Category Archives: व्यंग्य

कोई कुछ कर रहा है और कोई टांग खिंचाई

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कोई कुछ कर रहा है और कोई टांग खिंचाई

रेखाचित्र - रवि कुमारउल्टेलाल जी आदतन फिर आकर जम गये, आजादी की दूसरी लड़ाई का जोश उनके सिर भी चढ़ कर बोल रहा था, कभी-कभी इसी रामलीला मैदान पर कुछ ही दिनों पहले हुई आज़ादी की पहली लड़ाई का हश्र उनके माथे पर शिकन डाल देता था. इस बार वे उत्साहित थे और जोर-शोर से अपनी उल्टी बुद्धि को इस क्रांति और क्रांतिकारियों को गरियाने और लानते भेजने में लगा रहे थे. हालांकि वे कह यह भी रहे थे कि इसका सही विश्लेषण और आकलन जरूरी है, यह जानबूझकर किया गया प्रपंच है जो नये भ्रम उत्पन्न करने और परिवर्तनकारी आकांक्षाओं को यथास्थिति में ही कुंद कर डालने के लिए रचा गया षडयंत्र है. उनकी जैसी उल्टी बुद्धि वैसी ही उल्टी सोच.

हालांकि हम उनके सामने कुछ बोलने से बचते हैं ताकि बात आगे नहीं बढ़े और वे जल्दी ही अपनी भड़ास निकाल कर अपनी राह पकड़े और हम भी अपनी दिनचर्याओं में ही अपना श्रम और उर्जा लगाते रह सकें, पर अपनी आस्थाओं और मासूम मान्यताओं पर हो रही इस दनादन चोट से तिलमिलाते हुए हम थोड़ी देर मे ही उकता गये और बोल पड़े, ‘या उल्टेलाल जी, आप तो बिना वज़ह शक करते रहते हैं, ख़ुद तो कुछ करते नहीं और कोई दूसरा कोई कुछ कर रहा हो तो बस मीन-मेख निकालना शुरू कर देते हैं, उसकी टांग खींचना शुरू कर देते हैं. आपको यह सही नहीं लगता तो ख़ुद क्यों नहीं कुछ करते, पता पड़ जाएगा कि कितनी जनता आपके साथ खड़ी है और आपकी औकात क्या है?’

अब आप समझ सकते हैं कि हम बड़ी गलती कर गए थे, उल्टेलाल जी को भरपूर मौका मिल गया था. और ऐसा ही हुआ उन्होंने हमें जम कर पेला. वे बोले, “यह भली कही आपने कि ‘कुछ’ तो किया जा रहा है, पर इस ‘कुछ’ करने के भी कुछ मानी हैं क्या? मूल समस्याएं हमारी क्या है, और यह ‘कुछ’ जो किया जा रहा है इसका इनसे मतलब भी है कि नहीं, क्या हमें यह नहीं देखना चाहिए? इस ‘कुछ’ करने से कोई रास्ता भी निकलेगा या हम इसी भूल-भुलैया में ही घूमते रहने को मजबूर रह जाएंगे?” उन्होंने दनादन इतने प्रश्न दाग दिये कि हमारी खोपड़ी हैंग हो गई और हम अपनी आंखें चौडा़ए उन्हें टुकुर-टुकुर ताकते रह गये.

उल्टेलाल जी को शायद हमारी इस हालत पर रहम आया और बोले, ‘छोड़िए श्रीमान जी, आप काहे अपने दिमाग़ का दही बनाते हैं? चलिए हम आपको एक कहानी सुनाते हैं.’ हमें थोड़ा सा चैन आया कि नहीं यह हम अभी पूरी तरह समझ भी नहीं पाये थे कि उन्होंने कहानी शुरू कर दी.

“एक जंगल था जैसा होता है. उसमें सभी कुछ वैसा ही था, जैसा कि अभी तक होता आया है. यानि समर्थ और ताकतवरों का राज चलता था. उनका राजा एक शेर था, उनके कुछ उन जैसे ही दूसरों को खा-पीकर जीने वाले कारकून थे, और बाकी उनकी उदर-पूर्ति के लिए बहुत सारे जानवर. खैर, कहानी आगे बढ़ाते हैं.”

