Category Archives: कविताएं

हम कवि और हमारी कविताएं – रवि कुमार

सामान्य

हम कवि और हमारी कविताएं
( a poem by ravi kumar, rawatabhata )

कलाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

हम सभी संवेदनशील हैं
विचारशील भी
हमारा सौन्दर्यबोध
हर कुरूपता पर हमें द्रवित करता है

हमारे पास शब्द हैं
और कहने की बाजीगरी भी
हम लिख लेते हैं कविता

पर हमारी बदनसीबी
हमारा समय क्रांतिकारी नहीं है
यह इस नपुंसक दौर की
नियति ही है शायद
कि हमारी कविताएं
परिवर्तन का औजार बनने की बजाए
श्रेष्ठता बोध की तुष्टि का
जरिया बनकर उभरती हैं

पूंजी को चुनौती देती
हमारी कविताएं
धीरे-धीरे तब्दील होती जाती हैं
हमारी सबसे बड़ी पूंजी में

व्यवस्था के ख़िलाफ़ लिखी
अपनी इन्हीं कविताओं के जरिए
हम इसी व्यवस्था में
बनाना चाहते हैं अपना मुकाम

किसी प्रकाशक
या मूर्धन्य आलोचक की कृपा-दृष्टि
को टटोलते हम
श्रेष्ठ कवियों की गिनती में
शामिल हो जाना चाहते हैं

०००००
रवि कुमार

सोसायटी की सुरक्षा खतरे में है – रवि कुमार

सामान्य

सोसायटी की सुरक्षा कितनी खतरे में है
( यह कविता तो शायद कतई नहीं है )

रवि कुमार, रावतभाटा

सब बढिया चल रहा है

रसोई ठीक है
संतुलित आहार प्रदान का कल्पवृक्ष
पत्नी लगभग खुश है
गहनों और साड़ियों के नये चलन
आनंद के वायस बनकर उभरते हैं
आपसी समझदारी की ज़िंदा मिसाल

ठंड़ में गर्म और गर्मी में ठंड़ के इंतज़ाम हैं
पसीने की चिपचिप
कभी-कभी की बात रह गई है
हर तरह की मुद्रा के लिए
एक अदद कुर्सी का इंतज़ाम है

कुछ किताबें भी हैं
लिखने के लिए सफ़ेद झक कागज़
मूड़ बनाने के लिए बहुत कुछ
कई रिश्तेदार विदेशों में हैं
हमारी भी पहुंच हो ही रही है

बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में हैं
कई ट्यूशनें और कोचिंगें हैं
ढेर सारी प्रतियोगिताएं और अवसर हैं
वे माथा भी नहीं खाते
अगर समय निकल भी आता है उनके पास
टीवी है, ड़ीवीड़ी है
कार्टून्स है, हॉलीवुड़ है
फ़ैशन के नये चलन और मल्टीप्लेक्स मॉल है

हमारे पास ऑफ़िस है
व्हाइट कॉलर जॉब है
दमकते-महकते साथी हैं
( श्शsss……कई हसीन लड़कियां भी हैं,
इनका फ़िगर कभी-कभी पत्नी से उबकाई…छोडिए..
ये अंदर की बात है….
चर्चा तो सिर्फ़ बाहरी बातों की ही होती हैं ना…)

भविष्य सुरक्षित है
कई बीमा पॉलिसियां हैं
ढ़ेरों बचत योजनाओं में निवेश
सेंसेक्स है, शेयर्स हैं
बैंक हैं, लोन हैं
कई प्लॉट्स हैं, फ़्लैट्स हैं
मदद के लिए ज्योतिष विज्ञान है
अंगूठियां हैं, रत्न हैं
नवरात्राएं हैं, व्रत-पूजाएं हैं

कभी-कभी की ग्लानि के लिए
मानसिकता पर आने वाली उबकाइयों के लिए
सुनहरा अतीत है
गर्व करने के लिए धर्म है
हमारी महान संस्कृति और परंपराएं हैं
आदर्श धार्मिक आख्यान हैं
मंदिर हैं, भगवान हैं
उनकी कृपा बनी हुई है

सब कुछ बढिया चल रहा है

एकाध कष्ट हो जाते हैं कभी-कभी
सेंसेक्स ऊपर नीचे होने लगता है
सारा निवेश खतरे में लगने लगता है
ऊपर बताए दंद-फ़ंदों में
हमेशा जान सी उलझी रहती है
जरा सी इधर-उधर की सूचना
कितनी समस्याएं पैदा कर देती है
ये टेक्स बचाने की तिकड़में
संपत्ति छिपाने के जुगाड़
पत्नी की आंखों में दिखती व्यर्थता
बच्चों की त्यौरियां
बॉस से अनबन
साथियों से मनमुटाव

