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अर्थों के अनर्थ में – लवली गोस्वामी

सामान्य

अर्थों के अनर्थ में


cover_indiaree082015-hindi( अभी फेसबुक पर एक नोट के रूप में लवली गोस्वामी का यह सम्पादकीय पढ़ने को मिला, जो उन्होंने बहुभाषी वेबपत्रिका ‘इंडियारी’ के लिए लिखा है. इसमें उन्होंने ‘विकास’ और ‘सहिष्णुता’ शब्दों पर छोटी ही सही पर एक माक़ूल और सारगर्भित टिप्पणी की है. आवश्यकता महसूस हुई कि इसे यहां के पाठकों के लिए तथा नेट पर सामान्य रूप से उपलब्ध करवाना चाहिए. इसलिए उनकी अनुमति से यहां उस संपादकीय टिप्पणी की अविकल प्रस्तु्ति की जा रही है. )


 

आजकल चीजों की शुरूआत तो कर लेती हूँ, ख़त्म करने का कोई तरीक़ा नही सूझता। ऐसा लगता है समाज के साथ – साथ मन में भी लगातार फैलते और विलीन होते वलयों की एक सतत श्रृंखला नित्यप्रति आकर लेती रहती है जिसका सातत्य आपको उनकी परिधि और केंद्र दोनों के आकलन के लिए अयोग्य प्रमाणित कर दे, यह तो व्यक्तिगत बात हुई। वह व्यक्तिगत बात जो समाज से परावर्तन पाकर मन में घटित होती है,इसे यहीं छोड़ते हैं। तो जैसा कि हमारा समाज इन दिनों लगातार टूटते – बनते शक्ति, सत्ता, सहिष्णुता और धर्म के वलयों को आकार देता भयावह रूप ले रहा है वह आपकी इस निरीह विचारक के लिए भी कम चिंताजनक नही है। बात आगे बढ़ाने से पहले मैं आपसे कुछ शब्दों पर चर्चा करती हूँ।

पिछले एक साल से लगातार कुछ शब्दों ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। यह सम्पादकीय है और यहाँ लिखने की सीमाएँ होती है इसलिए मैं बस दो शब्द चर्चा के लिए चुनना चाहूँगी।

चित्र- रवि कुमार, रावतभाटाप्रथम तो “विकास”। मैं अपने समकालीन अमेरिकी रेडिकल पर्यावरण – चिंतक डेरिक जेनसन को स्मरण करना चाहूंगी। डेरिक ने आनलाईन पत्रिका “फेयर ऑब्ज़र्वर” में अपने लेख में कई रोचक टिप्पणियाँ लिखते हैं। वे लिखते हैं कि मनुष्य को विकास के मायने समझने की जरुरत है। डेरिक कहते हैं कि, “एक बालक का विकास एक वयस्क में होता है; इल्ली विकास करके तितली का रूप धारण करती है, परन्तु हरे – भरे घास का मैदान कभी विकसित होकर सीमेंट के दड़बेनुमा घरों में नही बदलता; समुद्रतट कभी विकसित होकर व्यवसायिक बंदरगाह में नही बदलता एक जंगल कभी सडकों और खाली ज़मीन के टुकड़ों में नही बदलता। डेरिक आगे कहते हैं कि यह सही तरीके से चीजों/संकल्पंनाओं को सम्बोधित नही किये जाने के परिणाम हैं और इसे ऐसे लिखा/कहा जाना चाहिए कि “समुद्रतट को बंदरगाह में “विकसित” करके वस्तुतः उसे नष्ट किया गया; जंगल को मानव (डेरिक से अलग मैं यहाँ “अल्पसंख्यक पूंजीपति वर्ग” शब्द का प्रयोग करना चाहूंगी) के उपयोग हेतु प्राकृतिक संसाधनों के निर्माण के लिए “नष्ट” किया गया। लेखक का कहना है कि विकास शब्द को मानव जाति पर गलत तरीके से थोप दिया गया है और मूलतः प्रकृति और प्रकारांतर से पृथ्वी और मनुष्य के विनाश को “विकास ” की संज्ञा से स्थानांतरित (रिप्लेस) करके अधिसंख्यक जनता को दिग्भ्रमित किया जा रहा है। मैं इस मुद्दे पर डेरिक से सहमत हूँ।

यहाँ कुछ और बातें जोड़ी जा सकती है यथा साऊथ अमेरिका में सांस्थानिक पशु पालन (cattle ranching) का कार्य अधिकतर यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ अमेरिका-मूल के पशु-व्यापारी करते हैं। ब्राज़ील से निर्यातित लकड़ी के लिए मुख्य बाजार फिर से यू एस ही है। मैं भारत में नकदी फसल (कैश क्रॉप्स) के कारण आई आत्महत्याओं की बात और अफ़्रीकी खानों से बहुराष्ट्रीय पूंजीपतियों/कंपनियों द्वारा निकाले जाने वाले कोबाल्ट, कॉपर, कोल्टन, प्लेटेमियम डायमंड आदि के कारण वहां हो रही तबाही को अगर ज़रा देर के लिए छोड़ भी दूँ तो अमेज़न के इन व्यवसायों की वजह से “धरती का फेफड़ा” कही जाने वाली अमेज़न घाटी लगातार नष्ट हो रही है। मई २०१४ की बात है अमेज़न घाटी में पर्यावरण संरक्षक कार्यकर्त्ता सिस्टर डौर्थी स्टॅन्ग (Sister Dorothy Stang) की सस्टेनेबल डेवलपमेंट से जुड़ा होने के बाद भी इस कारण हत्या कर दी गई कि वे सांस्थानिक पशुचारण एवं पशुपालन का विरोध कर रही थी।

यहाँ आप भारत के जंगलों के लिए लगातार लड़ रहे और उग्रवादी का तमगा टांक कर मार दिए जाने वाले आदिवासियों को भी स्मरण कर लें तो शायद “विकास” की तथाकथित अवधारणा को समझने में आपको और आसानी होगी जो कभी सस्टेनेबल (sustainable ) नही होता। खैर, इसका असर पर्यावरण पर पड़ेगा और हम जल्द ही प्राकृतिक विपदाओं के भयानक चक्र में फंसकर “विकास’गति ” को प्राप्त होंगे। यह होना ही है क्योंकि हम जैसे “विकासशील” मूर्खों को पहाड़, जंगल और नदी की जगह कंक्रीट के शमशान, परमाणु और मानवीय मलबा, प्लास्टिक के ढेर और ज़हरीली वायु से अधिक लगाव है। तो विकास को मैं यही छोड़ती हूँ। इस महान ध्येय और आधुनिक मनुष्य के उत्थान हेतु अतीव आवश्यक (कदाचित अपरिहार्य) ज़रूरत की व्याख्या आपकी इस तुच्छ विचारक के बस का रोग नही नही है। इसपर फैसला आपको ही करना है, संगठित होकर आदिवासियों और पर्यावरणविदों का साथ दें या आने वाली पीढ़ियों को बीमारों और लाचारों जैसा जीवन। जबकि इतना सब कह ही रही हूँ इतना और कह दूँ कि मेरा तात्पर्य “अर्थ आवर” मनाने और नहाते वक़्त पानी कम खर्च करने के महान उपक्रम के बाद अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेने वाली संतुष्टि से कतई नही है आपको लड़ना अंततः पूंजीवाद से ही है।

sprk3फिर एक दूसरा बहुप्रचलित शब्द स्मृत होता है। वर्तमान समय में हम सबका प्यारा शब्द जिसने देश के राजनैतिक-सामाजिक वातावरण को चाइनीज़ रसोइये के द्वारा फ्राईंग पैन में छौंक लगाने हेतु हिलाये गए शिमला मिर्च और प्याज के टुकड़ों की तरह हिला रखा है, जी, आपने ठीक समझा वह शब्द है “सहिष्णुता”। यह शब्द मेरे होंठों पर आजकल अजीब सी मुस्कुराहट का कारण बना हुआ है। इसके लिए आप मेरे प्रति पर्याप्त असहिष्णु हो ही सकते हैं, 🙂 खैर यह तो हास्य था। मैं मुद्दे पर आती हूँ।

इन दिनों मैं अपने एक प्रोजेक्ट पर कार्य कर रही थी। उसी क्रम में कई ग्रंथों से फिर से, कुछ से पहली बार गुजरना हुआ। मैं जब नाट्यशास्त्र पढ़ रही थी भरत मुनि की एक रोचक टिप्पणी मुझे दिखाई दी और मैंने सोचा मुझे यह आपसे जरूर शेअर करनी चाहिए। नाट्य शास्त्र के २७वें अध्याय में दर्शक की योग्यता का बखान है। जिसमे भरतमुनि लिखते है जो मनुष्य इतना संवेदनशील हो कि शोक के दृश्य को देखकर शोक का अनुभव कर सके, आनंदजनक दृश्य देखकर उल्लसित हो सके एवं दैन्यभाव के प्रदर्शन के समय दीनत्व का अनुभव कर सके केवल वही नाटक का योग्य श्रोता है। नाटक के श्रोता को भाषा, संस्कृति-विधान, शब्द शास्त्र, छंदशास्त्र, कला, शिल्प एवं रसों का ज्ञाता होना चाहये, तभी वह नाटक का योग्य दर्शक/श्रोता है। भारत मुनि लिखते हैं कि हम समझ ही सकते हैं कम आयु वाला मनुष्य श्रृंगार और अधिक वयस्क प्राणी पौराणिक अथवा धार्मिक प्रहसन पसंद करेगा परन्तु हम दर्शक से इतनी सहृदयता कि आशा करते हैं कि अगर वह रस का ज्ञाता है तब खुद को प्रहसन के अनुकूल बना सकेगा।

n5यह रोचक टिप्पणी है। न सिर्फ नाटक, साहित्य एवं अन्य कलाओं के सन्दर्भ में ही इस संस्कार का पालन होना चाहिए। परन्तु हम देखते हैं कि आधुनिक भारत में यह संस्कृति लुप्तप्राय है। यह वस्तुतः मनुष्य की संवेदनशीलता पर, उसकी ग्रहण करने की योग्यता पर, उसके निरंतर परिष्करण पर और इन सबसे बढ़कर “ग्रहण करने की सहिष्णुता” पर रोचक टिप्पणी है। ग्रहण करना अभ्यास का विषय होता है। कोई विद्वान, विचारक, लेखक, कलाकार, वैज्ञानिक अथवा कोई अन्य सहृदय मनुष्य अगर आपसे शालीन असहमति के साथ कोई बात कह रहा है तो मानव को चाहिए कि तुरंत बात काट कर, आक्रामक शब्दावली के प्रयोग से अथवा अपशब्द के पत्थर उठा कर सामने वाले का सर फोड़ देने के प्रतिक्रियावादी व्यवहार से बचे, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है यह संस्कृति ही गांधी के देश में विलुप्त हो गई है।

क्या कहूँ कि शब्द नही मिलते हर तरफ अजीब सी ज़हालत का माहौल है। उग्रवादी हिन्दू समूह ज़रा-ज़रा सी बात पर हत्या एवं बलात्कार करने की धमकी दे रहे हैं और बहुसंख्यक जनता को अगले तीनेक साल इंतज़ार करना है कि चुनाव आये और वे इसका जवाब दे सकें। सबसे बड़ी बात क्या पता जनता की अल्पकालीन स्मृति में यह भयानक समय रहेगा भी या अंतिम साल में किये गए लोक-लुभावन फ़ैसले फिर से एक बार यही माहौल झेलने के लिए हमें बाध्य कर देंगे। यह सब तो भविष्य के गर्भ में हैं पर मुझे कहने में संदेह नही कि पिछले ही सम्पादकीय में मैंने जब पाकिस्तानी भीड़ का उदाहरण देते हुए यह कहा था कि आने वाले समय में इस बौखलाई भीड़ का सामना हमें भी करना पड़ेगा तब मैं सिर्फ आशंका प्रकट कर रही थी, जो महज महीने भर में सही साबित हुई। भय होता है कि मेरे अन्य डर भी हक़ीक़त न बन जाएँ। खैर, फ़िलहाल विदा लेती हूँ, एक सहिष्णु भविष्य की प्रतीक्षा के साथ।

० लवली गोस्वामी


12359882_10207953335140126_2807706114200277009_nलवली गोस्वामी

दर्शन और मनोविज्ञान की गहन अध्येता. ब्लॉग तथा पत्र-पत्रिकाओं में गंभीर लेखन. दखल प्रकाशन से एक पुस्तक ‘प्राचीन भारत में मातृसत्ता और यौनिकता’ प्रकाशित. वाम राजनीति में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता. इन दिनों बैंगलोर में.


जो सार्थक है, वही सकारात्मक है

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जो सार्थक है, वही सकारात्मक है


rajesh-joshi_1443996109अग्रज कवि राजेश जोशी का यह आलेख दैनिक भास्कर के गत ५ अक्टूबर के अंक में पढ़ने को मिला. सहज तरीके से कई महत्त्वपूर्ण बातें करते इस आलेख को यहां सहेजने और अपने मित्रों के बीच साझा करने की आवश्यकता महसूस हुई. दैनिक भास्कर को आभार सहित यह आलेख यहां प्रस्तुत है.


 

deepमिस्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कथाकार नजीब महफूज़ की एक बहुत छोटी-सी कहानी है – प्रार्थना । इस कहानी का अनुवाद हिंदी के चर्चित कथाकार जितेंद्र भाटिया ने किया है:

‘मेरी उम्र सात से भी कम रही होगी जब मैंने क्रांति के लिए प्रार्थना की। उस सुबह भी मैं रोज़ की तरह दाई की उंगली पकड़कर प्राथमिक शाला की ओर जा रहा था, लेकिन मेरे पैर इस तरह घिसट रहे थे जैसे कोई जबर्दस्ती मुझे कैदखाने की ओर खींचे लिए चल रहा हो। मेरे हाथ में काॅपी, आंखों में उदासी और दिल में सब कुछ चकनाचुर कर डालने की अराजक मनःस्थिति थी। निकर के नीचे नंगी टांगों पर हवा बर्छियों की तरह चुभ रही थी। स्कूल पहुंचने पर बाहर का फाटक बंद मिला। दरबान ने गंभीर शिकायती लहज़े में बताया कि प्रदर्शनकारियों के धरने की वजह से कक्षाएं आज भी रद्‌द रहेंगी। खुशी की एक ज़बर्दस्त लहर ने मुझे बाहर से भीतर तक सराबोर कर दिया। अपने दिल की सबसे अंदरूनी तह से मैंने इंकिलाब के ज़िंदाबाद होने की दुआ मांगी।’

यह मजेदार छोटी-सी कहानी सकारात्मकता और नकारात्मकता के अर्थ को उलझाती हुई लग सकती है, लेकिन वास्तविकता यही है कि अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग व्यक्तियों के लिए इन पदों के अर्थ बदल जाते हैं। जैसे स्कूल जाने के प्रति अनइच्छुक बच्चे के लिए स्कूल और क्रांति जैसे पद की सकारात्मकता बदल गई है। वह क्रांति के ज़िंदाबाद होने की कामना इसलिए करता है कि उसके कारण उसे स्कूल से छुट्‌टी मिल गई है । ऐसी स्थितियां आ सकती हैं जब आपको दो सकारात्मक स्थितियों या विचारों के बीच अपने लिए चुनना हो।

चरखे या स्वदेशी आंदोलन में विदेशी कपड़ों और सामान की होली जलाने को लेकर महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच हुई असहमति और वाद-विवाद को याद किया जा सकता है। (टैगोर इसे पश्चिम से दिल और दिमाग के स्तर पर अलगाव तथा आध्यात्मिक आत्मघात मानते थे। चरखे से बुनाई पर उन्होंने कहा कि जो लोग दूसरे काम के योग्य हैं, उनके द्वारा चरखे पर सूत कातने से क्या भला होगा।) इसमें रवींद्रनाथ का पक्ष सकारात्मक लग सकता है और गांधीजी की कार्रवाई नकारात्मक। तर्क के स्तर पर चाहे रवींद्रनाथ गलत नहीं थे, लेकिन बाद के इतिहास ने गांधीजी के आंदोलन को ज्यादा सही सिद्ध किया। सही से ज्यादा देश के लिए सार्थक भी।

