अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 3

सामान्य

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.

अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान ( तीसरा भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )

parliamentattack-1_121311071046( दूसरे भाग से जारी…) पांच महीने तक, उसकी गिरफ़्तारी से लेकर उस समय तक जब पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाख़िल किया, एक उच्च सुरक्षा जेल ( हाई सिक्योरिटी प्रिज़न ) में बंद मोहम्मद अफ़ज़ल को किसी क़िस्म की क़ानूनी सहायता या क़ानूनी सलाह उपलब्ध नहीं थी। कोई नामी वकील नहीं, कोई बचाव समिति नहीं ( न भारत में, न कश्मीर में ) और कोई अभियान नहीं। चारों आरोपियों में उसकी स्थिति सबसे कमज़ोर थी, उसका मामला गिलानी के मामले से कहीं ज़्यादा जटिल था। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस दौरान ज़्यादातर वक़्त अफ़ज़ल के छोटे भाई हिलाल को कश्मीर में स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप ( एस.ओ.जी.) ने ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से हिरासत में रखा हुआ था। उसे अफ़ज़ल के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाख़िल करने के बाद ही छोड़ा गया ( यह इस पहेली का एक सिरा है जो कहानी के आगे बढ़ने के साथ ही पकड़ में आयेगा )।

प्रक्रिया की एक गंभीर अवहेलना करते हुए 20 दिसम्बर, 2001 को जांच अधिकारी, सहायक आयुक्त पुलिस राजबीर सिंह ने ( जिसे इतनी तादाद में ‘आतंकवादियों’ को एनकाउंटरों-मुठभेड़ों-में मारने के कारण प्रेम से ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’-मुठभेड़ विशेषज्ञ कहा जाता है ) स्पेशल सेल में एक पत्रकार सम्मेलन बुलाया।16 मोहम्मद अफ़ज़ल को मीडिया के सामने अपना ‘अपराध स्वीकार’ करने के लिए मजबूर किया गया। पुलिस आयुक्त अशोक चन्द ने प्रेस से कहा कि अफ़ज़ल ने पुलिस के सामने पहले ही अपना अपराध मान लिया है। यह बात सच्ची साबित नहीं हुई। पुलिस के सामने अफ़ज़ल की औपचारिक स्वीकारोक्ति अगले दिन जाकर ही हुई ( जिसके बाद वह लगातार पुलिस हिरासत में रहा – यंत्रणा के आगे बेबस – जो कि एक और गंभीर प्रक्रियागत चूक थी ) मीडिया के सामने की गयी अपनी ‘स्वीकारोक्ति’ में अफ़ज़ल ने पूरी तरह से अपने को संसद पर आक्रमण में शामिल होने का दोषी मान लिया था।17

मीडिया के सामने की गयी इस स्वीकारोक्ति के दौरान एक अजीब बात हुई। एक सीधे प्रश्न के उत्तर में अफ़ज़ल ने कहा कि गिलानी का आक्रमण से कोई लेना-देना नहीं है, वह पूरी तरह से बेक़सूर है। इस पर एसीपी राजबीर सिंह ने चीख़कर उसे जबरन चुप करवा दिया और मीडिया से गुज़ारिश की कि अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति के इस हिस्से को नज़रअन्दाज़ कर दें। और उन्होंने मान भी लिया। यह कहानी, तीन महीने के बाद उस समय सामने आयी जब टीवी चैनल ‘आज तक’ ने स्वीकारोक्ति को ‘हमले के सौ दिन’ नामक कार्यक्रम में दुबारा प्रसारित किया और जाने कैसे इस हिस्से को भी बना रहने दिया। इस बीच सामान्य जनता की नज़रों में – जो क़ानून और दंड प्रक्रिया के बारे में बहुत कम जानती है – अफ़ज़ल की सार्वजनिक ‘स्वीकारोक्ति’ ने उसके अपराध की ही पुष्टि की। ‘समाज के सामूहिक अंतःकरण के फ़ैसले’ के बारे में कोई दूसरा अनुमान लगाना मुश्किल नहीं रहा होगा।