उस पर यह व्यवस्था
कहीं कुछ ठीक नहीं रहता
घर और ऑफ़िस से बाहर ऐसा लगता है
नर्क में रह रहे हैं
तरह-तरह के गंदे लोग
गंदगी, अव्यवस्था
बगैरा-बगैरा

कभी लगता है मज़े हैं
कभी लगता है तकलीफ़े हैं

और ज़िंदगी की ऐसी भारी उथल-पुथलों के बीच
ये खबरें भी ना
ये कुछ लोग भी ना

पता नहीं क्या तकलीफ़ हैं इन्हें
कोई हड़ताल करने लगता है
कोई बेवज़ह आंदोलन करने लगता है
कितना नुकसान करते हैं ये लोग

कोई हमारे धर्म के पीछे पड़ा है
कोई हमारी संस्कृति के
कोई चोरी करता है
कोई लूटपाट
कोई आतंकवादी बन जाएगा
कोई नक्सली

कितना ड़र-ड़र जाते हैं हम लोग
पत्नी को रात-रात नींद नहीं आती
बच्चे अजीब-अजीब से सवाल पूछने लगते हैं

ये साले नेता भी कुछ काम के नहीं हैं
कितना समय लगता है वरना
इन सबको को तो तुरंत मार देना चाहिए
जड़ से ही उखाड़ फैंकना चाहिए

देश का विकास नहीं होने देंगे ये लोग

इन सालों के पास कोई और काम नहीं है क्या
कल-परसों ही हमारे चौकीदार को मार दिया किसी ने
बेचारा गरीब आदमी था

सोसायटी की सुरक्षा कितनी खतरे में है

०००००
रवि कुमार

रंग – कविता – रवि कुमार

सामान्य

रंग
(a poem by ravi kumar, rawatabhata)

रंग बहुत महत्वपूर्ण होते हैं
इसलिए भी कि
हम उनमें ज़्यादा फ़र्क कर पाते हैं

कहते हैं पशुओं को
रंग महसूस नहीं हो पाते
गोया रंगों से सरोबार होना
शायद ज़्यादा आदमी होना है

यह समझ
गहरे से पैबस्त है दिमाग़ों में
तभी तो यह हो पा रहा है
कि
जितनी बेनूर होती जा रही है ज़िंदगी
हम रचते जा रहे हैं
अपने चौतरफ़ रंगों का संसार

चहरे की ज़र्दी
और मन की कालिख
रंगों में कहीं दब सी जाती है

०००००
रवि कुमार

कब आओगे – कविता – रवि कुमार

सामान्य

कब आओगे
( a poem by ravi kumar, rawatbhata )

खुलता है ख़त
और शब्द टपक पड़ते हैं
कब आओगे

पंछी चहचहाते हैं
वृक्ष झूमते हैं
गीत गाती है हवा
कब आओगे

मशीनों का थका देने वाला शोर
लगने लगता है मधुर संगीत
बोल फूट पड़ते हैं उसी ताल में
कब आओगे

वह सोचता है
हथेलियों की नाज़ुक छुअन को
फूल शरमाने लगते हैं
महसूसता है
नन्हीं सी किलकारी को
चांद बादलों की ओट में छिप जाता है

घर-भर की स्मृतियों के
चिलकते कोलाज़ में
उसे अपने कंधे
बहुत भारी लगने लगते हैं
वह टटोलता है
मनीआर्डर भेजने के बाद
जेब की बची अपनी हैसियत को
केंटीन के खाने की तरह
गले में अटकने लगता है वही सवाल
कब आओगे

कब आओगे की सदा
और किसी के इन्तज़ार में होने के
तल्ख़ अहसास के बावज़ूद
रविवार से रविवार
गुजरते रहते हैं महिने
वह भेज भी नहीं पाता एक जवाबी ख़त

वैसे एक ज़िम्मेदार
आदमी की हैसियत से
रोज़ सोने से पहले
वह सोचता है बिना नागा
घर जाने के बारे में

अब के त्यौहार पर तो जरूर

०००००
रवि कुमार

बच्चे और फूल – कविता

सामान्य

बच्चे और फूल
( a poem by ravi kumar, rawatbhata )

बच्चे और फूल – पूर्वार्ध

बच्चों को फूल बहुत पसंद हैं
वे उन्हें छू लेना चाहते हैं
वे उनकी ख़ुशबू के आसपास तैरना चाहते हैं
उन्हें तितलियां भी बहुत पसंद हैं

बच्चों को उनके नाम-वाम में
कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती
वे तो चुपके से कुछ फूल तोड़ लेना चाहते हैं
और उन्हें अपने जादुई पिटारे में
समेटे गए और भी कई ताम-झाम के साथ
सुरक्षित रख लेना चाहते हैं
वे फूलों को सहेजना चाहते हैं

