अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 5

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( अंतिम भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

mohammed_afzal_parliament_attack_060929( चौथे भाग से लगातार…) ज़्यादातर लोगों के लिए ऐसा करना आसान नहीं है, लेकिन अगर आप कर सकते हैं तो पल भर के लिए ख़ुद को इस अवधारणा से अलग कर लें कि सिद्धांततः ‘पुलिस अच्छी है/आतंकवादी शैतान हैं।’ पेश किये गये सबूतों से अगर वैचारिक साज-सज्जा हटा दी जाये तो उनसे भयावह संभावनाओं के गर्त खुल जाते हैं। सबूत ऐसी दिशा की ओर संकेत करते हैं, जिधर हममे से अधिकतर लोग नहीं देखना चाहेंगे।

पूरे मामले में ‘सर्वाधिक उपेक्षित क़ानूनी दस्तावेज़’ का इनाम क्रिमिनल प्रोसीजर कोड ( दंड प्रक्रिया संहिता ) की धारा 313 के तहत लिये गये अभियुक्त मोहम्मद अफ़ज़ल के बयान को जाता है। इस दस्तावेज़ में अदालत ने सबूतों को उसके सम्मुख सवालों के रूप में रखा है। वह या तो सबूत को स्वीकार कर सकता है या उन पर आपत्ति कर सकता है और उसे अपने ही शब्दों में अपनी कहानी का पक्ष रखने की छूट भी है। अफ़ज़ल के मामले में यह देखते हुए कि उसे अपनी सुनवाई का कोई मौक़ा नहीं मिला, यह दस्तावेज़ उसकी आवाज़ में उसकी कहानी बयान करता है।

इस दस्तावेज़ में अफ़ज़ल अपने ख़िलाफ़ अभियोगी पक्ष द्वारा कगाये गये कुछ आरोप स्वीकार करता है। वह स्वीकार करता है कि वह तारिक़ नाम के एक आदमी से मिला था। वह स्वीकार करता है कि तारिक़ ने उसका परिचय मोहम्मद नाम के एक आदमी से करवाया। वह स्वीकार करता है कि उसने दिल्ली आने और एक पुरानी सफ़ेद अम्बैसेडर कार ख़रीदने में मोहम्मद की मदद की। वह स्वीकार करता है कि मोहम्मद संसद पर हमले में मारे गये पांच फ़िदायीनों में से एक था। ‘आरोपी के रूप में अफ़ज़ल के बयान’ में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ यह है कि वह कहीं भी ख़ुद को पूरी तरह निर्दोष साबित करने की कोशिश नहीं करता। लेकिन वह अपने कार्यों को जिस संदर्भ में रखता है, वह ध्वस्त कर देने वाला है। अफ़ज़ल का वक्तव्य संसद पर हमले में उसके द्वारा निभायी गयी हाशिये की भूमिका का ब्योरा देता है। लेकिन वह हमें उन संभावित कारणों की एक समझ की ओर भी ले जाता है कि जांच इतने ढुलमुल ढंग से क्यों करायी गयी, वह सबसे महत्त्वपूर्ण स्थानों पर ठिठककर खड़ी क्यों हो जाती है और यह क्यों ज़रूरी है कि इसे महज़ अक्षमता और घटिया कहकर नज़रअन्दाज़ नहीं किया जाना चाहिए। अगर हम अफ़ज़ल पर भरोसा न भी करें, तो भी मुक़दमें और स्पेशल सेल की भूमिका के बारे में हम जो जानते हैं उसे देखते हुए, अफ़ज़ल जिस दिशा की ओर संकेत कर रहा है, उस ओर न देखना अक्षम्य है। वह स्पष्ट सूचनाएं देता है : नाम, जगहें और तारीख़ें ( यह आसान नहीं रहा होगा, इस बात के मद्दे-नज़र कि उसका परिवार, उसका भाई, उसकी पत्नी और अबोध बेटा कश्मीर में रहते हैं और अफ़ज़ल ने जिनका नाम लिया है, उनका आसान शिकार बन सकते हैं )।

अफ़ज़ल के शब्दों में :

