभियोजन पक्ष की किसी भुतही आधारशिला की तरह। और इससे पहले कि यह स्वीकारोक्ति तकनीकी और क़ानूनी तौर पर ख़ारिज हो, यह क़ानून से इतर एक बड़ा उद्देश्य हासिल कर चुकी थी। 21दिसम्बर, 2001 को जब भारत सरकार ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ युद्ध की तैयारी शुरू की, तो उसने कहा कि हमारे पास पाकिस्तान का हाथ होने के ‘स्पष्ट और अकाट्य प्रमाण’ हैं।18 अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति ही भारत सरकार के पास पाकिस्तान के शामिल होने का एकमात्र ‘प्रमाण’ थी। अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति। और स्टिकर घोषणा-पत्र। ज़रा सोचिये। पुलिस यंत्रणा के बल पर ली गयी इस ग़ैर-क़ानूनी स्वीकारोक्ति के आधार पर हज़ारों सैनिक जनता के ख़र्च पर पाकिस्तान की सीमा की ओर रवाना कर दिये गये और उपमहाद्वीप को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचाने के खेल के सुपुर्द कर दिया गया, जिसमें सारी दुनिया बन्धक बनी हुई थी।

कान में कहा गया बड़ा सवाल : क्या इसका बिल्कुल उलट नहीं हुआ हो सकता था ? क्या स्वीकारोक्ति ने युद्ध को उकसाया या फिर युद्ध की ज़रूरत ने स्वीकारोक्ति की ज़रूरत को उकसाया ?

बाद में, जब ऊंची अदालतों ने अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति को ख़ारिज कर दिया तो जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा की सारी बाते बंद हो गयीं। पाकिस्तान से जुड़ाव का दूसरा तार पांच मारे गये फ़ियादिनों की पहचान का रह गया था। मोहम्मद अफ़ज़ल ने, जो पुलिस हिरासत में ही था, उनकी पहचान मोहम्मद, राना, राजा, हमज़ा और हैदर के रूप में की थी। गृहमंत्री ने कहा कि ‘वे पाकिस्तानियों जैसे लगते थे’, पुलिस ने कहा वे ‘पाकिस्तानी थे’, निचली अदालत के न्यायाधीश ने कहा वे पाकिस्तानी थे19 और यही मामले की स्थिति है ( अगर हमसे कहा जाता कि उनके नाम हैप्पी, बाउन्सी, लक्की, जॉली और किडिंगमनी थे और वे स्कैंडिनेवियाई थे, तो हमें वह भी मानना पड़ता )।

हम अब भी नहीं जानते कि वे सचमुच कौन हैं, या वे कहां के हैं। क्या किसी को कोई उत्सुकता है? लगता तो नहीं। उच्च न्यायालय ने कहा, ‘इस तरह मारे गये पांच आतंकवादियों की पहचान स्थापित मानी जाती है। न भी होने की स्थिति में भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जो बात प्रासंगिक है, वह मारे गये लोगों के साथ आरोपी का संबंध है, न कि उनके नाम।’

अपने ‘आरोपी के वक्तव्य’ में ( जो कि स्वीकारोक्ति के विपरीत, नयायालय में दिया जाता है, पुलिस हिरासत में नहीं ) अफ़ज़ल का कहना है : ‘मैंने किसी भी आतंकवादी की शिनाख़्त नहीं की थी। पुलिस ने मुझे नाम बतलाये और मजबूर किया कि मैं उनकी शिनाख़्त करूं।20  लेकिन तब तक उसके लिए बहुत देर हो चुकी थी। मुक़दमें के पहले दिन, निचली अदालत द्वारा नियुक्त अफ़ज़ल के वकील ने ‘अफ़ज़ल द्वारा पहचाने शवों की शिनाख़्त और पोस्टमार्टम की रिपोर्टों को बिना किसी औपचारिक प्रमाण के अविवादित साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने’ के लिए सहमति दे दी थी। अफ़ज़ल के लिए इस चकरा देने वाले क़दम के गंभीर परिणाम होने वाले थे। सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को उद्धृत करें तो, ‘आरोपी अफ़ज़ल के ख़िलाफ़ पहली परिस्थिति यह है कि अफ़ज़ल जानता था मारे गये आतंकवादी कौन थे। उसने मारे गये आतंकवादियों के शवों की शिनाख़्त की थी। इस पहलू से जुड़े साक्ष्य अकाट्य हैं।’

निश्चय ही यह संभव है कि मारे गये आतंकवादी विदेशी लड़ाके हों। लेकिन इतनी ही संभावना है कि वे न हों। लोगों को मारकर ‘विदेशी आतंकवादियों’ के रूप में उनकी झूठी शिनाख़्त करना, या झूठे ही मृत लोगों की शिनाख़्त ‘विदेशी आतंकवादियों’ के रूप में करना, या झूठे ही जीवित लोगों की शिनाख़्त आतंकवादियों के रूप में करना, पुलिस या सुरक्षा बलों के लिए आम बात है चाहे कश्मीर में हो या दिल्ली की सड़कों पर।21

भरपूर दस्तावेज़ी सबूतों पर आधारित कश्मीर के अनेक मामलों में सबसे ज़्यादा जाना-माना मामला छत्तीसिंहपुरा हत्याकांड के बाद हुई मार-काट का है, जो आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय प्रवाद बन गया। 20 अप्रेल, 2000 की रात, अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के नयी दिल्ली पहुंचने के ठीक पहले, छत्तीसिंहपुरा गांव में ‘अनजाने बंदूकधारियों’ ने, जो भारतीय सेना की वर्दियां पहने हुए थे, 35 सिखों की हत्या कर दी थी।22 ( कश्मीर में कई लोगों को शंका है कि इस हत्याकांड के पीछे भारतीय सुरक्षा बल थे )। पांच दिब बाद एस.ओ.जी. और सेना की उपद्रव निरोधक इकाई ‘राष्ट्रीय राइफ़ल्स’ ने एक संयुक्त अभियान में पथरीबल नामक गांव के बाहर पांच आदमियों को मार गिराया था।23 अगले दिन उन्होंने घोषणा की वे पाकिस्तान के रहने वाले विदेशी आतंकवादी थे, जिन्होंने छत्तीसिंहपुरा में सिखों की हत्या की थी। शव जले हुए और शक्लें बिगाड़ी हुई थीं। अपनी ( बिना जली ) सैनिक वर्दियों के नीचे वे सामान्य सिविलियन कपड़े पहने हुए थे। बाद में पता चला कि वे स्थानीय लोग थे जिन्हें अनन्तनाग ज़िले में गिरफ़्तार किया गया था और निर्ममतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया था।

किस्से और भी हैं :
20 अक्टूबर, 2003 : श्रीनगर के अख़बार ‘अल-सफ़ा’ ने एक पाकिस्तानी ‘उग्रवादी’ की तस्वीर प्रकाशित की, जिसके बारे में 18वीं राष्ट्रीय राइफ़ल्स ने दावा किया कि उन्होंने उसे तब मारा जब वह एक सैनिक शिविर पर हमले का प्रयास कर रहा था। कुपवाड़ा के एक नानबाई वली ख़ान ने तस्वीर की पहचाण अपने बेटे फारूख़ अहमद के रूप में की, जिसे सैनिक दो महीने पहले जिप्सी में उठाकर ले गये थे। अन्ततः उसका शव एक साल बाद खोदकर निकाला गया।24

20 अप्रेल, 2004 : लोलाब घाटी में तैनात 18वीं राष्ट्रीय राइफ़ल्स ने एक घमासान मुठभेड़ में चार विदेशी उग्रवादियों को मार गिराने का दावा किया। बाद में पता चला कि चारों साधारण मज़दूर थे, जिन्हें सेना जम्मू से कुपवाड़ा लायी थी। एक बेनाम चिट्ठी के ज़रिये मज़दूरों के घरवालों को उनकी जानकारी मिली थी, जो कुपवाड़ा गये और अन्ततः मृतकों को खोदकर निकलवाया।25

9 नवंबर, 2004 : सेना ने नगरोटा, जम्मू में भारतीय सेना की 15वीं कोर के जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग और जम्मू कश्मीर पुलिस के महानिदेशक की उपस्थिति में पत्रकारों के सामने आत्मसमर्पण करने वाले 47 ‘उग्रवादियों’ को पेश किया। जम्मू-कश्मीर पुलिस को बाद में पता चला कि उनमें 27 लोग बेरोज़गार आदमी थे, जिन्हें झूठे नाम और उपनाम दिये गये थे और जिन्हें इस बुझौवल में अपनी भूमिका निभाने के बदले सरकारी नौकरी देने का वादा किया गया था।26

ये सिर्फ़ इस तथ्य को उजागर करने के लिए जल्दी में दी गयी थोड़ी-सी मिसालें हैं कि दूसरे किसी भी सबूत की ग़ैर-मौजूदगी में, पुलिस जो कहती है वह किसी भी हालत में पर्याप्त नहीं होता

( अगली बार लगातार… चौथा भाग )


संदर्भ :

16. ‘स्पेशल सेल एसीपी फ़ेसेज़ चार्जेज ऑफ़ एक्सेसेज़, टार्चर’, हिंदुस्तान टाइम्स, 31 जुलाई, 2005। सिंह की बाद में ( मार्च, 2008 में ) – एक विवाद में जो व्यापक रूप से विश्वास किया जाता है कि अपराधियों की दुनिया और ज़मीन-जायदाद से संबंधित था – हत्या कर दी गयी। देखें, प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट राजबीर सिंह शॉट डेड’, हिंदुस्तान टाइम्स, 25 मार्च, 2008 ।
17. देखें लेख, ‘टेरेरिस्ट्स वर क्लोज़-निट रिलिजियस फ़ेनैटिक्स’ और ‘पुलिस इम्प्रेस विद स्पीड बट शो लिटल एविडेंस’, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 21 दिसम्बर, 2001 । इंटरनेट पर उपलब्ध : http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/1600576183.cms और http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/1295243790.cms ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया )।
18. एमिली वैक्स और रमा लक्ष्मी, ‘इंडियन ऑफ़िशियल पॉइंट्स टू पाकिस्तान’, वॉशिंगटन पोस्ट, 6 दिसम्बर, 2008, पृ. A8 ।
19. मुखर्जी, 13 दिसम्बर, पृ. 43 ।
20. श्री एस.एन. ढींगरा की अदालत में आपराधिक मामलों की धारा 313 के तहत मोहम्मद अफ़ज़ल का बयान, एएसजे, नयी दिल्ली, राज्य बनाम अफ़जल गुरू और अन्य, एफआईआर 417/01 सितम्बर, 2002 । इंटरनेट पर उपलब्ध : http://www.outlookindia.com/article.aspx?232880 और http://www.revolutionarydemocracy.org/afzal/azfal6.htm ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया )।
21. एजाज़ हुसैन, ‘किलर्स इन ख़ाकी’, इंडिया टुडे, 11 जून, 2007 । ‘पीयूडीआर पिक्स सेवरल होल्स इन पुलिस वर्ज़न ऑन प्रगति मैदान एनकाउंटर’, द हिंदू, 3 मई, 2005, और पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, एन अनफ़ेयर वरडिक्ट : ए क्रिटिक ऑफ़ स रेड फोर्ट जजमेंट ( नयी दिल्ली, 22 दिसम्बर, 2006 )  और क्लोज़ एनकाउंटर : ए रिपोर्ट ऑन पुलिस शूट-आउट्स इन डेल्ही ( नयी दिल्ली, 21 अक्टूबर, 2004 ) भी देखें।
22. देखें, ‘ए न्यू काइंड ऑफ़ वॉर’, एशिया वीक, 7 अप्रेल, 2000, और रणजीत देव राज, ‘टफ़ टॉक कंटीन्यूज़ डिस्पाइट पीस डिमांड्स’, इंटर प्रेस सर्विस, 19 अप्रेल, 2000 ।
23. देखें, ‘फ़ाइव किल्ड आफ़्टर छत्तीसिंहपुरा मैसेकर वर सिवियन्स’, प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, 16 जुलाई, 2002 और ‘ज्यूडिशियल प्रोब ऑर्डर्ड इनटू छत्तीसिंहपुरा सिख मैसेकर’, 23 अक्टूबर, 2000 ।
24. पब्लिक कमिशन ऑन ह्यूमन राइट्स, श्रीनगर, 2006, ‘स्टेट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स इन जम्मू एंड कश्मीर 1990-2005′, पृ. 21 ।
25. ‘प्रोब इनटू अलेज्ड फ़ेक किलिंग ऑर्डर्ड’, डेली एक्सेल्सियर ( जनिपुरा ), 14 दिसम्बर, 2006 ।
26. एम.एल.काक, ‘आर्मी क्वायट ऑन फ़ेक सरेंडर बाई अल्ट्राज़’, द ट्रिब्यून ( चंडीगढ़ ), 14 दिसम्बर, 2006 ।


प्रस्तुति – रवि कुमार

( यह आलेख अरुंधति रॉय के लेखों के संग्रह, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और नीलाभ द्वारा संपादित पुस्तक “कठघरे में लोकतंत्र” से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. यह अंग्रेजी की मूलकृति Listening of Grasshoppers से अनूदित है. यह लेख सबसे पहले ३० अक्‍तूबर, २००६ को ‘आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. )

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 2

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( दूसरा भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

1f53e3fe-40be-49d4-8ec3-b3e88c5f590cHiRes( पहले भाग से जारी…) मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी इसलिए ह्रदयग्राही है क्योंकि वह मक़बूल बट्ट नहीं है। ताहम, उसकी कहानी भी कश्मीर घाटी की कहानी से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। यह ऐसी कहानी है जिसके नियामक तत्व न्यायालय की चारदीवारी से और ऐसे लोगों की सीमित कल्पना से, जो स्वघोषित ‘महाशक्ति’ के सुरक्षित केन्द्र में रहते हैं, बहुत आगे तक फैले हुए हैं। मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी का उत्स ऐसे युद्ध-क्षेत्र में है जिसके नियम सामान्य न्याय-व्यवस्था के सूक्ष्म तर्कों और नाज़ुक संवेदनाओं से परे है।

इन सभी कारणों से यह महत्त्वपूर्ण है कि हम संसद पर 13 दिसम्बर की अजीब, दुखद और पूरी तरह अमंगलसूचक कहानी को सावधानी से जांचे-परखें। यह दरअसल हमें इस बारे में ढेर सारी बातें बतलाती है कि दुनिया का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ किस तरह काम करता है। यह सबसे बड़ी चीज़ों को सबसे छोटी चीज़ों से जोड़ती है। यह उन गलियों-पगडंडियों को चिह्नित करती है जो उस सबको जो हमारे पुलिस थानों की अंधेरी कोठरियों में होता है, उस सबसे जोड़ती है जो धरती के स्वर्ग की सर्द, बर्फ़ीली सड़कों पर हो रहा है; और वहां से उस निस्संग दुर्भावनापूर्ण रोष तक, जो राष्ट्रों को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचा देता है। यह ऐसे स्पष्ट, सुनिश्चित सवाल उठाती है जिन्हें विचारधारा से जुड़े अथवा वाग्मितापूर्ण उत्तरों की नहीं, बल्कि स्पष्ट, सुनिश्चित उत्तरों की दरकार है।

इस साल 4 अक्टूबर को मैं भी उस छोटे-से समूह में शामिल थी जो मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी की सज़ा दिये जाने के ख़िलाफ़ नयी दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर इकट्ठा हुआ था। मैं वहां इसलिए थी कि मैं मानती हूं कि मोहम्मद अफ़ज़ल एक बहुत ही शातिराना शैतानी खेल का महज़ एक मोहरा है। अफ़ज़ल वह राक्षस नहीं है जो कि उसे बनाया जा रहा है। वह तो राक्षस के पंजे का निशान भर है और अगर पंजे के निशान को ही ‘मिटा’ दिया जाता है तो हम कभी नहीं जान पाएंगे कि राक्षस कौन था। और है।

कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि उस दोपहर वहां विरोध करने वालों से ज़्यादा पत्रकार और टीवी के लोग थे। सबसे अधिक ध्यान फ़रिश्ते की तरह सुंदर अफ़ज़ल के बेटे ग़ालिब पर था। भले दिल वाले लोग, जो यह नहीं समझ पा रहे थे कि उस लड़के का क्या करें जिसका बाप फांसी के तख़्ते की तरफ़ जा रहा था, उसे आइसक्रीम और कोल्ड़ड्रिंक दिये जा रहे थे। वहां जमा लोगों की ओर देखते हुए मेरा ध्यान एक छोटे-से उदास ब्योरे पर गया। इस विरोध-प्रदर्शन का संयोजक दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी का प्राध्यापक एस.ए.आर. गिलानी था, छोटे क़द का गठीला आदमी जो थोड़े घबराये-से अन्दाज़ में वक्ताओं का परिचय दे रहा था और घोषणाएं कर रहा था। संसद पर आक्रमण के मामले में आरोपी नंबर तीन। उसे आक्रमण के एक दिन बाद, 14 दिसम्बर, 2001 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा गिरफ़्तार किया गया था। हालांकि गिलानी को गिरफ़्तारी के दौरान बर्बर यातनाएं दी गयी थीं, हालांकि उसके परिवार को – पत्नी, छोटे बच्चे और भाई – को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से हवालात में रखा गया था, फिर भी उसने उस अपराध को स्वीकार करने से मना कर दिया था, जो उसने किया नहीं था।

