Author Archives: रवि कुमार

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रवि कुमार, रावतभाटा, कोटा, ( राजस्थान ). संपर्क : ravikumarswarnkar@gmail.com एक बेहतर आदमी बनने की प्रक्रिया में एक साधारण सा आदमी...

हमारा समय और सांस्कृतिक चुनौतियां

सामान्य

शिवराम स्मृति समारोह
“हमारा समय और सांस्कृतिक चुनौतियां” पर परिचर्चा
“हमारे पुरोधा : शिवराम” का लोकार्पण


कोटा, २ अक्टूबर. २०१४

शिवरामसुप्रसिद्ध रंगकर्मी एवं साहित्यकार शिवराम के चतुर्थ स्मृति-दिवस पर विकल्प जन सांस्कृतिक मंच, कोटा द्वारा गत १ अक्टूबर, २०१४ को एम. डी. मिशन कॉलेज के सभागार में एक समारोह का आयोजन किया गया। “हमारा समय और सांस्कृतिक चुनौतियां” विषय पर एक सार्थक परिचर्चा और राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित एवं महेन्द्र नेह द्वारा लिखित पुस्तक “हमारे पुरोधा : शिवराम” का लोकार्पण इस समारोह के मुख्य आकर्षण रहे। इस अवसर पर रवि कुमार द्वारा शिवराम की रचनाओं पर केंद्रित एक कविता पोस्टर श्रृंखला का प्रदर्शन भी किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार प्रो० मोहन श्रोत्रिय ने परिचर्चा का समाहार करते हुए कहा कि हमारा देश-समाज इस समय गहरे सांस्कृतिक संकट से गुजर रहा है। संस्कृति और धर्म का घालमेल किया जा रहा है, धर्म को संस्कृति की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। जबकि संस्कृति कहीं अधिक व्यापक संकल्पना है जिसका कि धर्म एक संकीर्ण अवयव मात्र है। हमारी विविधता से भरी समावेशी संस्कृति निशाने पर है और इस पर कट्टरवादी सामंती धार्मिक प्रभुत्व का संकट हमारे समय की सबसे बड़ी सांस्कृतिक चुनौती है। इस संकट के लिए मात्र कुछ संगठनों और मीडिया को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि संकट की जड़ो को तलाशना होगा। उन्होंने विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहा कि वर्तमान बाज़ारवादी संस्कृति के साथ धार्मिक उन्माद पैदा करने वाली पतित संस्कृति का ताना-बाना बुनकर देशवासियों को विकास के दुस्वप्न दिखाये जा रहे हैं। इसके पीछे देश के शासक-वर्ग हैं, जो साम्राज्यवादी आर्थिक-राजनैतिक ताकतों के साथ दुरभि संधि करके देश के संसाधनों की अंधी लूट के लिए सांस्कृतिक विभ्रमों की सृष्टि कर रहे हैं। हमें फासीवाद की आहटों को सुनना, पहचानना सीखना-सिखाना होगा और उनके खिलाफ़ एक व्यापक राजनैतिक और संस्कृतिकर्म की लामबंदी करनी होगी। कलाकर्म को व्यक्तिगतता के दायरे से बाहर निकालना होगा, क्योंकि हर व्यक्तिगत कर्म अंततः राजनैतिक होता ही है, पर्सनल इज़ पॉलिटिकल। कला जगत को वर्तमान राजनीति के प्रतिकार की राजनीति में उतरना होगा, यही हम कला और संस्कृतिकर्मियों के लिए हमारे समय की चुनौतियों के खिलाफ़ एक सक्रिय और सचेत प्रतिरोध की राह हो सकती है।

वरिष्ठ शायर और विकल्प के अध्यक्ष अखिलेश अंजुम के स्वागत वक्तव्य के बाद परिचर्चा की शुरुआत करते हुए रंगकर्मी संदीप राय ने कहा कि शिवराम ने वर्तमान शोषक-शासक व्यवस्था के जन-विरोधी चरित्र को बेनकाब करने तथा उसके विरुद्ध प्रतिरोध जगाने के लिए सर्वाधिक प्रभावी माध्यम के रूप में नुक्कड़ नाटक को चुना। उनके नाटकों में आज के समय के संकटों की स्पष्ट अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। उन्होंने सत्तापोषित मीडिया के मुक़ाबले जन-मीडिया की आवश्यकता पर जोर दिया। साथी नारायण शर्मा ने कहा कि हमें वैचारिक प्रखरता एवं श्रमिकों-किसानों के बीच संस्कृति कर्म द्वारा नव जागरण की धार को विकसित करना होगा। व्यंग्यकार डॉ. अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि साहित्य और संस्कृति के लिए स्थापित जनसंचार माध्यमों में जगह लगातार कम हो रही है और वर्तमान समय की सांस्कृतिक चुनौतियों के पीछे नई तकनीक और हाई फाई ब्रेन योजनाबद्ध ढंग से काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं को प्रगतिशील और जनपक्षधर संस्कृति के मूल्यों से परिचित कराना समय की मांग है।

साथी बी.एम. शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि शिवराम ने अपने विचारों तथा संस्कृतिकर्म से एक वैकल्पिक रास्ता दिखाया था और हमें इसे और आगे बढ़ाना चाहिये। महेन्द्र नेह ने कहा कि शासक-वर्ग की की संस्कृति मरणशील संस्कृति है, साम्राज्यवाद का आर्थिक-जहाज डूब रहा है। पूंजी और सत्ता का फासीवादी गठजोड़ इस बात की स्पष्ट अभिव्यक्ति है कि आर्थिक संकट अब लाइलाज होता जा रहा है। हमें मीडिया के दुष्प्रचार से हताश न होकर जन-गण के बीच शासक-वर्ग के झूठ-फरेब के विरुद्ध न्याय व सचाई की अलख जगानी चाहिये। कार्यक्रम का संचालन करते हुए मशहूर शायर शकूर अनवर ने शिवराम के संस्कृतिकर्म को धर्म जाति, संप्रदाय की सीमाओं को तोड़कर एक न्यायपरक व समतामूलक समाज के सपने जगानेवाला प्रेरणादायक संस्कृतिकर्म बताया।

hamare purodha‘हमारे पुरोधा : शिवराम’ पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए कवि-समीक्षक हितेश व्यास ने कहा कि शिवराम ने अपने नाटकों के जरिये जनता की सोई हुई चेतना को जगाने का काम किया और उनकी कविताओं में भी लोक नाट्य और जन चेतना की प्रखर कलात्मकता है जो जीवन के यथार्थ से उपजी है। डा. प्रेम जैन ने पुस्तक-परिचय के रूप में अपनी लिखित टिप्पणी में कहा कि महेन्द्र नेह ने इस पुस्तक के ज़रिये शिवराम के जीवन, कविताओं, नाटकों व गद्य से न केवल हमें परिचित कराया है, अपितु उनके लेखन में गुंथी हुई युगपरिवर्तनकामी ऊर्जा को भी पाठकों तक पहुंचाने का कार्य किया है। डॉ. ओम नागर ने कहा कि शिवराम के नाटकों का हाड़ौती भाषा में अनुवाद करते समय उन्होंने अनुभव किया कि शिवराम में जन मनोविज्ञान और लोक मुहावरों को चित्रित करने की अपूर्व क्षमता थी, और यही कारण था कि उनके नाटक जनता से सीधे संवाद करते थे, उनकी चेतना में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करते थे।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यात कवि अंबिकादत्त ने कहा कि परिवर्तनकामी चेतना को अपने साहित्य व नाटकों के जरिये व्यापक जन तक ले जाने वाले शिवराम जैसे रचनाकार विरल ही होते हैं। उनके सानिध्य की ऊर्जा अभी तक हमें इस तरह आंदोलित करती है कि लगता ही नहीं कि वे अब हमारे बीच में नहीं है। वरिष्ठ रचनाकार निर्मल पाण्डेय ने शिवराम को जीता-जागता जन-मीडिया और समय के आगे चलने वाले संस्कृतिकर्मी बताया। विशिष्ट अतिथि डॉ. नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी ने संस्कृति और साहित्य के संबंधों को व्याख्यायित करते हुए शिवराम के योगदान को रेखांकित किया। अध्यक्ष मंडल के सदस्य दिनेश राय द्विवेदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिवराम के जीवन और रचनाकर्म में कोई विलगाव नहीं था। वे जैसा देखते और विश्लेषित करते थे, वैसा लिखते थे और जैसा लिखते थे वैसा ही अपने जीवन में उतारते और सक्रिय रहा करते थे। समय के द्वंद्वों और अंतर्विरोधों को समझने और उन्हें अपनी रचनाओं में सहजता से ढ़ालने की क्षमता उनके अंदर गहरे से पैबस्त थी। उन्होंने अपने नाटकों व कविताओं से जनता को प्रतिरोध की संस्कृति से संस्कारित करने, भयमुक्त होने तथा विद्रोह की ओर आगे बढ़ने की राह प्रशस्त की।

अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए विकल्प के महासचिव महेन्द्र नेह ने सभी अतिथियों और भागीदारों का आभार व्यक्त किया। समारोह में कोटा शहर के साहित्य-कला-संस्कृति कर्मियों और प्रेमियों के साथ-साथ शिवराम के परिवारजनों ने भी सक्रिय भागीदारी की।

विकल्प जन सांस्कृतिक मंच, कोटा

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साधों, मिलीजुली ये कुश्ती – महेन्द्र नेह के पद

सामान्य

साथी, संस्कृति एक न होई – महेन्द्र नेह के पद

mahendra nehइस बार प्रस्तुत हैं कोटा ( राजस्थान ) से ही साहित्यकार और जनगीतकार महेन्द्र नेह के कुछ नई पद-रचनाएं। जनआंदोलनों में संघर्षशील अवाम और साथी जिन बहुत से जनगीतों से ऊर्जा पाया करते थे और हैं, उनमें महेन्द्र नेह के कई मशहूर जनगीत भी शामिल रहे हैं। जनसंघर्षों में स्वयं अपना जीवन होम कर देने वाले साथी महेन्द्र नेह आज भी भरसक सक्रिय रहते हैं और विभिन्न स्तरों पर कई कार्रवाइयों में लगे हुए हैं। ‘विकल्प’ अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक-सामाजिक मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, और कई संगठनों में भी सक्रिय हैं। साथ ही ‘अभिव्यक्ति’ पत्रिका का संपादन भी उन्हीं के जिम्मे हैं।

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( १ )

साथी, संस्कृति एक न होई ।
जो संस्कृति लुट्टन खोरन की अपनी कैसे होई ।।

हमरा किया शिकार, रोंधते और पकाते हमको ।
देते हैं उपदेश, भगाना भू-तल से है तम को ।।

जो हम को चंडाल समझते, छुआछूत करते हैं ।
उनका भाग्य चमकता है, हम बिना मौत मरते हैं ।।

उनकी संस्कृति राजे-रजवाड़ों, सेठों की गाथा ।
उनकी संस्कृति अधिनायक है, जन-गण ठोके माथा ।।

उनकी संस्कृति भ्रम रचती है, सिर के बल चलती है ।
अपनी संस्कृति सृजन-कर्म, परिवर्तन में ढलती है ।।

उनकी संस्कृति सच पूछें तो दुष्कृति है, विकृति है ।
अपनी संस्कृति सच्चे माने जन-जन की संस्कृति है ।।

( २ )

साधों, मिलीजुली ये कुश्ती ।
लोकतंत्र की ढपली ले कर करते धींगामुश्ती ।।

जनता की मेहनत से बनती अरबों-खरबों पूंजी ।
उसे लूट कर बन जाते हैं, चन्द लुटेरे मूँजी ।।

उन्ही लुटेरों की सेवा में रहते हैं ये पंडे ।
जनता को ताबीज बाँटते कभी बाँटते गंडे ।।

इनका काम दलाली करना धर्म न दूजा इनका ।
भले लुटेरा पच्छिम का हो या उत्तर-दक्खिन का ।।

धोखा दे कर वोट मांगते पक्के ठग हैं यारों ।
इनके चक्रव्यूह से निकलो नूतन पंथ विचारो ।।

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( ३ )

साधो, घर में घुसे कसाई ।
बोटी-बोटी काट हमारी हमरे हाथ थमाई ।।

छीने खेत, जिनावर छीने, छीनी सकल कमाई ।
भँवरों की गुनगुन-रस छीना, तितली पंख कटाई ।।

मधु छीना, छत्तों को काटा, नीचे आग लगाई ।
इतना धुँआ भरा आँखों में, देता नहीं दिखाई ।।

नदियाँ गँदली, पोखर गँदले, गँदले ताल-तलाई ।
पानी बिके दूध से मँहगा, कैसी रीत चलाई ।।

नये झुनझुनों की सौगातें, घर-घर में बँटवाई ।
इतनी गहरी मार समय की, देती नहीं सुनाई ।।

किससे हम फरियाद करें, अब किससे करें दुहाई ।
नंगों की महफिल में, नंगे प्रभुओं की प्रभुताई ।।

( ४ )

साधो, यह कैसा मोदी ।

जिसने दिया सहारा पहले उसकी जड़ खोदी ।
फसल घृणा की, फूटपरस्ती की गहरी बो दी ।।

नारे हैं जनता के, बैठा धनिकों की गोदी ।
कौन महावत, किसका अंकुश किसकी है हौदी ।।

विज्ञापन करके विकास की अर्थी तक ढो दी ।
नहीं मिला खेतों को पानी, धरती तक रो दी ।।

ख़ुद के ही अमचों-चमचों ने मालाएं पो दीं ।
ख़ुद ही पहना ताज, स्वयं ही बन बैठा लोदी ।।

० महेन्द्र नेह

क़यामत ढा दिया करता है इक टूटा सितारा भी – पुरुषोत्तम यक़ीन

सामान्य

क़यामत ढा दिया करता है इक टूटा सितारा भी
( gazals by purushottam yaqeen )

इस बार प्रस्तुत है कोटा (राजस्थान) के एक महत्त्वपूर्ण रचनाकार पुरुषोत्तम यक़ीन के कुछ अश्‍आर। ढेर सारी किताबों, उस्तादगी और एक बड़ी पहचान के बावज़ूद वे जिस सहजता और सरलता के साथ सभी के लिए उपलब्ध होते हैं उसी सहजता के साथ वे दुनिया की पेचीदगियों से भी पूरी जिम्मेदारी से बाबस्ता होते हैं। यही उनके गीतों-गज़लों की ताक़त है और उनकी विशिष्ट पहचान भी।

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( 1 )

इक कहानी थी हक़ीक़ी-सी लगी
इक हक़ीक़त भी कहानी-सी लगी

उस ने जो बोला वो सच होगा ज़रूर
उस की इक-इक बात चुभती-सी लगी

ग़ौर से डाली जो दुनिया पर नज़र
मुझ को इक-इक आंख भीगी-सी लगी

हर कोई तपता है इक अंगार-सा
दुनिया इक जलती अंगीठी-सी लगी

( 2 )

किस क़दर तंग ज़माना है कि फ़ुरसत ही नहीं
वो समझते हैं हमें उन से मुहब्बत ही नहीं

दोपहर सख़्त है, सूरज से ठनी है मेरी
ऐसे हालात में आराम की सूरत ही नहीं

शाम से पहले पहुंचना है उफ़ुक़ तक मुझ को
मुड़ के देखूं कभी इतनी मुझे मुहलत ही नहीं

देखा कुछ और था महफ़िल में बयां और करूं
ये न होगा कभी, ऐसी मेरी फ़ितरत ही नहीं

यूं तो बनते भी हैं क़ानून यहां रोज़ नये
न्याय मुफ़्लिस को मिले ऐसी हुकूमत ही नहीं

( उफ़ुक़ – क्षितिज )

( 3 )

हम समझते थे जिसे ताबो-तवाँ का पैकर
वक़्त पर निकला वही आहो-फ़ुग़ाँ का पैकर

मतलबो-मौक़ापरस्ती के हैं किरदार सभी
किस बलंदी पे है देखो तो जहाँ का पैकर

हर तरफ़ अब तो नज़र में हैं लहू के धब्बे
कितना बदरंग हुआ अम्नो-अमाँ का पैकर

( ताबो-तवाँ – ओजस्व और सामर्थ्य, पैकर – आकृति, मूर्ति )

( 4 )

लोग रहते भी हैं वीरान मकाँ लगते हैं
क्यूं सभी अपने सिवा ग़ैर यहाँ लगते हैं

इन दरीचों को ज़रा खोल दो आने दो हवा
वर्ना दम घुटने के आसार अयाँ लगते हैं

नक़्शे-पा जिन पे तू चल के चला आया है
वो तेरे अपने ही क़दमों के निशाँ लगते हैं

( दरीचों – खिड़कियों, अयाँ – स्पष्ट, नक़्शे-पा – पद-चिह्न )

