चतुर्भुजनाथ नाला शैल-चित्र स्थल Chaturbhujnath Nala Rock Art Site

सामान्य

चतुर्भुजनाथ नाला शैल-चित्र स्थल
(Chaturbhujnath Nala Rock Art Site)

पिछले दिनों बहुत समय बाद तफ़रीह पर थे। जगह चुनी गई वह, जहां जाना पहले से तयशुदा था पर वाक़ई वहां पहुंच पाना काफ़ी समय से टलते जाने को अभिशप्त रहा। साथ के मित्रों ने इस बार ठान लिया, तो पहुंच गये। और जब वहां स्थित उन चीज़ों से सीधे रूबरू हुए, जिनसे नेट पर खोजबीन के जरिए थोड़ा बहुत परिचित हुए थे, तो हम आश्चर्यचकित थे, रोमांच से भर उठे थे। यह शैल-चित्रों, भित्ति-चित्रों से प्रत्यक्ष साक्षात्कार था, वह भी उन्हें एकदम प्राकृतिक परिस्थितियों में सीधे महसूसते हुए। उफ़, ग़ज़ब का अनुभव।

इसीलिए सोचा, कि इस जगह की सूचना और एक प्राथमिक जानकारी यहां मित्रों को भी उपलब्ध करा दी जाए, ताकि वे भी अगर इस अनोखे अनुभव से वंचित हैं तो पहले मौके पर मुंह उठाएं और वहां पहुंच जाएं, खासकर वे जो यहां रावतभाटा के आस-पास ही रहते हों। बाकी उनकी रूचियों और जिज्ञासाओं पर निर्भर रहेगा ही।

बात हो रही है गांधीसागर, मध्यप्रदेश के पास स्थित चतुर्भुजनाथ नाले की। गूगल मैप पर देखेंगे तो यह चतुर्भुजनाथ मंदिर भानपुरा, मध्यप्रदेश ( chaturbhujnath mandir bhanpura, madhyapradesh) के नाम से मिलेगा, जो कि इस नाले पर ही स्थित एक पिकनिक स्थल भी है। गांधीसागर से भानपुरा रोड़ पर लगभग 7 किलोमीटर चलने के बाद बायीं तरफ़ एक कच्चा रास्ता निकलता है। सड़क पर बड़ा सा सूचना-पट्ट भी लगा है और कच्चे रास्ते की शुरुआत में एक गेट भी लगा है। यहां से लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का कच्चा रास्ता है जो चतुर्भुजनाथ मंदिर तक पहुंचाता है। मंदिर से दो सौ-ढ़ाई सौ मीटर पहले ही बायीं तरफ़ ही एक और कच्चा रास्ता निकलता है, यहां नाले की रॉक आर्ट गैलरी का सूचना पट्ट भी लगा है, इसी रास्ते पर डेढ़ किलोमीटर और चलकर चतुर्भुजनाथ नाले के शैल-चित्र स्थल पर पहुंचा जा सकता है।

बस्स, अब थोड़ा नीचे उतरना है और नाला तथा किनारे की चट्टानें आपके सामने होंगी, पहले थोड़ा दायीं तरफ़ आगे चट्टानों से गुजरिए और उसके बाद बायीं तरफ़ एक बड़ा इलाका आपके सामने होगा। वहां प्रशासन के तीन-चार लोग भी हो सकते हैं, जो आपके साथ-साथ रहेंगे, थोड़ा गाइड भी करेंगे और आप कोई नुकसान नहीं पहुंचाएं इसका ध्यान भी रखेंगे। लौटते समय एक-दो रजिस्टरों पर आपकी जानकारी और प्रतिक्रिया भी दर्ज़ कराना चाहेंगे।

तो फिर नीचे की जानकारी से और गुजर लीजिये, सबसे नीचे हमारे लिये गये चित्रों को देख कर आहें भरिये और ज़ल्द ही वहां पहुंचने की योजना बनाइये।


 

चतुर्भुजनाथ नाला शैल-चित्र स्थल
(जीन क्लोट्स के आलेख ‘द रॉक आर्ट ऑफ़ सेन्ट्रल इंडिया’ तथा नेट पर उपलब्ध अन्य सामग्री से निष्कर्षित)

गांधीसागर और भानपुरा के बीच, गांधीसागर वन्यजीव अभ्यारण्य में स्थित चतुर्भुजनाथ नाला शैल-चित्र स्थल ( Chaturbhujnath Nala Rock Art Site ) को विश्व की सबसे लंबी तथा सबसे महत्वपूर्ण शैल-चित्र शृंखलाओं (rock art gallery) में से एक माना जाता है। चंबल की एक सहायक नदी ( जिसे अब वहां स्थित चुतुर्भुजनाथ मंदिर की वज़ह से चतुर्भुजनाथ नाले के रूप में जाना जाता है ) के दोनों ओर उथली (shallow) चट्टानों की लंबी बनावट है जो कि अपने समय में विकसित होती मानवजाति के लिए एकदम उपयुक्त आश्रय स्थल (shelter) रही होगी। इन्हीं शैल आश्रय-स्थलों पर आकृतियों और दृश्यों के चित्रांकन की कई किलोमीटर लंबी सतत शृंखला है। एक लंबे दायरे में प्रचुरता से उकेरे गये इन शैल-चित्रांकनों से गुजरना एक ऐसा अनोखा अनुभव है, जिसमें आप पुरापाषाण युग तथा मध्य पाषाण युग से शुरु करके, मध्यकाल होते हुए मौर्यकाल तक की मानव विकास यात्रा को जैसे अपने सामने घटित होता महसूस कर सकते हैं.