महाभारत में यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुए संवाद में यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया कि दुनिया में सबसे मूल्यवान क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- समय। वस्तुतः समय ही किसी भी स्थिति घटना या विचार की सकारात्मकता और नकारात्मकता को तय करता है। कहा जा सकता है कि सकारात्मकता एक सापेक्ष अवधारणा है। वह दिक और काल के संदर्भ में ही व्याख्यायित होगा। यानी समय, परिस्थिति और स्थान के सदर्भ से काटकर अगर उसे देखेंगे तो वह एक लुजलुजा-सा पद बनकर रहा जाएगा।

उत्तर आधुनिकता के एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण चिंतक जाॅक देरिदा के कथन को इस प्रसंग के साथ ही जोड़कर देखें तो शायद नकारात्मकता तथा सकारात्मकता और समय के संबंध को समझने में ज्यादा सही दृष्टि मिल सकती है। जाॅक देरिदा का मानना है कि चरम निराशा की अवस्था में भी किसी उम्मीद की आकांक्षा समय के साथ हमारे रिश्ते का एक अभिन्न अंग है। नाउम्मीदी, इसलिए है, क्योंकि हमें उम्मीद है कि कुछ अच्छा और सुंदर घटित होगा। मुझे लगता है कि सकारात्मकता से ज्यादा सार्थकता पर बल दिया जाना चाहिए। हमारे समय में, जो कुछ भी हाशिये पर धकेल दिए गए मनुष्य के पक्ष में है, वही सार्थक है और वहीं सही अर्थ में सकारात्मक है

सकारात्मकता एक लचीला पद है। इसकी व्याख्या हर व्यक्ति अपने ढंग से करता है, कर सकता है। कहा जा सकता है कि नकारात्मकता भी ऐसा ही पद है। सत्ताएं या ताकत की संरचनाएं दोनों ही पदों का अपने हित में हमेशा से ही मनमाना उपयोग करती रही हैं। ताकत के केंद्र चाहे राजनीतिक हों, सामाजिक या धार्मिक। यह सिलसिला एक स्तर पर घर से ही शुरू हो जाता है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि बच्चा जब पहली बार ‘नहीं कहना सीखता है तभी उसके दिमाग का विकास शुरू होता है । कहा जा सकता है कि ‘नहीं’ तो एक नकारात्मक शब्द है, लेकिन यही मस्तिष्क के विकास की सकारात्मक प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। एक व्यक्ति के लिए, जो सकारात्मक है वह दूसरे के लिए नकारात्मक हो सकता है और इसी तरह नकारात्मक कभी-कभी बहुत सकारात्मक हो सकता है बल्कि होता ही है।

इतिहास में इसके बहुत उज्ज्वल उदाहरण मिल जाएंगे। स्वाधीनता संग्राम में भगत सिंह द्वारा संसद में बम फेका जाना ही नहीं महात्मा गांधी का करो या मरो जैसा आंदोलन भी अपने ध्वन्यार्थ में नकारात्मक है, लेकिन इतिहास इन दोनों ही घटनाओं की व्याख्या सकारात्मक रूप से ही करेगा। इसलिए कई बार लगता है कि सकारात्मकता और नकारात्मकता वस्तुतः ताकत के खेल के रूप में अपना अर्थ ग्रहण करते हैं। यह पद एक ऐसा औजार है, जिससे सत्ता हर घटना की व्याख्या को अपने पक्ष में मोड़ लेने की कोशिश करती है। समाज का वर्गीय ढांचा अपने आप में अन्याय पर आधारित संरचना है। वह मनुष्य और मनुष्य के बीच फर्क करती है।

पुरुष-सत्तात्मक समाज अन्याय पर आधारित संरचना है। वह स्त्री और पुरूष के बीच भेद करता है। उनके अधिकारों के बारे में भेद करता है। समान अधिकार का दावा करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी क्या सबको समान अधिकार मिल पाते हैं? आरक्षण के बावजूद हम पाते हैं कि कई स्तर पर दलितों के साथ समाज में हर पल अन्याय की घटनाएं होती ही रहती हैं। इन स्थितियों के विरूद्ध समाज में लगातार संघर्ष जारी रहता है। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में स्त्री विमर्श या दलित विमर्श ने विचार-विमर्श में केंद्रीयता हासिल कर ली। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में ही तर्क दिए जा सकते हैं। दिए जाते रहे हैं।

तो सवाल उठता है कि नकारात्मकता है क्या? स्त्रियों, बच्चों और समाज के कमजोर तबके के लोगों पर होने वाला अन्याय, अत्याचार नकारात्मक है या उसके विरूद्ध असहमति में उठा हाथ, विरोध में लिखा या बोला गया शब्द नकारात्मक है? वस्तुतः नकारात्मक जीवन स्थितियों के विरूद्ध खड़ी नकारात्मक कार्रवाई एक वास्तविक सकारात्मकता है


० राजेश जोशी
साहित्य अकादमी अवॉर्ड व शिखर सम्मान से पुरस्कृत हिंदी कवि और लेखक

चित्रकार के प्रेम की अकथ कथा – लवली गोस्वामी

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चित्रकार के प्रेम की अकथ कथा


raja ravi verma - self potrait( अभी फेसबुक पर एक नोट के रूप में लवली गोस्वामी का राजा रवि वर्मा और उनके काम की पड़ताल करता यह महत्त्वपूर्ण आलेख पढ़ने को मिला. आवश्यकता महसूस हुई कि इसे नेट पर सामान्य रूप से उपलब्ध करना चाहिए. इसलिए उनकी अनुमति से यहां उस आलेख की अविकल प्रस्तु्ति की जा रही है. )


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किसी ऐसे चरित्र पर लिखना वाकई मुश्किल होता है जो आपको कहीं प्रभावित करता हो। मनोगतता, भावना अक्सर वस्तुगतता पर भारी पड़ती है और आप निरपेक्ष मूल्यांकन से चूक जाते हैं, इसी एक समस्या के कारन मैं राजा रवि वर्मा पर लिखने से हमेशा बचती रही हूँ । अधिक समय नही बीता है जब किसी फिल्म की वजह से राजा रवि वर्मा का नाम भारत की आम जनता तक पहुंचा, यहाँ मुझे कहना होगा कि हम भारतीय अपनी बौद्धिक सम्पदा को पहचानने और उसे सम्मान देने के मामले में बहुत कृपण हैं, जिस चित्रकार ने पुराणो से ईश्वर को घर के कैलेंडरों तक पहुँचाया वह साधारण भारतीय के लिए लगभग गुमनाम ही रहा. यह कुछ उस तरह की घटना है कि भारत के अधिकतर लोग चर्चित कविताओं की पंक्तियों का उपयोग तो अपनी रोजाना की बातचीत में कर जाते हैं परन्तु यह नही जानते कि उस कवि का नाम क्या है। इस प्रसंग को यहीं छोड़ते हैं. हम रंजीत देसाई के मूलतः मराठी में लिखे एवं विक्रांत पाण्डेय द्वारा अंग्रेजी में अनूदित राजा रवि वर्मा की कहानी के आधार पर कला और प्रेम के कुछ रोचक दृश्य सामाजिकता और मिथकीय चेतना के आलोक में देखते हैं, जिससे इस महान (मुझे मेरे प्रगतिशील दोस्त क्षमा करें, यह दार्शनिक समीक्षा नही है 🙂 ) चित्रकार के जीवन में प्रेम और कला के समेकित प्रभाव को समझ पाएं।

a7966f8aebc37481c1df60f911bad23bजब आप कला की बात करते हैं तो वह आपके मंतव्य को सबसे सुन्दर रूप में जनता तक ले जाने का माध्यम होती है। कला मानव की वह खोज है जिसने निरंतर अपने हर पुराने फार्म का अतिक्रमण किया है और नए रूपों में नए सलीके से फिर से मनुष्यों के मध्य लौटी है। रवि वर्मा ने चित्रकारिता को ही अपना माध्यम क्यों चुना यह बताते हुए रंजीत देसाई के रवि वर्मा  भी कला के एक नए रूप का अभिर्भाव कर रहे होते हैं। मंदिरों में पाषाण – शिल्प के सुन्दर, कलात्मक और भव्य रूप देखकर भी रवि वर्मा को उनमे एक कमी महसूस होती है। कमी यह की पत्थर से बनी प्रतिमाएँ मुद्रा तो दिखा रही हैं परन्तु भावनाएं नही। खजुराहो में श्रृंगार तो है कामना नही उत्तेजना नही. एक सजग मनुष्य के लिए चहरे पर उभरती रेखाएं और मांशपेशियों के गणित का प्रभाव आज से दो सौ साल पहले मायने रखता था यही बात उसे रवि वर्मा बनाती है।  मुझे अक्सर लगता है कि सभ्यता की अपनी गति होते हुए भी वह उसी मनुष्य को किसी परिधटना के लिए चुनती है जो उस वक़्त में सबसे श्रेष्ठ प्रतिभा का होता है , सबसे संवेदनशील होता है और साथ ही साथ निडर भी।  रवि  वर्मा में यह सब था।  एक अनुशासित युवा जिसने कला के लगभग हर रूप का विधिवत अध्ययन किया फिर वह नृत्य हो , संगीत हो , संस्कृत साहित्य हो या चित्रकला। वह युवक जो स्वपनदर्शी था, महत्वकांक्षी और आदर्शवादी भी। उसने महसूस किया कि मंदिरों की पाषाण मूर्तियों में नज़र को बांध लेने वाली भव्यता तो है पर मन को संवेदना से भर देने वाली बारीक़ी नही , मूर्तिओं में भय, करुणा , उपेक्षा , अपमान , कामना , प्रेम , वातसल्य , मान , विरह और दर्प का चित्रण नही है। जनता के जीवन की दशा उस वक़्त कला के लिए आलोचना की कसौटी नही थी , विषय पौराणिक ही हो सकते थे और हुए. यह भी कालचक्र की गति ही है।भावों के बारे में चित्रकार का मत कई जगह स्पष्ट है वह उर्वशी पुरुरवा के चित्र बनाते कठिनाई महसूस करता है क्योंकि उसे रात्रि के प्रणय क्षणों के चिन्ह और विरह का दुःख एक साथ चित्रित करना है। भावों की यह छटा रवि के चित्रों में  कई जगह दिखती है। जब वे शकुंतला के जन्म को चित्रित करते हैं तब विश्वामित्र के चहरे की उपेक्षा और मेनका के मुख पर दुःख के चिन्ह स्पष्ट है। सत्यवती और शांतनु के चित्र में सत्यवती के मुख का मान स्पष्ट है। द्रौपदी का भय अपमान स्पष्ट है।

Raja_Ravi_Varma_-_Mahabharata_-_Birth_of_Shakuntalaतो यह युवा चित्रकार जैसा की होता आया है सबसे पहले प्रेम से प्रभावित होता है। विवाह के बाद प्रथम रात्रि में काव्यों के दृश्यों की कल्पना करते रवि वर्मा के मन को ठेस पहुचंती है जब उसकी नवविवाहिता पारम्परिक पत्नी दीपक बुझा कर अभिसार के लिए प्रवृत होती है. यह अस्वीकरण साधारण है परन्तु साधारण नही भी है। परम्परा एक बाध्यता की तरह होती है वह मानव मन  विकास को भी अवरुद्ध भी करती है। रवि वर्मा की पत्नी चित्रकला को निकृष्ट कार्य समझती है एवं कला उसके लिए एक व्यर्थ वस्तु (अवधारणा )है।निराश रवि वर्मा अपने चित्र की प्रथम नायिका के रूप के घरेलू सहायिका को चुनते हैं और इससे “नायर स्त्री ” के प्रसिद्द चित्र के साथ उनकी चित्रकला की यात्रा का आरंभ होता है।

प्रेम निश्चय ही जैविक कारणों से, मनुष्य के अंदर संचारित होती सबसे सुन्दर और पुरातन भावना है। इसके सम्प्रेषण हेतु मानवीय प्रज्ञा अलग – अलग समय में अलग अलग माध्यमों का उपयोग करती रही है. मानव सभ्यता के विकास के साथ नित्य जटिलतम होती जाती मानवीय चेतना प्रेम और कला के मध्य निरंतर एक सामंजस्य सा ढूंढती रही है। अगर प्रेम सन्देश है तो दुनिया की हर कला उसका माध्यम भर है। महज एक मानवीय भाव होते हुए भी यह जगत की उत्पति और प्रकारांतर से विनाश के कारणों का मूल भी है। संसार में यूँ तो जीवधारियों के मध्य कई तरह के सम्बन्ध हो सकते हैं पर जैविकता से आबद्ध होने वाले दो ही सम्बन्ध होते हैं एक तो संतान का उसके  माता – पिता से दूसरा पुरुष का स्त्री से यौन सम्बन्ध जो पहले तरह के सम्बन्ध का कारन भी है।  यही प्रेम स्त्री के लिए परिवार संस्था के निर्माण के बाद बहुत जटिल रूप ले लेता है। रवि के समाज की स्त्री भी भय, कामना , दर्प और रुमान के भावों को एक साथ महसूस कर रही होती है। अहम के टकराने के परिणाम स्वरुप रवि वर्मा पत्नी का आवास छोड़कर अपने घर वापस लौट आते हैं। यहाँ यह बताया जाना आवश्यक है कि उनके समाज में मातृसत्तात्मक चलन है जिसमे पुरुष को विवाह के बाद पत्नी के आवास में रहना होता है।  अहम का यह संघर्ष तब तक जारी रहता है जब तक रवि की पत्नी की मृत्यु नही हो जाती।

Raja_Ravi_Varma_-_Mahabharata_-_NalaDamayantiरवि चित्रकला में ख्याति प्राप्त करने  के अपने उद्देश्यों की पूर्ती के लिए मुंबई आते हैं। यहाँ उनके जीवन में कथा – नायिका सुगंधा का प्रवेश होता है. सुगंधाबाई का चरित्र एक दुःसाहसी स्त्री का चरित्र है। प्रेम में पड़ी स्त्री का मूर्खता की हद तक दुःसाहसी होना एक कुंठाग्रस्त और पारम्परिक समाज में कोई आश्चर्जनक बात नही है।  वर्जनाओं से ग्रस्त रूढ़िवादी मन प्रेम में उपलब्ध निर्बाध उड़ान का आनंद लेना चाहता है और सुगंधा धीरे – धीरे रवि वर्मा के क़रीब आती चली जाती है। समाज जहाँ पुरुष को उसकी अपेक्षित साथिन चुनने के कुछ अवसर उपलब्ध कराता हैं वहीँ स्त्री को वस्तु की तरह किसी पुरुष से बांध दिया जाता है  तो सुगंधा जब रवि के प्रेम में पड़ती है तब यह कहना कहीं से अतिश्योक्ति नही कि यह स्त्री के मन का समाज की इस व्यवस्था से प्रतिशोध है।  प्रेम यहाँ केवल एक निष्कलुष सी भावना बनकर सामने नही आता इसके पीछे सदियों से प्रताड़ित हुई स्त्री की पीड़ा के अवसान की कोशिश है , भले ही कि यह प्रतीकात्मक हो ..क्षणिक हो।