“अब एक बार हुआ यूं कि एक हिरणी के छोटे से शावक को शेर ने दबोच लिया. हिरणी बेचारी इधर-उधर गुहार लगाने लगी. सभी किंकर्तव्यविमूढ़ थे, क्या करते. किसी ने सुझाया कि एक पहुंचे हुए अहिंसावादी संत हैं, वे पास ही के एक पेड़ पर अपनी इसी ताकत से सुरक्षित ज़िंदगी गुजार रहे हैं. हिरणी को थोड़ा शक हुआ तो उसे बताया गया कि उन्होंने राजा जी के कई कारकूनों के आचार-विचारों के खिलाफ़ कई लड़ाइयां लड़ी हैं और फिर भी वे अभी तक ज़िंदा हैं, भले-चंगे हैं, अपने पेड़ पर मस्त हैं तो इसका मतलब यही हुआ कि उनमें कुछ तो बात है, वे जरूर कोई राह दिखा सकते हैं, कोई राह निकाल सकते हैं.”

“मरती क्या ना करती, बेचारी हिरणी को उम्मीद जगी और वह पेड़ वाले संत बंदर की शरण में गई और उन्हें मामला समझाया, उनसे गुहार की कि उसके बच्चे को उस शेर से किसी भी तरह बचा लिया जाए. संत बंदर ममतामयी थे, तुरंत द्रवित हो गए और हिरणी तथा शावक का उद्धार करने को उद्यत हो उठे. वे बोले चलो, हमें वहां ले चलो जहां वह दुष्ट शेर यह हिंसा कर रहा है, पाप कर रहा है, वैसे तो उसे स्वयं भगवान ही वह सज़ा देंगे कि वह नरक में सड़-सड़ कर मरेगा, पर जीव के निमित्त हमें भी कुछ कर्म करने ही होंगे. वे उठे और हिरणी के साथ हो लिए.”

“शेर शावक को दबोचे हुआ था और उससे ठिठोली कर रहा था, उसे खाने से पहले उससे मज़े ले रहा था. संत बंदर वहां पहुंचे और शेर से विनती की कि वह शावक को छोड़ दे और अपने राजधर्म का पालन करे तथा प्रजावत्सल बने. वे उसे तरह-तरह के पंचतंत्रीय उपदेश देने लगे. शेर कुछ परेशान सा हुआ तो उसने बंदर को झिड़क दिया. संत बंदर कुछ बिदके, उनकी पद्धति और उनके अहम् को कुछ चोट पहुंची तो उन्होंने शेर को अपने अहिंसक दांत दिखाए और थोड़ी बहुर खौं-खौं की. शेर चिढ़ गया और एक तेज़ दहाड़ मार कर थोड़ा संत बंदर की तरफ़ लपका. संत बंदर भागे और सुरक्षित दूरी बनाते हुए पास के एक पेड़ पर चढ गए. शेर ने अब शावक की गरदन दबोच ली और उसे मारकर खाने की तैयारी करने लगा.”

“संत बंदर वहीं पेड से उसे गरियाने लगे. धमकाने लगे. कभी दांत दिखाते, कभी खौं-खौं करते. शेर अब उस शावक की खाल को अपने पैने दांतों से नौंचने लगा. संत बंदर की उछलकूद भी बढ़ गई. वे कभी इस पेड़ पर, कभी उस पर दौड़ते, शोर मचाने लगे, जमकर उछलकूद करने लगे. खौं-खौं, चीं-चीं से सारा आलम गूंजने लगा, इस शोर-शराबे में जंगल के और प्राणियों की भी चीख-पुकार शामिल होने लगी. गज़ब का शोर मच गया था, अफरा-तफरी मच गई. शेर को भी शायद कुछ फर्क पड़ा हो या नहीं पता नहीं, पर वह आराम से उस शावक के मांस को नौंचता-खाता रहा. हिरणी थोड़ा दूर खड़ी, बैचैनी से इधर-उधर होती, कभी संत को, उनके क्रियाकलापों को, कभी अपने शावक को खाये जाते देखती रही. आंसूं बहाती रही.”