( 5 )

ग़मों के इस समुंदर का कहीं होगा किनारा भी
सफ़र जारी है, हम पायेंगे मंज़िल का इशारा भी

दिया दिल का तो है रोशन कि नफ़रत के अंधेरों में
है काफ़ी डूबतों को एक तिनके का सहारा भी

तुम्हारे फ़ैसलों पर सर बहुत हमने कटाये हैं
मुक़द्दर अब हमें लिखना है अपना भी तुम्हारा भी

मेरी हस्ती पे मत जाना, कभी ऐसा भी होता है
क़यामत ढा दिया करता है इक टूटा सितारा भी

( 6 )

हम अंधेरे में चरागों को जला देते हैं
हम पे इल्ज़ाम है हम आग लगा देते हैं

कल को खुर्शीद भी निकलेगा, सहर भी होगी
शब के सौदागरों ! हम इतना जता देते हैं

बीहडों में से गुज़रते है मुसलसल जो क़दम
चलते-चलते वो वहां राह बना देते हैं

जड़ हुए मील के पत्थर ये बजा है लेकिन
चलने वालों को ये मंज़िल का पता देते हैं

अब गुनह्गार वो ठहराऐं तो ठहराऐं मुझे
मेरे अशआर शरारों को हवा देते हैं

एक-एक जुगनू इकट्ठा किया करते हैं ‘यक़ीन’
रोशनी कर के रहेंगे ये बता देते हैं

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( रेखाचित्र – पुरुषोत्तम यक़ीन – द्वारा रवि कुमार )

०००००
पुरुषोत्तम यक़ीन

सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प – शिवराम

सामान्य

सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प

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मनमोहन की नाव में, छेद पचास हजार।
तबहु तैरे ठाठ से, बार-बार बलिहार॥
नाव में नदिया डूबी
नदी की किस्मत फूटी
नदी में सिंधु डूबा जाए
सिंधु में सेतु रहा दिखाय
सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।

वाम झरौखा बैठिके, दांयी मारी आंख।
कबहुं दिखावे नैन तो, कबहुं खुजावे कांख॥
नयन से नयन लड़ावै
प्रम बढ़तौ ही जावै
नयनन कुर्सी रही इतराय
‘सेज’ में मनुवा डूबौ जाय
सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।

माया सच्ची, माया झूठी, सिंहासन की माया।
ये जग झूठा, ये जग सांचा, ये जग ब्रह्म की माया॥
माया ब्रह्म अंग लगे
ब्रह्म माया में रमे
ब्रह्म की माया बरनी न जाय
ब्रह्म को माया रही लुभाय
सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।

अड़-अड़ के वाणी हुई, अडियल, चपल, कठोर।
सपने सब बिखरन लगे, घात करी चितचोर॥
चित्त की बात निराली
तुरुप बिन पत्ते खाली
चेला चाल चल रहा
गुरू अब हाथ मल रहा
सुनो भाई गप्प-सुनो भाई सप्प।

००००००

शिवराम

रेखाचित्र – कोरल बीच, अंड़मान का दृश्य

सामान्य

रेखाचित्र – कोरल बीच, अंड़मान

लगभग सात वर्ष पूर्व एक बार अंड़मान जाना हुआ था, वहां की मनोरम दृश्यावलियों के ताज़ा प्रभाव में यह तय किया था कि इन पर पेन-स्कैच की एक श्रृंखला तैयार करनी चाहिए। सिर्फ़ एक चित्र बनाया जा सका, दूसरा अधूरा ही रह गया…और जोश ख़त्म। यह वही रेखाचित्र है, जो कि अंड़मान के कोरल बीच का है।

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०००००
रवि कुमार

भगत सिंह – संक्षिप्त जीवन-यात्रा

सामान्य

“क्रांति से हमारा अर्थ है – अंत में समाज की ऐसी व्यवस्था की स्थापना जिसमें किसी प्रकार के हड़कम्प का भय न हो, जिसमें मज़दूर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए, और उसके फलस्वरूप विश्व संघ पूंजीवाद के बंधनों, दुखों तथा युद्धों की मुसीबतों से मानवता का उद्वार कर सके…”  – भगत सिंह

भगत सिंह – संक्षिप्त जीवन-यात्रा

प्रस्तुत है भगत सिंह की जीवन-यात्रा को संक्षिप्त रूप से प्रदर्शित करते हुए, कुछ पुराने पोस्टर जो कि शहादत-दिवस के मौके पर ही किए जाने वाले कार्यक्रमों में प्रदर्शन के लिए बनाए गए थे.

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मैं पुरुष खल कामी

सामान्य

मैं पुरुष खल कामी

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चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

मैं पुरुष हूं
एक लोहे का सरिया है
सुदर्शन चक्र सा यह
बार-बार लौट आता है, इतराता है

यह भी मैं ही हूं
आदि-अनादि से, हजारों सालों से
मैं ही हूं जो रहा परे सभी सवालों से

मैं सदा से हूं
मैं अदा से हूं

मैं ही दुहते हुए गाय के स्तनों को
रच रहा था अविकल ऋचाएं
मैं ही स्खलित होते हुए उत्ताप में
रच रहा था पुराण गाथाएं

मैं ही रखने को अपनी सत्ता अक्षुण्ण
गढ़ रहा था अनुशासन स्मृतियां
मैं ही स्वर्गलोक के आरोहण को
गढ़ रहा था महाकाव्य-कृतियां

मैं ही था हर जगह
शासन की परिभाषाओं में
शोर्य की गाथाओं में
मैं ही था स्वर्ग के सिंहासन पर
अश्वमेधी यज्ञों पर
चतुर्दिक लहराते दंड़ों पर

मैं ही निष्कासनों का कर्ता था
मैं ही आश्रमों-आवासों में शील-हर्ता था
मैंनें ही रास रचाए थे
मैंने ही काम-शास्त्रों में पात्र निभाए थे

मै ही क्षीर-सागर में पैर दबवाता हूं
मैं अपनी लंबी आयु के लिए व्रत करवाता हूं
मैं ही उन अंधेरी गंद वीथियों में हूं
मैं ही इन इज्ज़त की बंद रीतियों में हूं

मैं ही परंपराएं चलाती खापों में हूं
गर्दन पर रखी खटिया की टांगों में हूं
ये मेरे ही पैर हैं जिसमें जूती है
ये मेरी ही मूंछे है जो कपाल को छूती हैं

ये मेरा ही शग़ल है, वीरता है
ये मेरा ही दंभ है जो सलवारों को चीरता है
कि नरक के द्वार को
मैं बंद कर सकता हूं तालों से
मैं पत्थरों से इसे पाट सकता हूं
मैं इसे नाना तरीक़ों से कील सकता हूं

मैं ब्रह्म हूं, मैं नर हूं
मैं अजर-अगोचर हूं
मेरी आंखों में
हरदम एक भूखी तपिश है
मेरी उंगलियों में
हरदम एक बेचैन लरजिश है

मेरी जांघों में
एक लपलपाता दरिया है
मेरे हाथों में
एक दंड है, एक सरिया है

मैं सदा से इसी सनातन खराश में हूं
मैं फिर-फिर से मौकों की तलाश में हूं…

०००००

रवि कुमार

माफ़िया ये समय – महेन्द्र नेह के दो गीत

सामान्य

महेन्द्र नेह के दो गीत
( उदयपुर से निकलने वाले पाक्षिक ‘महावीर समता संदेश’ से साभार )

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( एक )

माफ़िया
ये समय
हमको नित्य धमकाता

छोड़ दो यह रास्ता
ईमान वाला
हम कहें वैसे चलो
बदल दो सांचे पुराने
हम कहें जैसे ढलो
माफ़िया यह समय
हमको नित्य हड़काता

त्याग दो ये सत्य की
तोता रटन्ती
हम कहें वैसा कहो
फैंक दो तखरी धरम की
हम कहें जैसा करो
माफ़िया ये समय
हमको नित्य दहलाता

भूल जाओ जो पढ़ा
अब तक किताबी
हम कहें वैसा पढ़ो
तोड़ दो कलमें नुकीली
हम कहें जैसा लिखो
माफ़िया ये समय
हमको नित्य धमकाता

०००००
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( दो )