यह प्रेम किसी की कामना का पात्र होने की अदम्य इच्छा भी है। खुद को पौराणिक आख्यानो के लिए चित्रकार के समक्ष निर्वसन करती सुगंधा में जहाँ प्रेमिका का रोमांच है वहीँ प्रकृतिजनित पूर्णता की अभिलाषा भी है। वहीँ रवि वर्मा यह चाहते हैं कि सुगंधा अपने भावों से मुक्त होकर चित्रित किये जाने वाले चरित्र के भावों का अंगीकार कर ले इसलिए वे सुगंधा को दो दिन सिर्फ नग्न अपने समक्ष अन्य साधारण कार्य करने को कहते हैं पर उसका चित्र बनाना नही आरम्भ करते।  तीसरे दिन सुगंधा क्रोध में रवि से पूछती है कि क्या यही सब काम करवाने के लिए मुझे निर्वसन तुम्हारे समक्ष आने का आदेश दिया था ? इसी क्षण चित्रकार को सुगंधा में नग्न उर्वशी का साहस और उन्मुक्तता दिखाई देती है और वह उसके चित्र बनाने को प्रवृत होता है। चित्रकार का तर्क है कि अब सुगंधा अपने “स्व ” से मुक्त है। यह तर्क भ्रामक है और सुगंधा अपने स्व के किंचित भी मुक्त नही है , सिर्फ उसके भाव कुछ समय के लिए परोक्ष हुए हैं.यह कैसे सम्भव था कि किसी को अपने भावों का आधार माने बिना एक स्त्री उसके समक्ष कामना , सुख , विरह आदि के भावों का प्रदर्शन कर पाती। एक अत्यंत साधारण भावुक स्त्री बिना प्रेम के किसी के समक्ष निर्वसन चित्रण के लिए तैयार हो पाती। चित्रकार असम्पृक्त है और असम्पृक्त स्त्री सम्पृक्ता में बदलती जाती है। फिर वही होता है जो अपेक्षित है , चित्रकार के उद्देश्य के साथ उसकी असम्पृक्तता भी खत्म हो जाती है और वह आकंठ प्रेम में डूबी सुगंधा की ओर  आकर्षित होता जाता है. वह कभी उसमे माता कभी प्रेयसी को देखता है। कलाकार के लिए भावों का निर्माण और उनमें परिवर्तन बहुत हद तक अभ्यास परक घटना है परन्तु नायिका के लिए यह न अभ्यास में है न सायास निर्मित किया गया है।

raja_ravivarma_painting_9_jatayu_vadhaजैसे प्रेम की नियति में उसकी तीव्रता है ..वैसे उसका मध्यम होना है ,जैसे घनिष्ठता है …वैसे सरल होना है ,जैसे आकर्षण हैं.. वैसे एक दिन विकर्षण तय है। जहाँ प्रेम में आकंठ डूबी सुगंधा अभिसार के बाद खुद को दर्पण में देखती समर्पिता होती जाती है , रवि के लिए यह सिर्फ मानव होने का सौंदर्य भर होता है। दूसरे दिन सुगंधा लौटती है और रवि वर्मा सामान बांधकर अपने घर केरल लौटने को तैयार हो रहे होते हैं। सुगंधा जो अधिकार से रवि को रोकने की स्थिति में है न सवाल पूछने का अधिकार रखती है रवि को बिना कुछ कहे जाने देती है।  रवि लौट कर आने का वायदा करके चले जाते हैं। प्रेम एक भ्रामक अवधारणा है , भ्रामक इसलिए कि यह परम्परा से अपनी जड़ें पाता है इसलिए संसार के हर दूसरे मनुष्य के लिए यह अलग होता है. सुगंधा के लिए भी प्रेम की अलग परिभाषा है और रवि के लिए अलग। उन्माद के क्षणों मे इन परिभाषाओं का आभास किसे होता है ? या ज्यादा सही तरीके से सवाल को रखें तो करना कौन चाहता है ?  भाव भी अंततः मनुष्य के अंतस के लिए भोजन की तरह हैं , खासकर तब जब वह किसी रचनात्मक कार्य से जुड़ा हो , यह चित्रकार के लिए शब्दसः सत्य था परन्तु सुगंधा के लिए प्रेम के अलावा जीवन का कोई अन्य उदेश्य नही था। बस यही बात उसमे धीरे – धीरे आत्महंता प्रवृति पैदा कर देती है।

4.-raja_ravivarma_painting_fresh_from_bath2वहीँ रवि के लौटने पर उनकी पत्नी उनका स्वागत ही करती है, रवि उसे  अपने साथ अपने पितृ आवास पर  जाकर रहने को  कहते हैं जिसे वह अपनी परम्पराओं के विरुद्ध बताकर अस्वीकार कर देती है।  यह देखने लायक विरोधाभाष है कि रवि यहाँ पत्नी को परम्पराओं को तोड़ने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं परन्तु खुद वे समुद्र पार न करने की पुरातन भारतीय परम्परा को मानने की वजह से यूरोपीय देशों में जाकर चित्रकला की  नयी तकनीकों को सीखने से इंकार कर देते हैं।  सुगंधा के चित्रों में भावों के इन्द्रधनुष देखकर पुरू (रवि की पत्नी ) यह समझ जाती है कि उसके और रवि के क्या सम्बन्ध हैं। वह रवि से प्रश्न करती है। रवि का उत्तर रोचक है।  वे जवाब देते हैं कि कलाकार  कामना और प्रेम से ओतप्रोत होते हैं और बहुधा वह परवान चढ़ती ही है। सोचने वाली बात है कि यह जवाब क्या एक कलाकार का है ? या एक पुरुष का जो एक सुविधाभोगी स्थाई साथिन के आभाव में कामना के तर्क का , प्रेम की क्षणिकता का अपने बचाव के लिए सहारा ले रहा है ? जबकि वह सुगंधा से लौट कर आने का वायदा करके आया है फिर वह पत्नी को किस मंतव्य के तहत साथ ले जाना चाहता है? और अगर यह कामना का शुद्ध रूप था तब सुगंधा से प्रेम के प्रदर्शन का अभिप्राय क्या था ? अपनी कला को आकर देने हेतु किसी सुन्दर वस्तु का चित्रण अथवा  पुरुष की अदम्य जैविक इच्छा का प्राकृतिक निर्वहन ? इन सवालों के उत्तर हम यही छोड़ते हैं।

raja_ravivarma_painting_1_milkmaidरवि वर्मा की अदूरदर्शिता और लापरवाही से सुगंधा के चित्र सार्वजनिक हो जाते हैं। दूसरी ओर यथास्थिति वाद के समर्थक उनपर अश्लीलता और हिन्दू धर्म को क्षति पहुचने का आरोप लगाकर उनपर मुक़दमा कर देते हैं। हिंदूवादियों का तर्क होता है कि देवी देवताओं के नग्न चित्रण के कारन प्लेग की आपदा का उन्हें सामना करना पड़ रहा है, इसलिए यह चित्र प्रतिबंधित किये जाने चाहिए और रवि वर्मा को  सजा मिलनी चाहिए।  रवि सुगंधा के सामने विवाह प्रस्ताव रखते हैं जिसे सुगंधा सामाजिक वर्ग – चरित्र का तर्क देकर नामंजूर कर देती है। सुगंधा अपने अपमान को तो बर्दाश्त कर लेती है परन्तु  रवि के मुक़दमा  हार जाने के भय से ग्रसित होकर और उनके लगातार हो रहे अपमान से त्रस्त होकर फैसला आने के दिन पर आत्महत्या कर लेती है। रवि मुक़दमें विजयी होते हैं पर रवि सुगंधा की अनुपस्तिथि में पौराणिक – काल्पनिक चित्र बना पाने में असक्षम हो जाते हैं।  प्रेम कथा का दुखद अंत होता है।

अब जरा रवि वर्मा के चित्रों के आलोचनाओं पर बात कर लें। आलोचकों का आरोप है कि अगर रवि चित्र बनाकर देवताओं को मंदिरों से बाहर नही निकालते तो भारत में धर्म की जड़ें नही मजबूत होती, देवता साधारण भारतीय परिवारों के पूजा घरों तक नही पहुँचते ।  यह आरोप अनर्गल है।  समाज की अपनी गति होती है धर्म का निर्माण एवं उसका लोकप्रियकरण एक सामाजिक गति है। हर प्रकार की कला को पहला आश्रय राजा अथवा धर्माधिकारी से ही मिला है। हाँ एक चित्रकार की तरह रवि से हम यह अपेक्षा कर सकते थे कि वे अपनी कला में जनोन्मुख हो जाते अंतिम समय में उन्होंने प्रयास भी किया पर बहुत सफल नही रहे , शायद भावना भी वही सम्प्रेषण में आ पाती है जिसपर हम विश्वाश कर पाते हैं। यही रवि के साथ हुआ तथापि उनके अद्भुत कौशल और सौंदर्यबोध को अनदेखा करना आलोचना को जबरदस्ती एकपक्षीय बनाना ही है। इस कथा में रंजीत देसाई ने कितना सत्य लिखा है कितनी कल्पना का प्रयोग किया है, यह तो शायद हम कभी जान नही पाएंगे परन्तु यह तथ्य निर्विवाद है कि रवि वर्मा के चित्रों के रूप में उनकी कल्पना और कला की जो विरासत हमारे पास संरक्षित है वह उन्हें निश्चय ही उनके यूरोपीय समकालीन चित्रकारों के समक्ष स्थान देती है।

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लवली गोस्वामी

दर्शन और मनोविज्ञान की गहन अध्येता. ब्लॉग तथा पत्र-पत्रिकाओं में गंभीर लेखन. दखल प्रकाशन से एक पुस्तक ‘प्राचीन भारत में मातृसत्ता और यौनिकता’ शीघ्र प्रकाश्य. वाम राजनीति में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता. इन दिनों बैंगलोर में.

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 5

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( अंतिम भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

mohammed_afzal_parliament_attack_060929( चौथे भाग से लगातार…) ज़्यादातर लोगों के लिए ऐसा करना आसान नहीं है, लेकिन अगर आप कर सकते हैं तो पल भर के लिए ख़ुद को इस अवधारणा से अलग कर लें कि सिद्धांततः ‘पुलिस अच्छी है/आतंकवादी शैतान हैं।’ पेश किये गये सबूतों से अगर वैचारिक साज-सज्जा हटा दी जाये तो उनसे भयावह संभावनाओं के गर्त खुल जाते हैं। सबूत ऐसी दिशा की ओर संकेत करते हैं, जिधर हममे से अधिकतर लोग नहीं देखना चाहेंगे।

पूरे मामले में ‘सर्वाधिक उपेक्षित क़ानूनी दस्तावेज़’ का इनाम क्रिमिनल प्रोसीजर कोड ( दंड प्रक्रिया संहिता ) की धारा 313 के तहत लिये गये अभियुक्त मोहम्मद अफ़ज़ल के बयान को जाता है। इस दस्तावेज़ में अदालत ने सबूतों को उसके सम्मुख सवालों के रूप में रखा है। वह या तो सबूत को स्वीकार कर सकता है या उन पर आपत्ति कर सकता है और उसे अपने ही शब्दों में अपनी कहानी का पक्ष रखने की छूट भी है। अफ़ज़ल के मामले में यह देखते हुए कि उसे अपनी सुनवाई का कोई मौक़ा नहीं मिला, यह दस्तावेज़ उसकी आवाज़ में उसकी कहानी बयान करता है।

इस दस्तावेज़ में अफ़ज़ल अपने ख़िलाफ़ अभियोगी पक्ष द्वारा कगाये गये कुछ आरोप स्वीकार करता है। वह स्वीकार करता है कि वह तारिक़ नाम के एक आदमी से मिला था। वह स्वीकार करता है कि तारिक़ ने उसका परिचय मोहम्मद नाम के एक आदमी से करवाया। वह स्वीकार करता है कि उसने दिल्ली आने और एक पुरानी सफ़ेद अम्बैसेडर कार ख़रीदने में मोहम्मद की मदद की। वह स्वीकार करता है कि मोहम्मद संसद पर हमले में मारे गये पांच फ़िदायीनों में से एक था। ‘आरोपी के रूप में अफ़ज़ल के बयान’ में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ यह है कि वह कहीं भी ख़ुद को पूरी तरह निर्दोष साबित करने की कोशिश नहीं करता। लेकिन वह अपने कार्यों को जिस संदर्भ में रखता है, वह ध्वस्त कर देने वाला है। अफ़ज़ल का वक्तव्य संसद पर हमले में उसके द्वारा निभायी गयी हाशिये की भूमिका का ब्योरा देता है। लेकिन वह हमें उन संभावित कारणों की एक समझ की ओर भी ले जाता है कि जांच इतने ढुलमुल ढंग से क्यों करायी गयी, वह सबसे महत्त्वपूर्ण स्थानों पर ठिठककर खड़ी क्यों हो जाती है और यह क्यों ज़रूरी है कि इसे महज़ अक्षमता और घटिया कहकर नज़रअन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए। अगर हम अफ़ज़ल पर भरोसा न भी करें, तो भी मुक़दमें और स्पेशल सेल की भूमिका के बारे में हम जो जानते हैं उसे देखते हुए, अफ़ज़ल जिस दिशा की ओर संकेत कर रहा है, उस ओर न देखना अक्षम्य है। वह स्पष्ट सूचनाएं देता है : नाम, जगहें और तारीख़ें ( यह आसान नहीं रहा होगा, इस बात के मद्दे-नज़र कि उसका परिवार, उसका भाई, उसकी पत्नी और अबोध बेटा कश्मीर में रहते हैं और अफ़ज़ल ने जिनका नाम लिया है, उनका आसान शिकार बन सकते हैं )।

अफ़ज़ल के शब्दों में :

‘मैं जम्मू-कश्मीर में सोपोर में रहता हूं और सन् 2000 में जब मैं वहां था, फ़ौज मुझे लगभग रोज़ाना परेशान करती थी…राजा मोहन राय नाम का एक आदमी मुझे उग्रवादियों के बारे में उसे सूचनाएं देने के लिए कहता था। मैं समर्पण कर चुका उग्रवादी था और ऐसे सभी उग्रवादियों को हर इतवार आर्मी कैम्प में हाज़िरी लगाने जाना पड़ता है। मझे शारीरिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया जाता था। वह मुझे बस धमकाता ही था। ख़ुद को बचाने के वास्ते मैं उसे छोटी-छोटी जानकारियां देता था, जिन्हें मैं अख़वारों से इकट्ठा करता था। जून/जुलाई 2000 में मैं अपना गांव छोड़कर बारामूला चला गया। मेरी सर्जिकल औज़ारों की एक दुकान थी, जिसे मैं कमीशन के आधार पर चला रहा था। एक दिन जब मैं अपने स्कूटर पर जा रहा था, एसटीएफ ( स्पेशल टास्क फ़ोर्स ) के लोग आये और मुझे उठा ले गये और उन्होंने पांच दिनों तक मुझे लगातार प्रताडि़त किया। किसी ने एसटीएफ को सूचना दी थी कि मैं फिर से उग्रवादी कामों में लग गया हूं। उस आदमी का मुझसे सामना हुआ और उसे मेरी मौजूदगी में छोड़ दिया गया। फिर मुझे उन लोगों ने क़रीब 25 दिन तक अपनी हिरासत में रखा और मैंने एक लाख रुपये देकर ख़ुद को छुड़ाया। स्पेशल सेल वालों ने इस घटना की पुष्टि की थी। उसके बाद मुझे एसटीएफ वालों ने सर्टिफ़िकेट दिया था और उन्होंने मुझे छह महीनों के लिए स्पेशल पुलिस अफ़सर बनाया। वे जानते थे कि मैं उनके लिए काम नहीं करूंगा। तारिक़ मुझसे पालहलन एसटीएफ कैम्प में मिला था जहां मैं एसटीएफ की हिरासत में था। तारिक़ मुझे बाद में श्रीनगर में मिला और उसने बताया कि बुनियादी रूप से वह एसटीएफ के लिए काम कर रहा था। मैंने उसे बताया कि मैं भी एसटीएफ के लिए काम कर रहा हूं। संसद के हमले में मारा गया मोहम्मद भी तारिक़ के साथ था। तारिक़ ने मुझे बताया कि वह कश्मीर के केरान इलाक़े का रहनेवाला था और उसने मुझे कहा कि मैं मोहम्मद को दिल्ली ले जाऊं, क्योंकि मोहम्मद को कुछ समय बाद दिल्ली से देश के बाहर जाना है। मैं नहीं जानता कि 15 दिसम्बर, 2001 को श्रीनगर पुलिस ने मुझे क्यों पकड़ा? मैं तब श्रीनगर बस स्टॉप से घर जाने के लिए बस में चढ़ रहा था जब पुलिस ने मुझे पकड़ लिया। उस गवाह अकबर ने, जिसने कोर्ट में कहा था कि उसने शौकत और मुझे श्रीनगर में पकड़ा था, दिसम्बर 2001 से क़रीब एक साल पहले मेरी दुकान पर छापा मारा था और मुझसे कहा था कि मैं सर्जरी के नक़ली औज़ार बेच रहा था और उसने मुझसे 5000 रुपये लिये थे। मुझे स्पेशल सेल में प्रताड़ित किया गया और एक भूपसिंह ने मुझे पेशाब पीने को भी मजबूर किया और मैंने एस.ए.आर. गिलानी के परिवार को भी वहां देखा, गिलानी की हालत बहुत ख़राब थी। वह खड़े होने की स्थिति में नहीं था। हम जांच के लिए डॉक्टर के पास ले जाये जाते, लेकिन हमें निर्देश था कि हमें डॉक्टर को बताना था कि सब ठीक-ठाक था। हमें धमकी दी जाती कि अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो हमें फिर से सताया जायेगा।’