“कुछ देर बाद शेर ने अपना नाश्ता कर एक दहाड़ लगाई और अपनी राह ली. आलम की चीख-पुकार भी शांत हुई और संत बंदर की कार्यवाहियां भी. वे थके-हारे से धीरे-धीरे हिरणी के पास पहुंचे और गंभीर आवाज़ में बोले, हे हिरणी, होनी को कौन टाल सकता है, सब उसी प्रभु की इच्छा है, वह जो भी करता है ठीक ही करता है, हमारे भले के लिए ही करता है. हमारे हाथ में जो कुछ था वह हमने किया, तुमने देखा ही कि हमने कितना कुछ किया, कितनी महनत की, अपनी जान के बाजी लगा दी. पर नियति के लेखे को भला कोई मिटा सकता है.”

“चारों और जय-जयकार होने लगी. संत चले गए. उसके साथी उसे बचा हुआ दिलासा देने लगे. कहने लगे कि देखो कुछ तो हुआ ना, कुछ तो किया ना. और हमारे हाथ में हैं भी क्या. हिरणी भी कितनी देर तक टेंसुएं बहाती, उसे भी कुछ देर में यह मान ही लेना था कि जैसे सभी ने कुछ किया, उसने भी कुछ तो किया ही था, बिना अपनी जान पर शामत आए जितना बन पड़ सकता था उसने भी कुछ किया ही था, लोगों ने भी, संत बंदर ने भी.” उन्होंने अपनी कहानी जैसे यह कहते हुए ख़त्म सी की.

हम हतप्रभ थे. एकदम किंकर्तव्यविमूढ़. इस कहानी ने हमारा जैसे खून ही जमा दिया था. पर हम अपने में लौटे, सिर और हाथ झटके और बोले, “उल्टेलाल जी आप कुछ भी कहो, पर कुछ तो किया ही गया था, कुछ तो किया ही जाना चाहिए, कुछ तो करना ही होगा ना.” और यह कहते हुए हम चुपचाप वहां से खिसक लिए. पुनः शांति स्थापित हो गई थी.

०००००

व्यंग्य – रवि कुमार

आओ लोकपाल लोकपाल खेलें

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आओ लोकपाल लोकपाल खेलें

 

आओ लोकपाल लोकपाल खेलें
आओ अनशन अनशन खेलें

हम बन जाएं सरकार तुम बन जाओ अन्ना
भ्रष्टाचार के दलदल में लोकपाल का गन्ना
मिल बैठ के बात करेंगे
एक-दूजे की नहीं सुनेंगे
हम गाएंगे संसद-संसद
तुम शोर से करना अनशन
खेल फिर खूब जमेगा, जनता का मन बहलेगा
आओ लोकपाल लोकपाल खेलें
आओ अनशन अनशन खेलें

हम अपना इक ड्राफ्ट बनाएं तुम अपना इक लाना
हम जब संसद में पहुंचाएं तुम सड़कों पर जाना
संसद  में  भाईचारा
सड़क पर देश का नारा
देश-भक्ति की गंगा होगी
भ्रष्ट-पापों से मुक्ति होगी
अनशन खूब जमेगा, जन आक्रोश निकलेगा
आओ लोकपाल लोकपाल खेलें
आओ अनशन अनशन खेलें

अन्ना बनेंगे दूसरे गांधी लिए गांधी का वाद
सत्ता की वैतरणी मिलकर खूब डाल रही खाद
बाहर भी आग लगी है
यहां भी संकट की घड़ी है
वैश्विक आका भी चाहें
गांधी जी ही राह दिखाएं
अहिंसा का रंग जमेगा, झुनझुना खूब बजेगा
आओ लोकपाल लोकपाल खेलें
आओ अनशन अनशन खेलें

जब रच जाए खेला पूरा मिलकर साथ निभाना
बातचीत की राह पे चलकर झुकना और झुकाना
मूल थोड़ा सा फिसले
बीच के रास्ते निकलें
हंसी-खुशी से रस्ते लेंगे
लोग चैन की सांसे लेंगे
जीत की खुशी मनेगी, हमारा तुम्हारा रंग जमेगा
आओ लोकपाल लोकपाल खेलें
आओ अनशन अनशन खेलें

भ्रष्ट तंत्र की भ्रष्ट डगर का आधार नहीं हिलेगा
जनता का मन हरने को हथियार नया मिलेगा
तंत्र फिर से रास रचेगा
लोक अपने सिर को धुनेगा
पूंजी का ही राज चलेगा
समाज फिर हाथ मलेगा
जिंदगी यूं ही चलेगी, राज-काज यूं ही चलेगा
आओ लोकपाल लोकपाल खेलें
आओ अनशन अनशन खेलें