वे चाहते हैं
कि जब भी खोले अपना जादुई पिटारा
वही रंग-बिरंगा नाज़ुक अहसास
उन्हें अपनी उंगलियों के पोरों के
आसपास महसूस हो
वे इत्ती जोर से साँस खींचें
कि वही बेलौस ख़ुशबू
उनके रोम-रोम में समा जाए

वे शायद ऐसा भी सोच सकते हैं
कि यदि फूल होंगे उनके पास
तो आएंगी अपने-आप
उनके पास तितलियां

फूल और तितलियां
अक्सर उनकी चेतना में गड्डमड्ड हो जाते हैं

जब फूल उनकी नज़र में होते हैं
वे देख-सुन नहीं रहे होते हैं
चेतावनियां और नसीहतें
ना वे फँस पा रहे होते हैं
सभ्यता और संस्कारों के मकड़जाल में

दरअसल
जब फूल उनके दिमाग़ में होते हैं
तब उनके दिमाग़ में कुछ और नहीं होता

इधर-उधर
यूं ही दौड़ते-भागते
फूलों के आसपास मंडराते
बच्चे
सिर्फ़ बड़ों से नज़रे बचाना चाहते हैं
०००००

बच्चे और फूल – उत्तरार्ध

बच्चे उदास हैं
उनके जादुई पिटारे में सहेजे फूल
मुरझा गए हैं
नहीं शायद
वे सोच रहे हैं कि मर गए हैं

वे सदमें में हैं
कल्पनालोक घायल है
रंग खो गए हैं कहीं
ख़ुशबुएं संड़ांध मारने को हैं

सारी चेतावनियां और नसीहतें
उनकी आँखों में उतर आए पानी में
फूलों और तितलियों के साथ
बेतरतीबी से चिलक रही हैं

जादुई पिटारे की रहस्यमयी दुनियां
कुछ समय के लिए ख़ामोश हो गई है

बच्चे आख़िरकार बच्चे हैं
फूलों को फिर से देखते ही
कौंध उठती हैं उनकी आँखों में वही चमक
उनके कल्पनालोक में
उन्हें सहेजने के
नये-नये इंतज़ामात कुलबुलाने लगते हैं

वे फिर से
नज़रे बचाकर पहुंच जाना चाहते हैं
फूलों और तितलियों के पास

कुछ सिरफिरे कहते हैं
फूलों और ख़ुशबुओं को सहेजना
आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है
इस दुनियां को बचाए रखने के लिए।
०००००

रवि कुमार

एक ऐसे समय में – कविता – रवि कुमार

सामान्य

एक ऐसे समय में
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

एक ऐसे समय में
जब काला सूरज ड़ूबता नहीं दिख रहा है
और सुर्ख़ सूरज के निकलने की अभी उम्मीद नहीं है

एक ऐसे समय में
जब यथार्थ गले से नीचे नहीं उतर रहा है
और आस्थाएं थूकी न जा पा रही हैं

एक ऐसे समय में
जब अतीत की श्रेष्ठता का ढ़ोल पीटा जा रहा है
और भविष्य अनिश्चित और असुरक्षित दिख रहा है

एक ऐसे समय में
जब भ्रमित दिवाःस्वप्नों से हमारी झोली भरी है
और पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक रही है

एक ऐसे समय में
जब लग रहा है कि पूरी दुनिया हमारी पहुंच में है
और मुट्ठी से रेत का आख़िरी ज़र्रा भी सरकता सा लग रहा है

एक ऐसे समय में
जब सिद्ध किया जा रहा है
कि यह दुनिया निर्वैकल्पिक है
कि इस रात की कोई सुबह नहीं
और मुर्गों की बांगों की गूंज भी
लगातार माहौल को खदबदा रही हैं

एक ऐसे समय में
जब लगता है कि कुछ नहीं किया जा सकता
दरअसल
यही समय होता है
जब कुछ किया जा सकता है

जब कुछ जरूर किया जाना चाहिए

०००००
रवि कुमार

दीपावली फिर टल गई

सामान्य

दीपावली फिर टल गई
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

deep

आफ़ताब का दम भरने वाले
दिए की लौ से खौफ़ खा गए

आखिर ब्लैकआउट के वक्त
उनके ही घर से
रौशनी के आग़ाज़ का जोखिम
वे कैसे उठा सकते थे

आफ़ताब के सपने संजोती
उनकी ओर ताक रही निगाहें
नागहां बौखला गईं
और चूल्हों की आंच को
राख में रपेट दिया गया

दीपावली
एक बार फिर टल गई

०००००
रवि कुमार

आफ़ताब – सूर्य, आग़ाज़ – शुरूआत, नागहां – अचानक

समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता

सामान्य

हरीश भादानी जी नहीं रहे. कल २ अक्टूबर को उनका निधन हुआ.