निश्चय ही उसकी गिरफ़्तारी के बाद के दिनों में अगर आपने अख़बार नहीं पढ़े होंगे तो आप यह सब जान नहीं पाये होंगे। उन्होंने एक सर्वथा काल्पनिक, अस्तित्वहीन स्वीकारोक्ति के विस्तृत विवरण छापे थे। दिल्ली पुलिस ने गिलानी को साज़िश के भारतीय पक्ष का दुष्ट सरग़ना ( मास्टर माइंड ) कहा था। इसके पटकथा लेखकों ने उसके ख़िलाफ़ नफ़रत-भरा प्रचार-अभियान छेड़ रखा था जिसे अति-राष्ट्रवादी, सनसनी-खोजू मीडिया ने बढ़ा-चढ़ाकर और नमक-मिर्च लगाकर पेश किया था। पुलिस अच्छी तरह जानती थी कि फ़ौजदारी मामलों में यह फ़र्ज़ किया जाता है कि जज मीडिया रिपोर्टों का नोटिस नहीं लेते। इसलिए पुलिस को पता था कि उसके द्वारा इन ‘आतंकवादियों’ का निर्मम मनगढ़न्त चरित्र-चित्रण जनमत तैयार करेगा और मुक़दमें के लिए माहौल तैयार कर देगा। लेकिन पुलिस क़ानूनी जांच-परख के दायरे से बाहर होगी।

यहां प्रस्तुत हैं कुछ विद्वेषपूर्ण, कोरे झूठ जो मुख्यधारा के समाचार-पत्रों में छपें:

‘गुत्थी सुलझी : आक्रमण के पीछे जैश’, नीता शर्मा और अरुण जोशी : द हिंदुस्तान टाइम्स, 16 दिसम्बर, 2001 :

‘दिल्ली में स्पेशल सेल के गुप्तचरों ने अरबी के एक अध्यापक को गिरफ़्तार कर लिया है जो कि ज़ाकिर हुसैन कॉलेज ( सांध्यकालीन ) में पढ़ाता है…इस बात के साबित हो जाने के बाद कि उसके मोबाइल फ़ोन पर उग्रवादियों द्वारा किया गया फ़ोन आया था।’

‘दिल्ली विश्वविद्यालय का अध्यापक आतंकवादी योजना की धुरी था’, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 17 दिसम्बर, 2001 :

‘संसद पर 13  दिसम्बर का आक्रमण आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा की संयुक्त कार्रवाई था जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय का अध्यापक सैयद ए.आर. गिलानी दिल्ली में सुविधाएं जुटाने वाले ( फ़ैसिलिटेटर ) प्रमुख लोगों में से एक था। यह बात पुलिस कमिश्नर अजय राज शर्मा ने रविवार को कही।’

‘प्रोफ़ेसर ने “फ़ियादीन” का मार्गदर्शन किया,’ देवेश के.पांडे, द हिंदू, 17 दिसम्बर, 2001 :

‘पूछताछ के दौरान गिलानी ने यह राज़ खोला कि वह षड्यंत्र के बारे में उस दिन से जानता था जब “फ़ियादीन” हमले की योजना बनी थी।’

‘डॉन ख़ाली समय में आतंकवाद सिखाता था,’ सुतीथो पत्रनवीस, द हिंदुस्तान टाइम्स, 17 दिसम्बर, 2001 :

‘जांच से यह बात सामने आयी है कि सांझ होने तक वह कॉलेज पहुंचकर अरबी साहित्य पढ़ा रहा होता था। ख़ाली समय में, बंद दरवाज़ों के पीछे, अपने या फिर संदेह में गिरफ़्तार किये गये दूसरे आरोपी शौकत हुसैन के घर पर वह आतंकवाद का पाठ पढ़ता और पढ़ाता था।’

‘प्रोफ़ेसर की आय’ द हिंदुस्तान टाइम्स, 17 दिसम्बर, 2001 :

‘गिलानी ने हाल ही में पश्चिमी दिल्ली में 22 लाख का एक मकान ख़रीदा था। दिल्ली पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि उसे इतना पैसा किस छप्पर के फटने से मिला।’

‘अलीगढ़ से इग्लैंड तक छात्रों में आतंकवाद के बीज बो रहा था गिलानी,’ सुजीत ठाकुर, राष्ट्रीय सहारा, 18  दिसम्बर, 2001 :

‘जांच कर रही एजेंसियों के सूत्रों और उनके द्वारा इकट्ठा की गयी सूचनाओं के अनुसार गिलानी ने पुलिस को एक बयान में कहा है कि वह लंबे समय से जैश-ए-मोहम्मद का एजेंट था…गिलानी की वाग्विदग्धता, काम करने की शैली और अचूक आयोजन क्षमता के कारण ही 2000 में जैश-ए-मोहम्मद ने उसे बौद्धिक आतंकवाद फैलाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी।’

‘आतंकवाद का आरोपी पाकिस्तानी दूतावास में जाता रहता था,’ स्वाती चतुर्वेदी, द हिंदुस्तान टाइम्स, 21 दिसम्बर, 2001 :

‘पूछताछ के दौरान गिलानी ने स्वीकार किया कि उसने पाकिस्तान को कई फ़ोन किये थे और वह जैश-ए-मोहम्मद से संबंध रखनेवाले आतंकवादियों के संपर्क में था…। गिलानी ने कहा कि जैश के कुछ सदस्यों ने उसे पैसे दिये थे और दो फ़्लैट ख़रीदने को कहा जिन्हें आतंकवादी कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किया जा सके।’

‘सप्ताह का व्यक्ति,’ संडे टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 23 दिसंबर, 2001 :

‘एक सेलफ़ोन उसका दुश्मन साबित हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय का सैयद ए.आर. गिलानी 13 दिसम्बर के मामले में गिरफ़्तार किया जाने वाला पहला व्यक्ति था – एक स्तब्ध करने वाली चेतावनी कि आतंकवाद की जड़े दूर तक और गहरे उतरती हैं।’

ज़ी टीवी ने इन सबको मात कर दिया। उसने ‘13 दिसम्बर’ नाम की एक फ़िल्म बनायी, एक डॉक्यूड्रामा जिसमें यह दावा किया गया कि वह ‘पुलिस की चार्जशीट पर आधारित सत्य’ है। ( इसे क्या शब्दावली में अंतर्विरोध नहीं कहा जायेगा? ) फ़िल्म को निजी तौर पर प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी को दिखलाया गया। दोनों ने फ़िल्म की तारीफ़ की। उनके अनुमोदन को मीडिया ने व्यापक स्तर पर प्रचारित-प्रसारित किया।9

सर्वोच्च न्यायालय ने इस फ़िल्म के प्रसारण पर पाबन्दी लगाने की अपील यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि न्यायाधीश मीडिया से प्रभावित नहीं होते।10 ( क्या सर्वोच्च न्यायालय यह मानेगा कि भले ही न्यायाधीश मीडिया की रिपोर्टों से प्रभावित नहीं होते, क्या ‘समाज का सामूहिक अंतःकरण’ प्रभावित नहीं हो सकता? ) ‘13 दिसम्बर’ नामक फ़िल्म त्वरित-सुनवाई अदालत द्वारा गिलानी, अफ़ज़ल और शौकत को मृत्युदंड दिये जाने से कुछ दिन पहले ज़ी टीवी के राष्ट्रीय नेटवर्क पर दिखलायी गयी। गिलानी ने इसके बाद 18 महीने जेल में काटे; कई महीने फांसीवालों के लिए निर्धारित क़ैदे-तन्हाई में।

उच्च न्यायालय द्वारा उसे और अफ़सान गुरू को निर्दोष पाये जाने पर छोड़ा गया। ( अफ़सान गिरफ़्तारी के दौरान गर्भवती थी। उसके बच्चे का जन्म जेल में ही हुआ। उस अनुभव ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया। अब वह गंभीर मानसिक विकार से पीड़ित है। ) सर्वोच्च न्यायालय ने रिहाई के आदेश को बरक़रार रखा। उसने संसद पर आक्रमण के मामले से गिलानी को जोड़ने या किसी आतंकवादी संगठन से उसका संबंध होने का कोई प्रमाण नहीं पाया। एक भी अख़बार या पत्रकार या टीवी चैनल ने अपने झूठों के लिए उससे ( या किसी और से ) माफ़ी मांगने की ज़रूरत महसूस नहीं की। लेकिन एस.ए.आर. गिलानी की परेशानियों का अंत यहीं नहीं हुआ। उसकी रिहाई के बाद स्पेशल सेल के पास साज़िश तो रह गयी पर कोई ‘सरग़ना’ ( मास्टर माइंड ) नहीं बचा। जैसा कि हम देखेंगे, यह एक समस्या बन गयी।

इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गिलानी अब एक आज़ाद इंसान था – प्रेस से मिलने, वकीलों से बात करने और अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए आज़ाद। सर्वोच्च न्यायालय की अंतिम सुनवाई के दौरान 8 फ़रवरी, 2005 की शाम को गिलानी अपने वकील से मिलने उसके घर जा रहा था। नीम-अंधेरे से एक रहस्यमय बंदूकधारी प्रकट हुआ और उसने गिलानी पर पांच गोलियां दाग़ी।11 चामत्कारिक ढंग से वह बच गया। कहानी में यह नया अविश्वसनीय मोड़ था। साफ़ तौर पर कोई इस बात को लेकर चिंतित था कि गिलानी क्या जानता था और क्या कहने वाला था। कोई भी सोच सकता था कि पुलिस इस उम्मीद में इस मामले की जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी कि इससे संसद पर हुए आक्रमण के मामले में नये महत्त्वपूर्ण सुराग़ मिलेंगे। उलटे स्पेशल सेल ने गिलानी से इस तरह व्यवहार किया मानो अपनी हत्या के प्रयत्न का मुख्य संदेहास्पद व्यक्ति वह ख़ुद ही हो। उन्होंने उसका कंप्यूटर ज़ब्त कर लिया और उसकी कार ले गये। सैकड़ों कार्यकर्ता अस्तपाल के बाहर जमा हुए और उन्होंने हत्या के प्रयास की जांच की मांग की, जिसमें कि स्पेशल सेल पर भी जांच की मांग शामिल थी। ( बेशक वह कभी नहीं हुई। साल भर से ज़्यादा गुज़र चुका है, कोई भी इस मामले की जांच में रुचि नहीं ले रहा है। अजीब बात है। )

सो अब यहां था वह, एस.ए.आर. गिलानी। इस भयावह विपदा से उबर आने के बाद, जन्तर-मन्तर में जनता के साथ खड़ा, यह कहता हुआ कि मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी नहीं लगनी चाहिए। उसके लिए कितना आसान रहा होता घर में दुबककर बैठे रहना। साहस के इस शांत प्रदर्शन से मैं बहुत गहराई तक प्रभावित हुई, जीत ली गयी।

एस.ए.आर. गिलानी की दूसरी ओर, पत्रकारों और फ़ोटोग्राफ़रों की भीड़ में, हाथ में छोटा टेप रिकार्डर लिये, नींबू के रंग की टी-शर्ट और गैबर्डीन की पतलून में पूरी तरह सामान्य दिखने की कोशिश करता हुआ एक और गिलानी था। इफ़्तेख़ार गिलानी। वह भी क़ैद भुगत चुका था। उसे 9 जून, 2002 को गिरफ़्तार किया गय़ा था और पुलिस हिरासत में रखा गया था। उस समय वह जम्मू के दैनिक ‘कश्मीर टाइम्स’ का संवाददाता था। उस पर ‘सरकारी गोपनीयता अधिनियम’ ( ऑफ़िशियल सीक्रेट्स ऐक्ट ) के तहत आरोप लगाया गया था।12 उसका ‘अपराध’ यह था कि उसके पास ‘भारत-अधिकृत कश्मीर’ में भारतीय सेना की तैनाती को लेकर कुछ पुरानी सूचनाएं थी। ( ये सूचनाएं, बाद में पता चला, एक पाकिस्तानी शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित आलेख था जो इंटरनेट पर खुल्लमखुल्ला उपलब्ध था। ) इफ़्तेख़ार गिलानी के कंप्यूटर को ज़ब्त कर लिया गया। इंटेलिजेंस ब्यूरों के अधिकारियों ने उसकी हार्ड डिस्क के साथ छेड़-छाड़ की, डाउनलोड फ़ाइलों को उलट-पुलट किया। यह एक भारतीय दस्तावेज़-सा लगे इसके लिए ‘भारत-अधिकृत कश्मीर’ को बदल कर ‘जम्मू और कश्मीर’ किया गया और ‘केवल संदर्भ के लिए। प्रसार के लिए पूरी तरह निषिद्ध।’ – ये शब्द जोड़ दिये गये, जिससे यह ऐसा गुप्त दस्तावेज़ लगे जिसे गृहमंत्रालय से उड़ाया गया हो। सैन्य गुप्तचर विभाग के महानिदेशालय ने – हालांकि उसे इस आलेख की एक प्रति उपलब्ध करवा दी गयी थी – इफ़्तेख़ार गिलानी के वकील द्वारा बार-बार किये गये अनुरोधों की अनदेखी कर पूरे छह महीने तक इस मामले को निपटाने की कोशिश नहीं की।

एक बार फिर स्पेशल सेल के विद्वेषपूर्ण झूठों को अख़वारों ने पूरी फ़र्माबरदारी से छाप दिया। उन्होंने जो लिखा, उसमें से कुछ पंक्तियां यहां दी जा रही हैं –

‘हुर्रियत के कट्टरपंथी नेता सैयद अली शाह गिलानी के 35 वर्षीय दामाद, इफ़्तिख़ार गिलानी ने, ऐसा विश्वास है कि शहर की एक अदालत में यह मान लिया है कि वह पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी का एजेंट था।’

नीता शर्मा, द हिंदुस्तान टाइम्स, 11 जून, 2002

‘इफ़्तिख़ार गिलानी हिजबुल मुजाहिदीन के सैयद सलाहुद्दीन का ख़ास आदमी था। जांच से पता चला है कि इफ़्तिख़ार भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों के बारे में सलाहुद्दीन को सूचना देता था। जानकार सूत्रों ने कहा कि उसने अपने असली इरादों को अपने पत्रकार होने की आड़ में इतनी सफ़ाई से छिपा रखा था कि उसका पर्दाफ़ाश करने में कई वर्ष लग गये।’

प्रमोद कुमार सिंह, द पायनियर, जून 2002

‘गिलानी के दामाद के घर आयकर के छापों में बेहिसाब संपत्ति और संवेदनशील दस्तावेज़ बरामद’

हिंदुस्तान, 10 जून, 2002

इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि पुलिस की चार्जशीट में उसके घर से मात्र 3450 रुपये बरामद होने की बात दर्ज़ थी। इस बीच दूसरी मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि उसका एक तीन कमरों वाला फ़्लैट है, 22 लाख रुपये की अघोषित आय है, उसने 79 लाख रुपये के आयकर की चोरी की है तथा वह और उसकी पत्नी गिरफ़्तारी से बचने के लिए घर से भागे हुए हैं।

लेकिन वह गिरफ़्तार था। जेल में इफ़्तिख़ार गिलानी को पीटा गया, बुरी तरह ज़लील किया गया। अपनी किताब ‘जेल में कटे दिन’ में उसने लिखा है कि किस तरह अन्य बातों के अलावा उससे अपनी कमीज़ से शौचालय साफ़ करवाया गया और फिर उसी कमीज़ को कई दिन तक पहनने के लिए मजबूर किया गया।13 छह महीने की अदालती जिरह और उसके मित्रों द्वारा दवाब बनाने के बाद जब यह स्पष्ट हो गया कि अगर उसके ख़िलाफ़ मामला चला तो इससे ज़बर्दस्त भद्द पिटने का ख़तरा है, उसे छोड़ दिया गया।14

अब वह वहां था। एक स्वतंत्र व्यक्ति, एक रिपोर्टर जो जन्तर-मन्तर पर एक आयोजन की ख़बरे इकट्ठी करने के लिए आया था। मुझे लगा कि एस.ए.आर. गिलानी, इफ़्तिख़ार गिलानी और मोहम्मद अफ़ज़ल – तीनों ही, एक साथ, एक ही समय पर तिहाड़ जेल में रहे होंगे ( दूसरे कई कम जाने-पहचाने कश्मीरियों के साथ, जिनकी कहानियां हम कभी नहीं जान पाएंगे )।

कहा जा सकता है और कहा भी जायेगा कि एस.ए.आर. गिलानी और इफ़्तिख़ार गिलानी, दोनों के मसले भारतीय न्याय-व्यवस्था की वस्तुपरकता और उसकी आत्म-संशोधन की क्षमता दिखलाते हैं, वे उसकी साख पर बट्टा नहीं लगाते। यह आंशिक रूप से ही सही है। एस.ए.आर. गिलानी और इफ़्तिख़ार गिलानी दोनॊं इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि वे दिल्ली में रहने वाले कश्मीरी हैं और उनके साथ मध्यवर्ग के मुखर संगी-साथी हैं; पत्रकार और विश्वविद्यालय के अध्यापक, जो उन्हें अच्छी तरह जानते थे और संकट की घड़ी में उनके साथ खड़े हो गये थे। एस.ए.आर. गिलानी की वकील नन्दिता हक्सर ने एक ‘अखिल भारतीय एस.ए.आर. गिलानी बचाव समिति’ बनायी  ( जिसकी एक सदस्य मैं भी थी )।15 गिलानी के पक्ष में खड़े होने के लिए कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों ने एकजुट होकर अभियान चलाया। जाने-माने वकील राम जेठमलानी, के.जी. कन्नाबिरन और वृंदा ग्रोवर अदालत में उसकी तरफ़ से पेश हुए। उन्होंने मुक़दमें की असली सूरत उजागर कर दी – गढ़े गये सबूतों से खड़ा किया गया बेहूदा अटकलों, फ़र्ज़ी बातों और कोरे झूठों का पुलिन्दा। सो बेशक, न्यायिक वस्तुनिष्ठता मौजूद है। लेकिन वह एक शर्मीला जन्तु है जो हमारी क़ानूनी व्यवस्था की भूल-भुलैया में कहीं गहरे में रहता है। बिरले ही नज़र आता है। इसे इसकी मांद से बाहर लाने और करतब दिखाने के लिए नामी वकीलों की पूरी टोली की ज़रूरत होती है। अख़बारों की भाषा में कहें तो यह भगीरथ प्रयत्न था। मोहम्मद अफ़ज़ल के साथ कोई भगीरथ नहीं था।

( अगली बार लगातार… तीसरा भाग )


संदर्भ :