सब फिर से जुट जाएंगे, भ्रष्ट तंत्र को थाम।
रघुपति राघव गाएंगे,  ले गांधी का  नाम।।

०००००

अ..अ..अनुलोम कर रहे थे, बस जरा सा व..वि..विलोम हो गया

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अ..अ..अनुलोम कर रहे थे, बस जरा सा व..वि..विलोम हो गया

कई दिनों तक उल्टेलाल जी नहीं दिखे, हमें उनकी चिंता हुई कि कहीं काली रात के हंगामे में उनके साथ कुछ ज़्यादा ही बुरा न गुजर गया हो. सलाह हमारी थी, तो हम एक उच्च आध्यात्मिक और सभ्य गिल्ट महसूस रहे थे. एक अलसुबह पता चला कि उल्टेलाल जी रात से ही जूते हाथ में लिये हमें खोज रहे हैं, तो एकबारगी तो हमारी भागने की इच्छा हुई, और उल्टेलाल जी के प्रकोप से बच सकने के लिए पत्नी को आदेश दे दिया कि जल्दी से अपना एक सफ़ेद सलवार सूट और बड़ी-सी सफ़ेद चुन्नी निकाल कर हमें दे दे. अब हालात ऐसे हो गये हैं कि मुंह छिपाए बगैर काम नहीं चलेगा, अभी तो निकल लें फिर देखेंगे.

हमारे संस्कार ऐसे ही तो सिखाते नहीं है कि होनी को कौन टाल सकता है, जिससे बचने की कोशिश कर रहे थे वही सच सामने आ गया, पोल एक दिन खुलनी थी खुल गई, होनी होकर रही. परंपरा भी यही सिखाती थी कि काठ की हांडी को सोच समझ कर ही काम में लेना चाहिए, न कि बार-बार चढ़ाना और चूल्हे पर सीधा रख देना चाहिए. फिर भी हमनें जोश और गलतफहमियों में यही किया और फंस गये, कहां उल्टेलाल जी को सलाह देदी. गये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास. चौबे जी चले थे छब्बे जी बनने, दुबे जी रह गये. कई मुहावरे और कहावतें हमारे छुटमगज़ में ऊपर-नीचे हो रही थीं. खिसक ही रहे थे कि घर के पिछवाड़े उल्टेलाल जी के हत्थे हम चढ़ ही गये, उन्होंने हमें रंगे हाथों, सलवार चुन्नी के पीछे भी पहचान ही लिया और हमारी गिरेबान पकड़ ली, ” क्यों भाईजी, कहां भागे जा रहे हो. हमें वहां भूखों फंसाए दिए, लाठियां भंजवा दी और ख़ुद चुपचाप खिसक लेना चाह रहे हो.”

हम मिमियाए, “न न नहीं…ब भ भा भाई जी, हम तो ऐसे ही अ..अ..अनुलोम कर रहे थे, बस जरा सा व..वि..विलोम हो गया. ब..ब..बस्स.” हमने अपना थूक गटका और बोले, “हमें पता चला कि आप हमें ढूंढ रहे है तो हमने सोचा कि ख़ुद जाकर आपसे मिल लें और पूछे कि मामला क्या है?” वह गुर्राए, “वाह जी, फिर ये भाभी जी के पीतांबर क्यों कर ड़ाले हुए हैं?” हमने बात पलटने की कोशिश की, “ये तो..व..व्वो क्या है कि…अ..आप बताईये, सुना उस रात कुछ हंगामा-संगामा सा हो गया था?”

वे हम पर चढ़ बैठे, “आप तो कहे थे कि कुच्छौ नहीं होने वाला है, आप भी जाकर चहरा चमका लीजिए, धन-धंधे में बरकत होगी…आप तो हमें फंसवा दिये यार! लट्ठ पड़े जो अलग, किरकिरी हुई जो अलग और सबसे ऊपर चहरा चमकने की बजाए उस पर कालिख पुत गई. बूहूहू…इच्छा हो रही है यही तुम्हारा एनकांउटर कर दें.” हमारे तो ड़र के मारे हाथ पैर कांपने लगे, बांई आंख कुछ ज़्यादा ही फड़कने लगी. हमने फिर से बात संभालने की कोशिश की, “पर आप समझने की कोशिश तो कीजिए, ऐसी भी कोई बात थोड़े ही बिगड़ी है…यह सब तो चलता रहता है..बल्कि कहें तो असल संघर्षों की राह तो यही है, जिसके खिलाफ़ आप आंदोलन करें और वह आपके लिए पलक-पांवड़े बिछाए…ऐसा तभी हो सकता है कि जबकि आपकी सीधी-असीधी मिलीभगत हो…अब लट्ठ पड़े हैं तो यह तय हो जाएगा कि आप वाकई सरकार के खिलाफ़ हैं और व्यवस्था परिवर्तन करके रहेंगे…ही..ही.”