रो रहे हैं
ख़ून के आंसू
जिन्होंने
इस चमन में गंध रोपी है

फड़फड़ाई सुबह जब
अख़बार बनकर
पांव उनके पैडलों पर थे
झिलमिलाई रात जब
अभिसारिका बन
हाथ उनके सांकलों में थे
सी रहे हैं फट गई चादर
जिन्होंने इस धरा को चांदनी दी है

डगमगाई नाव जब
पतवार बनकर
देह उनकी हर लहर पर थी
गुनगुनाए शब्द जब
पुरवाइयां बन
दृष्टि उनकी हर पहर पर थी
पढ़ रहे हैं धूप की पोथी
जिन्होंने बरगदों को छांह सौंपी है

छलछलाई आंख जब
त्यौहार बनकर
प्राण उनके युद्ध रथ पर थे
खिलखिलाई शाम जब
मदहोश होकर
कदम उनके अग्नि पथ पर थे
सह रहे हैं मार सत्ता की
जिन्होंने इस वतन को ज़िंदगी दी है

०००००

महेन्द्र नेह

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 5

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( अंतिम भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

mohammed_afzal_parliament_attack_060929( चौथे भाग से लगातार…) ज़्यादातर लोगों के लिए ऐसा करना आसान नहीं है, लेकिन अगर आप कर सकते हैं तो पल भर के लिए ख़ुद को इस अवधारणा से अलग कर लें कि सिद्धांततः ‘पुलिस अच्छी है/आतंकवादी शैतान हैं।’ पेश किये गये सबूतों से अगर वैचारिक साज-सज्जा हटा दी जाये तो उनसे भयावह संभावनाओं के गर्त खुल जाते हैं। सबूत ऐसी दिशा की ओर संकेत करते हैं, जिधर हममे से अधिकतर लोग नहीं देखना चाहेंगे।

पूरे मामले में ‘सर्वाधिक उपेक्षित क़ानूनी दस्तावेज़’ का इनाम क्रिमिनल प्रोसीजर कोड ( दंड प्रक्रिया संहिता ) की धारा 313 के तहत लिये गये अभियुक्त मोहम्मद अफ़ज़ल के बयान को जाता है। इस दस्तावेज़ में अदालत ने सबूतों को उसके सम्मुख सवालों के रूप में रखा है। वह या तो सबूत को स्वीकार कर सकता है या उन पर आपत्ति कर सकता है और उसे अपने ही शब्दों में अपनी कहानी का पक्ष रखने की छूट भी है। अफ़ज़ल के मामले में यह देखते हुए कि उसे अपनी सुनवाई का कोई मौक़ा नहीं मिला, यह दस्तावेज़ उसकी आवाज़ में उसकी कहानी बयान करता है।

इस दस्तावेज़ में अफ़ज़ल अपने ख़िलाफ़ अभियोगी पक्ष द्वारा कगाये गये कुछ आरोप स्वीकार करता है। वह स्वीकार करता है कि वह तारिक़ नाम के एक आदमी से मिला था। वह स्वीकार करता है कि तारिक़ ने उसका परिचय मोहम्मद नाम के एक आदमी से करवाया। वह स्वीकार करता है कि उसने दिल्ली आने और एक पुरानी सफ़ेद अम्बैसेडर कार ख़रीदने में मोहम्मद की मदद की। वह स्वीकार करता है कि मोहम्मद संसद पर हमले में मारे गये पांच फ़िदायीनों में से एक था। ‘आरोपी के रूप में अफ़ज़ल के बयान’ में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ यह है कि वह कहीं भी ख़ुद को पूरी तरह निर्दोष साबित करने की कोशिश नहीं करता। लेकिन वह अपने कार्यों को जिस संदर्भ में रखता है, वह ध्वस्त कर देने वाला है। अफ़ज़ल का वक्तव्य संसद पर हमले में उसके द्वारा निभायी गयी हाशिये की भूमिका का ब्योरा देता है। लेकिन वह हमें उन संभावित कारणों की एक समझ की ओर भी ले जाता है कि जांच इतने ढुलमुल ढंग से क्यों करायी गयी, वह सबसे महत्त्वपूर्ण स्थानों पर ठिठककर खड़ी क्यों हो जाती है और यह क्यों ज़रूरी है कि इसे महज़ अक्षमता और घटिया कहकर नज़रअन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए। अगर हम अफ़ज़ल पर भरोसा न भी करें, तो भी मुक़दमें और स्पेशल सेल की भूमिका के बारे में हम जो जानते हैं उसे देखते हुए, अफ़ज़ल जिस दिशा की ओर संकेत कर रहा है, उस ओर न देखना अक्षम्य है। वह स्पष्ट सूचनाएं देता है : नाम, जगहें और तारीख़ें ( यह आसान नहीं रहा होगा, इस बात के मद्दे-नज़र कि उसका परिवार, उसका भाई, उसकी पत्नी और अबोध बेटा कश्मीर में रहते हैं और अफ़ज़ल ने जिनका नाम लिया है, उनका आसान शिकार बन सकते हैं )।

अफ़ज़ल के शब्दों में :

‘मैं जम्मू-कश्मीर में सोपोर में रहता हूं और सन् 2000 में जब मैं वहां था, फ़ौज मुझे लगभग रोज़ाना परेशान करती थी…राजा मोहन राय नाम का एक आदमी मुझे उग्रवादियों के बारे में उसे सूचनाएं देने के लिए कहता था। मैं समर्पण कर चुका उग्रवादी था और ऐसे सभी उग्रवादियों को हर इतवार आर्मी कैम्प में हाज़िरी लगाने जाना पड़ता है। मझे शारीरिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया जाता था। वह मुझे बस धमकाता ही था। ख़ुद को बचाने के वास्ते मैं उसे छोटी-छोटी जानकारियां देता था, जिन्हें मैं अख़वारों से इकट्ठा करता था। जून/जुलाई 2000 में मैं अपना गांव छोड़कर बारामूला चला गया। मेरी सर्जिकल औज़ारों की एक दुकान थी, जिसे मैं कमीशन के आधार पर चला रहा था। एक दिन जब मैं अपने स्कूटर पर जा रहा था, एसटीएफ ( स्पेशल टास्क फ़ोर्स ) के लोग आये और मुझे उठा ले गये और उन्होंने पांच दिनों तक मुझे लगातार प्रताडि़त किया। किसी ने एसटीएफ को सूचना दी थी कि मैं फिर से उग्रवादी कामों में लग गया हूं। उस आदमी का मुझसे सामना हुआ और उसे मेरी मौजूदगी में छोड़ दिया गया। फिर मुझे उन लोगों ने क़रीब 25 दिन तक अपनी हिरासत में रखा और मैंने एक लाख रुपये देकर ख़ुद को छुड़ाया। स्पेशल सेल वालों ने इस घटना की पुष्टि की थी। उसके बाद मुझे एसटीएफ वालों ने सर्टिफ़िकेट दिया था और उन्होंने मुझे छह महीनों के लिए स्पेशल पुलिस अफ़सर बनाया। वे जानते थे कि मैं उनके लिए काम नहीं करूंगा। तारिक़ मुझसे पालहलन एसटीएफ कैम्प में मिला था जहां मैं एसटीएफ की हिरासत में था। तारिक़ मुझे बाद में श्रीनगर में मिला और उसने बताया कि बुनियादी रूप से वह एसटीएफ के लिए काम कर रहा था। मैंने उसे बताया कि मैं भी एसटीएफ के लिए काम कर रहा हूं। संसद के हमले में मारा गया मोहम्मद भी तारिक़ के साथ था। तारिक़ ने मुझे बताया कि वह कश्मीर के केरान इलाक़े का रहनेवाला था और उसने मुझे कहा कि मैं मोहम्मद को दिल्ली ले जाऊं, क्योंकि मोहम्मद को कुछ समय बाद दिल्ली से देश के बाहर जाना है। मैं नहीं जानता कि 15 दिसम्बर, 2001 को श्रीनगर पुलिस ने मुझे क्यों पकड़ा? मैं तब श्रीनगर बस स्टॉप से घर जाने के लिए बस में चढ़ रहा था जब पुलिस ने मुझे पकड़ लिया। उस गवाह अकबर ने, जिसने कोर्ट में कहा था कि उसने शौकत और मुझे श्रीनगर में पकड़ा था, दिसम्बर 2001 से क़रीब एक साल पहले मेरी दुकान पर छापा मारा था और मुझसे कहा था कि मैं सर्जरी के नक़ली औज़ार बेच रहा था और उसने मुझसे 5000 रुपये लिये थे। मुझे स्पेशल सेल में प्रताड़ित किया गया और एक भूपसिंह ने मुझे पेशाब पीने को भी मजबूर किया और मैंने एस.ए.आर. गिलानी के परिवार को भी वहां देखा, गिलानी की हालत बहुत ख़राब थी। वह खड़े होने की स्थिति में नहीं था। हम जांच के लिए डॉक्टर के पास ले जाये जाते, लेकिन हमें निर्देश था कि हमें डॉक्टर को बताना था कि सब ठीक-ठाक था। हमें धमकी दी जाती कि अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो हमें फिर से सताया जायेगा।’