9. लक्ष्मी बालकृष्णन, ‘रीलिविंग अ नाइटमेयर’, द हिंदू, 12 दिसम्बर, 2002, पृ. 2 । बिदवई तथा अन्य, 13 दिसम्बर ‘ए रीडर’ में शुद्धब्रत सेनगुप्ता, ‘मीडिया ट्रायल एंड कोर्टरूम ट्रिब्युलेशन्स’, इन बिदवई, पृ. 46 भी देखें।
10. प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, ‘एस सी ( सुप्रीम कोर्ट ) अलॉउज़ ज़ी ( टीवी ) टू एयर फ़िल्म ऑन पार्लियामेंट अटैक’, Indiainfo.com, 13 दिसम्बर, 2002 ।
11. ‘फ़ाइव बुलेट्स हिट गिलानी, सेज फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट’, हिंदुस्तान टाइम्स, 25 फ़रवरी, 2005 ।
12. देखें, ‘पुलिस फ़ोर्स’, इंडियन एक्सप्रेस, 15 जुलाई, 2002; ‘एडिटर्स गिल्ड सीक्स फ़ेयर ट्रायल फ़ॉर इफ़्तिख़ार’, इडियन एक्सप्रेस, 20 जून, 2002, ‘कश्मीर टाइम स्टेफ़र्स डिटेंशन इश्यू रेज्ड इन लोकसभा’, बिजनेस रिकॉर्डर, 4 अगस्त, 2002 ।
13. इफ़्तिख़ार गिलानी, ‘माई डेज इन प्रिजन’ ( नयी दिल्ली : पेंगुइन बुक्स इंडिया, 2005 )। 2008 में इस किताब के उर्दू अनुवाद को साहित्य अकादमी से भारत का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार मिला। http://www.indianexpress.com/news/iftikhar-gilani-wins-sahitya-akademi-award/424871 ।
14. दूरदर्शन ( नई दिल्ली ), ‘कोर्ट रीलीज़ेज़ कश्मीर टाइम्स जर्नलिस्ट फ्रॉम डिटेंशन’, बीबीसी मॉनिटरिंग साउथ एशिया, 13 जनवरी, 2003 ।
15. स्टेटमेंट ऑफ़ सैयद अब्दुल रहमान गिलानी, नयी दिल्ली, 4 अगस्त, 2005 । इंटरनेट पर उपलब्ध : http://www.revolutionarydemocracy.org/parl/geelanistate.htm ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया )। बशरत पीर, ‘विक्टिम्स ऑफ़ डिसेम्बर 13′, द गार्डियन, (लंदन), 5 जुलाई, 2003, पृ. 29 ।


प्रस्तुति – रवि कुमार

( यह आलेख अरुंधति रॉय के लेखों के संग्रह, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और नीलाभ द्वारा संपादित पुस्तक “कठघरे में लोकतंत्र” से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. यह अंग्रेजी की मूलकृति Listening of Grasshoppers से अनूदित है. यह लेख सबसे पहले ३० अक्‍तूबर, २००६ को ‘आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. ) 

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 1

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान (पहला भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

patrliament attack-0इतना भर हम जानते हैं : 13 दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था। ( राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, एनडीए सरकार पर एक और भ्रष्टाचार के प्रवाद को लेकर हमले हो रहे थे ) सुबह के साढ़े ग्यारह बजे पांच हथियारबंद आदमी एक सफ़ेद अम्बैसेडर कार में, जिसमें कामचलाऊ विस्फोटक उपकरण ( इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोज़िव डिवाइस ) लगा हुआ था, नई दिल्ली में संसद भवन के फाटक से होकर बढ़े। जब उनको रोका गया तो वे कार से कूदे और उन्होंने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इसके बाद की गोलीबारी में सारे-के-सारे हमलावर मार गिराये गये। आठ सुरक्षाकर्मी और एक माली भी मारा गया। पुलिस ने कहा कि मारे गये आतंकवादियों के पास संसद भवन को उड़ाने के लिए काफ़ी विस्फोटक पदार्थ और एक पूरी बटालियन का सामना करने के लिए गोला-बारूद था।1 अधिकतर आतंकवादियों के विपरीत, ये पांच अपने अपने पीछे सुराग़ों की जबरदस्त श्रृंखला छोड़ गये – हथियार, मोबाइल फ़ोन, फ़ोन नंबर, पहचान पत्र, फ़ोटो, सूखे मेवों के पैकेट, यहां तक कि एक प्रेम-पत्र भी।2

आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए हमले की तुलना अमरीका के 11 सितंबर के आक्रमण से की, जो सिर्फ़ तीन महिने पहले की घटना थी।

संसद पर आक्रमण के दूसरे दिन, 14 दिसम्बर, 2001 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने दावा किया कि उसने ऐसे कई लोगों का पता लगा लिया है, जिन पर इस षडयंत्र में शामिल होने का संदेह है। एक दिन बाद, 15 दिसम्बर को उसने घोषणा की कि उसने ‘मामले को सुलझा लिया था’ : पुलिस ने दावा किया कि हमला पाकिस्तान आधारित दो आतंकवादी गुटों, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का संयुक्त अभियान था। इस षडयंत्र में 12 लोगों के शामिल होने की बात कही गयी। जैश-ए-मोहम्मद का ग़ाज़ी बाबा ( आरोपी नंबर -1), जैश-ए-मोहम्मद का ही मौलाना मसूद अज़हर ( आरोपी नंबर -2), तरीक़ अहमद ( पाकिस्तानी नागरिक ), पांच मारे गये ‘पाकिस्तानी आतंकवादी’( आज तक हम नहीं जानते कि वे कौन थे ) और तीन कश्मीरी मर्द एस.ए.आर. गिलान, शौकत गुरू और मोहम्मद अफ़ज़ल। इसके अलावा शौकत की बीबी अफ़सान गुरू। सिर्फ़ यही चार गिरफ़्तार हुए।3

उसके बाद के तनाव-भरे दिनों में संसद को स्थगित कर दिया गया। 21 दिसम्बर को भारत ने अपने राजदूत को पाकिस्तान से वापस बुला लिया, हवाई, रेल और बस संपर्क रोक दिये गये और हमारी वायु-सीमा से गुज़रने वाली पाकिस्तानी उडानोंपररोक लगा दी गयी। भारत ने युद्ध की जबरदस्त तैयारी शुरू कर दी और पांच लाख से ज़्यादा सैनिकों को पाकिस्तान की सीमा पर भेज दिया गया। विदेशी दूतावासों ने अपने कर्मचारियों को हटाना शुरू कर दिया और भारत आने वाले पर्यटकों को यात्रा की चेतावनी वाली सलाह जारी कर दी। परमाणु युद्ध के कगार की ओर बढ़ते उपमहाद्वीप को दुनिया सांस रोककर देखने लगी।4 भारत को इस सबकी क़ीमत जनता के दस हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करके चुकानी पड़ी। कुछ सौ सैनिक तो हड़बड़ाहट-भरी तैनाती की प्रक्रिया में ही जान से हाथ धो बैठे।

लगभग साढे़ तीन साल बाद, 4 अगस्त, 2005 को इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना अंतिम फ़ैसला सुना दिया। उसने इस दृष्टिकोण की पुष्टि की कि संसद पर हमले को जंगी कार्रवाई के तौर पर लिया जाना चाहिए। उसने कहा ‘संसद पर आक्रमण की कोशिश निःसंदेह भारतीय राज्य और सरकार की, जो उसकी ही प्रतिरूप है, प्रभुसत्ता का अतिक्रमण है…मृत आतंकवादियों को जबरदस्त भारत विरोधी भावनाओं से भड़काकर यह कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया गया जैसा कि कार ( एक्स.पी डब्लू 1-8 ) पर पाये गये गृहमंत्रालय के नक़ली स्टिकर में लिखे हुए शब्दों से भी साबित होता है।’ न्यायालय ने आगे कहा, ‘कट्टर फ़ियादिनों ने जो तरीक़े अपनाये वे सब भारत सरकार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की मंशा दर्शाते हैं।’

गृहमंत्रालय के नक़ली स्टिकर पर जो लिखा था, वह यह है :

‘हिन्दुस्तान बहुत ख़राब मुल्क है और हम हिन्दुस्तान से नफ़रत करते हैं, हम हिन्दुस्तान को बर्बाद कर देना चाहते हैं और अल्लाह के करम से हम ऐसा करेंगे अल्लाह हमारे साथ है और हम भरसक कोशिश करेंगे। यह मूरख वाजपेयी और आडवाणी हम उन्हें मार देंगे। इन्होंने बहुत से मासूम लोगों की जानें ली हैं और वे बेइन्तहा ख़राब इन्सान हैं, उनका भाई बुश भी बहुत ख़राब आदमी है, वह अगला निशाना होगा। वह भी बेकुसूर लोगों का हत्यारा है उसे भी मरना ही है और हम यह कर देंगे।’5

चतुराई-भरे शब्दों में लिखी गयी यह स्टिकर-घोषणा संसद की ओर जाते कार-बम के अगले शीशे पर लगा हुआ था। ( इस पाठ में जितने शब्द हैं उन्हें देखते हुए यह हैरत की बात है कि ड्राइवर कुछ देखने की स्थिति में रहा भी होगा। शायद यही कारण है कि वह उप-राष्ट्रपति की कारों के काफ़िले से टकरा गया था? )

पुलिस ने अपना आरोप-पत्र एक त्वरित-सुनवाई अदालत में दायर किया जो कि ‘आतंकवाद निरोधक अधिनियम’ ( पोटा ) के मामलों को निपटाने के लिए स्थापित की गयी थी। निचली अदालत ( ट्रायल कोर्ट ) ने 16 दिसम्बर, 2002 को गिलानी, शौकत और अफ़ज़ल को मौत की सज़ा सुनायी। अफ़सान गुरू को पांच वर्ष की कड़ी कैद की सज़ा दी गयी। साल भर बाद उच्च न्यायालय ने गिलानी और अफ़सान गुरू को बरी कर दिया। लेकिन शौकत और अफ़ज़ल की मौत की सज़ा को बरकरार रखा। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी रिहाइयों को यथावत् रखा और शौकत की सज़ा को 10 वर्ष की कड़ी सज़ा में तब्दील कर दिया। लेकिन उसने न केवल मोहम्मद अफ़ज़ल की सज़ा को बरक़रार रखा, बल्कि बढ़ा दिया। उसे तीन आजीवन कारावास और दोहरे मृत्युदंड की सज़ा दी गयी।

4 अगस्त, 2005 के अपने फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़-साफ़ कहा है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मोहम्मद अफ़ज़ल किसी आतंकवादी गुट या संगठन का सदस्य है। लेकिन न्यायालय ने यह भी कहा है : ‘जैसा कि अधिकांश षड्यंत्रों के मामले में होता है, उस सांठ-गांठ का सीधा प्रमाण नहीं हो सकता और न है जो आपराधिक षड्यंत्र ठहरती हो। फिर भी, कुल मिलाकर आंके जाने पर परिस्थितियां अचूक ढंग से अफ़ज़ल और मारे गये ‘फ़ियादीन’ आतंकवादियों के बीच सहयोग की ओर इशारा करती हैं।’

यानि सीधा कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन परिस्थितिजन्य प्रमाण हैं।

फ़ैसले के एक विवादास्पद पैरे में कहा गया है : ‘इस घटना ने, जिसके कारण कई मौतें हुईं, पूरे राष्ट्र को हिला दिया था और समाज का सामूहिक अन्तःकरण तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मृत्युदंड दिया जायेगा।’6

हत्या के अनुष्ठान को, जो  कि मृत्युदंड वास्तव में है, सही साबित करने की ख़ातिर ‘समाज के सामूहिक अन्तःकरण’ का आह्वान करना भीड़ द्वारा हत्या करने के क़ानून को मानक बनाने के बहुत नज़दीक आ जाता है। यह सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि यह हमारे ऊपर शिकारी राजनेताओं या सनसनी तलाशते पत्रकारों की ओर से नहीं आया ( हालांकि उन्होंने भी ऐसा किया है ), बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत की ओर से एक फ़रमान की तरह जारी हुआ है।

अफ़ज़ल को फांसी की सज़ा देने के कारणों को स्पष्ट करते हुए फ़ैसले में आगे कहा गया है, ‘अपील करने वाला, जो हथियार डाल चुका उग्रवादी है और जो राष्ट्रद्रोही कार्यों को दोहराने पर आमादा था, समाज के लिए एक ख़तरा है और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए।’

यह वाक्य ग़लत तर्क और इस तथ्य के निपट अज्ञान का मिश्रण है कि आज के कश्मीर में ‘हथियार डाल चुका उग्रवादी’ होने का क्या मतलब होता है।

सो : क्या मोहम्मद अफ़ज़ल की ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए?

बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं, संपादकों, वकीलों और सार्वजनिक क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण लोगों के एक छोटे-से, लेकिन प्रभावशाली समूह ने नैतिक सिद्धांत के आधार पर मृत्युदंड का विरोध किया है। उनका यह भी तर्क है कि ऐसा कोई व्यावहारिक प्रमाण नहीं है जो सुझाता हो कि मौत की सज़ा आतंकवादियों के लिए अवरोधक का काम करती है। ( कैसे कर सकती है, जब फ़िदायीनों और आत्मघाती बमवारों के इस दौर में मौत सबसे बड़ा आकर्षण बन गई जान पड़ती हो? )

अगर जनमत-संग्रह ( ओपिनियन पोल ), संपादक के नाम पत्र और टीवी स्टूडियो के सीधे प्रसारण में भाग ले रहे दर्शक भारत में जनता की राय का सही पैमाना हैं तो हत्यारी भीड़ ( लिंच मॉब ) में घंटे-दर-घंटे इज़ाफ़ा हो रहा है। ऐसा लगता है मानो भारतीय नागरिकों की बहुसंख्यक आबादी मोहम्मद अफ़ज़ल को अगले कुछ वर्षों तक हर दिन फांसी पर चढ़ाये जाते हुए देखना चाहेगी, जिनमें सप्ताहांत की छुट्टियां भी शामिल हैं। विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी, अशोभनीय हड़बड़ी प्रदर्शित करते हुए, चाहते हैं कि उसे फ़ौरन से पेश्तर फांसी दे दी जाये, एक मिनट की भी देर किये बिना।7

इस बीच कश्मीर में भी लोकमत उतना ही प्रबल है। ग़ुस्से से भरे बड़े-बड़े प्रदर्शन बढ़ती हुई मात्रा में यह स्पष्ट करते जा रहे हैं कि अगर अफ़ज़ल को फांसी दी गयी तो इसके राजनैतिक परिणाम होंगे। कुछ इसे न्याय का विचलन मानकर इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन विरोध करते हुए भी वे भारतीय न्यायालयों से न्याय की अपेक्षा नहीं करते। वे इतनी ज़्यादा बर्बरता से गुज़र चुके हैं कि अदालतों, हलफ़नामों और इन्साफ़ पर उनका अब कोई विश्वास नहीं रह गया है। कुछ दसरे लोग भी हैं जो चाहते हैं कि मोहम्मद अफ़ज़ल मक़बूल बट्ट की तरह फांसी चढ़ जाये – कश्मीर के स्वतंत्रता-संघर्ष के एक गर्वीले शहीद के रूप में।8 कुल मिलाकर, ज़्यादातर कश्मीरी मोहम्मद अफ़ज़ल को एक युद्धबंदी की तरह देखते हैं, जिस पर क़ब्ज़ा करने वाली ताक़त की अदालत में मुक़दमा चल रहा है ( जो निस्संदेह सच है )। स्वाभाविक रूप से राजनैतिक दलों ने भारत में भी और कश्मीर में भी हवा को सूंघ लिया है और बेमुरव्वती से जस्त लगाये, शिकार पर झपट पड़ने के लिए बढ़ रहे हैं।

दुखद यह है कि इस पागलपन में लगता है अफ़ज़ल ने व्यक्ति होने का अधिकार गंवा दिया है। वह राष्ट्रवादियों, पृथकतावादियों और मृत्युदंड विरोधी कार्यकर्ताओं – सबकी कपोल-कल्पनाओं का माध्यम बन गया है। वह भारत का महा-खलनायक बन गया है और कश्मीर का महानायक – महज़ यह सिद्ध करते हुए कि हमारे विद्धज्जन, नीति-निर्धारक और शांति के गुरू चाहे जो कहें, इतने साल बाद भी कश्मीर में युद्ध को किसी भी तरह ख़त्म हुआ नहीं कहा जा सकता।

ऐसी परिस्थिति में, जो इतनी आशंका भरी हों और जिसका इस हद तक राजनीतिकरण कर दिया गया हो, यह मानने का लालच होता है कि हस्तक्षेप का समय आकर चला गया है। आख़िरकार, कानूनी प्रक्रिया चालीस महीने चली और सर्वोच्च न्यायालय ने उन साक्ष्यों को जांचा है जो उसके सामने मौजूद थे।  उसने आरोपियों में से दो को सज़ा सुना दी और दो को बरी कर दिया। निश्चय ही यह अपने आप में न्याय की वस्तुपरकता का प्रमाण हैं? इसके बाद कहने को क्या रह जाता है? इसे देखने का एक और तरीक़ा भी है। क्या यह अजीब नहीं है कि अभियोजन पक्ष आधे मामले में इतने विलक्षण ढंग से ग़लत साबित हुआ और आधे में इतने शानदार तरीक़े से सही?