इस मीडिया स्वीकारोक्ति के अगले दिन, अफ़ज़ल की आधिकारिक स्वीकारोक्ति करवायी गयी। परिनिष्ठित अंग्रेजी में, डीसीपी अशोक चंद को बोलकर लिखवाये गये ( डीसीपी के शब्दों में ‘वह बतलाता गया और मैं लिखता गया’) निर्दोष ढंग से रचे, एकदम प्रवाहमान वक्तव्य को एक सीलबंद लिफ़ाफ़े में न्यायिक मैजिस्ट्रेट को दिया गया। अफ़ज़ल इस स्वीकारोक्ति में, जो अब अभियोजन पक्ष के मुक़दमें की रीढ़ हो गयी है, एक ग़ज़ब का किस्सा बुनता है जो ग़ाज़ी बाबा, मौलाना मसूद, अज़हर, तारिक़ नाम के एक आदमी और पांच मारे गये आतंकवादियों को जोड़ता है; उनका साज़-सामान, हथियार और गोला-बारूद, गृहमंत्रालय के अनुमति-पत्र, एक लैपटॉप और नक़ली पहचान-पत्र, ठीक-ठीक कौन-सा रसायन उसने कहां से ख़रीदा इसकी विस्तॄत सूची, वह ठीक-ठीक अनुपात, जिसमें उन्हें मिलाकर विस्फोटक बनाया गया और ठीक-ठीक समय जब उसने किस मोबाइल नम्बर को फ़ोन किया और किस नम्बर से उसे फ़ोन आया ( किसी कारणवश, तब तक अफ़ज़ल ने गिलानी के बारे में अपना दिमाग़ बदल लिया था और उसे षड्यंत्र में पूरी तरह से शामिल कर लिया था )।

‘स्वीकारोक्ति’ का हर बिंदु पुलिस द्वारा पहले ही से जमा किये गये साक्ष्य से हू-ब-हू मेल खाता था। दूसरे शब्दों में अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति उस प्रारूप में एकदम फ़िट बैठती थी, जो पुलिस ने कुछ दिन पहले प्रेस के सामने पेश किया था, जैसे कांच की जूती में सिंड्रेला का पैर ( अगर कोई फ़िल्म होती तो आप कह सकते थे कि यह ऐसी पटकथा थी जो अपने साज़-सामान का पिटारा ख़ुद अपने साथ लायी थी। दरअसल, जैसा कि अब हम जानते हैं, इस पर एक फ़िल्म बनायी भी गयी। ज़ी टीवी अफ़ज़ल को इसके लिए कुछ रॉयल्टी का देनदार है )।

अन्ततः, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय, दोनों ने अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति को ‘प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा उपायों में चूक और उनकी अवहेलना’ के कारण ख़ारिज कर दिया। लेकिन जाने कैसे, अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति अब तक बची रह गयी है – अभियोजन पक्ष की किसी भुतही आधारशिला की तरह। और इससे पहले कि यह स्वीकारोक्ति तकनीकी और क़ानूनी तौर पर ख़ारिज हो, यह क़ानून से इतर एक बड़ा उद्देश्य हासिल कर चुकी थी। 21दिसम्बर, 2001 को जब भारत सरकार ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ युद्ध की तैयारी शुरू की, तो उसने कहा कि हमारे पास पाकिस्तान का हाथ होने के ‘स्पष्ट और अकाट्य प्रमाण’ हैं।18 अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति ही भारत सरकार के पास पाकिस्तान के शामिल होने का एकमात्र ‘प्रमाण’ थी। अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति। और स्टिकर घोषणा-पत्र। ज़रा सोचिये। पुलिस यंत्रणा के बल पर ली गयी इस ग़ैर-क़ानूनी स्वीकारोक्ति के आधार पर हज़ारों सैनिक जनता के ख़र्च पर पाकिस्तान की सीमा की ओर रवाना कर दिये गये और उपमहाद्वीप को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचाने के खेल के सुपुर्द कर दिया गया, जिसमें सारी दुनिया बन्धक बनी हुई थी।

कान में कहा गया बड़ा सवाल : क्या इसका बिल्कुल उलट नहीं हुआ हो सकता था ? क्या स्वीकारोक्ति ने युद्ध को उकसाया या फिर युद्ध की ज़रूरत ने स्वीकारोक्ति की ज़रूरत को उकसाया ?