यहां उसने अदालत से कुछ और जानकारी जोड़ने की इजाज़त मांगी :

‘संसद पर हमले में मारा गया आतंकवादी मोहम्मद मेरे साथ कश्मीर से आया था। जिस आदमी ने उसे मुझे सौंपा, वह तारिक़ था। तारिक़ सुरक्षा बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस की एसटीएफ के साथ काम कर रहा है। तारिक़ ने मुझे कहा था कि अगर मोहम्मद की वजह से मैं किसी परेशानी में पड़ा तो वह मेरी मदद करेगा, क्योंकि वह सुरक्षा बलों और एसटीएफ को अच्छी तरह जानता है…तारिक़ ने कहा था कि मुझे सिर्फ़ मोहम्मद को दिल्ली छोड़ना है और कुछ नहीं करना है और अगर मैं मोहम्मद को अपने साथ दिल्ली नहीं ले गया तो मुझे किसी दूसरे मामले में फंसा दिया जायेगा। मैं इन हालात में मजबूरन मोहम्मद को दिल्ली लाया, यह जाने बग़ैर कि वह आतंकवादी है।’

तो अब हमारे सामने ऐसे आदमी की तस्वीर उभर रही है जो इस प्रकरण में मुख्य खिलाड़ी हो सकता है। ‘गवाह अकबर’ ( अभियोजन पक्ष का गवाह 62 ), मोहम्मद अकबर, हेड कॉन्स्टेबल, परिमपोरा पुलिस स्टेशन, जम्मू-कश्मीर का वह पुलिसवाला जिसने अफ़ज़ल की गिरफ़्तारी के समय ‘बरामदगी मेमो’ पर दस्तख़त किये। सर्वोच्च न्यायालय के अपने वकील सुशील कुमार को लिखे गये एक पत्र में अफ़ज़ल मुक़दमें के दौरान एक दहलाने वाले लम्हे का ब्योरा देता है। अदालत में गवाह अकबर, जो कश्मीर से ‘बरामदगी मेमो’ के बारे में बयान देने आया था, अफ़ज़ल को कश्मीरी में आश्वस्त करता है कि ‘उसका परिवार ख़ैरियत से है।’ अफ़ज़ल फ़ौरन समझ जाता है कि यह एक छिपी हुई धमकी है। अफ़ज़ल यह भी कहता है कि श्रीनगर में पकड़े जाने के बाद उसे परिमपोरा पुलिस स्टेशन ले जाकर पीटा गया और उससे साफ़ कहा गया कि अगर वह सहयोग नहीं देगा तो उसकी पत्नी और परिवार को गंभीर नतीजे भुगतने होंगे ( हम पहले ही जानते हैं कि अफ़ज़ल के भाई हिलाल को कुछ महत्त्वपूर्ण महीनों के दौरान एस.ओ.जी. द्वारा ग़ैरक़ानूनी हिरासत में रखा गया था )।

इस पत्र में अफ़ज़ल बताता है कि उसे एसटीएफ कैम्प में किस तरह प्रताड़ित किया गया था – उसके गुप्तांगों पर बिजली की छड़े लगाकर और गुदा में मिर्च और पेट्रोल डालकर। वह पुलिस के डिप्टी सुपरिटेंडेंट द्रविन्दर सिंह का नाम लेता है जिसने उससे कहा था कि दिल्ली में ‘एक छोटे-से काम’ के लिए मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। वह यह भी कहता है कि चार्जशीट में दिये गये कुछ नंबर खोजे जाने पर कश्मीर में एक एसटीएफ कैम्प के साबित होंगे।

यह अफ़ज़ल की दास्तान है जो हमें कश्मीर घाटी में जीवन के असली रूप की झलक दिखाती है। यह तो उन बचकानी कथाओं में ही होता है – जो हम अपने अख़बारों में पढ़ते हैं – कि सुरक्षा बल उग्रवादियों से लड़ते हैं और निरपराध लोग दोनों तरफ़ की गोलीबारी की ज़द में फंस जाते हैं। वयस्कों के क़िस्सों में कश्मीर घाटी उग्रवादियों, भगोड़ों, गद्दारों, सुरक्षा बलों, दोहरे एजेंटों, मुख़बिरों, पिशाचों, ब्लैकमेल करने वालों, ब्लैकमेल होने वालों, जबरन वसूली करने वालों, जासूसों, भारत और पाकिस्तान दोनों की गुप्तचर एजेंसियों के लोगों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, ग़ैर-सरकारी संगठनों और अकल्पनीय मात्रा में बिना हिसाब-किताब वाले पैसों और हथियारों से भरी हुई है। ऐसी साफ़ लकीरें हमेशा मौजूद नहीं होतीं, जो इन सारी चीज़ों और लोगों को अलग-अलग करने वाली चारदीवारियों को चिह्नित करें। यह बताना आसान नहीं है कि कौन किसके लिए काम कर रहा है।

कश्मीर में सच्चाई संभवतः किसी भी दूसरी चीज़ से ज़्यादा ख़तरनाक है। जितना गहरे आप खोदेंगे, उतना बुरा हाल मिलेगा। गड्ढे में सबसे नीचे, एस.ओ.जी. और एस.टी.एफ. हैं, जिनकी अफ़ज़ल बात करता है। ये कश्मीर में भारतीय सुरक्षा तंत्र के सबसे निर्मम, अनुशासनहीन और डरावने तत्व हैं। नियमित बलों के विपरीत ये लोग उस धुंधले इलाके में काम करते हैं जहां पुलिसवालों, आत्मसमर्पण कर चुके उग्रवादियों, भगोड़ों और आम अपराधियों का राज है। वे स्थानीय लोगों को शिकार बनाते हैं जो 1990 के दशक की शुरूआत में हुए अराजक विद्रोह में शामिल हुए थे और अब आत्मसमर्पण करके सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं।

1989 में जब अफ़ज़ल ने उग्रवादी के रूप में प्रशिक्षण लेने के लिए सीमा पार की थी, तब वह सिर्फ़ 20 साल का था। वह बिना किसी प्रशिक्षण के, अपने अनुभवों से निराश होकर वापस आ गया। उसने अपनी बंदूक छोड़ दी और दिल्ली विश्वविद्यालय में भर्ती हो गया। 1993 में नियमित उग्रवादी न होते हुए भी उसने स्वेच्छा से बी.एस.एफ़. के सम्मुख आत्मसमर्पण किया। अतार्किक ढंग से उसके दुःस्वप्नों की शुरूआत इसी बिन्दु से हुई। उसके आत्मसमर्पण को अपराध माना गया और उसका जीवन नरक बन गया। अगर कश्मीरी नौजवान अफ़ज़ल की कहानी से यह सबक लें कि हथियार डालना और ख़ुद को भारतीय राज्य की उन अनगिनत क्रूरताओं के हवाले कर देना न सिर्फ़ मूर्खता होगी, बल्कि पागलपन ही कहा जायेगा, जो भारतीय राज्य के पास उन्हें देने के लिए है, तो क्या उन्हें दोष दिया जा सकता है?

मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी ने कश्मीरियों में आक्रोश पैदा कर दिया है, क्योंकि उसकी कहानी उनकी भी कहानी है। उसके साथ जो हुआ है, हज़ारों युवा कश्मीरियों और उनके परिवारों के साथ हो सकता है, हो रहा है या हो चुका है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि उनकी कहानियां संयुक्त पूछताछ केन्द्र की अंधेरी कोठरियों, फ़ौजी कैम्पों और पुलिस थानों में घट रही हैं जहां उन्हें दाग़ा जाता है, पीटा जाता है, बिजली के झटके दिये जाते हैं, उन्हें ब्लैकमेल किया जाता है और मार दिया जाता है। उनके शवों को ट्रकों के पीछे से फैंक दिया जाता है जहां वे राहगीरों को मिलते हैं। जबकि अफ़ज़ल की कहानी को किसी मध्यकालीन नाटक की तरह राष्ट्रीय मंच पर दिन-दहाड़े, एक ‘न्यायपूर्ण मुक़दमें’ की क़ानूनी मंज़ूरी, ‘स्वतंत्र प्रेस’ के खोखले फ़ायदों और तथाकथित लोकतंत्र के सारे आडम्बर और अनुष्ठानों के साथ, खेला जा रहा है।

अगर अफ़ज़ल को फांसी दे दी जाती है तो हमें इस असली सवाल का जवाब कभी नहीं मिलेगा कि भारतीय संसद पर आख़िर किसने आक्रमण किया? क्या वह लश्कर-ए-तैयबा था? जैश-ए-मोहम्मद था? या फिर इसका उत्तर इस देश के गुप्त ह्रदय में गहरे कहीं छिपा है, जिसमें हम सब रहते हैं और जिसे हम अपने ही सुंदर, जटिल, विविध और कंटीले ढंग से प्रेम और घृणा करते हैं।

13 दिसम्बर को संसद पर हुए आक्रमण की संसदीय जांच होनी ही चाहिए। जब तक जांच हो, सोपोर में अफ़ज़ल के परिवार की रक्षा की जाये, क्योंकि इस अजीबो-ग़रीब कहानी में वे असुरक्षित बंधक हैं।

यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए

दस फ़ीसदी वृद्धि-दर के बावजूद।

०००००

अरुंधति रॉय


इस आलेख की पीडीएफ़ फ़ाइल (232kb) यहां से फ्री डाउनलोड की जा सकती है:

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – अरुंधति रॉय


प्रस्तुति – रवि कुमार

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 4

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( चौथा भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

13-Parliamentattack1-indiaink-blog480( तीसरे भाग से लगातार…) त्वरित-सुनवाई अदालत में कार्रवाई मई, 2002 में शुरू हुई। हमें उस माहौल को नहीं भूलना चाहिए जिसमें मुक़दमा शुरू हुआ। 9/11 हमले से उपजा उन्माद अभी बरक़रार था। अमरीका अफ़ग़ानिस्तान में अपनी जीत की ख़ुशी मना रहा था। गुजरात साम्प्रदायिक आक्रोश में कांप रहा था। कुछ महीने पहले ही साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे नम्बर एस-6 को आग लगा दी गयी थी और उसके भीतर मौजूद 58 हिंदू तीर्थयात्री ज़िंदा जल गये थे। ‘प्रतिशोध’ में किये गये सुनियोजित जनसंहार में 2000 से ज़्यादा मुसलमानों की सरेआम बर्बर हत्या कर दी गयी थी और डेढ़ लाख से ज़्यादा मुसलमानों को उनके घर से भगा दिया था।

अफ़ज़ल के लिए हर वो चीज़ जो ग़लत हो सकती थी, ग़लत हुई। उसे उच्च सुरक्षा वाली जेल के सुपुर्द कर दिया गया। बाहरी दुनिया तक उसकी कोई पहुंच नहीं थी और न ही उसके पास अपने लिए कोई पेशेवर वकील करने का पैसा था। मुक़दमें के तीन सप्ताह बाद अदालत द्वारा नियुक्त महिला वकील ने इस केस से हटा दिये जाने की इजाज़त मांगी, क्योंकि अब उसे एस.ए.आर. गिलानी के बचाव के लिए गठित वकीलों की टोली में पेशेवराना तौर पर शामिलकर लिया गया था। अदालत ने अफ़ज़ल के लिए उसी के जूनियर, बहुत कम अनुभव वाले एक वकील को नियुक्त कर दिया। अपने मुवक्किल से बात करने के लिए वह एक बार भी जेल में उसने मिलने नहीं गया। उसने अफ़ज़ल के बचाव में एक भी गवाह प्रस्तुत नहीं किया और अभियोजन पक्ष के गवाहों से भी ज़्यादा सवाल-जवाब नहीं किये। उसकी नियुक्ति के पांच दिन बाद 8 जुलाई को अफ़ज़ल ने अदालत से दूसरा वकील दिये जाने की दरख़्वास्त की और अदालत को वकीलों की एक सूची दी – इस उम्मीद के साथ कि अदालत उनमें से किसी को नियुक्त करेगी। उनमें से हर एक ने इन्कार कर दिया। ( मीडिया में आक्रोश-भरे प्रचार को देखते हुए, यह ज़रा भी हैरानी की बात नहीं थी। मुक़दमें के दौरान आगे चलकर जब वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने गिलानी की ओर से मुक़दमें में पेश होना स्वीकार किया, तो शिवसेना की भीड़ ने उनके मुम्बई के दफ़्तर में तोड़-फोड़ की।)27 न्यायाधीश ने इस मामले में कुछ भी कर पाने में असमर्थता जतायी और अफ़ज़ल को गवाहों से सवाल-जवाब करने का अधिकार दे दिया। न्यायाधीश का यह उम्मीद करना भी हैरानी की बात है कि एक आपराधिक मुक़दमें में एक अनाड़ी नाजानकार आदमी गवाहों से सवाल-जवाब कर सकेगा। ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए यह असंभव काम था जो कुछ ही समय पहले बने ‘पोटा’ के साथ-साथ पुराने ‘साक्ष्य अधिनियम’ और ‘टेलिग्राफ़ क़ानून’ में किये गये संशोधनों और फ़ौजदारी क़ानून की गहरी समझ न रखता हो। यहां तक कि अनुभवी वकीलों को भी क़ानूनों के मामले में नवीनतम जानकारियों के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही थी।

अफ़ज़ल के ख़िलाफ़ निचली अदालत में अभियोजन के लगभग 80 गवाहों के बयानों की ताक़त पर मामला बनाया गया : इन गवाहों में मकान मालिक, दुकानदार, सेलफ़ोन कंपनियों के टेक्नीशियन और ख़ुद पुलिस शामिल थी। यह मुक़दमें का नाज़ुक दौर था, जब मामले की क़ानूनी बुनियाद रखी जा रही थी। इसमें सूक्ष्म और सतर्क और कड़ी क़ानूनी मेहनत की ज़रूरत थी, जिसमें ज़रूरी सबूतों को जुटाकर उन्हें दर्ज किया जाना था, बचाव-पक्ष के गवाहों को तलब किया जाना था और अभियोजन पक्ष के गवाहों से उनके बयानों पर जिरह करनी थी। अगर निचली अदालत का फ़ैसला अभियुक्त के ख़िलाफ़ चला ही जाता ( निचली अदालतें अपनी रूढ़िवादिता के लिए कुख्यात हैं ) तो भी वकील ऊपर की अदालतों में साक्ष्य पर काम कर सकते थे। इस बेहद महत्त्वपूर्ण अवधि के दौरान अफ़ज़ल की ओर से किसी ने पैरवी नहीं की। इसी चरण में यह हुआ कि उसके मामले की बुनियाद खिसक गयी और उसके गले में फंदा कस गया।

इसके बावजूद, मुक़दमें के दौरान स्पेशल सेल की पोल बड़े पैमाने पर शर्मनाक ढंग से खुलने लगी। यह साफ़ हो गया कि झूठों, जालसाजियों, जाली काग़ज़ात और प्रक्रिया में गंभीर लापरवाहियों का सिलसिला तफ़्तीश के पहले दिन से ही शुरू हो गया था। जहां उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसलों ने इन चीज़ों को चिह्नित किया है, वहीं उन्होंने पुलिस को सिर्फ़ डपटने के अंदाज़ में उंगली भर दिखाय़ी है या कभी-कभी इसे ‘बेचैन करने वाला पहलू’ बताया है, जो अपने आप में एक बेचैन कर देने वाला पहलू है। मुक़दमें के दौरान किसी भी दौर में पुलिस को गंभीर फटकार नहीं लगायी गयी, सज़ा देने की तो ख़ैर, बात ही छोड़िये। सच तो यह है कि हर क़दम पर स्पेशल सेल ने प्रक्रिया के नियमों की घनघोर अवहेलना की। जिस निर्लज्ज लापरवाही से तफ़्तीश की गयी उससे उनका यह चिंताजनक विश्वास उजागर होता है कि उन्हें कभी ‘पकड़ा’ नहीं जा सकेगा और अगर वे पकड़ में आ भी गये तो इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। लगता है उनका विश्वास ग़लत भी नहीं था।