( अगली बार लगातार… दूसरा भाग )


संदर्भ :
1. संसद के हमले और उसके बाद की अदालती कार्रवाई के लिए देखें, नन्दिता हक्सर, फ्रेमिंग गिलानी, हैंगिंग अफ़ज़ल : पेट्रिऑटिज़म इन द नेम ऑफ़ टेरर ( नयी दिल्ली, प्रॉमिला, 2007 ); प्रफ़ुल्ल बिदवई, 13 डिसेम्बर-ए रीडर : द स्ट्रेंज केस ऑफ़ दी अटैक ऑन दी इंडियन पार्लियामेंट ( नयी दिल्ली : पेंगुइन बुक्स इंडिया, 2006 ); सैयद बिस्मिल्लाह गिलानी, मैन्युफ़ैक्चरिंग टेरिज़्म : कश्मीरी एनकाउंटर्स विद मीडिया एंड द लॉ ( नई दिल्ली, प्रॉमिला, 2006 ); निर्मलांशु मुखर्जी, डिसेम्बर 13 : टेरर ओवर डेमोक्रेसी ( नयी दिल्ली, प्रॉमिला, 2005 ); पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, बैलेंसिंग एक्ट : हाई कोर्ट जजमेंट ऑन द 13 डिसेम्बर, 2001 केस ( नयी दिल्ली : 19 दिसम्बर, 2003 ); पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, ट्रायल ऑफ़ एरर्स : ए क्रिटिक ऑफ़ द पोटा कोर्ट जजमेंट ऑन द 13 दिसम्बर केस ( नई दिल्ली, 15 फ़रवरी, 2003 )।
2. न्यायाधीश एस.एन. ढींगरा, विशेष पोटा अदालत का फ़ैसला, मोहम्मद अफ़ज़ल बनाम राज्य ( दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ), 16 दिसम्बर, 2002।
3. गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का बयान, 18 दिसम्बर, 2001 । पाठ भारतीय दूतावास (वाशिंगटन) की बेबसाइट पर उपलब्ध है : http://www.indianembassy.org/new/parliament_doc_12_01.html ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया ) ( अब यह उपलब्ध नहीं है – प्रस्तुतकर्ता )।
4. देखें, सूज़न मिलिगन, ‘डिस्पाइट डिप्लोमेसी, कश्मीर ट्रूप्स ब्रोस’, बॉस्टन ग्लोब, 20 जनवरी, 2002, पृ. A1; फ़राह स्टॉकमैन एंड ऐंटनी शदीद, ‘सेक्शन फ़्यूएलिंग आयर बिटवीन इंडिया एंड पाकिस्तान’, बॉस्टन ग्लोब, 28 दिसम्बर, 2001, पृ. A3;  ज़ाहिद हुसैन, ‘टिट फ़ॉर टैट बैन्स रेज़ टेन्शन ऑन कश्मीर’, द टाइम्स (लंदन), 28 दिसम्बर, 2001; और ग़ुलाम हसनैन और निकोलस रफ़र्ड, ‘पाकिस्तान रेज़ेज़ कश्मीर न्यूक्लियर स्टेक्स’, संडे टाइम्स (लंदन), 30 दिसम्बर, 2001 ।
5. ढींगरा, विशेष पोटा कोर्ट का फ़ैसला।
6. देखें, सोमिनी सेनगुप्ता, ‘इंडियन ओपिनियन स्प्लिट्स ऑन कॉल फ़ॉर एक्सीक्यूशन’, इंटरनेशनल हेरल्ड ट्रिब्यून, 9 अक्टूबर, 2006; और सोमिनी सेनगुप्ता और हरी कुमार, ‘डेथ सेंटेस इन टेरर अटैक पुट्स इंडिया ऑन ट्रायल’, न्यूयार्क टाइम्स, 10 अक्टूबर, 2006, पृ. A3 ।
7. ‘आडवाणी क्रिटिसाइज्ड डिले इन अफ़ज़ल एक्जुक्यूषन’, द हिंदू, 13 नवम्बर, 2006 ।
8. जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के एक संस्थापक मक़बूल बट्ट को 11 फ़रवरी, 1984 को दिल्ली में फांसी दी गयी। देखें, ‘इंडिया हैंग्स कश्मीरी फ़ॉर स्लेयिंग बैंकर’, न्यूयार्क टाइम्स, 12 फ़रवरी, 1984, सेक्शन 1, पृ. 7 । मक़बूल बट्ट के बारे में विवरण इंटरनेट पर उपलब्ध है : http://www.maqboolbutt.com और http://www.geocities.com/jklf-kashmir/maqboolstory.html ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया ) ( अब यह साइट बंद हो गई है – प्रस्तुतकर्ता )।


प्रस्तुति – रवि कुमार

( यह आलेख अरुंधति रॉय के लेखों के संग्रह, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और नीलाभ द्वारा संपादित पुस्तक “कठघरे में लोकतंत्र” से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. यह अंग्रेजी की मूलकृति Listening of Grasshoppers से अनूदित है. यह लेख सबसे पहले ३० अक्‍तूबर, २००६ को ‘आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. )

वे मुसलमान थे – देवी प्रसाद मिश्र

सामान्य

वे मुसलमान थे

० देवी प्रसाद मिश्र

कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे

ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे

वे मुसलमान थे

उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया

वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे

उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की

प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे

उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे

न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे

वे मुसलमान थे

वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए

वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू

वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं

वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे

वे मुसलमान थे

यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए

कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे

वे मुसलमान थे

वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता

मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती

वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता

मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता

वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे

वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे

इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे

वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे

वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे

वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे

वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे

वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं

वे शहर के बाहर रहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं

उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे

वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे

वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है

अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे

वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे

कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए

वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे

सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे

वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसलमान थे अफ़वाह नहीं थे

वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे

०००००
देवी प्रसाद मिश्र

‘जनता पागल हो गई है’ – एक पुनर्पाठ

सामान्य

‘जनता पागल हो गई है’ – एक पुनर्पाठ

( इस नाटक की पीडीएफ़ फाइल इस लिंक से डाउनलोड की जा सकती है‘जनता पागल हो गई है’ लेखक-शिवराम janta pagal ho gayi hai.pdf 1.4 MB )

शिवराम Shivram

जयपुर के एक बाग में नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ का प्रदर्शन

शिवराम का नुक्कड़ नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ आपातकाल से पहले ही 1974 में लिखा गया था, जो कालांतर में काफ़ी प्रसिद्ध हुआ। इसका पहला प्रदर्शन झालावाड़ महाविद्यालय में हुआ, और सव्यसाची ने इसे ‘उत्तरार्ध ’ में छापा। ‘जनता पागल हो गई है’ आपातकाल की परिस्थितियों में ज़्यादा माकूल हो कर उभरा, और इसकी अंतर्वस्तु ने इसे आपातकाल के दौरान पूरे देश में काफ़ी लोकप्रिय बना दिया। इसके कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद हुए और हिंदी का यह पहला नुक्कड़ नाटक धीरे-धीरे सर्वाधिक खेले जाने वाला नाटक बन गया। तभी से शुरु हुए इस नाटक के प्रदर्शन अभी तक जारी हैं। अक्सर इसके खेले जाने की सूचनाएं मिलती रहती हैं।

इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि इस नाटक की अंतर्वस्तु में उन तत्वों की पड़ताल की जाए जो इसे इसके लिखे जाने के वक्त से लेकर अब तक प्रासंगिक और लोकप्रिय बनाए हुए हैं। इसकी उन खासियतों को देखा जाए, जो अभी भी रंगकर्मियों को इस नाटक के प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करती रहती हैं। साथ ही, जो अधिक जरूरी है, उन सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों के विश्लेषण के साथ इस नाटक को समझने की जरूरत है, जिन्होंने इसमे अभिव्यक्ति पाई हैं, जो जस के तस बनी हुई हैं, और उन्हें बदलने की आंकाक्षा अब और भी ठोस-यथार्थ रूप में महसूस की जाने लगी है।

शिवराम का नुक्कड़ नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ एक साधारण सी मांग पर तात्कालिक रूप से लिखा गया था, जो उनके सामने उनके छोटे भाई पुरुषोत्तम ( जिन्हें अब शायर पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’ के नाम से जाना जाता है ) ने अपने महाविद्यालय में हो रही नाटक प्रस्तुतियों के संदर्भ में रखी थी। इससे पहले शिवराम शुरुआती रूप से अपनी गतिविधियों के संदर्भ में ‘आगे बढ़ो’ नामक एक नाटक और फिर भगतसिंह पर एक नाटक लिख और खेल चुके थे। वे इन नाटकों के जरिए रामगंजमंड़ी इलाके की श्रमशील जनता के साथ अंतर्क्रियाओं से अपने अनुभवों को संपृक्त कर रहे थे, और साथ ही अध्ययन-मनन के जरिए अपने आपको सैद्धांतिक रूप से भी समृद्ध कर रहे थे। वे द्वंदात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद की दार्शनिकी को आत्मसात कर रहे थे और इनके जरिए अपने परिवेश, समाज, राजनीति और दुनिया को समझने और समझाने की कवायदों में थे। ठीक इन्हीं परिस्थितियों में यह नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ लिखा गया।

बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित नाटक संग्रह ‘जनता पागल हो गई है’ की भूमिका में शिवराम लिखते हैं, ” नुक्कड़ या चौपाल नाटक सिर्फ़ इसलिए अस्तित्व में नहीं आए कि ‘प्रेक्षागृह’ हमारी पहुंच में नहीं था बल्कि इसलिए आए कि प्रेक्षागृहों की पहुंच जनसाधारण तक नहीं थी और हम अपने विचार लेकर जनसाधारण के बीच पहुंचने को व्यग्र थे”। यह वाक्य जहां नुक्कड़ नाटक विधा की उत्पत्ति की आवश्यकता को रेखांकित करता है वहीं नाटको की अंतर्वस्तु और कथ्य की रूपरेखा को शिवराम के आगे के कथन, ” मेरे पास एक विचार था और गरीबी के अभिशाप तले जीने वाले लोगों के, मेरे गांव के किसानों और दलितों के मेरे इर्द गिर्द के जीवन के थोड़े बहुत अनुभव मेरे पास थे और सबसे ज़्यादा मेरे मनोजगत में व्याप्त हलचल, अपने जाने ‘सच’ को जनसाधारण तक पहुंचाने की व्यग्रता थी”, से समझा जा सकता है।

शिवराम द्वारा इस नई समझ के साथ तात्कालिक सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों के किये गए विश्लेषण, उपरोक्त परिस्थितियों में लिखे गये इस नाटक में बखूबी रूप से संश्लेषित हुए हैं। पारंपरिक लोक नाट्‍य शैली में, हास्य-व्यंग्यात्मक प्रस्तुति के साथ किया गया यह सांद्र और सर्वतोमुखी संश्लेषण ही, जो कि क्रांति के युटोपिया के साथ जनता की जीत पर समाप्त होता है, इसे वह धार और रवानगी देता है जो इसे रंगकर्मियों और दर्शकों, दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय बनाती हैं।

इसी को और समझने के लिए आइये हम इस नाटक का पुनर्पाठ करते हैं, और उनको समझने और देखने की कोशिश करते हैं। मुझे इस नाटक को कई बार करने और कई बार निकट से दर्शकों के साथ देखने का अवसर प्राप्त हुआ है, और इसीलिए दर्शकों की हर चुटीले संवाद पर प्रतिक्रिया को पास से देखा है। नाटक में मुख्य पात्र सिर्फ़ छः हैं, यानि कम अभिनेताओं के साथ इसे बखूबी मंचित किया जा सकता हैं। चलिए अब इस नुक्कड़ नाटक की यात्रा शुरू करते हैं।

नाटक की शुरुआत सिपाही द्वारा श्रीमान भारत सरकार के पधारने की मुनादी के साथ होती है। वही सामंती राजशाही ठाठबाठ के साथ अशीर्वादी मुद्राओं में ‘सरकार’ का आगमन होता है। सरकार आते ही पुलिस को आवाज़ देती है और पुलिस अधिकारी हास्य भरे अंदाज़ के संवाद के साथ उपस्थित होता है, “जी हां मेहरबान, कद्रदान, क्या हुक्म है मेरे आका? किसका निकालूं कचूमर, किसका बिगाडूं खाका?”। यह संवाद पुलिस के चरित्र को बखूबी सामने रखता है, सत्ता के आदेशों के आगे दरबारी तरीके से नतमस्तक और आम आदमी का या सत्ता के विरोधी स्वरों का कचूमर निकालना और खाका बिगाड़ना जिसका कि मुख्य काम है। सरकार की हर पुकार को वह इसी हेतु समझता है। इस बार सरकार बेचैन है, चुनाव आने वाले हैं, अकाल, भुखमरी, मंहगाई, बेकारी से जनता त्रस्त है, वह ‘जनता’ से मिलने की आकांक्षा व्यक्त करती है। पुलिस अधिकारी को सरकार की यह बेचैनी खामख्वाह लगती है, वह सरकार के सामने जनता को पकड़ कर हाजिर करने की मुस्तैदी दिखाता है, परंतु सरकार उसे रोक लेती है और खुद ही जनता के सामने जाने की इच्छा व्यक्त करती है और माकूल सवारी और सुरक्षा इंतज़ामों की तैयारी के आदेश देती है।

इसके तुरंत बाद का दृश्य काफ़ी चुटीला और प्रतीतात्मक है, साधारणतयः इस तरह की नाटकीयता कम ही देखने को मिलती है। पुलिस अधिकारी एक सिपाही को कान पकड़ कर ले आता है, और उसे सवारी बनने का आदेश देता है, सिपाही हाथ-पैरों के बल घोड़ा बन जाता है। सरकार आशीर्वादी मुद्रा में उस पर बैठ जाती है, और घोड़ा सिपाही हिनहिनाते हुए सरकार को पीठ पर लादे चल देता है। राज्य पुलिस मशीनरी के जरिए विरोधों का दमन करता है और अपना स्थायित्व बनाए रखता है, एक तरह से यह कह सकते हैं कि राज्य की सत्ता उसकी पुलिस पर टिकी हुई होती है यानि पुलिस ही एक तरह से सत्ता का प्रत्यक्ष होती है और सरकारों को ढो रही होती है। शिवराम उपरोक्त व्यंग्यात्मक प्रतीकात्मकता रचते है, और अपनी इसी बात को एक हास्य दृश्य बुनकर दर्शकों तक बखूबी संप्रेषित कर जाते हैं।

तुकभरी काव्यात्मक संवादों की शैली लोक नाट्यों और रामलीलाओं में बहुत ही प्रचलित है और शिवराम ने इस नाटक में उसी तरह की संवाद शैली का बखूबी प्रयोग किया है। इस तरह के संवादों के साथ दर्शकों के साथ बेहतर तारतम्य बैठता है, और बात लंबे समय के लिए संप्रेषित होती है, दर्शकों की स्मृति में ये चुटीले संवाद बखूबी दर्ज़ हो जाते हैं। हमें इसके कई संवाद अभी भी जुबानी याद हैं, और दर्शकों को बाद में भी इसके कई संवादों को हूबहू प्रस्तुत करते हमने कई बार देखा है। बानगी देखिए, उपरोक्त दृश्य में पुलिस अधिकारी का संवाद :

“बेचैन होके आपने, जनता को पुकारा / कहते हैं अक्लमंद को काफ़ी है इशारा / जनता को हुक्म देता हूं दरबार में आए / सरकार याद करती है, आदाब बजाए / सरकार आपके कहने से, मैं बस्ती-बस्ती जाता हूं / नालायक जनता की बच्ची को, मैं अभी पकड़ कर लाता हूं”

और सरकार का प्रतिसंवाद : “हम सेवक हैं जनता के / जाएंगे ख़ुद उसके हुज़ूर में चलके / लाओ कोई माकूल सवारी करो सुरक्षा की तैयारी / पुलिस प्यारी . . . .  हमारी।”

सरकार की सवारी के सामने अचानक जनता आ जाती है, और अपने दुखड़े रोती है. पुलिस अधिकारी जनता को घुड़क रहा है, और सरकार विस्मय से उसे देखती हुई कहती है :

“ये कौन है और क्या हमें समझाए है / इसके तो इक-इक रोम से अपने को बदबू आए है / उफ़ मेरे नाज़ुक बदन को देखता है घूरकर / थाम ले मीसा में इसको और नज़र से दूर कर.”

यहां इस संवाद के जरिए शिवराम लोकतांत्रिक सरकारों के जनविरोधी चरित्र को पेश करना चाहते हैं। वे यह दर्शाते हैं कि सरकारों की आम जनता से इतनी दूरी है कि वे उसकी पहचान से भी परिचित नहीं रह जाती, उससे एक अलंघ्यनीय दूरी बना लेती हैं। यहीं मीसा जैसे कानूनों का जिक्र करके शिवराम उन सभी जनविरोधी कानूनों पर तंज कर रहे हैं जो कि असलियत में जनता के दमन और सरकारों की मनमर्जी, दादागिरी का ज़रिया बनकर उभरते हैं।

यहीं आगे एक संवाद में जनता सरकार से कहती है कि, ‘आप सर्वशक्तिमान हैं…आप तो ख़ुद भगवान हैं, माई बाप…आप भगवान के अवतार हैं सरकार…’। यह वही मानसिकता है जो राजा की दैवीय उत्पत्ति के मनु के सिद्धांत से होती हुई सामंती निरंकुशता के ज़रिए आम मानस में गहरी पैठा दी गई थी ताकि जनता राजाओं के विरुद्ध जाने की नैतिक शक्ति हासिल ना कर सकें और किसी भी तरह के प्रतिरोध की हिमाकत नहीं कर सकें। शिवराम इस संवाद के ज़रिए इस बात को सहज रूप से ही रख जाते हैं कि आम मानस में, तथाकथित लोकतंत्र की स्थापना के बावज़ूद जिसमें लोक ही वास्तविक शक्तिसंपन्न बताया जाता है, वही लौकिक और अलौकिक सामंती भय अभी भी बरकरार है क्योंकि यह तथाकथित लोकतंत्र भी उसी सामंती ठाठ-बाठ और जोर-जबर की तरह ही चलाया जा रहा है।

आगे जनता जब अपनी तकलीफ़ों का जिक्र करते हुए फूट पड़ती है, तब सरकार के संवादों में शिवराम आमतौर पर सत्ता के द्वारा अपनाए जाने वाले दार्शनिक और धार्मिक हथियारों की जरूरतों और प्रयोग के हालातों का बखूबी बयान करते हैं। जनता का संवाद है:

“ढोर डांगर मर गये सब, खेत पड़े वीरान / तिस पर बनियां और पटवारी मांगे ब्याज लगान
बालक भूखे मरें हमारे, हम कुछ कर न पाएं / ऐसी हालत है घर-घर में, जीते जी मर जाएं.”