बाद में, जब ऊंची अदालतों ने अफ़ज़ल की स्वीकारोक्ति को ख़ारिज कर दिया तो जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा की सारी बाते बंद हो गयीं। पाकिस्तान से जुड़ाव का दूसरा तार पांच मारे गये फ़ियादिनों की पहचान का रह गया था। मोहम्मद अफ़ज़ल ने, जो पुलिस हिरासत में ही था, उनकी पहचान मोहम्मद, राना, राजा, हमज़ा और हैदर के रूप में की थी। गृहमंत्री ने कहा कि ‘वे पाकिस्तानियों जैसे लगते थे’, पुलिस ने कहा वे ‘पाकिस्तानी थे’, निचली अदालत के न्यायाधीश ने कहा वे पाकिस्तानी थे19 और यही मामले की स्थिति है ( अगर हमसे कहा जाता कि उनके नाम हैप्पी, बाउन्सी, लक्की, जॉली और किडिंगमनी थे और वे स्कैंडिनेवियाई थे, तो हमें वह भी मानना पड़ता )।

हम अब भी नहीं जानते कि वे सचमुच कौन हैं, या वे कहां के हैं। क्या किसी को कोई उत्सुकता है? लगता तो नहीं। उच्च न्यायालय ने कहा, ‘इस तरह मारे गये पांच आतंकवादियों की पहचान स्थापित मानी जाती है। न भी होने की स्थिति में भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जो बात प्रासंगिक है, वह मारे गये लोगों के साथ आरोपी का संबंध है, न कि उनके नाम।’

अपने ‘आरोपी के वक्तव्य’ में ( जो कि स्वीकारोक्ति के विपरीत, नयायालय में दिया जाता है, पुलिस हिरासत में नहीं ) अफ़ज़ल का कहना है : ‘मैंने किसी भी आतंकवादी की शिनाख़्त नहीं की थी। पुलिस ने मुझे नाम बतलाये और मजबूर किया कि मैं उनकी शिनाख़्त करूं।20  लेकिन तब तक उसके लिए बहुत देर हो चुकी थी। मुक़दमें के पहले दिन, निचली अदालत द्वारा नियुक्त अफ़ज़ल के वकील ने ‘अफ़ज़ल द्वारा पहचाने शवों की शिनाख़्त और पोस्टमार्टम की रिपोर्टों को बिना किसी औपचारिक प्रमाण के अविवादित साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने’ के लिए सहमति दे दी थी। अफ़ज़ल के लिए इस चकरा देने वाले क़दम के गंभीर परिणाम होने वाले थे। सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को उद्धृत करें तो, ‘आरोपी अफ़ज़ल के ख़िलाफ़ पहली परिस्थिति यह है कि अफ़ज़ल जानता था मारे गये आतंकवादी कौन थे। उसने मारे गये आतंकवादियों के शवों की शिनाख़्त की थी। इस पहलू से जुड़े साक्ष्य अकाट्य हैं।’

निश्चय ही यह संभव है कि मारे गये आतंकवादी विदेशी लड़ाके हों। लेकिन इतनी ही संभावना है कि वे न हों। लोगों को मारकर ‘विदेशी आतंकवादियों’ के रूप में उनकी झूठी शिनाख़्त करना, या झूठे ही मृत लोगों की शिनाख़्त ‘विदेशी आतंकवादियों’ के रूप में करना, या झूठे ही जीवित लोगों की शिनाख़्त आतंकवादियों के रूप में करना, पुलिस या सुरक्षा बलों के लिए आम बात है चाहे कश्मीर में हो या दिल्ली की सड़कों पर।21