‘मैं जम्मू-कश्मीर में सोपोर में रहता हूं और सन् 2000 में जब मैं वहां था, फ़ौज मुझे लगभग रोज़ाना परेशान करती थी…राजा मोहन राय नाम का एक आदमी मुझे उग्रवादियों के बारे में उसे सूचनाएं देने के लिए कहता था। मैं समर्पण कर चुका उग्रवादी था और ऐसे सभी उग्रवादियों को हर इतवार आर्मी कैम्प में हाज़िरी लगाने जाना पड़ता है। मझे शारीरिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया जाता था। वह मुझे बस धमकाता ही था। ख़ुद को बचाने के वास्ते मैं उसे छोटी-छोटी जानकारियां देता था, जिन्हें मैं अख़वारों से इकट्ठा करता था। जून/जुलाई 2000 में मैं अपना गांव छोड़कर बारामूला चला गया। मेरी सर्जिकल औज़ारों की एक दुकान थी, जिसे मैं कमीशन के आधार पर चला रहा था। एक दिन जब मैं अपने स्कूटर पर जा रहा था, एसटीएफ ( स्पेशल टास्क फ़ोर्स ) के लोग आये और मुझे उठा ले गये और उन्होंने पांच दिनों तक मुझे लगातार प्रताडि़त किया। किसी ने एसटीएफ को सूचना दी थी कि मैं फिर से उग्रवादी कामों में लग गया हूं। उस आदमी का मुझसे सामना हुआ और उसे मेरी मौजूदगी में छोड़ दिया गया। फिर मुझे उन लोगों ने क़रीब 25 दिन तक अपनी हिरासत में रखा और मैंने एक लाख रुपये देकर ख़ुद को छुड़ाया। स्पेशल सेल वालों ने इस घटना की पुष्टि की थी। उसके बाद मुझे एसटीएफ वालों ने सर्टिफ़िकेट दिया था और उन्होंने मुझे छह महीनों के लिए स्पेशल पुलिस अफ़सर बनाया। वे जानते थे कि मैं उनके लिए काम नहीं करूंगा। तारिक़ मुझसे पालहलन एसटीएफ कैम्प में मिला था जहां मैं एसटीएफ की हिरासत में था। तारिक़ मुझे बाद में श्रीनगर में मिला और उसने बताया कि बुनियादी रूप से वह एसटीएफ के लिए काम कर रहा था। मैंने उसे बताया कि मैं भी एसटीएफ के लिए काम कर रहा हूं। संसद के हमले में मारा गया मोहम्मद भी तारिक़ के साथ था। तारिक़ ने मुझे बताया कि वह कश्मीर के केरान इलाक़े का रहनेवाला था और उसने मुझे कहा कि मैं मोहम्मद को दिल्ली ले जाऊं, क्योंकि मोहम्मद को कुछ समय बाद दिल्ली से देश के बाहर जाना है। मैं नहीं जानता कि 15 दिसम्बर, 2001 को श्रीनगर पुलिस ने मुझे क्यों पकड़ा? मैं तब श्रीनगर बस स्टॉप से घर जाने के लिए बस में चढ़ रहा था जब पुलिस ने मुझे पकड़ लिया। उस गवाह अकबर ने, जिसने कोर्ट में कहा था कि उसने शौकत और मुझे श्रीनगर में पकड़ा था, दिसम्बर 2001 से क़रीब एक साल पहले मेरी दुकान पर छापा मारा था और मुझसे कहा था कि मैं सर्जरी के नक़ली औज़ार बेच रहा था और उसने मुझसे 5000 रुपये लिये थे। मुझे स्पेशल सेल में प्रताड़ित किया गया और एक भूपसिंह ने मुझे पेशाब पीने को भी मजबूर किया और मैंने एस.ए.आर. गिलानी के परिवार को भी वहां देखा, गिलानी की हालत बहुत ख़राब थी। वह खड़े होने की स्थिति में नहीं था। हम जांच के लिए डॉक्टर के पास ले जाये जाते, लेकिन हमें निर्देश था कि हमें डॉक्टर को बताना था कि सब ठीक-ठाक था। हमें धमकी दी जाती कि अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो हमें फिर से सताया जायेगा।’

यहां उसने अदालत से कुछ और जानकारी जोड़ने की इजाज़त मांगी :

‘संसद पर हमले में मारा गया आतंकवादी मोहम्मद मेरे साथ कश्मीर से आया था। जिस आदमी ने उसे मुझे सौंपा, वह तारिक़ था। तारिक़ सुरक्षा बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस की एसटीएफ के साथ काम कर रहा है। तारिक़ ने मुझे कहा था कि अगर मोहम्मद की वजह से मैं किसी परेशानी में पड़ा तो वह मेरी मदद करेगा, क्योंकि वह सुरक्षा बलों और एसटीएफ को अच्छी तरह जानता है…तारिक़ ने कहा था कि मुझे सिर्फ़ मोहम्मद को दिल्ली छोड़ना है और कुछ नहीं करना है और अगर मैं मोहम्मद को अपने साथ दिल्ली नहीं ले गया तो मुझे किसी दूसरे मामले में फंसा दिया जायेगा। मैं इन हालात में मजबूरन मोहम्मद को दिल्ली लाया, यह जाने बग़ैर कि वह आतंकवादी है।’