यहां उसने अदालत से कुछ और जानकारी जोड़ने की इजाज़त मांगी :

‘संसद पर हमले में मारा गया आतंकवादी मोहम्मद मेरे साथ कश्मीर से आया था। जिस आदमी ने उसे मुझे सौंपा, वह तारिक़ था। तारिक़ सुरक्षा बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस की एसटीएफ के साथ काम कर रहा है। तारिक़ ने मुझे कहा था कि अगर मोहम्मद की वजह से मैं किसी परेशानी में पड़ा तो वह मेरी मदद करेगा, क्योंकि वह सुरक्षा बलों और एसटीएफ को अच्छी तरह जानता है…तारिक़ ने कहा था कि मुझे सिर्फ़ मोहम्मद को दिल्ली छोड़ना है और कुछ नहीं करना है और अगर मैं मोहम्मद को अपने साथ दिल्ली नहीं ले गया तो मुझे किसी दूसरे मामले में फंसा दिया जायेगा। मैं इन हालात में मजबूरन मोहम्मद को दिल्ली लाया, यह जाने बग़ैर कि वह आतंकवादी है।’

तो अब हमारे सामने ऐसे आदमी की तस्वीर उभर रही है जो इस प्रकरण में मुख्य खिलाड़ी हो सकता है। ‘गवाह अकबर’ ( अभियोजन पक्ष का गवाह 62 ), मोहम्मद अकबर, हेड कॉन्स्टेबल, परिमपोरा पुलिस स्टेशन, जम्मू-कश्मीर का वह पुलिसवाला जिसने अफ़ज़ल की गिरफ़्तारी के समय ‘बरामदगी मेमो’ पर दस्तख़त किये। सर्वोच्च न्यायालय के अपने वकील सुशील कुमार को लिखे गये एक पत्र में अफ़ज़ल मुक़दमें के दौरान एक दहलाने वाले लम्हे का ब्योरा देता है। अदालत में गवाह अकबर, जो कश्मीर से ‘बरामदगी मेमो’ के बारे में बयान देने आया था, अफ़ज़ल को कश्मीरी में आश्वस्त करता है कि ‘उसका परिवार ख़ैरियत से है।’ अफ़ज़ल फ़ौरन समझ जाता है कि यह एक छिपी हुई धमकी है। अफ़ज़ल यह भी कहता है कि श्रीनगर में पकड़े जाने के बाद उसे परिमपोरा पुलिस स्टेशन ले जाकर पीटा गया और उससे साफ़ कहा गया कि अगर वह सहयोग नहीं देगा तो उसकी पत्नी और परिवार को गंभीर नतीजे भुगतने होंगे ( हम पहले ही जानते हैं कि अफ़ज़ल के भाई हिलाल को कुछ महत्त्वपूर्ण महीनों के दौरान एस.ओ.जी. द्वारा ग़ैरक़ानूनी हिरासत में रखा गया था )।

इस पत्र में अफ़ज़ल बताता है कि उसे एसटीएफ कैम्प में किस तरह प्रताड़ित किया गया था – उसके गुप्तांगों पर बिजली की छड़े लगाकर और गुदा में मिर्च और पेट्रोल डालकर। वह पुलिस के डिप्टी सुपरिटेंडेंट द्रविन्दर सिंह का नाम लेता है जिसने उससे कहा था कि दिल्ली में ‘एक छोटे-से काम’ के लिए मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। वह यह भी कहता है कि चार्जशीट में दिये गये कुछ नंबर खोजे जाने पर कश्मीर में एक एसटीएफ कैम्प के साबित होंगे।

यह अफ़ज़ल की दास्तान है जो हमें कश्मीर घाटी में जीवन के असली रूप की झलक दिखाती है। यह तो उन बचकानी कथाओं में ही होता है – जो हम अपने अख़बारों में पढ़ते हैं – कि सुरक्षा बल उग्रवादियों से लड़ते हैं और निरपराध लोग दोनों तरफ़ की गोलीबारी की ज़द में फंस जाते हैं। वयस्कों के क़िस्सों में कश्मीर घाटी उग्रवादियों, भगोड़ों, गद्दारों, सुरक्षा बलों, दोहरे एजेंटों, मुख़बिरों, पिशाचों, ब्लैकमेल करने वालों, ब्लैकमेल होने वालों, जबरन वसूली करने वालों, जासूसों, भारत और पाकिस्तान दोनों की गुप्तचर एजेंसियों के लोगों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, ग़ैर-सरकारी संगठनों और अकल्पनीय मात्रा में बिना हिसाब-किताब वाले पैसों और हथियारों से भरी हुई है। ऐसी साफ़ लकीरें हमेशा मौजूद नहीं होतीं, जो इन सारी चीज़ों और लोगों को अलग-अलग करने वाली चारदीवारियों को चिह्नित करें। यह बताना आसान नहीं है कि कौन किसके लिए काम कर रहा है।

कश्मीर में सच्चाई संभवतः किसी भी दूसरी चीज़ से ज़्यादा ख़तरनाक है। जितना गहरे आप खोदेंगे, उतना बुरा हाल मिलेगा। गड्ढे में सबसे नीचे, एस.ओ.जी. और एस.टी.एफ. हैं, जिनकी अफ़ज़ल बात करता है। ये कश्मीर में भारतीय सुरक्षा तंत्र के सबसे निर्मम, अनुशासनहीन और डरावने तत्व हैं। नियमित बलों के विपरीत ये लोग उस धुंधले इलाके में काम करते हैं जहां पुलिसवालों, आत्मसमर्पण कर चुके उग्रवादियों, भगोड़ों और आम अपराधियों का राज है। वे स्थानीय लोगों को शिकार बनाते हैं जो 1990 के दशक की शुरूआत में हुए अराजक विद्रोह में शामिल हुए थे और अब आत्मसमर्पण करके सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं।

1989 में जब अफ़ज़ल ने उग्रवादी के रूप में प्रशिक्षण लेने के लिए सीमा पार की थी, तब वह सिर्फ़ 20 साल का था। वह बिना किसी प्रशिक्षण के, अपने अनुभवों से निराश होकर वापस आ गया। उसने अपनी बंदूक छोड़ दी और दिल्ली विश्वविद्यालय में भर्ती हो गया। 1993 में नियमित उग्रवादी न होते हुए भी उसने स्वेच्छा से बी.एस.एफ़. के सम्मुख आत्मसमर्पण किया। अतार्किक ढंग से उसके दुःस्वप्नों की शुरूआत इसी बिन्दु से हुई। उसके आत्मसमर्पण को अपराध माना गया और उसका जीवन नरक बन गया। अगर कश्मीरी नौजवान अफ़ज़ल की कहानी से यह सबक लें कि हथियार डालना और ख़ुद को भारतीय राज्य की उन अनगिनत क्रूरताओं के हवाले कर देना न सिर्फ़ मूर्खता होगी, बल्कि पागलपन ही कहा जायेगा, जो भारतीय राज्य के पास उन्हें देने के लिए है, तो क्या उन्हें दोष दिया जा सकता है?

मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी ने कश्मीरियों में आक्रोश पैदा कर दिया है, क्योंकि उसकी कहानी उनकी भी कहानी है। उसके साथ जो हुआ है, हज़ारों युवा कश्मीरियों और उनके परिवारों के साथ हो सकता है, हो रहा है या हो चुका है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि उनकी कहानियां संयुक्त पूछताछ केन्द्र की अंधेरी कोठरियों, फ़ौजी कैम्पों और पुलिस थानों में घट रही हैं जहां उन्हें दाग़ा जाता है, पीटा जाता है, बिजली के झटके दिये जाते हैं, उन्हें ब्लैकमेल किया जाता है और मार दिया जाता है। उनके शवों को ट्रकों के पीछे से फैंक दिया जाता है जहां वे राहगीरों को मिलते हैं। जबकि अफ़ज़ल की कहानी को किसी मध्यकालीन नाटक की तरह राष्ट्रीय मंच पर दिन-दहाड़े, एक ‘न्यायपूर्ण मुक़दमें’ की क़ानूनी मंज़ूरी, ‘स्वतंत्र प्रेस’ के खोखले फ़ायदों और तथाकथित लोकतंत्र के सारे आडम्बर और अनुष्ठानों के साथ, खेला जा रहा है।

अगर अफ़ज़ल को फांसी दे दी जाती है तो हमें इस असली सवाल का जवाब कभी नहीं मिलेगा कि भारतीय संसद पर आख़िर किसने आक्रमण किया? क्या वह लश्कर-ए-तैयबा था? जैश-ए-मोहम्मद था? या फिर इसका उत्तर इस देश के गुप्त ह्रदय में गहरे कहीं छिपा है, जिसमें हम सब रहते हैं और जिसे हम अपने ही सुंदर, जटिल, विविध और कंटीले ढंग से प्रेम और घृणा करते हैं।

13 दिसम्बर को संसद पर हुए आक्रमण की संसदीय जांच होनी ही चाहिए। जब तक जांच हो, सोपोर में अफ़ज़ल के परिवार की रक्षा की जाये, क्योंकि इस अजीबो-ग़रीब कहानी में वे असुरक्षित बंधक हैं।

यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए

दस फ़ीसदी वृद्धि-दर के बावजूद।

०००००

अरुंधति रॉय


इस आलेख की पीडीएफ़ फ़ाइल (232kb) यहां से फ्री डाउनलोड की जा सकती है:

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – अरुंधति रॉय


प्रस्तुति – रवि कुमार

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 4

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( चौथा भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

13-Parliamentattack1-indiaink-blog480( तीसरे भाग से लगातार…) त्वरित-सुनवाई अदालत में कार्रवाई मई, 2002 में शुरू हुई। हमें उस माहौल को नहीं भूलना चाहिए जिसमें मुक़दमा शुरू हुआ। 9/11 हमले से उपजा उन्माद अभी बरक़रार था। अमरीका अफ़ग़ानिस्तान में अपनी जीत की ख़ुशी मना रहा था। गुजरात साम्प्रदायिक आक्रोश में कांप रहा था। कुछ महीने पहले ही साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे नम्बर एस-6 को आग लगा दी गयी थी और उसके भीतर मौजूद 58 हिंदू तीर्थयात्री ज़िंदा जल गये थे। ‘प्रतिशोध’ में किये गये सुनियोजित जनसंहार में 2000 से ज़्यादा मुसलमानों की सरेआम बर्बर हत्या कर दी गयी थी और डेढ़ लाख से ज़्यादा मुसलमानों को उनके घर से भगा दिया था।

अफ़ज़ल के लिए हर वो चीज़ जो ग़लत हो सकती थी, ग़लत हुई। उसे उच्च सुरक्षा वाली जेल के सुपुर्द कर दिया गया। बाहरी दुनिया तक उसकी कोई पहुंच नहीं थी और न ही उसके पास अपने लिए कोई पेशेवर वकील करने का पैसा था। मुक़दमें के तीन सप्ताह बाद अदालत द्वारा नियुक्त महिला वकील ने इस केस से हटा दिये जाने की इजाज़त मांगी, क्योंकि अब उसे एस.ए.आर. गिलानी के बचाव के लिए गठित वकीलों की टोली में पेशेवराना तौर पर शामिलकर लिया गया था। अदालत ने अफ़ज़ल के लिए उसी के जूनियर, बहुत कम अनुभव वाले एक वकील को नियुक्त कर दिया। अपने मुवक्किल से बात करने के लिए वह एक बार भी जेल में उसने मिलने नहीं गया। उसने अफ़ज़ल के बचाव में एक भी गवाह प्रस्तुत नहीं किया और अभियोजन पक्ष के गवाहों से भी ज़्यादा सवाल-जवाब नहीं किये। उसकी नियुक्ति के पांच दिन बाद 8 जुलाई को अफ़ज़ल ने अदालत से दूसरा वकील दिये जाने की दरख़्वास्त की और अदालत को वकीलों की एक सूची दी – इस उम्मीद के साथ कि अदालत उनमें से किसी को नियुक्त करेगी। उनमें से हर एक ने इन्कार कर दिया। ( मीडिया में आक्रोश-भरे प्रचार को देखते हुए, यह ज़रा भी हैरानी की बात नहीं थी। मुक़दमें के दौरान आगे चलकर जब वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने गिलानी की ओर से मुक़दमें में पेश होना स्वीकार किया, तो शिवसेना की भीड़ ने उनके मुम्बई के दफ़्तर में तोड़-फोड़ की।)27 न्यायाधीश ने इस मामले में कुछ भी कर पाने में असमर्थता जतायी और अफ़ज़ल को गवाहों से सवाल-जवाब करने का अधिकार दे दिया। न्यायाधीश का यह उम्मीद करना भी हैरानी की बात है कि एक आपराधिक मुक़दमें में एक अनाड़ी नाजानकार आदमी गवाहों से सवाल-जवाब कर सकेगा। ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए यह असंभव काम था जो कुछ ही समय पहले बने ‘पोटा’ के साथ-साथ पुराने ‘साक्ष्य अधिनियम’ और ‘टेलिग्राफ़ क़ानून’ में किये गये संशोधनों और फ़ौजदारी क़ानून की गहरी समझ न रखता हो। यहां तक कि अनुभवी वकीलों को भी क़ानूनों के मामले में नवीनतम जानकारियों के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही थी।

अफ़ज़ल के ख़िलाफ़ निचली अदालत में अभियोजन के लगभग 80 गवाहों के बयानों की ताक़त पर मामला बनाया गया : इन गवाहों में मकान मालिक, दुकानदार, सेलफ़ोन कंपनियों के टेक्नीशियन और ख़ुद पुलिस शामिल थी। यह मुक़दमें का नाज़ुक दौर था, जब मामले की क़ानूनी बुनियाद रखी जा रही थी। इसमें सूक्ष्म और सतर्क और कड़ी क़ानूनी मेहनत की ज़रूरत थी, जिसमें ज़रूरी सबूतों को जुटाकर उन्हें दर्ज किया जाना था, बचाव-पक्ष के गवाहों को तलब किया जाना था और अभियोजन पक्ष के गवाहों से उनके बयानों पर जिरह करनी थी। अगर निचली अदालत का फ़ैसला अभियुक्त के ख़िलाफ़ चला ही जाता ( निचली अदालतें अपनी रूढ़िवादिता के लिए कुख्यात हैं ) तो भी वकील ऊपर की अदालतों में साक्ष्य पर काम कर सकते थे। इस बेहद महत्त्वपूर्ण अवधि के दौरान अफ़ज़ल की ओर से किसी ने पैरवी नहीं की। इसी चरण में यह हुआ कि उसके मामले की बुनियाद खिसक गयी और उसके गले में फंदा कस गया।