उन्होंने हमें चमकाया, “लेकिन हमें सरकार के खिलाफ़ कहां जाना था, हमें तो सिर्फ़ चहरा चमकाना था और जीत दिखाकर निकल जाना था…धन-धंधे में बरकत करनी थी, जैसा कि आप बताए थे.” हम मिमियाए, ” देखिए उल्टेलाल जी, अब सब कुछ योजनानुसार थोड़े ही होता है, कुछ गड़बड-सड़बड़ भी हो जाती है कभी…वो क्या है कि अभी तक पुलिस को सेवा में, सुरक्षा में सलामी देते देखा था…ऐसा बर्बर दमन कहां देखे…उफ़ वाकई वह एक कयामत वाली रात थी…कितना जुल्म ढ़ाया गया…च्च..च्च.”

वे दहाड़ पड़े, “ये च्च..च्च करके हमें लल्लू मत समझिये जी, आप भले नहीं जानते हों पर हम बखूबी जानते हैं कि पुलिस क्या चीज़ है और पुलिसिया दमन क्या होता है. पूरे देश में जो आम आदमी का, मजदूरों का, भूमिहार किसानों का, आदिवासियों का, उनके विरोधों पर जो गज़ब का ड़ंड़ा चलाया जाता है, सरेआम गोलियां चलाई जाती हैं, उसको देखते हुए तो ऐसा लग रहा था कि जैसे कि शैतान बच्चे को हल्की सी ड़ांट पिलाई जा रही हो. बर्बर दमन…क्या खूब कही आपने.” हम उन्हें टोके, “परंतु उल्टेलाल जी दमन तो दमन ही है, भले लाख भटकाव हों, भले रहनुमा सिर्फ़ चहरा चमकाना चाह रहे हों, पर आम जनता जो इन विरोधों से जुड़ती है, वह तो वाकई उन नारों के नाम पर, उन मुद्दों के नाम पर, उन तकलीफ़ों और उनसे मुक्ति के नाम पर ही उनके पीछे होती है. इसलिए उनका दमन तो दमन ही है, आखिर वे शांतिपूर्ण सत्याग्रह ही तो कर रहे थे…इसे कैसे आप हल्के में ले सकते हैं?”

एकबारगी तो उल्टेलाल जी थोड़ा नरम से पड़े, फिर उल्टा पड़े, “यह भली कही आपने, वाह जी क्या खूब सत्याग्रह. सत्य की टांग तो पहले ही तोड के आये थे, पहले ही दिन सत्य की तो हवा निकाल दी गई, अब बचा केवल आग्रह का हठ, मौका मिल गया उसे खत्म करवाने का. झूंठ के दम पर कहीं सत्याग्रह चला करते हैं, भली कही आपने. और ऐसे सत्याग्रही कैसे जो जरा सी घुड़की मिलते ही अपने सत्य और आग्रह का परिधान वहीं छोड, श्वेतांबर पहन भाग निकले. अरे सत्याग्रही तो वह जो सत्य के लिए, दमनकारी के सामने सीना तान कर खड़ा हो जाए. का गाते रहे थे कुछ पुराने लोग वह कि…सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजुए क़ातिल में है…”