जो उन्हें जानते हैं, वे सब जानते ही हैं.
वे जन-आंदोलनों के प्रिय जनकवि रहे हैं. कई कला-विधाओं के जरिए जन-जन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने और जागॄति की अलख जगाने वाले, बीकानेर (राजस्थान) के भादानी जी सामाजिक व राजनैतिक जागरुकता के लिए सदैव संघंर्षरत रहे.

उनका एक गीत हम बचपन में खूब गाया करते थे:

रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है
बोले खाली पेट की, करोड़-करोड़ कुंदियां
खाकी वर्दी वाले भोपें, भरे हैं बंदूकियां
राज के विधाता सुन, तेरे ही निमत हैं
रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है
०००००

आज की यह कविता उन्हीं की स्मृति को समर्पित।

समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता
( a poem by ravi kumar, rawatbhata)

5

समन्दर
कभी ख़ामोश नहीं हुआ करता

उस वक़्त भी नहीं
जबकि सतह पर
वह बेहलचल नज़र आ रहा हो
लाल क्षितिज पर सुसज्जित आफ़ताब को
अपने प्रतिबिंब के
समानान्तर दिखाता हुआ
बनाता हुआ
स्याह गहराते बादलों का अक़्स

उस वक़्त भी सतह के नीचे
गहराइयों में
जहां कि आसमान
तन्हाई में डूबा हुआ लगता है
एक दुनिया ज़िन्दा होती है
अपनी उसी फ़ितरत के साथ
जिससे बावस्ता हैं हम

कई तूफान
करवटें बदल रहे होते हैं वहां
कई ज्वालामुखी
मुहाने टटोल रहे होते हैं वहां

ज़िंदगी और मौत के
ख़ौफ़नाक खेल
यूं ही चल रहे होते हैं वहां

उस वक़्त भी
जबकि समन्दर
बेहद ख़ामोश नज़र आ रहा होता है

०००००
रवि कुमार

ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा

सामान्य

ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

roohom mein

मैं आऊंगा
जब चाक हो जाएगी हर राह
कि जब हर तरफ़ बिछी होंगी
बारूदी सुरंगें
और जबकि हमेशा के लिए
चुक जाएगी बारिश की उम्मीद

मैं आऊंगा
जब तुम्हारे सुर्ख़ लब तड़पने लगेंगे
एक तवील बोसे के लिए
कि जब तुम समझ चुकी होगी
चारों तरफ़ दीवारें होने का सबब
जबकि तुम तन्हाई में
कर रही होगी मौत की दुआ

मैं आऊंगा
फिर हम तुम गाएंगे मिलकर
ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा
और क़त्लगाह के
ख़ूं से सने हर सुतून पर
कर देंगे तहरीर
शबे-वस्ल की महक को

इससे पहले कि
हमारे मुख़ालिफ़ीन
सफ़्फ़ाकी से मुक़र्रर करें
हमारे लिए
सज़ा-ए-मौत

हम रूहों में तब्दील हो जाएंगे

०००००
रवि कुमार

तवील बोसा – लंबा चुंबन,  मुकद्दस – पवित्र,  सुतून – खंभा
तहरीर करना – लिखना,  शबे-वस्ल – मिलनरात्रि,  मुख़ालिफ़ीन – विरोधी,  सफ़्फ़ाकी – निष्ठुरता

आसमान फिर सिमट रहा है

सामान्य

आसमान फिर सिमट रहा है
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

n2

आसमान जब भी उतरता है धरा पर
उसके पास होते हैं
सूरज, चाँद, सितारे
और एक असीमित फैलाव
उन्मुक्त उड़ान के लिए

धरा
चाँद सितारों से दमकती
अनन्त ओढ़नी को
क्षण भर भी अपने पर
लिपटे रहने के रोमांच में
अभिभूत हो उठती है

इस अभिभूत क्षण में
आसमान सिमटता है चुपचाप
झुकता है तेजी से
और धरा में समा जाता है

जब तक धरा
लौटती है आपे में
आसमान फैल चुका होता है
वैसे ही
दूर बहुत दूर
उसी निर्लिप्तता से

और धरा
एक हसीं ख़्वाब टूट जाने की तरहा
ठगी सी रह जाती है

हमें ऐसा ही लगता है
कितना मधुर मिलन हो कर चुका है
क्षितिज पर
धरा और आसमान का

उफ़
आसमान फिर से सिमट रहा है
एक और क्षितिज पर…

०००००
रवि कुमार