इसके बावजूद, मुक़दमें के दौरान स्पेशल सेल की पोल बड़े पैमाने पर शर्मनाक ढंग से खुलने लगी। यह साफ़ हो गया कि झूठों, जालसाजियों, जाली काग़ज़ात और प्रक्रिया में गंभीर लापरवाहियों का सिलसिला तफ़्तीश के पहले दिन से ही शुरू हो गया था। जहां उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसलों ने इन चीज़ों को चिह्नित किया है, वहीं उन्होंने पुलिस को सिर्फ़ डपटने के अंदाज़ में उंगली भर दिखाय़ी है या कभी-कभी इसे ‘बेचैन करने वाला पहलू’ बताया है, जो अपने आप में एक बेचैन कर देने वाला पहलू है। मुक़दमें के दौरान किसी भी दौर में पुलिस को गंभीर फटकार नहीं लगायी गयी, सज़ा देने की तो ख़ैर, बात ही छोड़िये। सच तो यह है कि हर क़दम पर स्पेशल सेल ने प्रक्रिया के नियमों की घनघोर अवहेलना की। जिस निर्लज्ज लापरवाही से तफ़्तीश की गयी उससे उनका यह चिंताजनक विश्वास उजागर होता है कि उन्हें कभी ‘पकड़ा’ नहीं जा सकेगा और अगर वे पकड़ में आ भी गये तो इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। लगता है उनका विश्वास ग़लत भी नहीं था।

तफ़्तीश के लगभग हर हिस्से में घालमेल किया गया है28

गिरफ़्तारियों और बरामदगियों के समय और स्थान पर ग़ौर करें : दिल्ली पुलिस ने कहा कि गिरफ़्तारी के बाद गिलानी द्वारा दी गयी सूचनाओं के आधार पर अफ़ज़ल और शौकत को श्रीनगर में पकड़ा गया। अदालत का रिकार्ड बताता है कि अफ़ज़ल और शौकत को तलाश करने का संदेश श्रीनगर पुलिस को 15 दिसम्बर की सुबह 5.45 पर भेजा गया। लेकिन दिल्ली पुलिस के रिकार्ड के मुताबिक़ गिलानी को दिल्ली में 15 दिसम्बर की सुबह 10 बजे गिरफ़्तार किया गया था – श्रीनगर में अफ़ज़ल और शौकत की तलाश शुरू करने के चार घंटे के बाद। वे इस घपले के बारे में कुछ नहीं बता पाये हैं। उच्च न्यायालय का फ़ैसला यह बात दर्ज करता है कि पुलिस के विवरण में ‘महत्त्वपूर्ण अन्तर्विरोध’ हैं और उसे सही नहीं माना जा सकता। इसे बतौर एक ‘बेचैन करने वाला पहलू’ ( डिस्टर्बिंग फ़ीचर ) दर्ज किया गया है। दिल्ली पुलिस को झूठ बोलने की ज़रूरत क्यों पड़ी? यह सवाल न पूछा गया और न इसका जवाब दिया गया।

पुलिस जब किसी को गिरफ़्तार करती है, तो प्रक्रिया के तहत उसे गिरफ़्तारी के लिए सार्वजनिक गवाह रखने होते हैं जो पुलिस द्वारा बरामद किये गये सामान, नक़दी, कागज़ात या और किसी चीज़ के लिए ‘गिरफ़्तारी मेमो’ और ‘ज़ब्ती मेमो’ पर दस्तख़त करते हैं। पुलिस यह दावा करती है कि उसने अफ़ज़ल और शौकत को श्रीनगर में एक साथ 15 दिसम्बर को सुबह 11 बजे पकड़ा था। उसका कहना है कि दोनों जिस ट्रक में भाग रहे थे ( वह शौकत की बीवी के नाम पर रजिस्टर्ड था ) उसे पुलिस ने ‘कब्ज़े’ में ले लिया था। वह यह भी कहती है कि उसने अफ़ज़ल से एक नोकिया मोबाइल फ़ोन, एक लैपटॉप और 10 लाख रुपये बरामद किये। बतौर अभियुक्त अपने बयान में अफ़ज़ल का कहना है कि उसे श्रीनगर में एक बस स्टॉप से पकड़ा गया और उससे कोई मोबाइल फ़ोन या पैसा बरामद नहीं किया गया।

हद तो यह है कि अफ़ज़ल और शौकत दोनों की गिरफ़्तारी से संबंधित मेमो पर गिलानी के छोटे भाई बिस्मिल्लाह के दस्तख़त हैं, जो उस वक़्त लोधी रोड़ पुलिस स्टेशन में ग़ैरक़ानूनी हिरासत में था। इसके अलावा जिन दो गवाहों ने फ़ोन, लैपटॉप और 10 लाख रुपये के ज़ब्ती मेमो पर दस्तख़त किये थे, वे दोनों ही जम्मू-कश्मीर पुलिस के थे। उनमें से एक हैड कॉन्स्टेबल मोहम्मद अकबर ( अभियोजन का गवाह संख्या 62 ) है जो – जैसा कि हम बाद में देखेंगे – मोहम्मद अफ़ज़ल के लिए कोई अजनबी नहीं है, और न ही वह कोई आम पुलिसवाला है जो संयोगवश उधर से गुज़र रहा था। जम्मू-कश्मीर पुलिस की अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार भी उन्होंने अफ़ज़ल और शौकत को पहली बार परिमपुरा फल मंड़ी में देखा था। पुलिस इस बात का कोई कारण नहीं बताती है कि उसने उन्हें वहीं क्यों नहीं गिरफ़्तार किया। पुलिस का कहना है कि उसने अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक जगह तक उनका पीछा किया – जहां कोई सार्वजनिक गवाह नहीं थे।

लिहाज़ा, यह अभियोजन के मामले में एक और गम्भीर अन्तर्विरोध है। इसके बारे में उच्च न्यायालय का फ़ैसला कहता है, ‘अभियुक्तों की गिरफ़्तारी के समय में गहरी शिकनें पड़ी हुई हैं।’ हैरान करने वाली बात यह है कि गिरफ़्तारी के इसी विवादित समय और जगह पर ही पुलिस षड्यंत्र में अफ़ज़ल को फंसाने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण सबूत बरामद करने का दावा करती है : यानि मोबाइल और लैपटॉप। एक बार फिर, गिरफ़्तारी के दिन और समय के मामले में और अपराधी ठहराने वाले लैपटॉप और 10 लाख रुपये की कथित बरामदगी के मामले में हमारे पास एक ‘आतंकवादी’ के बयान के बरअक्स सिर्फ़ पुलिस का ही बयान है।

बरामदगियां जारी रहीं : पुलिस का कहना है कि बरामद लैपटॉप में वे फ़ाइलें थी जिनसे गृह मंत्रालय के प्रवेश-पत्र और नक़ली पहचान-पत्र बनाये गये। उसमें कोई और उपयोगी जानकारी नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि अफ़ज़ल उसे ग़ाज़ी बाबा को लौटाने श्रीनगर ले जा रहा था। जांच कर रहे अफ़सर एसीपी राजवीर सिंह ने कहा कि कम्प्यूटर की हार्डडिस्क को 16 जनवरी, 2002 को सील कर दिया गया था ( क़ब्ज़े में लेने के पूरे एक महीने बाद )। लेकिन कंप्यूटर दिखाता है कि उसके बाद भी उसे खोला गया। अदालतों ने इस पर विचार तो किया है, लेकिन इसका कोई संज्ञान नहीं लिया।

( अगर थोड़ी अटकल का सहारा लें तो क्या यह हैरान करने वाली बात नहीं है कि कम्प्यूटर में अपराध साबित करने वाली एकमात्र सूचना नक़ली प्रवेश-पत्र और पहचान-पत्र बनाने के लिए इस्तेमाल की गयी फ़ाइलें थी? और संसद की इमारत दिखाने वाली ज़ी टीवी की एक फ़िल्म का टुकड़ा। अगर अपराध साबित करने वाली दूसरी सूचनाओं को मिटा दिया गया था, तो फिर इसे क्यों छोड़ा गया? और एक अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन के मुखिया ग़ाज़ी बाबा को ऐसे लैपटॉप की इतनी क्या ज़रूरत थी जिसमें सिर्फ़ एक घटिया सचित्र सामग्री थी? )

मोबाइल फ़ोन कॉलों के रिकॉर्ड को देखिये : लम्बे समय तक ग़ौर से देखने पर, स्पेशल सेल द्वारा पेश किये गये कई ‘पक्के सबूत’ संदिग्ध दिखने लगते हैं। अभियोजन की ओर से मामले की रीढ़ का संबंध मोबाइल फ़ोन, सिमकार्ड, कम्प्यूटरीकृत कॉल रिकॉर्ड और सेलफ़ोन कम्पनियों के अधिकारियों और उन दुकानदारों के बयानों से है जिन्होंने अफ़ज़ल और उसके साथियों को फ़ोन और सिमकार्ड बेचे थे। यह दिखाने के लिये कि शौकत, अफ़ज़ल, गिलानी और मोहम्मद ( मारे गये आतंकवादियों में से एक ) हमले के समय के बहुत पास एक-दूसरे के सम्पर्क में थे, जिन कॉल रिकॉर्डों को पेश किया गया, वे ग़ैर-सत्यापित कम्प्यूटर प्रिंट आउट थे, मूल काग़ज़ात की प्रतिलिपी नहीं थे। वे टेक्स्ट फ़ाइल के रूप में स्टोर किये गये बिलिंग सिस्टम के आउटपुट थे जिनसे किसी भी समय आसानी से छेड़छाड़ की जा सकती थी। उदाहरण के लिए, पेश किये गये कॉल रिकॉर्ड दिखाते हैं कि एक ही सिमकार्ड से एक ही समय में दो कॉल किये गये, लेकिन ये अलग-अलग हैंडसेट और आई.एम.ई.आई. नम्बर से किये गये थे। इसका अर्थ यह है कि या तो सिमकार्डों का क्लोन ( जुड़वां ) बना लिया गया था या कॉल रिकार्ड से छेड़छाड़ की गयी थी।

सिमकार्ड का मामला लें : अपनी कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने के लिए अभियोजन एक ख़ास नम्बर 9811489429 पर अत्यधिक निर्भर है। पुलिस का कहना है कि यह अफ़ज़ल का नम्बर है – वह नम्बर जो अफ़ज़ल को ( मारे गये आतंकवादी ) मोहम्मद से, अफ़ज़ल को शौकत से और शौकत को गिलानी से जोड़ता है। पुलिस का यह भी कहना है कि यह नम्बर मारे गये आतंकवादियों से मिले पहचान-पत्रों के पीछे लिखा हुआ था। कितना सुविधाजनक है ! बिल्ली का बच्चा खो गया है ! मम्मी को 9811489429 पर कॉल करो।

यहां यह बात बताने लायक़ है कि सामान्य प्रक्रिया के तहत अपराध की जगह से लिये गये सबूतों को सील करने की ज़रूरत होती है। पहचान-पत्रों को कभी सील नहीं किया गया और वे पुलिस के क़ब्ज़े में रहे और उनसे किसी भी समय छेड़छाड़ की गयी हो सकती थी।

पुलिस के पास एकमात्र सबूत कि 9811489429 नम्बर सचमुच अफ़ज़ल ही का नम्बर है, सिर्फ़ अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति है, जो, जैसा कि हम देख चुके हैं, कोई सबूत ही नहीं है। सिमकार्ड कभी नहीं मिला। पुलिस ने अभियोजन पक्ष की ओर से गवाह के रूप में कमल किशोर को ज़रूर पेश किया, जिसने अफ़ज़ल की पहचान की और बताया कि उसने 4 दिसम्बर, 2001 को एक मोटरोला फ़ोन और एक सिमकार्ड बेचा था। लेकिन अभियोजन पक्ष जिस कॉल रिकॉर्ड पर निर्भर था, वह दिखाता है है कि वह ख़ास सिमकार्ड 6 नवम्बर से काम में लाया जा रहा था, अफ़ज़ल द्वारा उसकी फ़र्ज़िया ख़रीद से पूरे एक महीने पहले से। यानी या तो गवाह झूठ बोल रहा है या फिर कॉल रिकॉर्ड ही ग़लत हैं। उच्च न्यायालय ने इस गड़बड़ की लीपा-पोती यह कहते हुए करता है कि कमल किशोर ने सिर्फ़ यह कहा था कि उसने अफ़ज़ल को एक सिमकार्ड बेचा था, न कि यही वाला सिमकार्ड। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बड़ी ऊंचाई से कहता है, ‘अफ़ज़ल को सिमकार्ड अनिवार्य रूप से 4 दिसम्बर, 2001 से पहले बेचा गया होना चाहिए।’

अभियुक्तों की पहचान को लें : अभियोजन पक्ष की ओर से कई गवाहों ने, जिनमें से ज़्यादातर दुकानदार हैं, अफ़ज़ल की शिनाख़्त ऐसे व्यक्ति के रूप में की है, जिसे उन्होंने कई चीज़ें बेची थीं : अमोनियम नाइट्रेट, अल्यूमीनियम पाउडर, गंधक, सुजाता मिक्सी-ग्राइंडर, मेवों का पैकेट इत्यादि। सामान्य प्रक्रिया के तहत ज़रूरी है कि पहचान परेड हो जिसमें शामिल कई लोगों में से दुकानदार अफ़ज़ल को चुनें। ऐसा नहीं हुआ। बल्कि उनके द्वारा अफ़ज़ल की पहचान तब की गयी जब पुलिस की हिरासत में रहते हुए वह पुलिस को इन दुकानों में ‘ले’ गया और जब उसका संसद पर हमले के अभियुक्त के रूप में परिचय करवाया गया ( क्या हमें यह अंदाज़ा लगाने की छूट है कि दुकानों में पुलिस को वह ले गया या पुलिस उसे ले गयी? आख़िरकार, वह अब भी पुलिस की हिरासत में था, अब भी यातना के आगे बेबस था। अगर इन परिस्थितियों में उसका इक़बालियां बयान क़ानूनी तौर पर शंकास्पद हो जाता है, तो बाकी सब क्यों नहीं हो सकता? )।

जजों ने प्रक्रिया से संबंधित नियमों की इन अवहेलना पर विचार तो किया, लेकिन इसे उन्होंने पूरी गम्भीरता से नहीं लिया। उनका कहना था कि उन्हें यह नहीं समझ आता कि समाज के आम लोग एक निरपराध व्यक्ति को व्यर्थ ही क्यों दोषी ठहराएंगे। लेकिन क्या यह बात लागू हो सकती है, इस मामले में ख़ासतौर पर, जिसमें आम नागरिकों को भीषण मीडिया प्रचार का शिकार बनाया गया था? क्या यह बात इस बात को ध्यान में रखते हुए भी लागू हो सकती है कि सामान्त दुकानदार, ख़ासकर वे जो ‘ग्रे मार्केट’ में बिना रसीदों के सामान बेचते हैं, पूरी दिल्ली पुलिस के शिकंजे में होते हैं?

मैंने अब तक जिन अनियमितताओं की बात की है उनमें से कोई भी मेरी ओर से किसी बेमिसाल जासूसी का परिणाम नहीं है। इनमें से बहुत कुछ निर्मलांशु मुखर्जी द्वारा लिखी गयी एक शानदार किताब ‘दिसम्बर 13 : टेरर ओवर डेमोक्रेसी’ और पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित दो रिपोर्टों ( ट्रायल ऑफ़ एरर्स और बेलेंसिंग एक्ट ) और इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण – निचली अदालत, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसलों के – तीन मोटे ग्रन्थों में दर्ज हैं।29 ये सभी सार्वजनिक दस्तावेज़ हैं, जो मेरी मेज़ पर रखे हुए हैं। ऐसा क्यों है कि जब यह पूरा-का-पूरा धुंधला ब्रह्मांड उजागर किये जाने को बेताब है, हमारे टीवी चैनल नाजानकार लोगों और लालची नेताओं के बीच खोखली बहसें आयोजित करवा रहे हैं? ऐसा क्यों है कि कुछ स्वतंत्र टिप्पणीकारों के अलावा हमारे अख़वार अपने मुखपृष्ठों पर ऐसी फ़ालतू ख़बरें छाप रहे हैं कि जल्लाद कौन होगा और मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी देने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रस्सी की लंबाई ( 60 मीटर ) और उसके वज़न ( 3.75 किलो ) के बारे में बीभत्स ब्योरे परोस रहे हैं? ( इंडियन एक्सप्रेस, 16 अक्टूबर, 2006 )30

क्या हम अपने आज़ाद प्रेस की स्तुति करने के लिए क्षण भर रुकें?