भरपूर दस्तावेज़ी सबूतों पर आधारित कश्मीर के अनेक मामलों में सबसे ज़्यादा जाना-माना मामला छत्तीसिंहपुरा हत्याकांड के बाद हुई मार-काट का है, जो आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय प्रवाद बन गया। 20 अप्रेल, 2000 की रात, अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के नयी दिल्ली पहुंचने के ठीक पहले, छत्तीसिंहपुरा गांव में ‘अनजाने बंदूकधारियों’ ने, जो भारतीय सेना की वर्दियां पहने हुए थे, 35 सिखों की हत्या कर दी थी।22 ( कश्मीर में कई लोगों को शंका है कि इस हत्याकांड के पीछे भारतीय सुरक्षा बल थे )। पांच दिब बाद एस.ओ.जी. और सेना की उपद्रव निरोधक इकाई ‘राष्ट्रीय राइफ़ल्स’ ने एक संयुक्त अभियान में पथरीबल नामक गांव के बाहर पांच आदमियों को मार गिराया था।23 अगले दिन उन्होंने घोषणा की वे पाकिस्तान के रहने वाले विदेशी आतंकवादी थे, जिन्होंने छत्तीसिंहपुरा में सिखों की हत्या की थी। शव जले हुए और शक्लें बिगाड़ी हुई थीं। अपनी ( बिना जली ) सैनिक वर्दियों के नीचे वे सामान्य सिविलियन कपड़े पहने हुए थे। बाद में पता चला कि वे स्थानीय लोग थे जिन्हें अनन्तनाग ज़िले में गिरफ़्तार किया गया था और निर्ममतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया था।

किस्से और भी हैं :
20 अक्टूबर, 2003 : श्रीनगर के अख़बार ‘अल-सफ़ा’ ने एक पाकिस्तानी ‘उग्रवादी’ की तस्वीर प्रकाशित की, जिसके बारे में 18वीं राष्ट्रीय राइफ़ल्स ने दावा किया कि उन्होंने उसे तब मारा जब वह एक सैनिक शिविर पर हमले का प्रयास कर रहा था। कुपवाड़ा के एक नानबाई वली ख़ान ने तस्वीर की पहचाण अपने बेटे फारूख़ अहमद के रूप में की, जिसे सैनिक दो महीने पहले जिप्सी में उठाकर ले गये थे। अन्ततः उसका शव एक साल बाद खोदकर निकाला गया।24

20 अप्रेल, 2004 : लोलाब घाटी में तैनात 18वीं राष्ट्रीय राइफ़ल्स ने एक घमासान मुठभेड़ में चार विदेशी उग्रवादियों को मार गिराने का दावा किया। बाद में पता चला कि चारों साधारण मज़दूर थे, जिन्हें सेना जम्मू से कुपवाड़ा लायी थी। एक बेनाम चिट्ठी के ज़रिये मज़दूरों के घरवालों को उनकी जानकारी मिली थी, जो कुपवाड़ा गये और अन्ततः मृतकों को खोदकर निकलवाया।25

9 नवंबर, 2004 : सेना ने नगरोटा, जम्मू में भारतीय सेना की 15वीं कोर के जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग और जम्मू कश्मीर पुलिस के महानिदेशक की उपस्थिति में पत्रकारों के सामने आत्मसमर्पण करने वाले 47 ‘उग्रवादियों’ को पेश किया। जम्मू-कश्मीर पुलिस को बाद में पता चला कि उनमें 27 लोग बेरोज़गार आदमी थे, जिन्हें झूठे नाम और उपनाम दिये गये थे और जिन्हें इस बुझौवल में अपनी भूमिका निभाने के बदले सरकारी नौकरी देने का वादा किया गया था।26

ये सिर्फ़ इस तथ्य को उजागर करने के लिए जल्दी में दी गयी थोड़ी-सी मिसालें हैं कि दूसरे किसी भी सबूत की ग़ैर-मौजूदगी में, पुलिस जो कहती है वह किसी भी हालत में पर्याप्त नहीं होता

( अगली बार लगातार… चौथा भाग )


संदर्भ :