ये शैल-चित्र अपने आप में समय की एक एक लंबी अवधि का विस्तार रखते हैं, और इसीलिए हम इनमें अंकित कई शैलीगत (stylistic) और विषयगत (thematic) अंतरों को देख सकते हैं। यह शैल-चित्र आश्रय स्थल तत्कालीन स्थानीय मानव समूहों के सांस्कृतिक मान्यताओं तथा प्रथाओं का एक अमूल्य अभिलेख है और हमारे लिए उपलब्ध एक अनमोल तथा उत्कॄष्ट निधि। इनमें से कईयों को तो एक शानदार और महान कलाकृति के समकक्ष रूप में रखा जा सकता है।


 

शैल-चित्र शैलियां

प्रोफ़ेसर गिरिराज कुमार ने चंबल घाटी में पाई जाने वाले अंसख्य शैल-चित्रों की शैलियों (styles) का वर्गीकरण किया है, जिनमें कि प्रमुखता से कई जानवर पाये जाते हैं, विशेषकर भैंस, मृग, हिरण, हाथी, गैंडा, मछली, और जंगली सुअर।

शैली 1 व 2 – ये उत्तर पुरापाषाण (upper Palaeolithic) से लेकर वर्तमान से 12000 वर्ष पूर्व तक के काल से संबंधित है। ‘हल्की लाल और फीकी हरी’ छवियां तथा ‘सामान्यतः जानवरों के मुखौटे पहने’ गतिशील नर्तक। दूसरी शैली के चित्रों में में पहली की अपेक्षा अधिक मोटी रेखाएं। (चित्र 1, 2 व 3)

शैली 3 से 5 – शुरुआती मध्यपाषाण (early Mesolithic) से उत्तर मध्यपाषाण (late Mesolithic) युग तक के काल से संबद्ध ( मोटे तौर पर वर्तमान से 12000 वर्ष पूर्व से 6000 वर्ष पूर्व तक ), पहले, मुखौटे लगाये गतिशील धनुर्धर, कभी-कभी कमर पर एक क्रीड़ा आवरण (sporting flaps) लटकाये हुए  ( शैली 3 ), फिर जानवर जिनके शरीरों पर सजावट है तथा कुछ अलग वस्त्रों के साथ धनुर्धर ( शैली 4 ), शैली 5 में आकृतियों में अंकन का एक खास अंदाज़ होगा।

शैली 6 – मध्यपाषाण से ताम्रयुग (Chalcolithic) का संक्रमण काल ( वर्तमान से लगभग 6000 वर्ष पूर्व से 5000/4000 वर्ष पूर्व । छवियों में शैलीगत सरलीकरण। पहली बार मवेशियों ( पालतू पशुओं ) का प्रदर्शन। मनुष्यों की रेखीय आकृतियां (stick figure)।

शैली 7 से 9 – सातवीं शैली में, जानवरों का अंकन पहले की अपेक्षा छोटा है (10 से 30 सेमी), हेमेटाइट (hematite wash) से एक सपाट रंगत में बहुतायत में चित्रित, कूबड़ युक्त बैल (चित्र 4 व 5), परिवार तथा नृत्य के दृश्य (चित्र 6 ), शिकार के दृश्य। आठवीं शैली थोड़ा अधिक अमूर्त (abstract) है, जानवरों के लिए अधिक ज्यामितीय आकृतियां, चित्रों में रथ आता है, समूह एवं एकल नृत्य, नाव से मछली पकड़ने के दॄश्य, शिकार, कूबड़ वाले बैल प्रमुखता से, तीरों पर आगे निकला एक नुकीला सिरा। नवीं शैली अधिक स्टाइलिश है, इसमें मवेशी और हिरण प्रमुखता से हैं, गैंड़ा (चित्र 7), रथों में योद्धा (चित्र 8), नृत्य।

दसवीं से बारहवीं शैली प्रारंभिक, मध्य और उत्तर ऐतिहासिक (Historic) काल से संबद्ध हैं (2500 वर्ष पूर्व से अभी तक का काल)

शैली 10 – पूर्णतया स्टाईलिश, कठिन (stiff), मानव धनुष-बाण या लंबे भालों के साथ, अशोकन ब्राह्मी लिपी के अक्षरों का पहला उत्कीर्णन।

शैली 11 – अत्यधिक अमूर्त, चमकीले लाल और/या सफ़ेद रंग, मवेशियों के झुंड, हाथी, कुल्हाड़ियों के साथ पुरुष (चित्र 9), पैरों का आमतौर पर एक उल्टे त्रिकोणीय रूप में अंकन।

शैली 12 – 10वीं शताब्दी के बाद की अवधि, बहुत ही सरल आकृतियां, कुछ-कुछ आदिवासी कला के अंतर्गत घरों की दीवारों पर अंकित किये जाने वाले चित्राकृतियों के समान, जानवर, योद्धा, हाथी सवार, तलवारबाज, हाथों की छाप तथा ज्यामितीय डिज़ाइन।


 

अब कुछ हमारे द्वारा लिये गये चित्रों से भी गुजर लिया जाए……

                                                                                                                                                                                                                           


रवि कुमार, रावतभाटा

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