अब सरकार का संवाद देखिए: ” धीरज ! धीरज रखो जनता / आखिर महल समाजवाद का धीरे-धीरे बनता / ज़िंदगी और मौत अपने बस की बात नहीं है। यह तो ( आसमान की ओर हाथ उठाकर ) भगवान के हाथ की बात है।”

यहां दो चीज़ों को एक साथ लाया गया है, पहला कांग्रेस का समाजवाद का नारा। पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत जहां सारी संपदा मुट्टीभर पूंजीपतियों के हाथों में केन्द्रित होती जाती है, अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होते जाते हैं, वहां समाजवाद की बात करना जिसका कि मूल मतलब ही संपदा का समाज में समान वितरण है, एक अश्लील नारा बनकर उभरता है। यहां शिवराम यह दर्शाना चाहते हैं कि इस नाम को प्रयोग करने के पीछे की मजबूरियां क्या हैं। आखिरकार देश की बहुसंख्यक जनता को इस तरह के समाजवादी और गरीबी हटाओं जैसे नारों से भरमाए रखना, लोककल्याणकारी छवि को बनाए रखना जरूरी है। ये नारे और जनता की मांगों के सामने इन शब्दावलियों का प्रयोग दरअसल उनको तात्कालिक छलावा देना मात्र है।

दूसरी चीज़ है वह भाववादी और भाग्यवादी दर्शन, जिसे शिवराम जनता को भ्रमित और विरोध को दबाने के लिए प्रयोग किये जाने वाले सत्ता के हथियार के रूप में सामने लाते हैं। वे साफ़-साफ़ ये इंगित करते हैं कि सत्ता और धर्म की आपसी जुगलबंदी, नाभीनालबद्धता यथास्थिति को बनाए रखने के लिए किस तरह जरूरी हो उठती है। जनता की ऐसी हालत और मरने जैसी परिस्थितियों तथा भुखमरी-मौतों के लिए सरकार सफ़ाई से भगवान को जिम्मेदार बता देती है। जनता के मन में पैठाई गईं आस्थाएं और भाग्यवादी दर्शन उसे पहले से ही इसके अनुकूलित रखता है और सत्ता द्वारा उसे भ्रमित करना और अपनी जिम्मेदारियों से बचना आसान कर देता है।

आगे सरकार जनता से पूछती है कि भूखी हो, जनता जवाब में हांमी भरती है उसके बाद का एक संवाद इस तरह से है; सरकार सहज भाव से कहती है : “तो, भूखी रहो। मगर खुश-खुश। कल के सुख के लिए आज कुर्बानी करनी ही होती है।…तुम्हें याद नहीं जनता अंग्रेजों से आज़ादी हासिल करने के लिए गांधी जी अक्सर लंबी भूख हड़ताल करते थे।” जनता कह उठती है: “अब किससे आज़ादी हासिल करनी है सरकार? हमारे तो पुरखे भी भूख काटते मर गए और हम भी मर जाएंगे…हमें भूख से आज़ादी कब मिलेगी सरकार?”

यहां सरकार आज़ादी की लड़ाई के दौरान काम में लाई गई दार्शनिकी को, आज़ादी के इतने साल बाद भी बेहयाई से काम में लेती हैं और यह सामने आता है कि गांधी को किस तरह बचाव के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। शिवराम जनता के जवाब के ज़रिए यह तथ्य सामने लाते हैं कि आज़ादी के पश्चात भी आम परिस्थितियां वैसी ही बनी हुई हैं और असली आज़ादी, भूख से आज़ादी का सवाल अब भी एक घिनौनी वास्तविकता की तरह हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है।

जैसा कि कहा जा चु्का है, सरकार चुनाव की मजबूरियों के तहत जनता से मुखातिब होने के लिए उसके बीच में अवतरित हुई है, तो जल्दी ही वह चुनावों के जिक्र और वोट देने का आग्रह करती है। वोट के बदले रोटी की बात कहती है, जनता को विश्वास नहीं होता तो फिर यहां शिवराम सरकारों, अन्य दलों द्वारा सामान्यतः चुनाव के समय किए जाने वाले इस तरह के कई आश्वासनों का जिक्र करते हैं। इसी समय नाटक में एक पात्र का अनायास प्रवेश होता है। वह ‘पागल’ है।

शिवराम द्वारा गढ़ा गया पागल का यह चरित्र कई जटिल भी और सहज सी भी अभिव्यक्तियों को समेटे हुए है। वह सर्वहारा के बीच से निकला है, आंदोलनों के सरकारी दमन का मारा हुआ है, उसकी चेतना संघर्ष की प्रक्रिया में तपी हुई है, वह पूंजी और सत्ता के इस खेल, गठजोड़ को समझता है, वह इसी को सामने लाने और जनता के सामने खोलने के लिए प्रवृत्त रहता है। ऐसा भी लग सकता है कि सरकारी दमन और अत्याचारों के चलते वह अपना मानसिल संतुलन खो बैठा है और पागल हो गया है। वहीं शिवराम इस ओर भी इशारा करते हैं कि आम मान्यताओं, भ्रमों तथा परंपराओं के ख़िलाफ़ जब भी कोई व्यक्ति अपनी बात कहता है, परिवर्तन और संघर्षों के ज़रिए दुनिया को बदलने की बात करता है तो आम मानसिकता उसे सहज रूप से ही पागल कह उठती है, कि यह तो पागल हो गया है, कि भला कुछ ऐसा भी होता है, कि ऐसा भी हो सकता है, कि दुनिया तो ऐसे ही बनी और चलती आ रही है, इसे बदलने की बात करना पागलपन के सिवाय क्या है।

इस समय के संवादों के ज़रिए शिवराम बताते हैं कि इस तरह की ‘पागल’ शक्तियां सच को सामने लाने की कोशिश करती रही हैं, जनता अपने अनुकूलन के कारण उनपर विश्वास के लिए असमंजस में होती है और वहीं सत्ता तथा सरकारें इनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल देती हैं, इनके विरुद्ध सरकारी प्रचार-तंत्र खड़ा करती है, इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि इनकी बात जनता तक पहुंचने ही नहीं पाए और यदि छुट-पुट रूप में पहुंच भी जाएं तो जनता इन्हें गंभीरता से लेने की मानसिकता में ना हो, वह भ्रम में ही मुब्तिला रहे।

सरकार ऐसे ही पागलों से, और इसी बहाने अपने विरोधियों से भी जनता को चेताते हुए सावधान करते हुए कहती है कि, ‘देख जनता, तुझे तरह-तरह के लोग तरह-तरह से आकर बहकाएंगे। तू किसी के बहकावे में मत आना…।’ इस संवाद का अंत इस वाक्य से होता है, ‘मैंने जो कुछ भी किया जनता, तेरे भले के लिए किया। तेरे भले के लिए।’ पागल फिर बीच में कूद उठता है, उसका संवाद देखिए:
“हां जनता, सब कुछ तेरे भले के लिए। ये अपने लिए कार, कोठी, ऐशोआराम की चीज़ें जुटाई तो तेरे भले के लिए। देश पूंजीपतियों और जागीरदारों के हवाले कर दिया तो तेरे भले के लिए। मंहगाई, बेरोजगारी बढ़ाई तेरे भले के लिए। कच्ची बस्तियां उजाड़ी तो तेरे भले के लिए। टैक्स बढ़ाए तो तेरे भले के लिए। तुझ पर डंडे चलाए तो तेरे भले के लिए। अब तुझे जेल भेजेगी तो तेरे भले के लिए। मीसा, डी.आई.आर., आसुका-रासुका, टाडा-आडा सब तेरे भले के लिए। ये विदेशी कर्ज, तेरे भले के लिए। यह तानाशाही तर्ज, तेरे भले के लिए।”

सरकार पुलिस को बुलाकर कहती है: “इस पागल पर रखी जाए नज़र कड़ी / इसके पीछे हमको साजिश लगती कई बड़ी / कमबख़्त हमारी जनता को भड़काता है / कोई विदेशी एजेन्ट नज़र आता है…”

यहां शिवराम, सरकारों द्वारा भ्रमों के बावज़ूद जस्टीफाई नहीं किए जा सकने वाली बातों और विरोध की आवाजों के लिए आम-तौर पर विदेशी हाथ करार दिए जाने की मानसिकता पर सहज सा व्यंग्य करते हैं। वे यह स्पष्ट करते हैं कि चूंकि सारा प्रचार-तंत्र उनके हाथ में होता है, सत्ताएं अपके ख़िलाफ़ जाती सारी बातों, कार्यवाहियों को आसानी से अपने विरुद्ध किए जा रहे साजिशों, षड़यंत्रों का रूप दे देती हैं, और इस सामान्य तर्क के ज़रिए इस बात को सिद्ध करने की कोशिश करती हैं कि किसी भी तरह के प्रभुत्व के ख़िलाफ़ इस तरह के षड़यंत्र किया जाना आम बात है और यह सब वही सत्ता, प्रभुत्व प्राप्त करने की आकांक्षाओं के अंतर्गत किए जाने वाला दुष्प्रचार मात्र है।

पुलिस द्वारा सरकार को घोड़ा बनकर ढोए जाने वाले दृश्य का जिक्र पहले किया जा चुका है, उसी संदर्भ में नाटक में शिवराम अब एक और नाटकीयता रचते हैं। वे यह प्रदर्शित करते हैं कि सरकारों को ढोने वाली पुलिस के सामान्य सिपाही भी सर्वहारा वर्ग से आते हैं, उनके साझे दुख-दर्द हैं, इसलिए उन्हें भी इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्षों में साथ आना चाहिए, साथ लाना होगा। वे इसके लिए अधिकारी द्वारा पुनः सवारी बनने के लिए कहे जाने पर सिपाही का विद्रोह दिखाते हैं। सिपाही का संवाद देखिए:

“नहीं बनेंगे अब हम सवारी। दिन-रात जानवरों की तरह खटें। तुम्हारे बीवी-बच्चों की गुलामी बजाएं। तुम्हारे हुक्म पर आदमी पर डंडे चलाएं और बदले में मुट्ठी भर वेतन और ये ज़लालत, अब नहीं होगा ये सब। आखिर हम भी इन्सान हैं। कब तक जियेंगे ये जानवरों सी ज़िंदगी। जिल्लत की ज़िंदगी, ज़लालत की रोटियां।…हुं ! हम भी अपनी यूनियन बनाएंगे। नहीं बनेंगे अब हम सवारी-अवारी। पुलिस यूनियन ज़िंदाबाद ! इन्कलाब ज़िंदाबाद !”

इस पुलिस विद्रोह का दमन किया जाता है और अंततः सिपाही को फिर से सवारी बनने को मजबूर कर दिया जाता है। एक बार शिवराम ने बताया था कि इस दृश्य के पीछे दरअसल एक वास्तविक खबर का आधार था, जिसमें एक पुलिस यूनियन बनाने के प्रयासों का बेदर्दी से दमन कर दिया गया था, स्थान अब स्मृति में नहीं रहा है।

सरकार वोट मांगते हुए पुलिस की सवारी पर निकल जाती है, जनता रोजी, रोटी, भूख, बेकारी पर बुदबुदाते हुए भौंचक्की खड़ी रह जाती है। जनता की तकलीफ़ो पर सरकारों की संवेदनहीनता बयान करता जनता का यह मार्मिक संवाद देखिए: “मैंने अपना हाथ पसारा / उसने दिया चमकता नारा
देखी नहीं जिगर की चोट / देखा केवल मेरा वोट”

पागल का प्रवेश होता है, पहले वह वोट की राजनीति पर व्यंग्य करता हुआ गीत गाता है: “वोट माने कुर्सी, वोट माने राज / वोट माने सत्ता, वोट माने ताज / वोट माने लूट का पट्टा, पांच बरस को और / वोट माने ठगा गया फिर, पांच बरस को और”

फिर वह जनता से भूख के बारे में पूछता है, और जब कुछ नहीं सूझता तो वह गाने के लिए कहता है। ‘भूखे भजन ना होए गोपाला’ की लोकसमझ के सापेक्ष ‘भूख से बचने के लिए भजन’ वाली मानसिकता पर तंज करवाते हुए शिवराम यहां पागल से गाना गवाते हैं, भजन के बरअक्स हालांकि यह गाना एक अलग ही वितान रचता है। यह गीत काफ़ी लोकप्रिय हो उठता है और दर्शकों की स्मृति में ठहर सा जाता है जिसे वे बाद में भी गुनगुनाते रहते हैं:

“भूख लगे तो गाना गा / भूख लगे तो गाना गा, जनता तू गाना गा
ये सरकार बनी है बहरी / गूंगी इसकी सभी कचहरी / पर्दे फट जाएं कान के इसके / ऐसा गाना गा
जनता तू गाना गा, भूख लगे तो गाना गा
इस सरकार की चमड़ी मोटी / सेठों से फिट इसकी गोटी / सर्द पसीने छूटें इसको / ऐसा गाना गा
जनता तू गाना गा, भूख लगे तो गाना गा”

जनता साथ-साथ गुनगुनाने-गाने लगती है, फिर लाठी पटकते हुए बोल उठती है, ‘अरे पागल ! गाने से भी कहीं पेट भरता है।’ शिवराम इस तरह पागल और उसके तात्कालिक समाधानविहीन वितंड़ा पर भी करारा व्यंग्य कर जाते हैं। वे इस तरह बताना चाहते हैं कि कोरी लफ्फ़ाजियों से आमजन की पीड़ाओं के समाधान नहीं निकला करते, तात्कालिक समस्याओं की तकलीफ़ कम नहीं हुआ करती। मुक्तिकामी दूरगामी संघर्षों की श्रृंखलाएं, तात्कालिक जीवनीय जरूरतों के संघर्षों के साथ नाभीनालबद्ध होकर ही परवान चढ़ सकती हैं। आमजन के फौरी संघर्षों से अपने को जोड़कर ही प्रगतिशील शक्तियां जनता के साथ वह आपसदारी, वह विश्वास पैदा कर सकती हैं जिसके ज़रिए लंबी लड़ाइयों की पृष्ठभूमियां तैयार की जा सकती हैं। इसके बिना ये शक्तियां आमजन के बीच तारतम्य हासिल नहीं कर सकती और जनता से दूरियों को बढ़ा ही सकती है, सिर्फ़ एक ऐसी जनपक्षधरता के आयाम रच सकती हैं जिसका जन से कोई वास्तविक जुड़ाव नहीं रह जाता, और यह विलगाव अंततः उनकी जनपक्षधरता के सिद्धांतो में भी कई तरह के भटकावों के लिए भी ज़मीन तैयार करता है।

नाटक में यहां पूंजीपति का प्रवेश होता है और वह जनता को रोटी के लिए अपने कारखानों में काम करने के लिए तैयार करता है। इसी दौरान पागल की नौंक-झौंक से परेशान होकर पूंजीपति, पुलिस के ज़रिए उसे वहां से भगा देता है। यहां एक संवाद शिवराम दोनों के बीच कहलवाते हैं, वह दृष्टव्य है। पागल कहता है, ‘क्यों ये देश तेरे बाप का है क्या?’, जवाब में पूंजीपति जब पुलिस को बुलाकर उसे भगा देता है और पुलिस भी बख्शीश लेकर चली जाती है तब वह जनता से मुखातिब होकर हंसते हुए कहता है, ‘पता चला, देश किसका है?’ पुलिस किसकी है? बड़ी ही सहजता के साथ शिवराम इस तरह देश के पूंजीवादी लोकतंत्र की वास्तविक चालक शक्तियों का सच दर्शकों के सामने रख देते हैं।

पूंजीपति जनता को अपने कारखाने में ले जाता है और उसे एक मशीन पर काम में लगा देता है। यहां मशीन पर काम सिखाने का दृश्य है और साथ ही जनता के पुराने ढीले-ढाले कपड़े उतरवा कर कारखाने की पेंट-शर्ट वाली यूनीफार्म पहनवाने के भी। पूंजीपति द्वारा जनता का साफा भी उतारकर फैंक दिया जाता है। ये प्रतीकात्मक दृश्य साधारण सा लगता है तथा थोड़े ही समय में निकल जाता है पर अपने प्रभाव में शिवराम यहां कई गहरी ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की तरफ़ मूक इशारे कर जाते है। किसान जनता के सामने निजी श्रम की खेती में बढ़ती समस्याएं, कर्ज और ब्याज का बढ़ता बोझ, फसलों के ज़रिए दो जून की रोटी प्राप्त करने की भी असमर्थता, उसे मजदूरी के लिए मजबूर करती है और अंततः ज़मीनों से बेदखली उसकी सर्वाहाराकरण की प्रक्रिया को पूरा करती है। उसके पास जीवनयापन के लिए श्रम को एक माल की तरह बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोडती, वह कारखाना मज़दूर हो जाता है। कारखानों के लिए, श्रम को बेचने के दूसरे अवसरों के लिए, वह शहरों की तरफ़ रुख करता है। कारखाने की वर्दी पहनने और साफा फैंकने के दृश्यों के ज़रिए शिवराम मज़दूरीकरण, शहरीकरण तथा इस प्रक्रिया में परंपराओं और मूल्यों में हो रहे मूक बदलावों की गज़ब की प्रतीकात्मकता रचते हैं।

जनता मज़दूर बनकर कारखाने में मशीन पर काम कर रही है। कठोर नियमित श्रम के कारण थकान और पीड़ा मे है। जनता इसके बावज़ूद भी बिना कुछ कहे काम करती रहे, विरोध ना करे इसके लिए व्यवस्था किस तरह धर्म-दर्शन, भाग्यवाद और पुनर्जन्म के सिद्धांत का सहारा लेती है, या यूं भी कहे यह धर्म-दर्शन किस तरह यथास्थिति और शोषण के अभ्यारण्यों को बनाए रखने के लिए व्यवस्था के लिए आधार प्रस्तुत करता है, किस तरह प्रचलित कर दिए गए इन विचारों के जुमले इन स्थितियों में व्यवस्था की मदद करते हैं, यह दिखाने के लिए शिवराम यहां पूंजीपति से यह संवाद कहलाते हैं:

“पीड़ा होती है जनता? तो पीड़ा सहने का अभ्यास करो। इसी में सद्‍गति है। सारे धर्मों का यही सार है जनता – सहनशील बनों ! संतोष करो ! परिश्रमी बनों ! भगवान से डरो ! भाग्य पर भरोसा रखो ! तुम्हारे इस जन्म के दुःख-सुख पूर्वजन्मों के फल हैं। इस जन्म में अच्छे कर्म करो, अपने कर्तव्यों का पालन करो। अगले जन्म में इसके सुफल तुम्हें प्राप्त होंगे। धर्मप्राण बनो जनता। इसी में कल्याण है।”

जनता की थकान और पीड़ाओं को देखते हुए पूंजीपति बात आगे बढ़ाता है और मायावाद तथा गीता के कर्मदर्शन का उपदेश करने लगता है: “यह जो तुम दुखी हो दरिद्र हो तो पूर्वजन्म के पापों के कारण। मैं जो सुखी और समृद्ध हूं तो पूर्वजन्म के पुण्यों के कारण। ईश्वर का विधान ही ऐसा है। जो भी हो रहा है, जो भी हुआ है उसी की मर्जी से हुआ, आगे जो भी होगा उसी की मर्जी से होगा। ईश्वर ही सत्य है, बाकी सब मिथ्या है। यह सब स्वप्न की तरह है। अतः निष्काम कर्म ही मुक्ति का मार्ग है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है – कर्मण्यवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचनः। काम किए जा…फल की इच्छा मत कर…काम किए जा…फल की इच्छा मत कर…”

इस दृश्य में पूंजीपति इस वाक्यांश को ताल में उच्चारित करने लगता है, जनता उसी ताल में मशीन पर काम करती है। पूंजीपति के उच्चारण की गति तीव्र और धीमी होने के अनुसार ही जनता के काम की गति भी तीव्र और धीमी होती है। जनता के हाथ से सिक्के झरने लगते हैं। पूंजीपति सिक्के बटोरने लगता है। श्रम और उसके शोषण के ज़रिए पूंजी के उत्पादन और पूंजीपति द्वारा उसे हथियाने का यह प्रतीकात्मक दृश्य बहुत ही नाटकीय प्रभाव छोड़ता है। इस प्रभाव के संप्रेषण को बढ़ाने के लिए शिवराम यहां पागल का प्रवेश करवाते हैं और उसके संवाद के ज़रिए बात को साफ़ करते हैं, साथ ही श्रम से विलगाव के अन्य शारीरिक प्रभावों को भी रेखांकित करते हैं:

“धन, सिक्के ! जनता की मेहनत से दौलत पैदा हुई और ये तोंदूमल लगा है इसे बटोरने। मेहनत जनता की दौलत तोंदूमल की…ह…ह…ह…ह…( पूजीपति से ) ऐ तोंदूमल उठ। चल इधर चल। तू भी काम कर। जनता की कमाई पर हाथ मत मार। अपनी मेहनत की खा। मेहनत के और भी कई फायदे हैं। मेहनत करेगा तो तेरी तोंद भी छंट जाएगी। डायबिटिज नहीं होगी। ब्लड़प्रेशर भी सही हो जाएगा और तेरा भेजा भी ठीक काम करेगा।…चल काम कर…”

पूंजीपति पुलिस को बुलाकर पागल को खदेड़ता है और पुलिस अधिकारी को बटोरी गई दौलत में से कुछ हिस्सा रिश्वत में देता है। इस तरह पूंजीपति और पुलिस के बीच की सांठगांठ को उजागर किया जाता है। जनता काम बंद कर देती है, और रोटी की मांग करती है। वह आठ रोटी मांगती है, पूंजीपति उसके सामने दो रोटी उछाल देता है और संतोषवादी दर्शन का उपदेश देता है, ‘झूठी बात…!…ले…रूखी-सूखी खायके ठंड़ा पानी पीव। देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जीव…हह…हह…” इसके बाद जनता और रोटी मांगती है तो पूंजीपति उसे झिडकते हुए और काम करने, ओवरटाइम करने को कहता है। जनता और काम करती है, और पूंजी पैदा होती है, पूंजीपति उसे भी बटोर लेता है। पूंजीपति का संवाद देखिए, ‘आराम हराम है जनता। और रोटी के लिए और काम करो।’

जनता थक कर काम करने से मना कर देती है, और मांग रखती है कि भरपेट रोटी दो तभी काम करेंगे। यहां शिवराम काम बंद करने और मांग रखने के लिए जो दृश्य रचते हैं, वह हड़ताल की प्रतीकात्मकता के लिए है और उसे वह पागल के चरित्र के ज़रिए स्पष्ट भी करते चलते हैं। पूंजीपति पुलिस को बुलवाता है और जनता को संभालने के लिए कहता है। इस व्यवस्था में प्रचलित कई जुमलों के निहितार्थ पूंजीपति के पुलिस अधिकारी को कहे इस संवाद में खुलकर सामने आते हैं: “जनता हड़ताल कर रही है। जनता काम करने से इंकार कर रही है। पागल लोग जनता को भड़का रहे हैं। कानून व्यवस्था भंग हो रही है। उत्पादन में अव्यवस्था फैल रही है। राष्ट्र, देश, समाज, व्यवस्था, कौम सब ख़तरे में है। ऐसे में मत करो ऐसी-वैसी बात। कर्तव्य का पालन करो और याद रखो अपनी औकात। जनता को संभालो, संभालो जनता को।”

पुलिस मार-मार कर जनता और पागल दोनों को अधमरा कर देती है। जनता फिर से काम के लिए तैयार कर ली जाती है। प्रशासन का ऐलान होता है, स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है है। इस तरह शिवराम जनता के विरोधों और आंदोलनों तथा व्यवस्था द्वारा उनके बर्बर दमन की प्रतीकात्मकता रचते हैं।

इसके पश्चात शिवराम लोकतांत्रिक मूल्यों और सीमाओं के अंतर्गत प्रतिरोध और उनकी परिणतियों को दर्शाने के लिए अगले दृश्य रचते हैं, जनता अपनी शिकायत सरकार के दरबार में करती है। यहां सरकार और पूंजीपति के बीच के संवाद उनके बीच की सांठगांठ, चुनावी लोकतंत्र के सच, तथा अपनी सत्ता के हितार्थ जनता की एकता को तोडने और उसे दिग्भ्रमित बनाए रखने की आवश्यकता को उजागर करने के लिए महत्त्वपूर्ण हो उठते हैं, बानगी देखिए:

पूंजीपति: जनता काम करने से इन्कार करती है। उत्पादन ठप्प हो गया है। उत्पादन नहीं होगा तो मुनाफ़े का क्या होगा? मुनाफ़ा नहीं होगा तो चुनाव फंड का क्या होगा? आपकी कुर्सी का क्या होगा? देश का क्या होगा?
सरकार: लेकिन चुनाव के समय का तो ध्यान रखना चाहिए। हम चुनाव हार गए यो हमारा क्या होगा? और हम नहीं होंगे तो तुम्हारा क्या होगा? आप क्या सोचते हैं ये विरोधी दल आपकी वैतरणी पार करा देंगे और फिर कम्युनिस्ट भी तो आ सकते हैं।….तुम्हारी खातिर हमने विदेशी कंपनियों के लिए देश के सभी दरवाज़े खोल दिए। देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता तक को दाव पर लगा दिया। देश को विदेशी कर्ज में डुबो दिया, और अब आप चुनाव के समय जनता को तंग कर रहे हैं।
पूंजीपति: अब ये जनता ऐसे काबू में नहीं रह सकेगी। सख्ती से पेश आना होगा। इसकी एकता को छिन्न-भिन्न करना होगा। इसे दिग्भ्रमित करना होगा। जनता को विद्रोह के लिए उकसाने वाले पागलों को ठिकाने लगाना होगा…संभालिए…अब जैसे भी हो जनता को संभालिए।

सरकार जनता को समझाने की कोशिश करती है, जनता फिर से काम करने लगती है फिर पूंजीपति और सरकार के बीच की सांठगांठ और सरकार के पाखण्डपूर्ण व्यवहार को देख-समझकर काम करने से मना कर देती है। सरकार के यह कहने पर कि ‘तुम पागल हो गई हो जनता’ जनता हुंकार कर कहती है: “हां, हम पागल हो गए हैं। ( दर्शकों से ) इनकी मर्जी मुताबिक पिसते रहो तो ठीक। दिन-रात भूखे-प्यासे खटते रहो तो ठीक। चुपचाप जुल्म सहते रहो तो ठीक। और जो कुछ बोलो, न्याय की गुहार करो, हक मांगो तो तुम पागल हो गई हो जनता, अरे, पागल हो गए हो तुम। ( लाठी खटकाती है )”

सरकार पुलिस को बुलाती है, जनता लाठी तानकर खड़ी हो जाती है। पुलिस जनता पर वार करने को उद्धत होती है, जनता रौद्र रूप धारण कर लेती है और ताबड़तोड़ लाठी चलाने लगती है, पागल भी डंडा लेकर जनता के साथ आ मिलता है। पुलिस भाग खड़ी होती है। सरकार और पूंजीपाति मिलिट्री को बुलाते है। जनता और पागल सरकार और पूंजीपति की ओर लपकते हैं, सेना आती है और गोलियां बरसाने लगती है। जनता धावा बोल देती है और दृश्यपटल से सभी को खदेड देती है। इस तरह विद्रोह के इस वितान के साथ नाटक समाप्त होता है। शिवराम इस शोषण की व्यवस्था से मुक्ति के स्वप्न, सचेतन रूप से जनता के विद्रोह के रूप में देखते हैं और जनवादी क्रांति के ज़रिए मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को खत्म किए जाने की वकालत करते हैं। अभी-अभी मरहूम हुए मशहूर जनकवि अदम गोंडवी के शब्दों में कहें तो: “जनता के पास एक ही चारा है बगावत, यह बात कह रहा हूं मैं होशोहवास में“।

इस तरह हम देखते हैं कि शिवराम का यह नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ एक साथ कई सारी चीज़ों को समेटे हुए है। यह सामंती व्यवस्था से पूंजीवादी व्यवस्था में संक्रमण, सर्वहा्राकरण, शहरीकरण, आदि जैसी ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की भौतिकवादी दृष्टिकोण से रखता है। सामाजिक परिस्थितियों तथा प्रवृत्तियों और सामाजिक शक्तियों के बीच संबंधों के द्वंदात्मक विश्लेषण को प्रकट करता है। यह जनता की पीड़ाओं तथा उसके शोषण को, पूंजीवादी-लोकतांत्रिक सरकारों के जनविरोधी चरित्र को, पूंजीपतियों द्वारा श्रम के दोहन, शोषण और सत्ता के साथ मिलकर पूंजी की लूट को, राज्य और पुलिसिया तंत्र की सांठगांठों और बर्बरता को, व्यवस्था विरोधों के दमन को सामने लाता है और साथ ही जनता तथा जनपक्षकारी शक्तियों के प्रतिरोधों, संघर्षों, उनकी मुक्तिकामी इच्छाओं को भी सकारात्मक रूप में अभिव्यक्ति देता है। इसमें धार्मिक-भाववादी दर्शन, उसके जनविरोधी चरित्र और सत्ता के साथ नाभिनालबद्धता को भी चुटीले ढ़ंग से प्रस्तुत किया गया है। यह नाटक लोक परंपरा से जुड़ते हुए नौटंकी शैली तथा कवितामयी संवादों, हास्य और नाटकीयता से भरपूर छोटे-छोटे प्रतीकात्मक दृश्यों, पैने और सटीक व्यंग्यों के ज़रिए सीधे दर्शकों से संवाद करता, उनके सामने व्यवस्था का पूरा वितान खोलता चलता है।

छोटे कलेवर में विस्तृत और व्यापक फलक पर गागर में सागर भरने वाली यही सशक्त अंतर्वस्तु और सटीक अभिव्यक्ति, इस नुक्कड़ नाटक को जनता के संघर्षों से, उसकी मुक्तिकामी आकांक्षाओं से जोडती है। इसको करने वाले नाट्यकर्मियों, जनसंघर्षकारी जत्थों के लिए हौसले का काम करती है, उनके लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखने में उनकी मदद करती है। यही बात इसे इसके लिखे जाने से लेकर अभी तक लोकप्रिय बनाए हुए है, कालजयी रचना बनाए हुए है।

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रवि कुमार

( इस नाटक की पीडीएफ़ फाइल इस लिंक से डाउनलोड की जा सकती है ‘जनता पागल हो गई है’ लेखक-शिवराम janta pagal ho gayi hai.pdf 1.4 MB )

शिवराम Shivram

नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ का आखिरी दृश्य जिसमें जनता अपनी लाठी से सरकार और पूंजीपति को खदेड़ती है

बढ़ता पूंजीवादी संकट

सामान्य

आलेख ‘पूंजीवाद एक प्रेत कथा’ का अंतिम हिस्सा. यहां पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचवा, छठा, सातवां, आठवां, नौवां, दसवां, ग्यारहवां, बारहवां, तेरहवां, चौदहवां.

( मूलतः ‘आउटलुक’ में प्रकाशित अरुंधति रॉय के इस आलेख का भारतभूषण द्वारा किया गया अनुवाद ‘समयांतर’ के मई-२०१२ अंक में प्रकाशित हुआ था. इसे यहां के पाठकों के लिए छोटे-छोटे टुकड़ो में प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि यह सहेजा तथा और अधिक पढ़ा जा सके. आप भी अरुंधति द्वारा वर्तमान समय की चुनौतियों पर अपने अलग ही बेलौस अंदाज़ में कही गई कई बेलाग और महत्त्वपूर्ण टिप्पणियों से गुजरने का माद्दा टटोलिए. )

बढ़ता पूंजीवादी संकट

० अरुंधति रॉय

पूंजीवाद संकट में है। ट्रिकल-डाउन असफल हो गया है। अब गश-अप भी संकट में है। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय आपदा बढ़ती जा रही है। भारत की विकास दर कम होकर 6.9 प्रतिशत हो गई है। विदेशी निवेश दूर जा रहा है। प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय कॉर्पोरेशन पैसों के विशाल ढेर पर बैठे हैं, समझ नहीं आ रहा है कहां पैसा निवेश करें, यह भी समझ नहीं आ रहा कि वित्तीय संकट कैसे खत्म होगा। वैश्विक पूंजी के भीमकाय रथ में यह एक प्रमुख संरचनात्मक दरार है।

पूंजीवाद के असली ‘गोरकन’ शायद उसके भ्रांतिग्रस्त प्रमुख साबित हों, जिन्होंने विचारधारा को धर्म बना लिया है। उनकी कूटनीतिक प्रदीप्ति के बावजूद उन्हें एक साधारण-सी बात समझने में परेशानी हो रही है: पूंजीवाद धरती को तबाह कर रहा है। विगत संकटों से उसे उबारने वाली दो युक्तियां- जंग और खरीदारी- काम नहीं करने वाली है।

एंटिला के सामने खड़े होकर मैं देर तक सूर्यास्त होते देखती रही। कल्पना करने लगी कि वह ऊंची मीनार जितनी जमीन से ऊपर है उतनी ही नीचे भी। कि उसमें सत्ताइस-मंजिल लंबा एक सुरंग मार्ग है जो जमीन के अंदर सांप जैसा फैला है। यह भूखों की भांति धरती से संपोषण खींचे जा रही है और उसे धुऐं और सोने में बदल रही है।

अंबानियों ने अपनी इमारत का नाम एंटिला क्यों रखा? एंटिला एक काल्पनिक द्वीप-समूह का नाम है जिसकी कहानी आठवीं सदी की एक आइबेरियाई किंवदंती से जुड़ी है, जब मुसलमानों ने आइबेरियाई प्रायद्वीपया हिस्पेनिया पर जीत हासिल की, तो वहां राज कर रहे छह विथिगोथिक ईसाई पादरी और उनके पल्लीवासी जहाजों पर चढ़ कर भाग निकले। कई दिन या शायद कई हफ्ते समुद्र में गुजारने के बाद वे एंटिला द्वीप-समूह पर पहुंचे और उन्होंने वहीं बस जाने और नई सभ्यता तैयार करने का फैसला किया। बर्बर लोगों द्वारा शासित अपने देश से पूरी तरह संबंध तोड़ डालने के लिए उन्होंने अपनी नावें जला डालीं।

अपनी इमारत को एंटिला कहकर, क्या अंबानी अपने देस की गरीबी और गंदगी से संबंध तोड़ डालना चाहते हैं? भारत के सबसे सफल अलगाववादी आंदोलन का क्या यह अंतिम अंक है? मध्यम और उच्च वर्ग का अगल हो कर बाहरी अंतरिक्ष में चले जाना?

जैसे-जैसे मुंबई में रात उतरने लगी, कड़क लिनन कमीजें पहने और चटर-चटर करते वाकी-टाकी लिए सुरक्षाकर्मी एंटिला के आतंकित करनेवाले फाटकों के आगे नमूदार हुए। रौशनी जगमगाने लगी, शायद भूतों को डराने के लिए। पड़ोसियों की शिकायत है कि एंटिला की तेज रौशनी ने उनकी रात चुरा ली है।

शायद वक्त हो गया कि अब हम रात को वापिस हासिल करें।

० अरुंधति रॉय

( इस आलेख पर ‘हाशिया’ द्वारा की गई परिचयात्मक टिप्पणी: “अरुंधति राय का यह शानदार लेख अपने समय का महाकाव्य है, जब लेखक-संस्कृतिकर्मियों का एक हिस्सा साम्राज्यवादी प्रचारतंत्र का हिस्सा बना हुआ है. जब सरकारों और प्रशासन के भीतर तक साम्राज्यवाद की गहरी पैठ को दशकों गुजर चुके हैं और व्यवस्थाएं वित्त पूंजी और उसके एजेंटों के हाथों बंधक बना दिए जाने को जनवाद के चमकदार तमाशे के साथ प्रस्तुत कर रही हैं. जब जनता के संसाधनों की लूट को विकास का नाम देकर फौज और अर्धसैनिक बल देश के बड़े इलाके में आपातकाल लागू कर चुके हैं. यह आज के दौर का महाकाव्य है, जब अपनी रातों को वापस छीनने का सपना समाज को पूरी तरह बदल डालने की लड़ाई के साथ मिल जाता है…” )


इस पूरे आलेख की पीडीएफ़ फाइल ( poonjiwad ek pretkathaa PDF 280 KB ) यहां से डाउनलोड़ की जा सकती है।
पूंजीवाद एक प्रेतकथा – अरुधंति रॉय  ( पीडीएफ़ – फ़्री डाउनलोड )


हथियार क्यों चाहिए?