तो अब हमारे सामने ऐसे आदमी की तस्वीर उभर रही है जो इस प्रकरण में मुख्य खिलाड़ी हो सकता है। ‘गवाह अकबर’ ( अभियोजन पक्ष का गवाह 62 ), मोहम्मद अकबर, हेड कॉन्स्टेबल, परिमपोरा पुलिस स्टेशन, जम्मू-कश्मीर का वह पुलिसवाला जिसने अफ़ज़ल की गिरफ़्तारी के समय ‘बरामदगी मेमो’ पर दस्तख़त किये। सर्वोच्च न्यायालय के अपने वकील सुशील कुमार को लिखे गये एक पत्र में अफ़ज़ल मुक़दमें के दौरान एक दहलाने वाले लम्हे का ब्योरा देता है। अदालत में गवाह अकबर, जो कश्मीर से ‘बरामदगी मेमो’ के बारे में बयान देने आया था, अफ़ज़ल को कश्मीरी में आश्वस्त करता है कि ‘उसका परिवार ख़ैरियत से है।’ अफ़ज़ल फ़ौरन समझ जाता है कि यह एक छिपी हुई धमकी है। अफ़ज़ल यह भी कहता है कि श्रीनगर में पकड़े जाने के बाद उसे परिमपोरा पुलिस स्टेशन ले जाकर पीटा गया और उससे साफ़ कहा गया कि अगर वह सहयोग नहीं देगा तो उसकी पत्नी और परिवार को गंभीर नतीजे भुगतने होंगे ( हम पहले ही जानते हैं कि अफ़ज़ल के भाई हिलाल को कुछ महत्त्वपूर्ण महीनों के दौरान एस.ओ.जी. द्वारा ग़ैरक़ानूनी हिरासत में रखा गया था )।

इस पत्र में अफ़ज़ल बताता है कि उसे एसटीएफ कैम्प में किस तरह प्रताड़ित किया गया था – उसके गुप्तांगों पर बिजली की छड़े लगाकर और गुदा में मिर्च और पेट्रोल डालकर। वह पुलिस के डिप्टी सुपरिटेंडेंट द्रविन्दर सिंह का नाम लेता है जिसने उससे कहा था कि दिल्ली में ‘एक छोटे-से काम’ के लिए मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। वह यह भी कहता है कि चार्जशीट में दिये गये कुछ नंबर खोजे जाने पर कश्मीर में एक एसटीएफ कैम्प के साबित होंगे।

यह अफ़ज़ल की दास्तान है जो हमें कश्मीर घाटी में जीवन के असली रूप की झलक दिखाती है। यह तो उन बचकानी कथाओं में ही होता है – जो हम अपने अख़बारों में पढ़ते हैं – कि सुरक्षा बल उग्रवादियों से लड़ते हैं और निरपराध लोग दोनों तरफ़ की गोलीबारी की ज़द में फंस जाते हैं। वयस्कों के क़िस्सों में कश्मीर घाटी उग्रवादियों, भगोड़ों, गद्दारों, सुरक्षा बलों, दोहरे एजेंटों, मुख़बिरों, पिशाचों, ब्लैकमेल करने वालों, ब्लैकमेल होने वालों, जबरन वसूली करने वालों, जासूसों, भारत और पाकिस्तान दोनों की गुप्तचर एजेंसियों के लोगों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, ग़ैर-सरकारी संगठनों और अकल्पनीय मात्रा में बिना हिसाब-किताब वाले पैसों और हथियारों से भरी हुई है। ऐसी साफ़ लकीरें हमेशा मौजूद नहीं होतीं, जो इन सारी चीज़ों और लोगों को अलग-अलग करने वाली चारदीवारियों को चिह्नित करें। यह बताना आसान नहीं है कि कौन किसके लिए काम कर रहा है।