उन्होंने एक लंबी सांस ली और चालू रहे, “और यह भी आप भली कह रहे हैं कि आम जनता, आप तो अपनी रोटियां यहीं से सैकते रहते हैं तो बैठे बिठाए कुछ भी सोचा कीजिए. हम गये थे वहां हमें तो कहीं भी आम जनता नहीं नज़र नहीं आई वहां पर, कुछ मेहनत से कटे शरीर और दिमाग़ से बीमार लोग थे जो घर और काम से फ़ालतू हैं और अपना टाम-टीपरा समेटे हर शिविर में पहुंच जाते हैं किसी चमत्कार की उम्मीद में, अधिकतर योग और दवाईयों के व्यवसाय से जुड़े और सीधे फायदा उठा रहे लोग थे जिनकी आजीविका अब इनकी चैन से जुड गई है और जो देश भर में संगठनों से जुडे हैं, पदाधिकारी हैं, व्हीप के अनुसार व्यवस्था करना जिनका धर्म सा हो जाता है, बाकी कुछ हम जैसे भी लोग थे जो चहरा चमकाए के खातिर, आप जैसे नकारा लोगों के बहकाये में आकर वहां पहुंच गये थे. और भईया इन माता-बहनों के बारे में का कहें ये बेचारी पुरुष सत्ता की मारी हर धार्मिक से लगते जमावड़े में सहारा सी खोजती पहुंच जाती है.”

उनकी सांस फूलने लगी थी, पर बोलना जारी था, “बताईये अब यदि इन सब पर भी दमन हुआ तो…सरकार को फिलहाल छोडिए…राज्य और व्यवस्था तो उनसे टकराव लेने वाली हर शक्ति का दमन करेगी ही…उससे प्यार और संवेदनशीलता की आकांक्षा रखना तो बेमानी है…पर आप ही बताईये, किसकी जिम्मेदारी ज़्यादा बनती है. इन सब भोले लोगों को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए इकट्ठा किया जाता है, दिन भर उनके सामने सच नहीं लाया जाता है उन्हें धोखे में रखा जाता है, और जब पुलिसिया दमन शुरू होता है तो छुप जाया जाता है, बेसहारा छोड़ कर भाग जाया जाता है. क्या यह सरेआम धोखाधड़ी और चार सौ बीसी का मामला नहीं है.” वे कहते हुए कहीं गुम से हो लिए दिखते थे, हमने मौका ताड़ा और वहां से चुपचाप खिसक लिए. बाद में पता चला कि उल्टेलाल जी आजकल खूब उल्टा-सुल्टा बकने में लगे हुए हैं.

कुछ दिनों बाद फिर मिले, हम मिलते ही बोले, “क्यों उल्टेलाल जी, आप फालतू ही उल्टी-उल्टी बातें बनाते रहते हैं. देखिए अनशन जारी है, कुछ ना कुछ होकर ही रहेगा, पूरे देश में उबाल है. अरे वे योगी हैं योगी, योगी लोग बिना कुछ खाए-पिए सैकड़ो साल निकाल सकते हैं, सरकार को आखिर झुकना ही होगा.” वे फिर भड़क उठे, “आप चुप कीजिए जी, लगता है आप तो मरवाकर ही दम लेंगे. वैसे ही अनशन टूटने का कोई ज़रिया नहीं निकल रहा है और आप ये अफ़वाहे और फैलाईये कि योगियों का भला कुछ बिगड़ा है. अरे अन्न नहीं पहुंचता काया में तो ब्रह्म छूटने लगता है. लगता है आप टीवी-सीवी नहीं देखते हैं, या फिर प्रोफ़िट-सोफिट ही देखते रहते हैं. पांच-सात दिन में ही टैं बोल गया योग-सोग, अब ऐलोपैथी के डॉक्टरों के भरोसे हैं और इज्ज़त बचाने की कोई तरकीब नहीं निकल रही है. एक वो थी इरोम शर्मिला-वर्मिला…ऐसा ही कुछ, सुना था उसे जबरन खाना देना पड़ता था…एकदम नकारा, अरे डॉक्टर तो भगवान होते हैं, उन्हें तो सहयोग करना चाहिए…जैसे कि अभी किया जा रहा है.” उन्होंने अपनी आंख दबाई, हम सिहर से उठे.

