Category Archives: कविताएं-अन्य कवियों की

उसे शांति की चाह है मुझे बगावत की

सामान्य

शिवराम की कुछ कविताएं

इस बार प्रस्तुत हैं शिवराम की ही कुछ कविताएं. ये कविताएं कुछ समय पहले ही लिखी हुई थीं. ‘कथन’ ने अपने जनवरी-मार्च, २०११ अंक में शिवराम को याद करते हुए, राजाराम भादू का उन पर स्मृति-आलेख और यह कविताएं प्रकाशित की हैं.

चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा


चाह

वह
तट खोज रहा है
मैं
समन्दर
वह
दो गज ज़मीन
मैं
दो पंख नवीन

उसे शांति की चाह है
मुझे बगावत की

०००००

तृप्ति-अतृप्ति

आदर
उम्मीद से सौ गुना अधिक
प्यार
चाहत से बहुत-बहुत कम

यही तृप्ति-अतृप्ति
अपनी ज़िंदगी का दम-खम

पल-पल को जिया

विष भी – अमृत भी
यूं नहीं
तो यूं पिया

असंतुष्ट भी हूं
संतुष्ट भी

जो पाना चाहा नहीं मिला
जो करना चाहा कर लिया

०००००


जैसा भी था वैसा ही हूं

पंख नहीं थे
फिर भी मैंने भरी उड़ानें

पैर नहीं थे
फिर भी मैंने दौड़ लगाई

हाथ नहीं थे
फिर भी मैंने पर्वत खिसकाए

आंख नहीं थी
फिर भी मैंने देखी जग की गहराई
नापी – जानी

सिखलाया मुझे तैरना
थपेड़ों दर थपेड़ों ने लहरों के
डूबा नहीं
तैर-तैर कर करी सफाई
कीचड़ – काई

जलकुंभी
छाई वनस्पति भांति-भांति की
बिना जड़ों की
बिना अर्थ की
बोईं बेल सिंघाड़े की

ह्र्दय नहीं था
फिर भी मैंने प्यार किया सृष्टि से
वक़्त नहीं था
फिर भी मैंने हर दायित्व निभाया
जितना खोया उतना पाया

जैसा भी था वैसा ही हूं
निकट भविष्य आसन्न युद्ध हित
अस्त्र चलाना – शस्त्र चलाना
सीख रहा हूं

०००००

यह कब पता चला

तेरे दिल में जहर भरा है
यह कब पता चला
मेरे दिल का घाव भरा है
यह कब पता चला

पानी नहीं बचा आंखों में
यह कब पता चला
थोथा जीवन बचा जगत में
यह कब पता चला

दरिया नहीं है दलदल है ये
यह कब पता चला
लाल नहीं वह नीला रंग है
यह कब पता चला

गली प्रेम की बहुत तंग है
यह कब पता चला

प्रेम नहीं यह दीर्घ जंग है
यह कब पता चला

इंतज़ार किसका पल-पल है
यह कब पता चला
मैं भी संग हूं कहा था किसने
यह कब पता चला

०००००

तुम्हारे बाद

जैसे झक्क दोपहरी में
डूब जाए सूरज

जैसे सूख जाए अचानक

कोई कल-कल बहती नदी

जैसे किसी पर्वत की छाती से
देखते-देखते अदृश्य हो जाए
कोई उछलता हुआ झरना

जैसे दमकते चांद को
निगल जाए आसमान

पीठ थपथपाता कोई स्नेहिल हाथ
आंख पोंछती खुरदरी अंगुलियां
आगे-आगे चलते दृढ़ कदम
अचानक लुप्त हो जाएं जैसे

कुछ वैसा ही लग रहा है कामरेड़
तुम्हारे बाद
सब कुछ उदास-उदास
बाहर भीतर, दूर-दूर, आस-पास

०००००

शिवरामशिवराम

( जाने-माने नुक्कड़ नाटककार और साहित्यकार. ‘अभिव्यक्ति’ पत्रिका का संपादन. सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेपों के ज़रिए निरंतर परिवेश को आंदोलित करते रहने वाले गंभीर अध्येता और कुशल वक्ता. जन्म : 23 दिसंबर, 1949. निधन : 01 अक्टूबर, 2010.)
उनके बारे में थोड़ा अधिक जानने के लिए इस लिंक पर जाएं. ‘शिवराम : एक संक्षिप्त जीवन वृत्त’