( अगली बार लगातार… पांचवा भाग )


संदर्भ :

27. ‘स्टार्म ओवर अ सेंटेस’, द स्टेट्समेन ( इंडिया ), 12 फ़रवरी, 2003 ।
28. जो विश्लेषण आगे दिया जा रहा है वह भारत के सर्वोच्च न्यायालय, दिल्ली उच्च न्यायालय और पोटा विशेष अदालत के फ़ैसलों पर आधारित है।
29. मुखर्जी, डिसेम्बर 13 । पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, ट्रायल ऑफ़ एरर्स एंड बेलेंसिंग एक्ट।
30. ‘ऐज मर्सी पेटिशन लाइज़ विद कलाम, तिहार बाइज़ रोप फ़ॉर अफ़ज़ल हैंगिंग’, इंडियन एक्सप्रेस, 16 अक्टूबर, 2006 ।


प्रस्तुति – रवि कुमार

( यह आलेख अरुंधति रॉय के लेखों के संग्रह, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और नीलाभ द्वारा संपादित पुस्तक “कठघरे में लोकतंत्र” से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. यह अंग्रेजी की मूलकृति Listening of Grasshoppers से अनूदित है. यह लेख सबसे पहले ३० अक्‍तूबर, २००६ को ‘आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. )

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 3

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( तीसरा भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

parliamentattack-1_121311071046( दूसरे भाग से जारी…) पांच महीने तक, उसकी गिरफ़्तारी से लेकर उस समय तक जब पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाख़िल किया, एक उच्च सुरक्षा जेल ( हाई सिक्योरिटी प्रिज़न ) में बंद मोहम्मद अफ़ज़ल को किसी क़िस्म की क़ानूनी सहायता या क़ानूनी सलाह उपलब्ध नहीं थी। कोई नामी वकील नहीं, कोई बचाव समिति नहीं ( न भारत में, न कश्मीर में ) और कोई अभियान नहीं। चारों आरोपियों में उसकी स्थिति सबसे कमज़ोर थी, उसका मामला गिलानी के मामले से कहीं ज़्यादा जटिल था। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस दौरान ज़्यादातर वक़्त अफ़ज़ल के छोटे भाई हिलाल को कश्मीर में स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप ( एस.ओ.जी.) ने ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से हिरासत में रखा हुआ था। उसे अफ़ज़ल के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाख़िल करने के बाद ही छोड़ा गया ( यह इस पहेली का एक सिरा है जो कहानी के आगे बढ़ने के साथ ही पकड़ में आयेगा )।

प्रक्रिया की एक गंभीर अवहेलना करते हुए 20 दिसम्बर, 2001 को जांच अधिकारी, सहायक आयुक्त पुलिस राजबीर सिंह ने ( जिसे इतनी तादाद में ‘आतंकवादियों’ को एनकाउंटरों-मुठभेड़ों-में मारने के कारण प्रेम से ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’-मुठभेड़ विशेषज्ञ कहा जाता है ) स्पेशल सेल में एक पत्रकार सम्मेलन बुलाया।16 मोहम्मद अफ़ज़ल को मीडिया के सामने अपना ‘अपराध स्वीकार’ करने के लिए मजबूर किया गया। पुलिस आयुक्त अशोक चन्द ने प्रेस से कहा कि अफ़ज़ल ने पुलिस के सामने पहले ही अपना अपराध मान लिया है। यह बात सच्ची साबित नहीं हुई। पुलिस के सामने अफ़ज़ल की औपचारिक स्वीकारोक्ति अगले दिन जाकर ही हुई ( जिसके बाद वह लगातार पुलिस हिरासत में रहा – यंत्रणा के आगे बेबस – जो कि एक और गंभीर प्रक्रियागत चूक थी ) मीडिया के सामने की गयी अपनी ‘स्वीकारोक्ति’ में अफ़ज़ल ने पूरी तरह से अपने को संसद पर आक्रमण में शामिल होने का दोषी मान लिया था।17

मीडिया के सामने की गयी इस स्वीकारोक्ति के दौरान एक अजीब बात हुई। एक सीधे प्रश्न के उत्तर में अफ़ज़ल ने कहा कि गिलानी का आक्रमण से कोई लेना-देना नहीं है, वह पूरी तरह से बेक़सूर है। इस पर एसीपी राजबीर सिंह ने चीख़कर उसे जबरन चुप करवा दिया और मीडिया से गुज़ारिश की कि अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति के इस हिस्से को नज़रअन्दाज़ कर दें। और उन्होंने मान भी लिया। यह कहानी, तीन महीने के बाद उस समय सामने आयी जब टीवी चैनल ‘आज तक’ ने स्वीकारोक्ति को ‘हमले के सौ दिन’ नामक कार्यक्रम में दुबारा प्रसारित किया और जाने कैसे इस हिस्से को भी बना रहने दिया। इस बीच सामान्य जनता की नज़रों में – जो क़ानून और दंड प्रक्रिया के बारे में बहुत कम जानती है – अफ़ज़ल की सार्वजनिक ‘स्वीकारोक्ति’ ने उसके अपराध की ही पुष्टि की। ‘समाज के सामूहिक अंतःकरण के फ़ैसले’ के बारे में कोई दूसरा अनुमान लगाना मुश्किल नहीं रहा होगा।

इस मीडिया स्वीकारोक्ति के अगले दिन, अफ़ज़ल की आधिकारिक स्वीकारोक्ति करवायी गयी। परिनिष्ठित अंग्रेजी में, डीसीपी अशोक चंद को बोलकर लिखवाये गये ( डीसीपी के शब्दों में ‘वह बतलाता गया और मैं लिखता गया’) निर्दोष ढंग से रचे, एकदम प्रवाहमान वक्तव्य को एक सीलबंद लिफ़ाफ़े में न्यायिक मैजिस्ट्रेट को दिया गया। अफ़ज़ल इस स्वीकारोक्ति में, जो अब अभियोजन पक्ष के मुक़दमें की रीढ़ हो गयी है, एक ग़ज़ब का किस्सा बुनता है जो ग़ाज़ी बाबा, मौलाना मसूद, अज़हर, तारिक़ नाम के एक आदमी और पांच मारे गये आतंकवादियों को जोड़ता है; उनका साज़-सामान, हथियार और गोला-बारूद, गृहमंत्रालय के अनुमति-पत्र, एक लैपटॉप और नक़ली पहचान-पत्र, ठीक-ठीक कौन-सा रसायन उसने कहां से ख़रीदा इसकी विस्तॄत सूची, वह ठीक-ठीक अनुपात, जिसमें उन्हें मिलाकर विस्फोटक बनाया गया और ठीक-ठीक समय जब उसने किस मोबाइल नम्बर को फ़ोन किया और किस नम्बर से उसे फ़ोन आया ( किसी कारणवश, तब तक अफ़ज़ल ने गिलानी के बारे में अपना दिमाग़ बदल लिया था और उसे षड्यंत्र में पूरी तरह से शामिल कर लिया था )।

‘स्वीकारोक्ति’ का हर बिंदु पुलिस द्वारा पहले ही से जमा किये गये साक्ष्य से हू-ब-हू मेल खाता था। दूसरे शब्दों में अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति उस प्रारूप में एकदम फ़िट बैठती थी, जो पुलिस ने कुछ दिन पहले प्रेस के सामने पेश किया था, जैसे कांच की जूती में सिंड्रेला का पैर ( अगर कोई फ़िल्म होती तो आप कह सकते थे कि यह ऐसी पटकथा थी जो अपने साज़-सामान का पिटारा ख़ुद अपने साथ लायी थी। दरअसल, जैसा कि अब हम जानते हैं, इस पर एक फ़िल्म बनायी भी गयी। ज़ी टीवी अफ़ज़ल को इसके लिए कुछ रॉयल्टी का देनदार है )।

अन्ततः, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय, दोनों ने अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति को ‘प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपायों में चूक और उनकी अवहेलना’ के कारण ख़ारिज कर दिया। लेकिन जाने कैसे, अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति अब तक बची रह गयी है – अभियोजन पक्ष की किसी भुतही आधारशिला की तरह। और इससे पहले कि यह स्वीकारोक्ति तकनीकी और क़ानूनी तौर पर ख़ारिज हो, यह क़ानून से इतर एक बड़ा उद्देश्य हासिल कर चुकी थी। 21दिसम्बर, 2001 को जब भारत सरकार ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ युद्ध की तैयारी शुरू की, तो उसने कहा कि हमारे पास पाकिस्तान का हाथ होने के ‘स्पष्ट और अकाट्य प्रमाण’ हैं।18 अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति ही भारत सरकार के पास पाकिस्तान के शामिल होने का एकमात्र ‘प्रमाण’ थी। अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति। और स्टिकर घोषणा-पत्र। ज़रा सोचिये। पुलिस यंत्रणा के बल पर ली गयी इस ग़ैर-क़ानूनी स्वीकारोक्ति के आधार पर हज़ारों सैनिक जनता के ख़र्च पर पाकिस्तान की सीमा की ओर रवाना कर दिये गये और उपमहाद्वीप को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचाने के खेल के सुपुर्द कर दिया गया, जिसमें सारी दुनिया बन्धक बनी हुई थी।

कान में कहा गया बड़ा सवाल : क्या इसका बिल्कुल उलट नहीं हुआ हो सकता था ? क्या स्वीकारोक्ति ने युद्ध को उकसाया या फिर युद्ध की ज़रूरत ने स्वीकारोक्ति की ज़रूरत को उकसाया ?

बाद में, जब ऊंची अदालतों ने अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति को ख़ारिज कर दिया तो जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा की सारी बाते बंद हो गयीं। पाकिस्तान से जुड़ाव का दूसरा तार पांच मारे गये फ़ियादिनों की पहचान का रह गया था। मोहम्मद अफ़ज़ल ने, जो पुलिस हिरासत में ही था, उनकी पहचान मोहम्मद, राना, राजा, हमज़ा और हैदर के रूप में की थी। गृहमंत्री ने कहा कि ‘वे पाकिस्तानियों जैसे लगते थे’, पुलिस ने कहा वे ‘पाकिस्तानी थे’, निचली अदालत के न्यायाधीश ने कहा वे पाकिस्तानी थे19 और यही मामले की स्थिति है ( अगर हमसे कहा जाता कि उनके नाम हैप्पी, बाउन्सी, लक्की, जॉली और किडिंगमनी थे और वे स्कैंडिनेवियाई थे, तो हमें वह भी मानना पड़ता )।

हम अब भी नहीं जानते कि वे सचमुच कौन हैं, या वे कहां के हैं। क्या किसी को कोई उत्सुकता है? लगता तो नहीं। उच्च न्यायालय ने कहा, ‘इस तरह मारे गये पांच आतंकवादियों की पहचान स्थापित मानी जाती है। न भी होने की स्थिति में भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जो बात प्रासंगिक है, वह मारे गये लोगों के साथ आरोपी का संबंध है, न कि उनके नाम।’

अपने ‘आरोपी के वक्तव्य’ में ( जो कि स्वीकारोक्ति के विपरीत, नयायालय में दिया जाता है, पुलिस हिरासत में नहीं ) अफ़ज़ल का कहना है : ‘मैंने किसी भी आतंकवादी की शिनाख़्त नहीं की थी। पुलिस ने मुझे नाम बतलाये और मजबूर किया कि मैं उनकी शिनाख़्त करूं।20  लेकिन तब तक उसके लिए बहुत देर हो चुकी थी। मुक़दमें के पहले दिन, निचली अदालत द्वारा नियुक्त अफ़ज़ल के वकील ने ‘अफ़ज़ल द्वारा पहचाने शवों की शिनाख़्त और पोस्टमार्टम की रिपोर्टों को बिना किसी औपचारिक प्रमाण के अविवादित साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने’ के लिए सहमति दे दी थी। अफ़ज़ल के लिए इस चकरा देने वाले क़दम के गंभीर परिणाम होने वाले थे। सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को उद्धृत करें तो, ‘आरोपी अफ़ज़ल के ख़िलाफ़ पहली परिस्थिति यह है कि अफ़ज़ल जानता था मारे गये आतंकवादी कौन थे। उसने मारे गये आतंकवादियों के शवों की शिनाख़्त की थी। इस पहलू से जुड़े साक्ष्य अकाट्य हैं।’

निश्चय ही यह संभव है कि मारे गये आतंकवादी विदेशी लड़ाके हों। लेकिन इतनी ही संभावना है कि वे न हों। लोगों को मारकर ‘विदेशी आतंकवादियों’ के रूप में उनकी झूठी शिनाख़्त करना, या झूठे ही मृत लोगों की शिनाख़्त ‘विदेशी आतंकवादियों’ के रूप में करना, या झूठे ही जीवित लोगों की शिनाख़्त आतंकवादियों के रूप में करना, पुलिस या सुरक्षा बलों के लिए आम बात है चाहे कश्मीर में हो या दिल्ली की सड़कों पर।21

भरपूर दस्तावेज़ी सबूतों पर आधारित कश्मीर के अनेक मामलों में सबसे ज़्यादा जाना-माना मामला छत्तीसिंहपुरा हत्याकांड के बाद हुई मार-काट का है, जो आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय प्रवाद बन गया। 20 अप्रेल, 2000 की रात, अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के नयी दिल्ली पहुंचने के ठीक पहले, छत्तीसिंहपुरा गांव में ‘अनजाने बंदूकधारियों’ ने, जो भारतीय सेना की वर्दियां पहने हुए थे, 35 सिखों की हत्या कर दी थी।22 ( कश्मीर में कई लोगों को शंका है कि इस हत्याकांड के पीछे भारतीय सुरक्षा बल थे )। पांच दिब बाद एस.ओ.जी. और सेना की उपद्रव निरोधक इकाई ‘राष्ट्रीय राइफ़ल्स’ ने एक संयुक्त अभियान में पथरीबल नामक गांव के बाहर पांच आदमियों को मार गिराया था।23 अगले दिन उन्होंने घोषणा की वे पाकिस्तान के रहने वाले विदेशी आतंकवादी थे, जिन्होंने छत्तीसिंहपुरा में सिखों की हत्या की थी। शव जले हुए और शक्लें बिगाड़ी हुई थीं। अपनी ( बिना जली ) सैनिक वर्दियों के नीचे वे सामान्य सिविलियन कपड़े पहने हुए थे। बाद में पता चला कि वे स्थानीय लोग थे जिन्हें अनन्तनाग ज़िले में गिरफ़्तार किया गया था और निर्ममतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया था।

किस्से और भी हैं :
20 अक्टूबर, 2003 : श्रीनगर के अख़बार ‘अल-सफ़ा’ ने एक पाकिस्तानी ‘उग्रवादी’ की तस्वीर प्रकाशित की, जिसके बारे में 18वीं राष्ट्रीय राइफ़ल्स ने दावा किया कि उन्होंने उसे तब मारा जब वह एक सैनिक शिविर पर हमले का प्रयास कर रहा था। कुपवाड़ा के एक नानबाई वली ख़ान ने तस्वीर की पहचाण अपने बेटे फारूख़ अहमद के रूप में की, जिसे सैनिक दो महीने पहले जिप्सी में उठाकर ले गये थे। अन्ततः उसका शव एक साल बाद खोदकर निकाला गया।24