वे बोलते रहे, “अब अनशन टूटना ही चाहिए भाई कैसे भी, कोई राह तो निकालनी ही होगी.  वे जिएं, भरपूर जिएं. सत्य को समझें, उसका दामन पकड़े फिर अपने आग्रह तय करें. तभी समुचित सत्याग्रहों या संघर्षों की राह पकड़ें. अन्न लें और औरों के अन्न की भी चिंता करें. भईया सच तो यही है कि अन्न ही ब्रह्म है, अन्न के बिना कुछ नहीं सूझता और अधिकतर लोगों के पास इसी की गारंटी नहीं है कि दोजून अन्न भी नसीब होगा कि नहीं. और फिर भी कुछ लोग इस अन्न की बात को छोड़कर पूरे देश को ब्रह्म में डूब जाने की राह पर ले जाना चाहते हैं…वाकई इस देश का तो भगवान ही मालिक है.” हमसे बोलते हुए नहीं बन रहा था, कहां बैठे-बिठाए फिर से उल्टेलाल जी के पल्ले पड़ गये थे. अब उन्हें कौन समझाए कि भई ये समझ का नहीं, आस्था से जुड़ा मामला बन जाता है, और तार्किक सोच के साथ इस पर बोल कर कौन आम खुशफहमियों के आगे बुरा बनने की जुर्रत करे. अपनी खुशनुमा चल रही ज़िंदगी और धन-धंधे में बरकत की संभावनाओं से कौन पंगा ले.

जिन्हें अन्न नसीब है, वे ब्रह्म की राह चलेंगे. और जिन्हें अन्न नसीब नहीं, वे अपनी अन्न की राह ख़ुद ढ़ूढ़ेंगे, ढ़ूढ़नी ही होगी लाख भटकावों के बावज़ूद. इसके सिवाय कोई विकल्प नहीं.

भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के विरोध में अनशन

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धन-धंधे में बरकत होती रहनी चाहिए

हमारे एक मित्र हैं, उल्टेलाल. खूब सोचविचार कर, जानबूझकर हमसे टकराए, और बोले कि वे कल अनशन पर रहेंगे. हम चौंक गये और पूछा, “क्या भई कल रामलीला में दिल्ली जा रहे हो?” वे ठंड़ी सांस लेकर बोले, “कहां भई, अपनी ऐसी ‘एसी’ वाली किस्मत कहां? जाने की तो बड़ी इच्छा थी, और चले ही जाते पर ससुरा मुद्दे हमारे खिलाफ़ हैं सो कैसे जा सकते हैं?”

बात हमारे छुटमगज़ में नहीं घुस पा रही थी सो हार मान कर पूछ ही बैठे कि भई बताओ तो मामला क्या है? दिल्ली नहीं जा रहे हो, पर अनशन करोगे, मतलब. मुद्दे आपके खिलाफ़ कैसे हैं?

वे यही इंतज़ार कर रहे थे, तुरंत हमारे छुटमगज़ पर चढ़ बैठे. पहले बोले, “भई हम कल अनशन करेंगे, एक घंटा समर्थन में और बाकी पूरा समय विरोध में.” हमारे चहरे की फ़क्क हालत देखते ही उनका जोश बढ़ गया, पहेलियां सी बूझते हुए बोले, “एक मांग हमें जंची अरे वही शिक्षा को मातृभाषा में दिये जाने वाली, वो का है कि हमारे गांवडैल बच्चों के दिमाग़ में ये ससुरी अंग्रेजी घुसती ही नहीं, ससुरे पास ही ना होते अगर ये ग्रेडिंग-स्रेड़िग शुरू करके सरकार सभी को पास नहीं कर रही होती. हमें ये ठीक लग रहा है इसलिए हम समर्थन में एक्को घंटा अनशन कर लेंगे, बाकी सारी मांगे हमें पच नहीं रहीं इसलिए हम इस आंदोलन के विरोध में बाकी समय अनशन करेंगे.”

हमने भी एक ठौ ठंड़ी सांस ली और पूछने की हिम्मत की, “उल्टेलाल जी, ऐसी कौनसी मांग है जो आपको नहीं पच रही, भई आपको तो हर मामले में उल्टा बोलने की आदत है. आप तो हमेशा विरोध पर ही उतारू रहते हैं” वे शायद ऐसी ही कुछ उम्मीद किये थे तुरत बोले, “भई, एक्को मांग पर समर्थन भी तो किये हैं.” हमने कहा, “उसे छोडिए, आप तो यह बताइए कि आपको तक़लीफ़ किस बात से है?”