प्रस्तुति – रवि कुमार

पूर्ण सहमति तो एक अपवाद पद है

सामान्य

( ‘इतिहास बोध’ में छपी ईश्वरचंद्र पाण्डे की यह महत्वपूर्ण कविता यहां प्रस्तुत की जा रही है। देखिए किस नायाब तरीके से उन्होंने अपनी निराली दृष्टि को अभिव्यक्त किया है। आज के समय की अपेक्षा को बख़ूबी शब्द दिये हैं….यह अभी जनपक्ष में भी दी गई थी, यहां पुनः प्रस्तुत की जा रही है ताकि यहां के पाठक भी इससे महरूम ना रहें….)


असहमति

चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

अगर कहूंगा शून्य
तो ढूंढ़ने लग जाएंगे बहुत से लोग बहुत कुछ
इसलिए कहता हूं    खालीपन

जैसे     बामियान में बुद्ध प्रतिमा टूटने के बाद का
जैसे     अयोध्या में मस्जिद ढ़हने के बाद का

ढहा-तोड़ दिए गये दोनों
ये मेरे    सामने-सामने की बात है

मेरे सामने बने नहीं थे ये
किसी के सामने बने होंगे

मैं बनाने का मंज़र नहीं देख पाया
वह ढहाने का

इन्हें तोड़ने में कुछ ही घंटे लगे
बनाने में महिनों लगे होंगे    या फिर वर्षों
पर इन्हें बचाए रखा गया सदियों-सदियों तक

लोग जानते हैं इन्हें तोड़ने वालों को नाम से जो गिनती में थे
लोग जानते हैं इन्हें बनाने वालों के नाम से जो कुछ ही थे
पर इन्हें बचाए रखने वालों को नाम से कोई नहीं जानता
असंख्य-असंख्य थे जो

पूर्ण सहमति तो एक अपवाद पद है
असहमति के आदर के सिवा
भला कौन बचा सकता है किसी को
इतने लंबे समय तक

०००००

हरीशचन्द्र पाण्डे
प्रस्तुति – रवि कुमार

ईश्वर एक बड़ी सुविधा है – हरीशचन्द्र पाण्डे की कविताएं

सामान्य

अभी ‘इतिहास बोध’ में हरिशचन्द्र पाण्ड़े की कविताओं से गुजरना हुआ। छोटे कलेवर की तीन बेहतरीन कविताओं को यहां साभार प्रस्तुत कर रहा हूं। शायद पसंद आएं।

ईश्वर एक बड़ी सुविधा है

चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

देवता

पहला पत्थर
आदमी की उदरपूर्ति में उठा

दूसरा पत्थर
आदमी द्वारा आदमी के लिए उठा

तीसरे पत्थर ने उठने से इंकार कर दिया
आदमी ने उसे देवता बना दिया

ईश्वर

उसकी आंखे बंद समझ
डंडी मार लो
बलात्कार कर लो
या गला रेत दो आदमी का
ईश्वर एक बड़ी सुविधा है

विचार

तुमने दिया एक विचार
और उसे फूलों से लाद दिया

तुमने अगरबत्ती दिखाई उसे
उसकी रक्षा के लिए कवच बनाए
उसके संकेत के लिए
लंबी पताका फहराई शीर्ष पर

उसकी पावनता की अक्षुण्णता के लिए
तुमने
ईंट-गारे से लेकर संगमरमर तक के आलय बनाए

उसकी आराधना में फूल चढ़े थे सबसे पहले
फिर जानवर चढ़े
और फिर आदमी ही आदमी

एक से अनेक तो हुए
मगर मूर्त न हुए विचार

मूर्ति हो गए

०००००

हरीशचन्द्र पाण्ड़े

प्रस्तुति – रवि कुमार

एक अच्छी नींद – नचिकेता

सामान्य

नचिकेता के गीत

पत्रिका उदभावना के पन्ने पलटते हुए, बहुत समय के बाद नचिकेता के गीत पढ़ने को मिले.
उनका हर गीत कई आयामों से बावस्ता होता है और पाठक से सीधे संवाद करता है. इनको गुनगुनाना इनके प्रभाव को कई गुना कर देता है.
इस बार उनका एक गीत प्रस्तुत है.