16. ‘स्पेशल सेल एसीपी फ़ेसेज़ चार्जेज ऑफ़ एक्सेसेज़, टार्चर’, हिंदुस्तान टाइम्स, 31 जुलाई, 2005। सिंह की बाद में ( मार्च, 2008 में ) – एक विवाद में जो व्यापक रूप से विश्वास किया जाता है कि अपराधियों की दुनिया और ज़मीन-जायदाद से संबंधित था – हत्या कर दी गयी। देखें, प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट राजबीर सिंह शॉट डेड’, हिंदुस्तान टाइम्स, 25 मार्च, 2008 ।
17. देखें लेख, ‘टेरेरिस्ट्स वर क्लोज़-निट रिलिजियस फ़ेनैटिक्स’ और ‘पुलिस इम्प्रेस विद स्पीड बट शो लिटल एविडेंस’, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 21 दिसम्बर, 2001 । इंटरनेट पर उपलब्ध : http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/1600576183.cms और http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/1295243790.cms ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया )।
18. एमिली वैक्स और रमा लक्ष्मी, ‘इंडियन ऑफ़िशियल पॉइंट्स टू पाकिस्तान’, वॉशिंगटन पोस्ट, 6 दिसम्बर, 2008, पृ. A8 ।
19. मुखर्जी, 13 दिसम्बर, पृ. 43 ।
20. श्री एस.एन. ढींगरा की अदालत में आपराधिक मामलों की धारा 313 के तहत मोहम्मद अफ़ज़ल का बयान, एएसजे, नयी दिल्ली, राज्य बनाम अफ़जल गुरू और अन्य, एफआईआर 417/01 सितम्बर, 2002 । इंटरनेट पर उपलब्ध : http://www.outlookindia.com/article.aspx?232880 और http://www.revolutionarydemocracy.org/afzal/azfal6.htm ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया )।
21. एजाज़ हुसैन, ‘किलर्स इन ख़ाकी’, इंडिया टुडे, 11 जून, 2007 । ‘पीयूडीआर पिक्स सेवरल होल्स इन पुलिस वर्ज़न ऑन प्रगति मैदान एनकाउंटर’, द हिंदू, 3 मई, 2005, और पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, एन अनफ़ेयर वरडिक्ट : ए क्रिटिक ऑफ़ स रेड फोर्ट जजमेंट ( नयी दिल्ली, 22 दिसम्बर, 2006 )  और क्लोज़ एनकाउंटर : ए रिपोर्ट ऑन पुलिस शूट-आउट्स इन डेल्ही ( नयी दिल्ली, 21 अक्टूबर, 2004 ) भी देखें।
22. देखें, ‘ए न्यू काइंड ऑफ़ वॉर’, एशिया वीक, 7 अप्रेल, 2000, और रणजीत देव राज, ‘टफ़ टॉक कंटीन्यूज़ डिस्पाइट पीस डिमांड्स’, इंटर प्रेस सर्विस, 19 अप्रेल, 2000 ।
23. देखें, ‘फ़ाइव किल्ड आफ़्टर छत्तीसिंहपुरा मैसेकर वर सिवियन्स’, प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, 16 जुलाई, 2002 और ‘ज्यूडिशियल प्रोब ऑर्डर्ड इनटू छत्तीसिंहपुरा सिख मैसेकर’, 23 अक्टूबर, 2000 ।
24. पब्लिक कमिशन ऑन ह्यूमन राइट्स, श्रीनगर, 2006, ‘स्टेट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स इन जम्मू एंड कश्मीर 1990-2005′, पृ. 21 ।
25. ‘प्रोब इनटू अलेज्ड फ़ेक किलिंग ऑर्डर्ड’, डेली एक्सेल्सियर ( जनिपुरा ), 14 दिसम्बर, 2006 ।
26. एम.एल.काक, ‘आर्मी क्वायट ऑन फ़ेक सरेंडर बाई अल्ट्राज़’, द ट्रिब्यून ( चंडीगढ़ ), 14 दिसम्बर, 2006 ।


प्रस्तुति – रवि कुमार

( यह आलेख अरुंधति रॉय के लेखों के संग्रह, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और नीलाभ द्वारा संपादित पुस्तक “कठघरे में लोकतंत्र” से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. यह अंग्रेजी की मूलकृति Listening of Grasshoppers से अनूदित है. यह लेख सबसे पहले ३० अक्‍तूबर, २००६ को ‘आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. )

2 responses »

  1. पिंगबैक: अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 4 « सृजन और सरोकार

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