सामान्य

आलेख ‘पूंजीवाद एक प्रेत कथा’ का चौदहवां हिस्सा. यहां पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचवा, छठा, सातवां, आठवां, नौवां, दसवां, ग्यारहवां, बारहवां, तेरहवां.

( मूलतः ‘आउटलुक’ में प्रकाशित अरुंधति रॉय के इस आलेख का भारतभूषण द्वारा किया गया अनुवाद ‘समयांतर’ के मई-२०१२ अंक में प्रकाशित हुआ था. इसे यहां के पाठकों के लिए छोटे-छोटे टुकड़ो में प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि यह सहेजा तथा और अधिक पढ़ा जा सके. आप भी अरुंधति द्वारा वर्तमान समय की चुनौतियों पर अपने अलग ही बेलौस अंदाज़ में कही गई कई बेलाग और महत्त्वपूर्ण टिप्पणियों से गुजरने का माद्दा टटोलिए. )

हथियार क्यों चाहिए?

० अरुंधति रॉय

हथियारों की जरूरत जंग लडऩे के लिए होती है? या जंगों की जरूरत हथियारों के लिए बाजार तैयार करने के लिए होती है? जो भी हो योरोप, अमेरिका और इजऱाइल की अर्थव्यवस्थाएं बहुत कुछ उनके हथियार उद्योग पर निर्भर हैं। यही वह चीज है जो उन्होंने चीन को आउटसोर्स नहीं की।

अमेरिका और चीन के बीच के शीत युद्ध में भारत को उस भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है जो रूस के साथ शीत युद्ध में पाकिस्तान ने अमेरिका के सहयोगी के तौर पर निभाई थी। (देख लीजिये पाकिस्तान का हाल क्या हुआ। ) भारत और चीन के बीच के लड़ाई-झगड़ों को जो स्तंभकार और ‘रणनीतिक विश्लेषक’ बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं, देखा जाए तो उनमें से कई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इंडो-अमेरिकन थिंक टैंकों और फाउंडेशनों से जुड़े पाए जायेंगे। अमेरिका के ‘सामरिक सहयोगी’ होने का यह मतलब नहीं कि दोनों राष्ट्राध्यक्ष एक दूसरे को हमेशा दोस्ताना फोन कॉल करते रहें। इस का मतलब है हर स्तर पर सहयोग (हस्तक्षेप)। इसका मतलब है भारत की जमीन पर अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस की मेजबानी करना (पेंटागन के एक कमांडर ने हाल ही में बीबीसी से इस बात की पुष्टि की)। इसका अर्थ है गुप्त सूचनाएं साझा करना, कृषि और ऊर्जा-संबंधी नीतियों में बदलाव करना, वैश्विक निवेश हेतु स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों को खोलना। इसका अर्थ है खुदरा क्षेत्र को खोलना। इसका मतलब है गैर-बराबर हिस्सेदारी जिसमें भारत को उसके साथी द्वारा मजबूत बांहों में भरकर डांस फ्लोर पर नचाया जा रहा है और उसके नाचने से मना करते ही उसे भस्म कर दिया जाएगा।

ओ.आर.एफ. के ‘संस्थागत सहयोगियों’ की सूची में आपको रैंड कॉर्पोरेशन, फोर्ड फाउंडेशन, विश्व बैंक, ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूशन (जिनका घोषित मिशन है ‘ऐसी अभिनव एवं व्यावहारिक अनुशंसाएं करना जो तीन वृहत लक्ष्यों को आगे बढ़ाये: अमेरिकी लोकतंत्र को मजबूत करना; सभी अमेरिकियों का आर्थिक और सामाजिक कल्याण, सुरक्षा और अवसर को बढ़ावा देना; और अधिक उदार, सुरक्षित, समृद्ध और सहकारात्मक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था अर्जित करना’। ) उस सूची में आपको जर्मनी के रोजा लक्जमबर्ग फाउंडेशन का नाम भी मिलेगा। (बेचारी रोजा, जिन्होंने साम्यवाद के ध्येय के लिए अपनी जान दी उनका नाम ऐसी सूची में!)

हालांकि पूंजीवाद प्रतिस्पर्धा पर आधारित होता है, मगर खाद्य श्रंखला के शीर्ष पर बैठे हुए लोगों ने दिखाया है कि वे सबको मिलाकर चलने और एकजुटता दिखाने में समर्थ हैं। महान पश्चिमी पूंजीपतियों ने फासिस्टों, समाजवादियों, निरंकुश सत्ताधीशों और सैनिक तानाशाहों के साथ धंधा किया है। वे लगातार अपने आप को अनुकूलित कर सकते हैं और नए तरीके निकाल सकते हैं। वे तुरंत विचार करने और अपरिमित नीतिगत चतुराई में माहिर हैं।

मगर आर्थिक सुधारों के माध्यम से सफलतापूर्वक आगे बढऩे, मुक्त बाजार ‘लोकतंत्र’ बिठाने के लिए लड़ाइयां छेडऩे और देशों पर सैन्य कब्जे जमाने के बावजूद, पूंजीवाद एक ऐसे संकट से गुजऱ रहा है जिसकी गंभीरता अभी तक पूरी तरह सामने नहीं आई है। मार्क्स ने कहा था, ‘ इसलिए बुर्जुआ वर्ग जो उत्पादित करता है, उनमें सबसे ऊपर होते हैं उसकी ही कब्रखोदनेवाले। इनका पतन और सर्वहारा की विजय दोनों समान रूप से अपरिहार्य हैं। ‘

सर्वहारा वर्ग, जैसा कि मार्क्स ने समझा था, लगातार हमले झेलता रहा है। फैक्टरियां बंद हो गई हैं, नौकरियां छूमंतर हो गई हैं, यूनियनें तोड़ डाली गई हैं। पिछले कई सालों से सर्वहारा को हर संभव तरीके से एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जाता रहा है। भारत में यह हिंदू बनाम मुस्लिम। हिंदू बनाम ईसाई, दलित बनाम आदिवासी, जाति बनाम जाति, प्रदेश बनाम प्रदेश रहा है। और फिर भी, दुनिया भर में, सर्वहारा वर्ग लड़ रहा है। भारत में दुनिया के निर्धनतम लोगों ने कुछ समृद्धतम कॉर्पोरेशनों का रास्ता रोकने के लिए लड़ाई लड़ी है।

( लगातार…)

दलित पूंजीवाद की ओर

सामान्य

आलेख ‘पूंजीवाद एक प्रेत कथा’ का तेरहवां हिस्सा. यहां पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचवा, छठा, सातवां, आठवां, नौवां, दसवां, ग्यारहवां, बारहवां.

( मूलतः ‘आउटलुक’ में प्रकाशित अरुंधति रॉय के इस आलेख का भारतभूषण द्वारा किया गया अनुवाद ‘समयांतर’ के मई-२०१२ अंक में प्रकाशित हुआ था. इसे यहां के पाठकों के लिए छोटे-छोटे टुकड़ो में प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि यह सहेजा तथा और अधिक पढ़ा जा सके. आप भी अरुंधति द्वारा वर्तमान समय की चुनौतियों पर अपने अलग ही बेलौस अंदाज़ में कही गई कई बेलाग और महत्त्वपूर्ण टिप्पणियों से गुजरने का माद्दा टटोलिए. )

दलित पूंजीवाद की ओर

० अरुंधति रॉय

अमेरिका में अश्वेत शक्ति का उदय भारत में रैडिकल, प्रगतिशील दलित आंदोलन के लिए प्रेरणा का स्रोत था और दलित पैंथर जैसे संगठन ब्लैक पैंथर जैसे संगठनों की प्रतिबिंबन थे। लेकिन दलित शक्ति भी ठीक उसी तरह नहीं पर लगभग उन्हीं तौर-तरीकों से दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों और फोर्ड फाउंडेशन की खुली मदद से विभाजित और कमजोर कर दी गई है। यह अब दलित पूंजीवाद के रूप में बदलने की ओर बढ़ रही है।

पिछले साल दिसंबर में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट थी: ‘दलित इनक्लेव रेडी टू शो बिजऩेस कैन बीट कास्ट’। इसमें दलित इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (डिक्की) के एक सलाहकार को उद्धृत किया गया था। ‘हमारे समाज में दलितों की सभा के लिए प्रधान मंत्री को लाना मुश्किल नहीं है। मगर दलित उद्यमियों के लिए टाटा या गोदरेज के साथ दोपहर के खाने पर या चाय पर एक तस्वीर खिंचवाना एक अरमान होता है – और इस बात का सबूत कि वे आगे बढ़ेहैं,’ उन्होंने कहा। आधुनिक भारत की परिस्थिति को देखते हुए यह कहना जातिवादी और प्रतिक्रियावादी होगा कि दलित उद्यमियों को नामी-गरामी उद्योगपतियों के साथ बैठने (हाई टेबल पर जगह पाने) की कोई जरूरत नहीं। मगर यह अभिलाषा, अगर दलित राजनीति का वैचारिक ढांचा होने लगी तो बड़े शर्म की बात होगी। और इस से उन करोड़ों दलितों को भी कोई मदद नहीं मिलेगी जो अब भी अपने हाथों से कचरा साफ करके जीविका चलाते हैं- अपने सिरों पर आदमी की विष्ठा ढोते हैं।

वामपंथी आंदोलन की असफलताएं

फोर्ड फाउंडेशन से अनुदान स्वीकार करने वाले युवा दलित स्कॉलरों के प्रति कठोर नहीं हुआ जा सकता। भारतीय जाति व्यवस्था के मलकुंड से बाहर निकलने का मौका उन्हें और कौन दे रहा है? इस घटनाक्रम का काफी हद तक दोष और शर्मिंदगी दोनों ही भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के सर है जिसके नेता आज भी मुख्यत: ऊंची जातियों से आते हैं। इसने सालों से जाति के सिद्धांत को मार्क्सवादी वर्ग विश्लेषण में जबरदस्ती फिट करने की कोशिश की है। यह कोशिश सिद्धांत और व्यवहार दोनों में ही बुरी तरह असफल रही है। दलित समुदाय और वाम के बीच की दरार पैदा हुई दलितों के दृष्टि संपन्न नेता भीमराव अंबेडकर एवं ट्रेड यूनियन नेता और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य एस.ए.डांगे के बीच के झगड़े से। 1928 में मुंबई में कपड़ा मिल मजदूरों की हड़ताल से अंबेडकर का कम्युनिस्ट पार्टी से मोहभंग शुरू हुआ। तब उन्हें अहसास हुआ कि मेहनतकश वर्ग की एकजुटता के सारे शब्दाडंबरों के बावजूद पार्टी को इस बात से कोई आपत्ति न थी कि बुनाई विभाग से ‘अछूतों’ को बाहर रखा जाता है (और वे सिर्फ कम वेतन वाले कताई विभाग के योग्य माने जाते हैं) इसलिए कि उस काम में धागों पर थूक का इस्तेमाल करना पड़ता था और जिसे अन्य जातियां ‘अशुद्ध’ मानती थीं।

अंबेडकर को महसूस हुआ कि एक ऐसे समाज में जहां हिंदू शास्त्र छुआछूत और असमानता का संस्थाकरण करते हैं, वहां ‘अछूतों’ के लिए, उनके सामाजिक और नागरी अधिकारों के लिए तत्काल संघर्ष करना उस साम्यवादी क्रांति के इंतजार से कहीं ज्यादा जरूरी था जिसका आश्वासन था। अंबेडकरवादियों और वाम के बीच की दरार की दोनों ही पक्षों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। इसका मतलब यह निकला है कि दलित आबादी के बहुत बड़े हिस्से ने, जो भारत के मेहनतकश वर्ग की रीढ़ है, सम्मान और बेहतरी की अपनी उम्मीदें संविधानवाद, पूंजीवाद और बसपा जैसे राजनीतिक दलों से लगा ली हैं, जो पहचान की राजनीति के उस ब्रांड का पालन करते हैं जो महत्त्वपूर्ण तो है पर दीर्घकालिक तौर पर गतिहीन है।

अमेरिका में, जैसा कि हमने देखा, कॉर्पोरेट-अनुदानित फाउंडेशनों ने एनजीओ संस्कृति को जन्म दिया। भारत में लक्ष्य बना कर किए जाने वाले कॉर्पोरेट परोपकार की गंभीरतापूर्वक शुरूआत नब्बे के दशक में, नई आर्थिक नीतियों के युग में हुई। स्टार चेंबर की सदस्यता सस्ते में नहीं मिलती। टाटा समूह ने उस जरूरतमंद संस्थान, हार्वर्ड बिजनेस स्कूल, को पांच करोड़ डॉलर और कॉर्नेल विश्वविद्यालय को भी पांच करोड़ डॉलर दान किए। इनफोसिस के नंदन निलकेणी और उनकी पत्नी रोहिणी ने 50 लाख डॉलर येल विश्वविद्यालय के इंडिया इनिशिएटिव को शुरूआती निधि के तौर पर दान किए। महिंद्रा समूह द्वारा अब तक का सबसे बड़ा एक करोड़ डॉलर का अनुदान पाने के बाद हार्वर्ड ह्युमैनिटीज सेंटर का नाम अब महिंद्रा ह्युमैनिटीज सेंटर हो गया है।

यहां पर जिंदल समूह, जिसके खनन, धातु और ऊर्जा में बड़े निवेश हैं, जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल चलाता है और जल्द ही जिंदल स्कूल ऑफ गवर्नमेंट एंड पब्लिक पॉलिसी शुरू करने वाला है। (फोर्ड फाउंडेशन कांगो में एक विधि महाविद्यालय चलाता है।) इनफोसिस के मुनाफों से मिले पैसे से चलने वाला नंदन नीलकेणी द्वारा अनुदानित द न्यू इंडिया फाउंडेशन समाज विज्ञानियों को पुरस्कार और फेलोशिप देता है। ग्रामीण विकास, गरीबी निवारण, पर्यावरण शिक्षा और नैतिक उत्थान के क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए जिंदल एल्युमिनियम से अनुदान प्राप्त सीताराम जिंदल फाउंडेशन ने एक-एक करोड़ रुपए के पांच नगद पुरस्कारों की घोषणा की है। रिलायंस समूह का ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओ.आर.एफ.), जिसे फिलहाल मुकेश अंबानी से धन मिलता है, रॉकफेलर फाउंडेशन के अंदाज में ढला है। इससे रिसर्च ‘फेलो’ और सलाहकारों के तौर पर गुप्तचर सेवाओं के सेवा निवृत्त एजेंट, सामरिक विश्लेषक, राजनेता (जो संसद में एक दूसरे के खिलाफ होने का नाटक करते हैं), पत्रकार और नीति निर्धारक जुड़े हैं।

ओ.आर.एफ. के उद्देश्य बड़े साफ-साफ प्रतीत होते हैं: ‘आर्थिक सुधारों के पक्ष में आम सहमति तैयार करने हेतु सहायता करना। ‘ और ‘पिछड़े जिलों में रोजगार निर्मिति और आणविक, जैविक और रसायनिक खतरों का सामना करने के लिए समयोचित कार्यनीतियां बनाने जैसे विविध क्षेत्रों में व्यवहार्य और पर्यायी नीतिगत विकल्प तैयार करके’ आम राय को आकार देना और उसे प्रभावित करना।

ओ.आर.एफ. के घोषित उद्देश्यों में ‘आणविक, जैविक और रसायनिक युद्ध’ को लेकर अत्यधिक चिंता देखकर मैं शुरू में चक्कर में पड़ गई। मगर उसके ‘संस्थागत सहयोगियों’ की लंबी सूची में रेथियोन और लॉकहीड मार्टिन जैसे नाम देख कर हैरानी कम हुई। ये दोनों कंपनियां दुनिया की प्रमुख हथियार निर्माता हैं। 2007 में रेथियोन ने घोषणा की कि वे अब भारत पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे। क्या यह इसलिए है कि भारत के 3,200 करोड़ डॉलर के रक्षा बजट का कुछ हिस्सा रेथियोन और लॉकहीड मार्टिन द्वारा तैयार हथियारों, गाइडेड मिसाइलों, विमानों, नौसेना के जहाजों और निगरानी उपकरणों पर खर्च होगा?

( लगातार…)

गरीबी की चमक

सामान्य

आलेख ‘पूंजीवाद एक प्रेत कथा’ का बारहवां हिस्सा. यहां पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचवा, छठा, सातवां, आठवां, नौवां, दसवां, ग्यारहवां.