एक अच्छी नींद

एक अच्छी
नींद सोना चाहता हूं

चाहकर ही
सदा हासिल हँसी होती
बिना चाहे है मिली
बेबसी होती
घाम से तम
घना धोना चाहता हूं

बिना चाहे
कब हुए हैं स्वप्न पूरे
काहिलों के कर्म होते
हैं अधूरे
पकड़ माथा
मैं न रोना चाहता हूं

चाहने से
रुख़ पलट जाता हवा का
कथानक भी बदल जाता
है कथा का
मैं न आया
वक्त खोना चाहता हूं

एक अच्छी
नींद सोना चाहता हूं

०००००
नचिकेता
द्वारा प्रेमचंद प्रसाद,
पथ सं. १, आज़ाद नगर
कंकड़बाग, पटना-८०००२०

प्रस्तुति – रवि कुमार

शिवराम की कविताएं

सामान्य

शिवराम की कविताएं

कोटा में शिवराम की तीन कविता पुस्तकों का विमोचन था। इस अवसर पर, उनकी कविताओं पर कुछ पोस्टर खींच-खांचकर मैं भी वहां उपस्थित था। कार्यक्रम की विस्तृत रपट की प्रस्तुति पर तो आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी जी का कॉपीराईट है। अभी वे बाहर हैं, जल्द ही शायद उनके यहां प्रस्तुत होगी।
अपने पोस्टर तो यहां बाद में प्रस्तुत करने ही हैं।
अभी ताजातरीन प्रभाव में शिवराम की तीन कविताएं प्रस्तुत कर रहा हूं।

व्यथा की थाह
vyatha
किसी तरह
अवसर तलाशो
उसकी आँखों में झाँको

चुपचाप

गहरे और गहरे

वहाँ शायद
थाह मिले कुछ

उसकी व्यथा का
पूछने से
कुछ पता नहीं चलेगा।

०००००

जो चले, वे ही आगे बढ़े
jo chale
जुए के तले ही सही
जो चले
वे ही आगे बढ़े

जिनकी गर्दन पर भार होता है
उनके ह्रदय में ही क्षोभ होता है

कैद होते हैं जिनके अरमान
वे ही देखते हैं मुक्ति के स्वप्न

जो स्वप्न देखते हैं
वे ही लड़ते हैं

जो लड़ते हैं
वे ही आगे बढ़ते हैं

जो खूँटों से बँधे रहे
बँधे के बँधे रह गये

जो अपनी जगह अड़े रहे
अड़े के अड़े रह गये।

०००००

महाभारत के कुछ सबक

mahabharat

धृतराष्ट्रों को
दुर्योधनों की
वैसी ही जरूरत होती है
जैसी कृष्णों को
अर्जुनों की

सत्ता की प्रतिबद्धता हो या निर्भरता
भीष्मों की भी वैसी ही
दुर्गति होती है
जैसी द्रोणाचार्यों की

अभिमन्यु
घेर कर ही मारे जाते हैं सदा
सदैव छले जाते हैं
कर्ण, एकलव्य और बर्बरीक

सत्ता पौरूष की हो या पूँजी की
कुन्तियाँ, गांधारी, राधाएँ और द्रोपदियाँ
समस्त पत्नियाँ, समस्त प्रेयसियाँ, समस्त स्त्रियाँ
होती हैं अभिशप्त

न्याय और सत्य
सिर्फ़ झंड़े पर लिखे होते हैं
लड़े जाते हैं सभी युद्ध
स्वार्थ और सत्ता के लिए

सभी पक्षों के होते हैं
अलग-अलग न्याय, अलग-अलग सत्य।

०००००

शिवराम

०००००
प्रस्तुति – रवि कुमार