20 अप्रेल, 2004 : लोलाब घाटी में तैनात 18वीं राष्ट्रीय राइफ़ल्स ने एक घमासान मुठभेड़ में चार विदेशी उग्रवादियों को मार गिराने का दावा किया। बाद में पता चला कि चारों साधारण मज़दूर थे, जिन्हें सेना जम्मू से कुपवाड़ा लायी थी। एक बेनाम चिट्ठी के ज़रिये मज़दूरों के घरवालों को उनकी जानकारी मिली थी, जो कुपवाड़ा गये और अन्ततः मृतकों को खोदकर निकलवाया।25

9 नवंबर, 2004 : सेना ने नगरोटा, जम्मू में भारतीय सेना की 15वीं कोर के जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग और जम्मू कश्मीर पुलिस के महानिदेशक की उपस्थिति में पत्रकारों के सामने आत्मसमर्पण करने वाले 47 ‘उग्रवादियों’ को पेश किया। जम्मू-कश्मीर पुलिस को बाद में पता चला कि उनमें 27 लोग बेरोज़गार आदमी थे, जिन्हें झूठे नाम और उपनाम दिये गये थे और जिन्हें इस बुझौवल में अपनी भूमिका निभाने के बदले सरकारी नौकरी देने का वादा किया गया था।26

ये सिर्फ़ इस तथ्य को उजागर करने के लिए जल्दी में दी गयी थोड़ी-सी मिसालें हैं कि दूसरे किसी भी सबूत की ग़ैर-मौजूदगी में, पुलिस जो कहती है वह किसी भी हालत में पर्याप्त नहीं होता

( अगली बार लगातार… चौथा भाग )


संदर्भ :

16. ‘स्पेशल सेल एसीपी फ़ेसेज़ चार्जेज ऑफ़ एक्सेसेज़, टार्चर’, हिंदुस्तान टाइम्स, 31 जुलाई, 2005। सिंह की बाद में ( मार्च, 2008 में ) – एक विवाद में जो व्यापक रूप से विश्वास किया जाता है कि अपराधियों की दुनिया और ज़मीन-जायदाद से संबंधित था – हत्या कर दी गयी। देखें, प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट राजबीर सिंह शॉट डेड’, हिंदुस्तान टाइम्स, 25 मार्च, 2008 ।
17. देखें लेख, ‘टेरेरिस्ट्स वर क्लोज़-निट रिलिजियस फ़ेनैटिक्स’ और ‘पुलिस इम्प्रेस विद स्पीड बट शो लिटल एविडेंस’, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 21 दिसम्बर, 2001 । इंटरनेट पर उपलब्ध : http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/1600576183.cms और http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/1295243790.cms ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया )।
18. एमिली वैक्स और रमा लक्ष्मी, ‘इंडियन ऑफ़िशियल पॉइंट्स टू पाकिस्तान’, वॉशिंगटन पोस्ट, 6 दिसम्बर, 2008, पृ. A8 ।
19. मुखर्जी, 13 दिसम्बर, पृ. 43 ।
20. श्री एस.एन. ढींगरा की अदालत में आपराधिक मामलों की धारा 313 के तहत मोहम्मद अफ़ज़ल का बयान, एएसजे, नयी दिल्ली, राज्य बनाम अफ़जल गुरू और अन्य, एफआईआर 417/01 सितम्बर, 2002 । इंटरनेट पर उपलब्ध : http://www.outlookindia.com/article.aspx?232880 और http://www.revolutionarydemocracy.org/afzal/azfal6.htm ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया )।
21. एजाज़ हुसैन, ‘किलर्स इन ख़ाकी’, इंडिया टुडे, 11 जून, 2007 । ‘पीयूडीआर पिक्स सेवरल होल्स इन पुलिस वर्ज़न ऑन प्रगति मैदान एनकाउंटर’, द हिंदू, 3 मई, 2005, और पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, एन अनफ़ेयर वरडिक्ट : ए क्रिटिक ऑफ़ स रेड फोर्ट जजमेंट ( नयी दिल्ली, 22 दिसम्बर, 2006 )  और क्लोज़ एनकाउंटर : ए रिपोर्ट ऑन पुलिस शूट-आउट्स इन डेल्ही ( नयी दिल्ली, 21 अक्टूबर, 2004 ) भी देखें।
22. देखें, ‘ए न्यू काइंड ऑफ़ वॉर’, एशिया वीक, 7 अप्रेल, 2000, और रणजीत देव राज, ‘टफ़ टॉक कंटीन्यूज़ डिस्पाइट पीस डिमांड्स’, इंटर प्रेस सर्विस, 19 अप्रेल, 2000 ।
23. देखें, ‘फ़ाइव किल्ड आफ़्टर छत्तीसिंहपुरा मैसेकर वर सिवियन्स’, प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, 16 जुलाई, 2002 और ‘ज्यूडिशियल प्रोब ऑर्डर्ड इनटू छत्तीसिंहपुरा सिख मैसेकर’, 23 अक्टूबर, 2000 ।
24. पब्लिक कमिशन ऑन ह्यूमन राइट्स, श्रीनगर, 2006, ‘स्टेट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स इन जम्मू एंड कश्मीर 1990-2005′, पृ. 21 ।
25. ‘प्रोब इनटू अलेज्ड फ़ेक किलिंग ऑर्डर्ड’, डेली एक्सेल्सियर ( जनिपुरा ), 14 दिसम्बर, 2006 ।
26. एम.एल.काक, ‘आर्मी क्वायट ऑन फ़ेक सरेंडर बाई अल्ट्राज़’, द ट्रिब्यून ( चंडीगढ़ ), 14 दिसम्बर, 2006 ।


प्रस्तुति – रवि कुमार

( यह आलेख अरुंधति रॉय के लेखों के संग्रह, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और नीलाभ द्वारा संपादित पुस्तक “कठघरे में लोकतंत्र” से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. यह अंग्रेजी की मूलकृति Listening of Grasshoppers से अनूदित है. यह लेख सबसे पहले ३० अक्‍तूबर, २००६ को ‘आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. )

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 2

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( दूसरा भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

1f53e3fe-40be-49d4-8ec3-b3e88c5f590cHiRes( पहले भाग से जारी…) मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी इसलिए ह्रदयग्राही है क्योंकि वह मक़बूल बट्ट नहीं है। ताहम, उसकी कहानी भी कश्मीर घाटी की कहानी से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। यह ऐसी कहानी है जिसके नियामक तत्व न्यायालय की चारदीवारी से और ऐसे लोगों की सीमित कल्पना से, जो स्वघोषित ‘महाशक्ति’ के सुरक्षित केन्द्र में रहते हैं, बहुत आगे तक फैले हुए हैं। मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी का उत्स ऐसे युद्ध-क्षेत्र में है जिसके नियम सामान्य न्याय-व्यवस्था के सूक्ष्म तर्कों और नाज़ुक संवेदनाओं से परे है।

इन सभी कारणों से यह महत्त्वपूर्ण है कि हम संसद पर 13 दिसम्बर की अजीब, दुखद और पूरी तरह अमंगलसूचक कहानी को सावधानी से जांचे-परखें। यह दरअसल हमें इस बारे में ढेर सारी बातें बतलाती है कि दुनिया का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ किस तरह काम करता है। यह सबसे बड़ी चीज़ों को सबसे छोटी चीज़ों से जोड़ती है। यह उन गलियों-पगडंडियों को चिह्नित करती है जो उस सबको जो हमारे पुलिस थानों की अंधेरी कोठरियों में होता है, उस सबसे जोड़ती है जो धरती के स्वर्ग की सर्द, बर्फ़ीली सड़कों पर हो रहा है; और वहां से उस निस्संग दुर्भावनापूर्ण रोष तक, जो राष्ट्रों को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचा देता है। यह ऐसे स्पष्ट, सुनिश्चित सवाल उठाती है जिन्हें विचारधारा से जुड़े अथवा वाग्मितापूर्ण उत्तरों की नहीं, बल्कि स्पष्ट, सुनिश्चित उत्तरों की दरकार है।

इस साल 4 अक्टूबर को मैं भी उस छोटे-से समूह में शामिल थी जो मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी की सज़ा दिये जाने के ख़िलाफ़ नयी दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर इकट्ठा हुआ था। मैं वहां इसलिए थी कि मैं मानती हूं कि मोहम्मद अफ़ज़ल एक बहुत ही शातिराना शैतानी खेल का महज़ एक मोहरा है। अफ़ज़ल वह राक्षस नहीं है जो कि उसे बनाया जा रहा है। वह तो राक्षस के पंजे का निशान भर है और अगर पंजे के निशान को ही ‘मिटा’ दिया जाता है तो हम कभी नहीं जान पाएंगे कि राक्षस कौन था। और है।

कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि उस दोपहर वहां विरोध करने वालों से ज़्यादा पत्रकार और टीवी के लोग थे। सबसे अधिक ध्यान फ़रिश्ते की तरह सुंदर अफ़ज़ल के बेटे ग़ालिब पर था। भले दिल वाले लोग, जो यह नहीं समझ पा रहे थे कि उस लड़के का क्या करें जिसका बाप फांसी के तख़्ते की तरफ़ जा रहा था, उसे आइसक्रीम और कोल्ड़ड्रिंक दिये जा रहे थे। वहां जमा लोगों की ओर देखते हुए मेरा ध्यान एक छोटे-से उदास ब्योरे पर गया। इस विरोध-प्रदर्शन का संयोजक दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी का प्राध्यापक एस.ए.आर. गिलानी था, छोटे क़द का गठीला आदमी जो थोड़े घबराये-से अन्दाज़ में वक्ताओं का परिचय दे रहा था और घोषणाएं कर रहा था। संसद पर आक्रमण के मामले में आरोपी नंबर तीन। उसे आक्रमण के एक दिन बाद, 14 दिसम्बर, 2001 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा गिरफ़्तार किया गया था। हालांकि गिलानी को गिरफ़्तारी के दौरान बर्बर यातनाएं दी गयी थीं, हालांकि उसके परिवार को – पत्नी, छोटे बच्चे और भाई – को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से हवालात में रखा गया था, फिर भी उसने उस अपराध को स्वीकार करने से मना कर दिया था, जो उसने किया नहीं था।

निश्चय ही उसकी गिरफ़्तारी के बाद के दिनों में अगर आपने अख़बार नहीं पढ़े होंगे तो आप यह सब जान नहीं पाये होंगे। उन्होंने एक सर्वथा काल्पनिक, अस्तित्वहीन स्वीकारोक्ति के विस्तृत विवरण छापे थे। दिल्ली पुलिस ने गिलानी को साज़िश के भारतीय पक्ष का दुष्ट सरग़ना ( मास्टर माइंड ) कहा था। इसके पटकथा लेखकों ने उसके ख़िलाफ़ नफ़रत-भरा प्रचार-अभियान छेड़ रखा था जिसे अति-राष्ट्रवादी, सनसनी-खोजू मीडिया ने बढ़ा-चढ़ाकर और नमक-मिर्च लगाकर पेश किया था। पुलिस अच्छी तरह जानती थी कि फ़ौजदारी मामलों में यह फ़र्ज़ किया जाता है कि जज मीडिया रिपोर्टों का नोटिस नहीं लेते। इसलिए पुलिस को पता था कि उसके द्वारा इन ‘आतंकवादियों’ का निर्मम मनगढ़न्त चरित्र-चित्रण जनमत तैयार करेगा और मुक़दमें के लिए माहौल तैयार कर देगा। लेकिन पुलिस क़ानूनी जांच-परख के दायरे से बाहर होगी।

यहां प्रस्तुत हैं कुछ विद्वेषपूर्ण, कोरे झूठ जो मुख्यधारा के समाचार-पत्रों में छपें:

‘गुत्थी सुलझी : आक्रमण के पीछे जैश’, नीता शर्मा और अरुण जोशी : द हिंदुस्तान टाइम्स, 16 दिसम्बर, 2001 :

‘दिल्ली में स्पेशल सेल के गुप्तचरों ने अरबी के एक अध्यापक को गिरफ़्तार कर लिया है जो कि ज़ाकिर हुसैन कॉलेज ( सांध्यकालीन ) में पढ़ाता है…इस बात के साबित हो जाने के बाद कि उसके मोबाइल फ़ोन पर उग्रवादियों द्वारा किया गया फ़ोन आया था।’

‘दिल्ली विश्वविद्यालय का अध्यापक आतंकवादी योजना की धुरी था’, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 17 दिसम्बर, 2001 :

‘संसद पर 13  दिसम्बर का आक्रमण आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा की संयुक्त कार्रवाई था जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय का अध्यापक सैयद ए.आर. गिलानी दिल्ली में सुविधाएं जुटाने वाले ( फ़ैसिलिटेटर ) प्रमुख लोगों में से एक था। यह बात पुलिस कमिश्नर अजय राज शर्मा ने रविवार को कही।’

‘प्रोफ़ेसर ने “फ़ियादीन” का मार्गदर्शन किया,’ देवेश के.पांडे, द हिंदू, 17 दिसम्बर, 2001 :

‘पूछताछ के दौरान गिलानी ने यह राज़ खोला कि वह षड्यंत्र के बारे में उस दिन से जानता था जब “फ़ियादीन” हमले की योजना बनी थी।’

‘डॉन ख़ाली समय में आतंकवाद सिखाता था,’ सुतीथो पत्रनवीस, द हिंदुस्तान टाइम्स, 17 दिसम्बर, 2001 :

‘जांच से यह बात सामने आयी है कि सांझ होने तक वह कॉलेज पहुंचकर अरबी साहित्य पढ़ा रहा होता था। ख़ाली समय में, बंद दरवाज़ों के पीछे, अपने या फिर संदेह में गिरफ़्तार किये गये दूसरे आरोपी शौकत हुसैन के घर पर वह आतंकवाद का पाठ पढ़ता और पढ़ाता था।’

‘प्रोफ़ेसर की आय’ द हिंदुस्तान टाइम्स, 17 दिसम्बर, 2001 :

‘गिलानी ने हाल ही में पश्चिमी दिल्ली में 22 लाख का एक मकान ख़रीदा था। दिल्ली पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि उसे इतना पैसा किस छप्पर के फटने से मिला।’

‘अलीगढ़ से इग्लैंड तक छात्रों में आतंकवाद के बीज बो रहा था गिलानी,’ सुजीत ठाकुर, राष्ट्रीय सहारा, 18  दिसम्बर, 2001 :

‘जांच कर रही एजेंसियों के सूत्रों और उनके द्वारा इकट्ठा की गयी सूचनाओं के अनुसार गिलानी ने पुलिस को एक बयान में कहा है कि वह लंबे समय से जैश-ए-मोहम्मद का एजेंट था…गिलानी की वाग्विदग्धता, काम करने की शैली और अचूक आयोजन क्षमता के कारण ही 2000 में जैश-ए-मोहम्मद ने उसे बौद्धिक आतंकवाद फैलाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी।’

‘आतंकवाद का आरोपी पाकिस्तानी दूतावास में जाता रहता था,’ स्वाती चतुर्वेदी, द हिंदुस्तान टाइम्स, 21 दिसम्बर, 2001 :

‘पूछताछ के दौरान गिलानी ने स्वीकार किया कि उसने पाकिस्तान को कई फ़ोन किये थे और वह जैश-ए-मोहम्मद से संबंध रखनेवाले आतंकवादियों के संपर्क में था…। गिलानी ने कहा कि जैश के कुछ सदस्यों ने उसे पैसे दिये थे और दो फ़्लैट ख़रीदने को कहा जिन्हें आतंकवादी कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किया जा सके।’

‘सप्ताह का व्यक्ति,’ संडे टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 23 दिसंबर, 2001 :