तफ़्तीश के लगभग हर हिस्से में घालमेल किया गया है28

गिरफ़्तारियों और बरामदगियों के समय और स्थान पर ग़ौर करें : दिल्ली पुलिस ने कहा कि गिरफ़्तारी के बाद गिलानी द्वारा दी गयी सूचनाओं के आधार पर अफ़ज़ल और शौकत को श्रीनगर में पकड़ा गया। अदालत का रिकार्ड बताता है कि अफ़ज़ल और शौकत को तलाश करने का संदेश श्रीनगर पुलिस को 15 दिसम्बर की सुबह 5.45 पर भेजा गया। लेकिन दिल्ली पुलिस के रिकार्ड के मुताबिक़ गिलानी को दिल्ली में 15 दिसम्बर की सुबह 10 बजे गिरफ़्तार किया गया था – श्रीनगर में अफ़ज़ल और शौकत की तलाश शुरू करने के चार घंटे के बाद। वे इस घपले के बारे में कुछ नहीं बता पाये हैं। उच्च न्यायालय का फ़ैसला यह बात दर्ज करता है कि पुलिस के विवरण में ‘महत्त्वपूर्ण अन्तर्विरोध’ हैं और उसे सही नहीं माना जा सकता। इसे बतौर एक ‘बेचैन करने वाला पहलू’ ( डिस्टर्बिंग फ़ीचर ) दर्ज किया गया है। दिल्ली पुलिस को झूठ बोलने की ज़रूरत क्यों पड़ी? यह सवाल न पूछा गया और न इसका जवाब दिया गया।

पुलिस जब किसी को गिरफ़्तार करती है, तो प्रक्रिया के तहत उसे गिरफ़्तारी के लिए सार्वजनिक गवाह रखने होते हैं जो पुलिस द्वारा बरामद किये गये सामान, नक़दी, कागज़ात या और किसी चीज़ के लिए ‘गिरफ़्तारी मेमो’ और ‘ज़ब्ती मेमो’ पर दस्तख़त करते हैं। पुलिस यह दावा करती है कि उसने अफ़ज़ल और शौकत को श्रीनगर में एक साथ 15 दिसम्बर को सुबह 11 बजे पकड़ा था। उसका कहना है कि दोनों जिस ट्रक में भाग रहे थे ( वह शौकत की बीवी के नाम पर रजिस्टर्ड था ) उसे पुलिस ने ‘कब्ज़े’ में ले लिया था। वह यह भी कहती है कि उसने अफ़ज़ल से एक नोकिया मोबाइल फ़ोन, एक लैपटॉप और 10 लाख रुपये बरामद किये। बतौर अभियुक्त अपने बयान में अफ़ज़ल का कहना है कि उसे श्रीनगर में एक बस स्टॉप से पकड़ा गया और उससे कोई मोबाइल फ़ोन या पैसा बरामद नहीं किया गया।

हद तो यह है कि अफ़ज़ल और शौकत दोनों की गिरफ़्तारी से संबंधित मेमो पर गिलानी के छोटे भाई बिस्मिल्लाह के दस्तख़त हैं, जो उस वक़्त लोधी रोड़ पुलिस स्टेशन में ग़ैरक़ानूनी हिरासत में था। इसके अलावा जिन दो गवाहों ने फ़ोन, लैपटॉप और 10 लाख रुपये के ज़ब्ती मेमो पर दस्तख़त किये थे, वे दोनों ही जम्मू-कश्मीर पुलिस के थे। उनमें से एक हैड कॉन्स्टेबल मोहम्मद अकबर ( अभियोजन का गवाह संख्या 62 ) है जो – जैसा कि हम बाद में देखेंगे – मोहम्मद अफ़ज़ल के लिए कोई अजनबी नहीं है, और न ही वह कोई आम पुलिसवाला है जो संयोगवश उधर से गुज़र रहा था। जम्मू-कश्मीर पुलिस की अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार भी उन्होंने अफ़ज़ल और शौकत को पहली बार परिमपुरा फल मंड़ी में देखा था। पुलिस इस बात का कोई कारण नहीं बताती है कि उसने उन्हें वहीं क्यों नहीं गिरफ़्तार किया। पुलिस का कहना है कि उसने अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक जगह तक उनका पीछा किया – जहां कोई सार्वजनिक गवाह नहीं थे।

लिहाज़ा, यह अभियोजन के मामले में एक और गम्भीर अन्तर्विरोध है। इसके बारे में उच्च न्यायालय का फ़ैसला कहता है, ‘अभियुक्तों की गिरफ़्तारी के समय में गहरी शिकनें पड़ी हुई हैं।’ हैरान करने वाली बात यह है कि गिरफ़्तारी के इसी विवादित समय और जगह पर ही पुलिस षड्यंत्र में अफ़ज़ल को फंसाने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण सबूत बरामद करने का दावा करती है : यानि मोबाइल और लैपटॉप। एक बार फिर, गिरफ़्तारी के दिन और समय के मामले में और अपराधी ठहराने वाले लैपटॉप और 10 लाख रुपये की कथित बरामदगी के मामले में हमारे पास एक ‘आतंकवादी’ के बयान के बरअक्स सिर्फ़ पुलिस का ही बयान है।

बरामदगियां जारी रहीं : पुलिस का कहना है कि बरामद लैपटॉप में वे फ़ाइलें थी जिनसे गृह मंत्रालय के प्रवेश-पत्र और नक़ली पहचान-पत्र बनाये गये। उसमें कोई और उपयोगी जानकारी नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि अफ़ज़ल उसे ग़ाज़ी बाबा को लौटाने श्रीनगर ले जा रहा था। जांच कर रहे अफ़सर एसीपी राजवीर सिंह ने कहा कि कम्प्यूटर की हार्डडिस्क को 16 जनवरी, 2002 को सील कर दिया गया था ( क़ब्ज़े में लेने के पूरे एक महीने बाद )। लेकिन कंप्यूटर दिखाता है कि उसके बाद भी उसे खोला गया। अदालतों ने इस पर विचार तो किया है, लेकिन इसका कोई संज्ञान नहीं लिया।

( अगर थोड़ी अटकल का सहारा लें तो क्या यह हैरान करने वाली बात नहीं है कि कम्प्यूटर में अपराध साबित करने वाली एकमात्र सूचना नक़ली प्रवेश-पत्र और पहचान-पत्र बनाने के लिए इस्तेमाल की गयी फ़ाइलें थी? और संसद की इमारत दिखाने वाली ज़ी टीवी की एक फ़िल्म का टुकड़ा। अगर अपराध साबित करने वाली दूसरी सूचनाओं को मिटा दिया गया था, तो फिर इसे क्यों छोड़ा गया? और एक अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन के मुखिया ग़ाज़ी बाबा को ऐसे लैपटॉप की इतनी क्या ज़रूरत थी जिसमें सिर्फ़ एक घटिया सचित्र सामग्री थी? )

मोबाइल फ़ोन कॉलों के रिकॉर्ड को देखिये : लम्बे समय तक ग़ौर से देखने पर, स्पेशल सेल द्वारा पेश किये गये कई ‘पक्के सबूत’ संदिग्ध दिखने लगते हैं। अभियोजन की ओर से मामले की रीढ़ का संबंध मोबाइल फ़ोन, सिमकार्ड, कम्प्यूटरीकृत कॉल रिकॉर्ड और सेलफ़ोन कम्पनियों के अधिकारियों और उन दुकानदारों के बयानों से है जिन्होंने अफ़ज़ल और उसके साथियों को फ़ोन और सिमकार्ड बेचे थे। यह दिखाने के लिये कि शौकत, अफ़ज़ल, गिलानी और मोहम्मद ( मारे गये आतंकवादियों में से एक ) हमले के समय के बहुत पास एक-दूसरे के सम्पर्क में थे, जिन कॉल रिकॉर्डों को पेश किया गया, वे ग़ैर-सत्यापित कम्प्यूटर प्रिंट आउट थे, मूल काग़ज़ात की प्रतिलिपी नहीं थे। वे टेक्स्ट फ़ाइल के रूप में स्टोर किये गये बिलिंग सिस्टम के आउटपुट थे जिनसे किसी भी समय आसानी से छेड़छाड़ की जा सकती थी। उदाहरण के लिए, पेश किये गये कॉल रिकॉर्ड दिखाते हैं कि एक ही सिमकार्ड से एक ही समय में दो कॉल किये गये, लेकिन ये अलग-अलग हैंडसेट और आई.एम.ई.आई. नम्बर से किये गये थे। इसका अर्थ यह है कि या तो सिमकार्डों का क्लोन ( जुड़वां ) बना लिया गया था या कॉल रिकार्ड से छेड़छाड़ की गयी थी।