( मूलतः ‘आउटलुक’ में प्रकाशित अरुंधति रॉय के इस आलेख का भारतभूषण द्वारा किया गया अनुवाद ‘समयांतर’ के मई-२०१२ अंक में प्रकाशित हुआ था. इसे यहां के पाठकों के लिए छोटे-छोटे टुकड़ो में प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि यह सहेजा तथा और अधिक पढ़ा जा सके. आप भी अरुंधति द्वारा वर्तमान समय की चुनौतियों पर अपने अलग ही बेलौस अंदाज़ में कही गई कई बेलाग और महत्त्वपूर्ण टिप्पणियों से गुजरने का माद्दा टटोलिए. )

गरीबी की चमक

० अरुंधति रॉय

भारतीय गरीबी, जब भारत ‘शाइन’ कर रहा था उस दौरान कुछ थोड़े वक्त के नेपथ्य में चले जाने के बाद , फिर से कला के क्षेत्र में आकर्षक विषय के तौर पर लौट आई है, इसका नेतृत्व स्लमडॉग मिलियनेयर जैसी फिल्में कर रही हैं। गरीबों, उनकी गजब की जीजीविषा और गिरकर उठने की क्षमता की इन कहानियों में कोई खलनायक नहीं होते – सिवाय छोटे खलनायकों के जो नेरेटिव टेंशन और स्थानिकता का पुट देते हैं। इन रचनाओं के लेखक पुराने जमाने के नृशास्त्रियों के आज के समानधर्मा जैसे हैं, जो ‘जमीन’ पर काम करने के लिए, अज्ञात की अपनी साहसिक यात्राओं के लिए सराहे जाते और सम्मान पाते हैं। आप को इन तरीकों से अमीरों की जांच-परख शायद ही कभी देखने को मिले।

ये पता कर लेने के बाद कि सरकारों, राजनीतिक दलों, चुनावों, अदालतों, मीडिया और उदारवादी विचार का बंदोबस्त किस तरह किया जाये, नव-उदारवादी प्रतिष्ठान के सामने एक और चुनौती थी: बढ़ते असंतोष, ‘जनता की शक्ति’ के खतरे से कैसे निबटा जाए? उसे वश में किया जाए? विरोधकर्ताओं को पालतुओं में कैसे बदलें? जनता के क्रोध को किस तरह खींचा जाए और अंधी गलियों की ओर मोड़ दिया जाये?

इस मामले में भी फाउंडेशनों और उनके आनुषंगिक संगठनों का लंबा और सफल इतिहास है। साठ के दशक में अमेरिका में अश्वेतों के सिविल राइट्स मूवमेंट (नागरिक अधिकार या समानता के आंदोलन) की हवा निकालना और उसे नरम करने और ‘ब्लैक पावर’ (अश्वेत शक्ति)के ‘ब्लैक कैपिटलिज्म’ (अश्वेत पूंजीवाद) में यशस्वी रूपांतरण में उनकी भूमिका इस बात का प्रमुख उदाहरण है।

जे डी रॉकफेलर के आदर्शों के अनुसार रॉकफेलर फाउंडेशन ने मार्टिन लूथर किंग सीनियर (मार्टिन लूथर किंग जूनियर के पिता) के साथ मिलकर काम किया। मगर स्टूडेंट नॉनवायलेंट कोआर्डिनेशन कमेटी (एसएनसीसी या छात्र अहिंसक समन्वय समिति) और ब्लैक पैंथर्स (काले चीते) जैसे अधिक आक्रामक संगठनों के उभरने के बाद उनका प्रभाव कम हो गया। फोर्ड और रॉकफेलर फाउंडेशन दाखिल हुए। 1970 में उन्होंने अश्वेतों के ‘नरम’ संगठनों को डेढ़ करोड़ डॉलर दिए। यह लोगों को अनुदान, फेलोशिप, छात्रवृत्तियां, पढ़ाई छोड़ चुके लोगों के लिए रोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम और कालों के व्यापारिक प्रतिष्ठानों के लिए प्रारंभिक धन के रूप में मिले। दमन, आपसी झगड़े और पैसों के जाल ने रेडिकल अश्वेत आंदोलन को धीरे-धीरे कुंद कर दिया।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, नस्लवाद और वियतनाम युद्ध के निषिद्ध संबंध को चिह्नित किया था। परिणामस्वरूप उनकी हत्या के बाद उनकी स्मृति तक सुव्यवस्था के लिए विषभरा खतरा बन गई। फाउंडेशनों और कॉर्पोरेशनों ने उनकी विरासत को नया रूप देने के लिए काफी मेहनत की ताकि वह मार्केट-फ्रेंडली स्वरूप में फिट हो सके। फोर्ड मोटर कंपनी, जनरल मोटर्स, मोबिल, वेस्टर्न इलेक्ट्रिक, प्रॉक्टर एंड गैंबल, यूएस स्टील, मोंसैंटो और कई दूसरों ने मिलकर 20 लाख डॉलर के क्रियाशील अनुदान के साथ द मार्टिन लूथर किंग जूनियर सेंटर फॉर नॉनवाइलेंट सोशल चेंज (मार्टिन लूथर किंग जूनियर अहिंसक सामाजिक बदलाव केंद्र) की स्थापना की। यह सेंटर किंग पुस्तकालय चलाता है और नागरी अधिकार आंदोलन के पुरालेखों का संरक्षण करता है। यह सेंटर जो बहुत सारे कार्यक्रम चलाता है उनमें कुछ प्रोजेक्ट ऐसे रहे हैं जिनमें उन्होंने ‘अमेरिकी रक्षा विभाग (यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस), आम्र्ड फोर्सेस चैप्लेंस बोर्ड (सशस्त्र सेना पुरोहित बोर्ड) और अन्यों के साथ मिलकर काम किया है’। यह मार्टिन लूथर किंग जूनियर व्याख्यान माला ‘द फ्री इंटरप्राइज सिस्टम : एन एजेंट फॉर नॉनवाइलेंट सोशल चेंज’ (मुक्त उद्यम व्यवस्था: अहिंसक सामाजिक बदलाव के लिए एक कारक) विषय पर सहप्रायोजक था।

ऐसा ही तख्तापलट दक्षिण अफ्रीका के रंग-भेद विरोधी संघर्ष में करवाया गया। 1978 में रॉकफेलर फाउंडेशन ने दक्षिण अफ्रीका के प्रति अमेरिकी नीति को लेकर एक अध्ययन आयोग का गठन किया। रिपोर्ट ने अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) में सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव के बारे चेताया और कहा कि सभी नस्लों के बीच राजनीतिक सत्ता की सच्ची हिस्सेदारी हो, यही अमेरिकी के सामरिक और कॉर्पोरेट हितों (अर्थात दक्षिण अफ्रीका के खनिजों तक पहुंच) के लिए शुभ यही होगा।

फाउंडेशनों ने एएनसी की सहायता करना शुरू कर दिया। जल्द ही एएनसी स्टीव बीको की ब्लैक कॉन्शसनेस मूवमेंट (अश्वेत चेतना आंदोलन) जैसे अधिक रैडिकल आंदोलनों पर चढ़ बैठी और उन्हें कमोबेश खत्म कर के छोड़ा। जब नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने तो उन्हें जीवित संत घोषित कर दिया गया, सिर्फ इसलिए नहीं कि वह 27 साल जेल में बिता चुके स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि इसलिए कि उन्होंने वाशिंगटन समझौते को पूरी तरह स्वीकार कर लिया था। एएनसी के एजेंडे से समाजवाद पूरी तरह गायब हो गया। दक्षिण अफ्रीका के बहुप्रशंसित महान ‘शांतिपूर्ण परिवर्तन’ का मतलब था कोई भूमि सुधार नहीं, कोई क्षतिपूर्ति नहीं, दक्षिण अफ्रीका की खानों का राष्ट्रीयकरण भी नहीं। इसकी जगह हुआ निजीकरण और संरचनात्मक समायोजन। मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका के सर्वोच्च नागरी अलंकरण -द ऑर्डर ऑफ गुड होप – से इंडोनेशिया में कम्युनिस्टों के हत्यारे,अपने पुराने समर्थक और मित्र जनरल सुहार्तो को सम्मानित किया। आज दक्षिण अफ्रीका में मर्सिडीज में घूमने वाले पूर्व रैडिकलों और ट्रेड यूनियन नेताओं का गुट देश पर राज करता है। और यह ब्लैक लिबरेशन (अश्वेत मुक्ति) के भरम को हमेशा बनाये रखने के लिए काफी है।

( लगातार…)

व्यापक जन-आंदोलन का माहौल बनाना होगा

सामान्य

द्वितीय शिवराम स्मृति दिवस समारोह
व्यापक जन-आंदोलन का माहौल बनाना होगा

कोटा, 2 अक्टूबर 2012. सुप्रसिद्ध कवि, नाट्य लेखक, निर्देशक, समीक्षक एवं विचारक शिवराम के द्वितीय स्मृति दिवस पर ‘विकल्प’ जन सांस्कृतिक मंच, श्रमजीवी विचार मंच एवं अभिव्यक्ति नाट्य एवं कला मंच द्वारा 30 सितम्बर व 1 अक्टूबर को ‘आशीर्वाद हॉल’ कोटा में दो दिवसीय वृहत साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य शिवराम द्वारा जीवन-पर्यन्त साहित्य, संस्कृति, समाज, राजनीति एवं विविध क्षेत्रों में किये गये प्रयत्नों को एकसूत्रता में पिरोना, उनकी स्मृति को संकल्प में तथा शोक को संकल्प में ढालने का साझा प्रयास था। आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से आमंत्रित लेखकों व संस्कृतिकर्मियों के अलावा हाड़ौती-अंचल के करीब दो सौ से अधिक रचनाकार, श्रोता व पाठक शामिल हुए।

इस महत्वपूर्ण आयोजन में जनवादी रचनाकारों व संस्कृतिकर्मियों ने बाजारवादी अप-संस्कृति एवं सामन्ती संस्कृति के खिलाफ नई जनपक्षधर संस्कृति का विकल्प खड़ा करने की जरूरत बताई। साथ ही बताया कि पूंजीवादी राजनीति का घिनौना चेहरा जनतांत्रिक मूल्यों को तहस-नहस कर रहा है। ऐसे में व्यापक जन-आंदोलन का माहौल बनाना होगा। आयोजन का प्रारम्भ 30 सितम्बर को मुख्य अतिथि, ‘विकल्प’ अ.भा. जनवादी सांस्कृतिक सामाजिक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रवीन्द्र कुमार ‘रवि’ ( मुजफ्फरपुर ) द्वारा मशाल प्रज्ज्वलित करके किया गया। सुप्रसिद्ध भोजपुरी गायक दीपक कुमार ( सीवान ) की अगुआई में मोर्चा के बैनर-गीत ‘ये वक्त की आवाज है मिल के चलो’ के पश्चात् वासुदेव प्रसाद ( गया) , प्रशांत पुष्कर ( सीवान ) एवं शरद तैलंग ( कोटा ) द्वारा शिवराम के जन-गीतों तथा गण-संगीत की प्रभावी प्रस्तुति की गई। ‘विकल्प’ जनसांस्कृतिक मंच के सचिव शकूर अनवर द्वारा स्वागत-वक्तव्य में अतिथियों का स्वागत करते हुए आयोजन के उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया।

अपरान्ह 3 बजे ‘‘सांस्कृतिक नव जागरण: परिदृश्य एवं संभावनाऐं’’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में दिल्ली, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश व अन्य स्थानों के जाने-माने साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किये। विशिष्ट-अतिथि हरेराम ‘समीप’ ( फरीदाबाद ) ने कहा कि कार्पोरेट घरानों और शासक दलों की सांठ-गांठ के चलते विषमता और असमानता चरम पर पहुंच गई है। सांस्कृतिक क्षरण भी चरम पर है। ऐसे दुर्योधन-वक्त में व्यापक जन-आंदोलन खड़ा करने के लिए जनता को जगाना होगा। शैलेन्द्र चैहान ( दिल्ली ) ने कहा कि हमें सामंती संस्कृति के मुकाबले नई वैकल्पिक संस्कृति का निर्माण करना होगा। डॉ. रामशंकर तिवारी ( फरीदाबाद ) ने कहा कि सामंतवादी संस्कृति आज भी समाज में मौजूद है। दक्षिणपंथी ताकतें पुनरुत्थान आंदोलन चला रही हैं। दलितों, आदिवासियों और महिलाओं से भेदभाव के संस्कार हमारे व्यक्तित्व में अंदर तक है। तीज-त्यौहार भी बाजारवादी संस्कृति के हवाले होते जा रहे हैं।

डॉ. मंजरी वर्मा ( मुजफ्फरपुर ) ने कहा कि हमारी संस्कृति में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से कई तरह की खामियां पैदा हो गई हैं। शिवराम ने जिस तरह गांव-गांव जाकर नाटकों के मंचन से जन-संस्कृति की अलख जगाई थी, उसी तर्ज पर हमें जुटना होगा। नारायश शर्मा ( कोटा ) ने कहा कि संस्कृति के क्षेत्र में घालमेल नहीं होना चाहिए। मीडिया दिन-रात मुट्ठीभर अमीरों की संस्कृति का प्रचार कर रहा है, सांस्कृतिक नव-जागरण के लिए करोड़ों गरीबों व मेहनतकशों की संस्कृति का परचम ही उठाना होगा। पटना से आये विजय कुमार चैधरी ने कहा कि इन दिनों प्रगतिशील-जनवादी संस्कृतिकर्मियों व उनकी पत्रिकाओं के बीच भी रहस्यवाद, भाग्यवाद व कलावाद के पक्षधर स्थान पाने लगे हैं, इस प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए। डॉ. रवीन्द्र कुमार ‘रवि’ ने समाहार करते हुए कहा कि इस समय बाजारवादी – सामंती संस्कृति अपने पतन की पराकाष्ठा पर है तथा आम-जन को गहरे भटकावों में फॅंसा रही है। ऐसे समय में हमें भारतेन्दु, प्रेमचन्द, राहुल, निराला, नागार्जुन, यादवचन्द्र व शिवराम की तरह जनता को जगाने के लिए देशव्यापी सांस्कृतिक अभियान छेड़ना होगा।

अध्यक्ष मण्डल की ओर से बोलते हुए तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आर.पी. यादव ने कहा कि किसी भी देश के विकास में विचार की मुख्य भूमिका होती है। डॉ. नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी ने कहा कि जागरूक संस्कृति कर्म द्वारा समाज की प्रचलित रूढि़यों व मूल्यहीनता को एक हद तक रोका जा सकता है। परिचर्चा में टी.जी. विजय कुमार, शून्य आकांक्षी, वीरेन्द्र विद्यार्थी एवं विजय सिंह पालीवाल ने भी अपने विचार व्यक्त किये। संचालन महेन्द्र नेह ने किया।

समारोह के दूसरे दिन 1 अक्टूबर, 12 को शिवराम द्वारा लिखित नाटक ‘नाट्य-रक्षक’ की बेहद प्रभावशाली प्रस्तुति ‘अनाम’ कोटा के कलाकारों द्वारा की गई। नाटक में वर्तमान ‘मतदान-पद्धति’, जिसे भारतीय लोकतंत्र का आधार बताकर प्रचारित किया जाता है, का चरित्र पूरी तरह पैसे और बाहुबल द्वारा निर्धारित हो जाने पर करारा व्यंग्य किया गया। अजहर अली द्वारा निर्देशित इस नाटक में प्रमुख पात्रों की भूमिका डॉ पवन कुमार स्वर्णकार, भरत यादव, रोहित पुरुषोत्तम, आकाश सोनी, तपन झा, गौरांग, देवेन्द्र खुराना, राकेश, सचिन राठौड़ व अजहर अली ने निभाई। गया से पधारे नाट्य-कर्मी वासुदेव एवं कृष्णा जी द्वारा प्रेमचन्द की कहानी ‘सद्गति’ की मगही भाषा में प्रभावी नाट्य-प्रस्तुति भी की गई।

इस अवसर पर ‘विकल्प’ अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक सामाजिक मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भी सम्पन्न हुई। बैठक में मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव महेन्द्र नेह द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन में अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय परिस्थितियों में आ रहे महत्वपूर्ण परिवर्तनों को रेखांकित करते हुए साहित्य व संस्कृति के क्षेत्र में शहर से गांवों तक जन-संस्कृति की मुहिम छेड़ने, देशभर में प्रगतिशील जनवादी लेखकों व संस्कृतिकर्मियों के बीच व्यापक एकता विकसित करने तथा संस्कृतिकर्म को मेहनतकश जनता के जीवन-संघर्षों से जोड़ने पर बल दिया गया। बैठक में संगठन को मजबूत करने के साथ आगामी कार्यक्रम की रूपरेखा भी निर्धारित की गई।

इस समारोह में रवि कुमार ( रावतभाटा ) द्वारा, कविता-पोस्टर प्रदर्शनी और ‘विकल्प’ द्वारा एक लघु-पुस्तिका प्रदर्शनी भी लगाई गई थी जिसमें दर्शकों और पाठकों ने अपनी गहरी रुचि प्रदर्शित की। ‘कविता पोस्टर प्रदर्शनी’ का उद्घाटन तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आर.पी. यादव द्वारा किया गया। इस अवसर पर शिवराम की पत्नी श्रीमती सोमवती देवी एवं अन्य अतिथियों द्वारा महेन्द्र नेह द्वारा संपादित ‘अभिव्यक्ति’ पत्रिका के शिवराम विशेषांक का लोकार्पण किया गया।

1 अक्टूबर को दूसरे सत्र में वृहत् कवि-सम्मेलन एंव मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता निर्मल पाण्डेय व अखिलेश अंजुम ने की। विशिष्ट अतिथि जनवादी कवि अलीक ( रतलाम ), मदन मदिर ( बूंदी ) व सी.एल. सांखला ( टाकरवाड़ा ) सहित अंचल के प्रतिनिधि कवियों व शायरों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ किया। ओम नागर, हितेश व्यास व उदयमणि द्वारा शिवराम को समर्पित कविताऐं सुनाईं। संचालन आर.सी. शर्मा ‘आरसी’ द्वारा किया गया। स्वागत-समिति की ओर से दिनेशराय द्विवेदी, जवाहरलाल जैन, धर्मनारायण दुबे, शब्बीर अहमद व परमानन्द कौशिक द्वारा सभी अतिथियों व सहभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया गया।

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‘अभिव्यक्ति’ का नया 39वां अंक उपलब्ध हो गया है. शिवराम पर केन्द्रित इस विशेषांक का मूल्य 50 रुपये है. मंगाने के लिए संपादक महेन्द्र नेह से संपर्क किया जा सकता है.

महेन्द्र नेह
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