कश्मीर में सच्चाई संभवतः किसी भी दूसरी चीज़ से ज़्यादा ख़तरनाक है। जितना गहरे आप खोदेंगे, उतना बुरा हाल मिलेगा। गड्ढे में सबसे नीचे, एस.ओ.जी. और एस.टी.एफ. हैं, जिनकी अफ़ज़ल बात करता है। ये कश्मीर में भारतीय सुरक्षा तंत्र के सबसे निर्मम, अनुशासनहीन और डरावने तत्व हैं। नियमित बलों के विपरीत ये लोग उस धुंधले इलाके में काम करते हैं जहां पुलिसवालों, आत्मसमर्पण कर चुके उग्रवादियों, भगोड़ों और आम अपराधियों का राज है। वे स्थानीय लोगों को शिकार बनाते हैं जो 1990 के दशक की शुरूआत में हुए अराजक विद्रोह में शामिल हुए थे और अब आत्मसमर्पण करके सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं।

1989 में जब अफ़ज़ल ने उग्रवादी के रूप में प्रशिक्षण लेने के लिए सीमा पार की थी, तब वह सिर्फ़ 20 साल का था। वह बिना किसी प्रशिक्षण के, अपने अनुभवों से निराश होकर वापस आ गया। उसने अपनी बंदूक छोड़ दी और दिल्ली विश्वविद्यालय में भर्ती हो गया। 1993 में नियमित उग्रवादी न होते हुए भी उसने स्वेच्छा से बी.एस.एफ़. के सम्मुख आत्मसमर्पण किया। अतार्किक ढंग से उसके दुःस्वप्नों की शुरूआत इसी बिन्दु से हुई। उसके आत्मसमर्पण को अपराध माना गया और उसका जीवन नरक बन गया। अगर कश्मीरी नौजवान अफ़ज़ल की कहानी से यह सबक लें कि हथियार डालना और ख़ुद को भारतीय राज्य की उन अनगिनत क्रूरताओं के हवाले कर देना न सिर्फ़ मूर्खता होगी, बल्कि पागलपन ही कहा जायेगा, जो भारतीय राज्य के पास उन्हें देने के लिए है, तो क्या उन्हें दोष दिया जा सकता है?

मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी ने कश्मीरियों में आक्रोश पैदा कर दिया है, क्योंकि उसकी कहानी उनकी भी कहानी है। उसके साथ जो हुआ है, हज़ारों युवा कश्मीरियों और उनके परिवारों के साथ हो सकता है, हो रहा है या हो चुका है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि उनकी कहानियां संयुक्त पूछताछ केन्द्र की अंधेरी कोठरियों, फ़ौजी कैम्पों और पुलिस थानों में घट रही हैं जहां उन्हें दाग़ा जाता है, पीटा जाता है, बिजली के झटके दिये जाते हैं, उन्हें ब्लैकमेल किया जाता है और मार दिया जाता है। उनके शवों को ट्रकों के पीछे से फैंक दिया जाता है जहां वे राहगीरों को मिलते हैं। जबकि अफ़ज़ल की कहानी को किसी मध्यकालीन नाटक की तरह राष्ट्रीय मंच पर दिन-दहाड़े, एक ‘न्यायपूर्ण मुक़दमें’ की क़ानूनी मंज़ूरी, ‘स्वतंत्र प्रेस’ के खोखले फ़ायदों और तथाकथित लोकतंत्र के सारे आडम्बर और अनुष्ठानों के साथ, खेला जा रहा है।

अगर अफ़ज़ल को फांसी दे दी जाती है तो हमें इस असली सवाल का जवाब कभी नहीं मिलेगा कि भारतीय संसद पर आख़िर किसने आक्रमण किया? क्या वह लश्कर-ए-तैयबा था? जैश-ए-मोहम्मद था? या फिर इसका उत्तर इस देश के गुप्त ह्रदय में गहरे कहीं छिपा है, जिसमें हम सब रहते हैं और जिसे हम अपने ही सुंदर, जटिल, विविध और कंटीले ढंग से प्रेम और घृणा करते हैं।

13 दिसम्बर को संसद पर हुए आक्रमण की संसदीय जांच होनी ही चाहिए। जब तक जांच हो, सोपोर में अफ़ज़ल के परिवार की रक्षा की जाये, क्योंकि इस अजीबो-ग़रीब कहानी में वे असुरक्षित बंधक हैं।

यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए

दस फ़ीसदी वृद्धि-दर के बावजूद।

०००००

अरुंधति रॉय


इस आलेख की पीडीएफ़ फ़ाइल (232kb) यहां से फ्री डाउनलोड की जा सकती है:

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – अरुंधति रॉय


प्रस्तुति – रवि कुमार

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