सिमकार्ड का मामला लें : अपनी कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने के लिए अभियोजन एक ख़ास नम्बर 9811489429 पर अत्यधिक निर्भर है। पुलिस का कहना है कि यह अफ़ज़ल का नम्बर है – वह नम्बर जो अफ़ज़ल को ( मारे गये आतंकवादी ) मोहम्मद से, अफ़ज़ल को शौकत से और शौकत को गिलानी से जोड़ता है। पुलिस का यह भी कहना है कि यह नम्बर मारे गये आतंकवादियों से मिले पहचान-पत्रों के पीछे लिखा हुआ था। कितना सुविधाजनक है ! बिल्ली का बच्चा खो गया है ! मम्मी को 9811489429 पर कॉल करो।

यहां यह बात बताने लायक़ है कि सामान्य प्रक्रिया के तहत अपराध की जगह से लिये गये सबूतों को सील करने की ज़रूरत होती है। पहचान-पत्रों को कभी सील नहीं किया गया और वे पुलिस के क़ब्ज़े में रहे और उनसे किसी भी समय छेड़छाड़ की गयी हो सकती थी।

पुलिस के पास एकमात्र सबूत कि 9811489429 नम्बर सचमुच अफ़ज़ल ही का नम्बर है, सिर्फ़ अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति है, जो, जैसा कि हम देख चुके हैं, कोई सबूत ही नहीं है। सिमकार्ड कभी नहीं मिला। पुलिस ने अभियोजन पक्ष की ओर से गवाह के रूप में कमल किशोर को ज़रूर पेश किया, जिसने अफ़ज़ल की पहचान की और बताया कि उसने 4 दिसम्बर, 2001 को एक मोटरोला फ़ोन और एक सिमकार्ड बेचा था। लेकिन अभियोजन पक्ष जिस कॉल रिकॉर्ड पर निर्भर था, वह दिखाता है है कि वह ख़ास सिमकार्ड 6 नवम्बर से काम में लाया जा रहा था, अफ़ज़ल द्वारा उसकी फ़र्ज़िया ख़रीद से पूरे एक महीने पहले से। यानी या तो गवाह झूठ बोल रहा है या फिर कॉल रिकॉर्ड ही ग़लत हैं। उच्च न्यायालय ने इस गड़बड़ की लीपा-पोती यह कहते हुए करता है कि कमल किशोर ने सिर्फ़ यह कहा था कि उसने अफ़ज़ल को एक सिमकार्ड बेचा था, न कि यही वाला सिमकार्ड। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बड़ी ऊंचाई से कहता है, ‘अफ़ज़ल को सिमकार्ड अनिवार्य रूप से 4 दिसम्बर, 2001 से पहले बेचा गया होना चाहिए।’

अभियुक्तों की पहचान को लें : अभियोजन पक्ष की ओर से कई गवाहों ने, जिनमें से ज़्यादातर दुकानदार हैं, अफ़ज़ल की शिनाख़्त ऐसे व्यक्ति के रूप में की है, जिसे उन्होंने कई चीज़ें बेची थीं : अमोनियम नाइट्रेट, अल्यूमीनियम पाउडर, गंधक, सुजाता मिक्सी-ग्राइंडर, मेवों का पैकेट इत्यादि। सामान्य प्रक्रिया के तहत ज़रूरी है कि पहचान परेड हो जिसमें शामिल कई लोगों में से दुकानदार अफ़ज़ल को चुनें। ऐसा नहीं हुआ। बल्कि उनके द्वारा अफ़ज़ल की पहचान तब की गयी जब पुलिस की हिरासत में रहते हुए वह पुलिस को इन दुकानों में ‘ले’ गया और जब उसका संसद पर हमले के अभियुक्त के रूप में परिचय करवाया गया ( क्या हमें यह अंदाज़ा लगाने की छूट है कि दुकानों में पुलिस को वह ले गया या पुलिस उसे ले गयी? आख़िरकार, वह अब भी पुलिस की हिरासत में था, अब भी यातना के आगे बेबस था। अगर इन परिस्थितियों में उसका इक़बालियां बयान क़ानूनी तौर पर शंकास्पद हो जाता है, तो बाकी सब क्यों नहीं हो सकता? )।

जजों ने प्रक्रिया से संबंधित नियमों की इन अवहेलना पर विचार तो किया, लेकिन इसे उन्होंने पूरी गम्भीरता से नहीं लिया। उनका कहना था कि उन्हें यह नहीं समझ आता कि समाज के आम लोग एक निरपराध व्यक्ति को व्यर्थ ही क्यों दोषी ठहराएंगे। लेकिन क्या यह बात लागू हो सकती है, इस मामले में ख़ासतौर पर, जिसमें आम नागरिकों को भीषण मीडिया प्रचार का शिकार बनाया गया था? क्या यह बात इस बात को ध्यान में रखते हुए भी लागू हो सकती है कि सामान्त दुकानदार, ख़ासकर वे जो ‘ग्रे मार्केट’ में बिना रसीदों के सामान बेचते हैं, पूरी दिल्ली पुलिस के शिकंजे में होते हैं?

मैंने अब तक जिन अनियमितताओं की बात की है उनमें से कोई भी मेरी ओर से किसी बेमिसाल जासूसी का परिणाम नहीं है। इनमें से बहुत कुछ निर्मलांशु मुखर्जी द्वारा लिखी गयी एक शानदार किताब ‘दिसम्बर 13 : टेरर ओवर डेमोक्रेसी’ और पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित दो रिपोर्टों ( ट्रायल ऑफ़ एरर्स और बेलेंसिंग एक्ट ) और इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण – निचली अदालत, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसलों के – तीन मोटे ग्रन्थों में दर्ज हैं।29 ये सभी सार्वजनिक दस्तावेज़ हैं, जो मेरी मेज़ पर रखे हुए हैं। ऐसा क्यों है कि जब यह पूरा-का-पूरा धुंधला ब्रह्मांड उजागर किये जाने को बेताब है, हमारे टीवी चैनल नाजानकार लोगों और लालची नेताओं के बीच खोखली बहसें आयोजित करवा रहे हैं? ऐसा क्यों है कि कुछ स्वतंत्र टिप्पणीकारों के अलावा हमारे अख़वार अपने मुखपृष्ठों पर ऐसी फ़ालतू ख़बरें छाप रहे हैं कि जल्लाद कौन होगा और मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी देने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रस्सी की लंबाई ( 60 मीटर ) और उसके वज़न ( 3.75 किलो ) के बारे में बीभत्स ब्योरे परोस रहे हैं? ( इंडियन एक्सप्रेस, 16 अक्टूबर, 2006 )30

क्या हम अपने आज़ाद प्रेस की स्तुति करने के लिए क्षण भर रुकें?

( अगली बार लगातार… पांचवा भाग )


संदर्भ :

27. ‘स्टार्म ओवर अ सेंटेस’, द स्टेट्समेन ( इंडिया ), 12 फ़रवरी, 2003 ।
28. जो विश्लेषण आगे दिया जा रहा है वह भारत के सर्वोच्च न्यायालय, दिल्ली उच्च न्यायालय और पोटा विशेष अदालत के फ़ैसलों पर आधारित है।
29. मुखर्जी, डिसेम्बर 13 । पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, ट्रायल ऑफ़ एरर्स एंड बेलेंसिंग एक्ट।
30. ‘ऐज मर्सी पेटिशन लाइज़ विद कलाम, तिहार बाइज़ रोप फ़ॉर अफ़ज़ल हैंगिंग’, इंडियन एक्सप्रेस, 16 अक्टूबर, 2006 ।


प्रस्तुति – रवि कुमार

( यह आलेख अरुंधति रॉय के लेखों के संग्रह, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और नीलाभ द्वारा संपादित पुस्तक “कठघरे में लोकतंत्र” से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. यह अंग्रेजी की मूलकृति Listening of Grasshoppers से अनूदित है. यह लेख सबसे पहले ३० अक्‍तूबर, २००६ को ‘आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. )