‘एक सेलफ़ोन उसका दुश्मन साबित हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय का सैयद ए.आर. गिलानी 13 दिसम्बर के मामले में गिरफ़्तार किया जाने वाला पहला व्यक्ति था – एक स्तब्ध करने वाली चेतावनी कि आतंकवाद की जड़े दूर तक और गहरे उतरती हैं।’

ज़ी टीवी ने इन सबको मात कर दिया। उसने ‘13 दिसम्बर’ नाम की एक फ़िल्म बनायी, एक डॉक्यूड्रामा जिसमें यह दावा किया गया कि वह ‘पुलिस की चार्जशीट पर आधारित सत्य’ है। ( इसे क्या शब्दावली में अंतर्विरोध नहीं कहा जायेगा? ) फ़िल्म को निजी तौर पर प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी को दिखलाया गया। दोनों ने फ़िल्म की तारीफ़ की। उनके अनुमोदन को मीडिया ने व्यापक स्तर पर प्रचारित-प्रसारित किया।9

सर्वोच्च न्यायालय ने इस फ़िल्म के प्रसारण पर पाबन्दी लगाने की अपील यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि न्यायाधीश मीडिया से प्रभावित नहीं होते।10 ( क्या सर्वोच्च न्यायालय यह मानेगा कि भले ही न्यायाधीश मीडिया की रिपोर्टों से प्रभावित नहीं होते, क्या ‘समाज का सामूहिक अंतःकरण’ प्रभावित नहीं हो सकता? ) ‘13 दिसम्बर’ नामक फ़िल्म त्वरित-सुनवाई अदालत द्वारा गिलानी, अफ़ज़ल और शौकत को मृत्युदंड दिये जाने से कुछ दिन पहले ज़ी टीवी के राष्ट्रीय नेटवर्क पर दिखलायी गयी। गिलानी ने इसके बाद 18 महीने जेल में काटे; कई महीने फांसीवालों के लिए निर्धारित क़ैदे-तन्हाई में।

उच्च न्यायालय द्वारा उसे और अफ़सान गुरू को निर्दोष पाये जाने पर छोड़ा गया। ( अफ़सान गिरफ़्तारी के दौरान गर्भवती थी। उसके बच्चे का जन्म जेल में ही हुआ। उस अनुभव ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया। अब वह गंभीर मानसिक विकार से पीड़ित है। ) सर्वोच्च न्यायालय ने रिहाई के आदेश को बरक़रार रखा। उसने संसद पर आक्रमण के मामले से गिलानी को जोड़ने या किसी आतंकवादी संगठन से उसका संबंध होने का कोई प्रमाण नहीं पाया। एक भी अख़बार या पत्रकार या टीवी चैनल ने अपने झूठों के लिए उससे ( या किसी और से ) माफ़ी मांगने की ज़रूरत महसूस नहीं की। लेकिन एस.ए.आर. गिलानी की परेशानियों का अंत यहीं नहीं हुआ। उसकी रिहाई के बाद स्पेशल सेल के पास साज़िश तो रह गयी पर कोई ‘सरग़ना’ ( मास्टर माइंड ) नहीं बचा। जैसा कि हम देखेंगे, यह एक समस्या बन गयी।

इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गिलानी अब एक आज़ाद इंसान था – प्रेस से मिलने, वकीलों से बात करने और अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए आज़ाद। सर्वोच्च न्यायालय की अंतिम सुनवाई के दौरान 8 फ़रवरी, 2005 की शाम को गिलानी अपने वकील से मिलने उसके घर जा रहा था। नीम-अंधेरे से एक रहस्यमय बंदूकधारी प्रकट हुआ और उसने गिलानी पर पांच गोलियां दाग़ी।11 चामत्कारिक ढंग से वह बच गया। कहानी में यह नया अविश्वसनीय मोड़ था। साफ़ तौर पर कोई इस बात को लेकर चिंतित था कि गिलानी क्या जानता था और क्या कहने वाला था। कोई भी सोच सकता था कि पुलिस इस उम्मीद में इस मामले की जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी कि इससे संसद पर हुए आक्रमण के मामले में नये महत्त्वपूर्ण सुराग़ मिलेंगे। उलटे स्पेशल सेल ने गिलानी से इस तरह व्यवहार किया मानो अपनी हत्या के प्रयत्न का मुख्य संदेहास्पद व्यक्ति वह ख़ुद ही हो। उन्होंने उसका कंप्यूटर ज़ब्त कर लिया और उसकी कार ले गये। सैकड़ों कार्यकर्ता अस्तपाल के बाहर जमा हुए और उन्होंने हत्या के प्रयास की जांच की मांग की, जिसमें कि स्पेशल सेल पर भी जांच की मांग शामिल थी। ( बेशक वह कभी नहीं हुई। साल भर से ज़्यादा गुज़र चुका है, कोई भी इस मामले की जांच में रुचि नहीं ले रहा है। अजीब बात है। )

सो अब यहां था वह, एस.ए.आर. गिलानी। इस भयावह विपदा से उबर आने के बाद, जन्तर-मन्तर में जनता के साथ खड़ा, यह कहता हुआ कि मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी नहीं लगनी चाहिए। उसके लिए कितना आसान रहा होता घर में दुबककर बैठे रहना। साहस के इस शांत प्रदर्शन से मैं बहुत गहराई तक प्रभावित हुई, जीत ली गयी।

एस.ए.आर. गिलानी की दूसरी ओर, पत्रकारों और फ़ोटोग्राफ़रों की भीड़ में, हाथ में छोटा टेप रिकार्डर लिये, नींबू के रंग की टी-शर्ट और गैबर्डीन की पतलून में पूरी तरह सामान्य दिखने की कोशिश करता हुआ एक और गिलानी था। इफ़्तेख़ार गिलानी। वह भी क़ैद भुगत चुका था। उसे 9 जून, 2002 को गिरफ़्तार किया गय़ा था और पुलिस हिरासत में रखा गया था। उस समय वह जम्मू के दैनिक ‘कश्मीर टाइम्स’ का संवाददाता था। उस पर ‘सरकारी गोपनीयता अधिनियम’ ( ऑफ़िशियल सीक्रेट्स ऐक्ट ) के तहत आरोप लगाया गया था।12 उसका ‘अपराध’ यह था कि उसके पास ‘भारत-अधिकृत कश्मीर’ में भारतीय सेना की तैनाती को लेकर कुछ पुरानी सूचनाएं थी। ( ये सूचनाएं, बाद में पता चला, एक पाकिस्तानी शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित आलेख था जो इंटरनेट पर खुल्लमखुल्ला उपलब्ध था। ) इफ़्तेख़ार गिलानी के कंप्यूटर को ज़ब्त कर लिया गया। इंटेलिजेंस ब्यूरों के अधिकारियों ने उसकी हार्ड डिस्क के साथ छेड़-छाड़ की, डाउनलोड फ़ाइलों को उलट-पुलट किया। यह एक भारतीय दस्तावेज़-सा लगे इसके लिए ‘भारत-अधिकृत कश्मीर’ को बदल कर ‘जम्मू और कश्मीर’ किया गया और ‘केवल संदर्भ के लिए। प्रसार के लिए पूरी तरह निषिद्ध।’ – ये शब्द जोड़ दिये गये, जिससे यह ऐसा गुप्त दस्तावेज़ लगे जिसे गृहमंत्रालय से उड़ाया गया हो। सैन्य गुप्तचर विभाग के महानिदेशालय ने – हालांकि उसे इस आलेख की एक प्रति उपलब्ध करवा दी गयी थी – इफ़्तेख़ार गिलानी के वकील द्वारा बार-बार किये गये अनुरोधों की अनदेखी कर पूरे छह महीने तक इस मामले को निपटाने की कोशिश नहीं की।

एक बार फिर स्पेशल सेल के विद्वेषपूर्ण झूठों को अख़वारों ने पूरी फ़र्माबरदारी से छाप दिया। उन्होंने जो लिखा, उसमें से कुछ पंक्तियां यहां दी जा रही हैं –

‘हुर्रियत के कट्टरपंथी नेता सैयद अली शाह गिलानी के 35 वर्षीय दामाद, इफ़्तिख़ार गिलानी ने, ऐसा विश्वास है कि शहर की एक अदालत में यह मान लिया है कि वह पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी का एजेंट था।’

नीता शर्मा, द हिंदुस्तान टाइम्स, 11 जून, 2002

‘इफ़्तिख़ार गिलानी हिजबुल मुजाहिदीन के सैयद सलाहुद्दीन का ख़ास आदमी था। जांच से पता चला है कि इफ़्तिख़ार भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों के बारे में सलाहुद्दीन को सूचना देता था। जानकार सूत्रों ने कहा कि उसने अपने असली इरादों को अपने पत्रकार होने की आड़ में इतनी सफ़ाई से छिपा रखा था कि उसका पर्दाफ़ाश करने में कई वर्ष लग गये।’

प्रमोद कुमार सिंह, द पायनियर, जून 2002

‘गिलानी के दामाद के घर आयकर के छापों में बेहिसाब संपत्ति और संवेदनशील दस्तावेज़ बरामद’

हिंदुस्तान, 10 जून, 2002

इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि पुलिस की चार्जशीट में उसके घर से मात्र 3450 रुपये बरामद होने की बात दर्ज़ थी। इस बीच दूसरी मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि उसका एक तीन कमरों वाला फ़्लैट है, 22 लाख रुपये की अघोषित आय है, उसने 79 लाख रुपये के आयकर की चोरी की है तथा वह और उसकी पत्नी गिरफ़्तारी से बचने के लिए घर से भागे हुए हैं।

लेकिन वह गिरफ़्तार था। जेल में इफ़्तिख़ार गिलानी को पीटा गया, बुरी तरह ज़लील किया गया। अपनी किताब ‘जेल में कटे दिन’ में उसने लिखा है कि किस तरह अन्य बातों के अलावा उससे अपनी कमीज़ से शौचालय साफ़ करवाया गया और फिर उसी कमीज़ को कई दिन तक पहनने के लिए मजबूर किया गया।13 छह महीने की अदालती जिरह और उसके मित्रों द्वारा दवाब बनाने के बाद जब यह स्पष्ट हो गया कि अगर उसके ख़िलाफ़ मामला चला तो इससे ज़बर्दस्त भद्द पिटने का ख़तरा है, उसे छोड़ दिया गया।14

अब वह वहां था। एक स्वतंत्र व्यक्ति, एक रिपोर्टर जो जन्तर-मन्तर पर एक आयोजन की ख़बरे इकट्ठी करने के लिए आया था। मुझे लगा कि एस.ए.आर. गिलानी, इफ़्तिख़ार गिलानी और मोहम्मद अफ़ज़ल – तीनों ही, एक साथ, एक ही समय पर तिहाड़ जेल में रहे होंगे ( दूसरे कई कम जाने-पहचाने कश्मीरियों के साथ, जिनकी कहानियां हम कभी नहीं जान पाएंगे )।

कहा जा सकता है और कहा भी जायेगा कि एस.ए.आर. गिलानी और इफ़्तिख़ार गिलानी, दोनों के मसले भारतीय न्याय-व्यवस्था की वस्तुपरकता और उसकी आत्म-संशोधन की क्षमता दिखलाते हैं, वे उसकी साख पर बट्टा नहीं लगाते। यह आंशिक रूप से ही सही है। एस.ए.आर. गिलानी और इफ़्तिख़ार गिलानी दोनॊं इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि वे दिल्ली में रहने वाले कश्मीरी हैं और उनके साथ मध्यवर्ग के मुखर संगी-साथी हैं; पत्रकार और विश्वविद्यालय के अध्यापक, जो उन्हें अच्छी तरह जानते थे और संकट की घड़ी में उनके साथ खड़े हो गये थे। एस.ए.आर. गिलानी की वकील नन्दिता हक्सर ने एक ‘अखिल भारतीय एस.ए.आर. गिलानी बचाव समिति’ बनायी  ( जिसकी एक सदस्य मैं भी थी )।15 गिलानी के पक्ष में खड़े होने के लिए कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों ने एकजुट होकर अभियान चलाया। जाने-माने वकील राम जेठमलानी, के.जी. कन्नाबिरन और वृंदा ग्रोवर अदालत में उसकी तरफ़ से पेश हुए। उन्होंने मुक़दमें की असली सूरत उजागर कर दी – गढ़े गये सबूतों से खड़ा किया गया बेहूदा अटकलों, फ़र्ज़ी बातों और कोरे झूठों का पुलिन्दा। सो बेशक, न्यायिक वस्तुनिष्ठता मौजूद है। लेकिन वह एक शर्मीला जन्तु है जो हमारी क़ानूनी व्यवस्था की भूल-भुलैया में कहीं गहरे में रहता है। बिरले ही नज़र आता है। इसे इसकी मांद से बाहर लाने और करतब दिखाने के लिए नामी वकीलों की पूरी टोली की ज़रूरत होती है। अख़बारों की भाषा में कहें तो यह भगीरथ प्रयत्न था। मोहम्मद अफ़ज़ल के साथ कोई भगीरथ नहीं था।

( अगली बार लगातार… तीसरा भाग )


संदर्भ :

9. लक्ष्मी बालकृष्णन, ‘रीलिविंग अ नाइटमेयर’, द हिंदू, 12 दिसम्बर, 2002, पृ. 2 । बिदवई तथा अन्य, 13 दिसम्बर ‘ए रीडर’ में शुद्धब्रत सेनगुप्ता, ‘मीडिया ट्रायल एंड कोर्टरूम ट्रिब्युलेशन्स’, इन बिदवई, पृ. 46 भी देखें।
10. प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, ‘एस सी ( सुप्रीम कोर्ट ) अलॉउज़ ज़ी ( टीवी ) टू एयर फ़िल्म ऑन पार्लियामेंट अटैक’, Indiainfo.com, 13 दिसम्बर, 2002 ।
11. ‘फ़ाइव बुलेट्स हिट गिलानी, सेज फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट’, हिंदुस्तान टाइम्स, 25 फ़रवरी, 2005 ।
12. देखें, ‘पुलिस फ़ोर्स’, इंडियन एक्सप्रेस, 15 जुलाई, 2002; ‘एडिटर्स गिल्ड सीक्स फ़ेयर ट्रायल फ़ॉर इफ़्तिख़ार’, इडियन एक्सप्रेस, 20 जून, 2002, ‘कश्मीर टाइम स्टेफ़र्स डिटेंशन इश्यू रेज्ड इन लोकसभा’, बिजनेस रिकॉर्डर, 4 अगस्त, 2002 ।
13. इफ़्तिख़ार गिलानी, ‘माई डेज इन प्रिजन’ ( नयी दिल्ली : पेंगुइन बुक्स इंडिया, 2005 )। 2008 में इस किताब के उर्दू अनुवाद को साहित्य अकादमी से भारत का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार मिला। http://www.indianexpress.com/news/iftikhar-gilani-wins-sahitya-akademi-award/424871 ।
14. दूरदर्शन ( नई दिल्ली ), ‘कोर्ट रीलीज़ेज़ कश्मीर टाइम्स जर्नलिस्ट फ्रॉम डिटेंशन’, बीबीसी मॉनिटरिंग साउथ एशिया, 13 जनवरी, 2003 ।
15. स्टेटमेंट ऑफ़ सैयद अब्दुल रहमान गिलानी, नयी दिल्ली, 4 अगस्त, 2005 । इंटरनेट पर उपलब्ध : http://www.revolutionarydemocracy.org/parl/geelanistate.htm ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया )। बशरत पीर, ‘विक्टिम्स ऑफ़ डिसेम्बर 13′, द गार्डियन, (लंदन), 5 जुलाई, 2003, पृ. 29 ।


प्रस्तुति – रवि कुमार

( यह आलेख अरुंधति रॉय के लेखों के संग्रह, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और नीलाभ द्वारा संपादित पुस्तक “कठघरे में लोकतंत्र” से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. यह अंग्रेजी की मूलकृति Listening of Grasshoppers से अनूदित है. यह लेख सबसे पहले ३० अक्‍तूबर, २००६ को ‘आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. )