उल्टेलाल सूतजी की तरह बोलने लगे, “हम भ्रष्टाचार वाले मुद्दे की बात कर रहे हैं भई, अब बताईये हज़ार-पांच सौ के नोटो को बंद करने की बात कर रहे हैं, और हमारे घर में अभी चलिए कम हैं, पर बीस-पचास नोट तो पड़े रहते ही हैं, ससुरी बड़ी चपत लग जाएगी, यार! ” हम अपना ज्ञान बघारे, “भई उल्टेलाल, ऐसा थोड़े ही है कि एकदम अचानक से बंद हो जाएंगे.” वे बोले, “अरे भई, इनका कोई भरोसा है? बंद कर दिये तो? और यह छोडिए, ससुरा हम जैसे छोटे लोगों की समस्या आप नहीं समझ रहे हैं. बड़े लोग तो नेट-वैट, चैक-शैक से काम चला लेते हैं, हम तो सारा धंधा कैश में करते हैं भाई, अब क्या पार्टियों से बोरियां भरकर सिक्के लिया दिया करेंगे? इसलिए हम तो इसके खिलाफ़ हैं भाई.”

हमें अपना पिड़ छुड़ाना जरूरी लग रहा था तो बात पलटी और पूछे, “बाकी?” वे बोलते रहे, “भ्रष्टाचार के बगैर हमारा काम कैसे चलेगा भाईजी, हमारा तो जीना ही मुश्किल हो जाएगा. आप समझ नहीं रहे हैं, अभी हमें अपनी लुगाई का ड्राइविंग लाईसेंस बनवाना है, बच्चों के मूल निवास बनवाने हैं, दो मकानों की साई दे दी है, दो की राजिस्ट्री बाकी है, एकाध खेत-सेत लेने की भी इच्छा थी, भई हमें भी यह गणित समझ आ गया है कि ससुरे सभी बड़े लोग किसान क्यों हो जाते हैं अचानक? कहते हुए उन्होंने अपनी एक आंख दबाई, हम अपनी गरदन ऐसे हिलाए कि जैसे हमें भी गणित समझ आ गई हो और वे बोलते रहे, “आधे से ज़्यादा धंधा तो हमारा लुगाई के नाम चलता है, वह भी कोई बिल-सिल, टैक्स-वैक्स के बगैर, हम तो बर्बाद हो जाएंगे भाई, भ्रष्टाचार के बगैर ये सब कैसे होगा? अब का भाटे फुड़वाने का विचार है? इसलिए हम तो भ्रष्टाचार के साथ हैं, इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के विरोध में हम अनशन पर बैठने वाले हैं.”

हम अभी अपने छूटमगज़ को खुजला भी नहीं पाये थे कि वे कान में फुसफुसाए, “और भाई जी, हम तो प्लान किये थे कि थोड़ा बहुत कमा-समा कर एक ठौ खाता स्विस बैंक में भी खुलवा लेंगे, और आराम की गुजर-बसर करेंगे. ससुरा हमारा प्लान तो चौपट हुआ जा रहा है. खु़द तो खूब कमाए-समाए के, अरबों के वारे-न्यारै कर लिये, और अब हम जैसे आम आदमी के पीछे पड़े है, अपना चहरा चमकाए के खातिर.”

हम चुप थे, चुप ही रहना चाहिए था पर बोल उठे, “भई उल्टेलाल, अपन सिविल सोसायटी के लोग हैं, अपने को कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है. यह देश जैसे चल रहा था, वैसे ही चलता रहेगा. भई ताकतवर तो अपन जैसे ही महान लोग हैं, आपका भी कोई कुछ नहीं उखाड़ सकता. दोचार दिन का हो-हल्ला है जैसा कि आप कहे चहरा चमकाए की खातिर, जैसे पहले शांत हो गया था इस बार भी शांत हो जाएगा. व्यवस्था वैसे ही चलती रहेगी. आप भी बहती गंगा में हाथ धोइये, अपना चहरा चमकाइये. यक़ीन मानिए, चमके चहरे से धन-धंधे में और बरकत ही होगी.”

उनकी आंखों में एक चमक उभरी, तभी उनका फोन घनघना उठा उन्होंने उसे उठाया और कहते हुए वहां से निकल लिये, “का? पतंजलि फार्मेसी अप जा रहा है, ऐसा कीजिए हज़ार शेअर हमारे खाते में भी ड़ाल दीजिए.” और उनकी हों-हों हंसने की आवाज़ हमारे कानों में गूंजने लगी.

हमें पता नहीं कि पतंजलि फार्मेसी का शेअर है भी कि नहीं और लिस्टेड भी है या नहीं. फिर सोचा क्या फर्क पड़ता है, नहीं है तो हो जाएगा. धन-धंधे में बरकत होती रहनी चाहिए.