लेखक होने का मतलब – एदुआर्दो गालेआनो

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लिखने के लिए
निबंध : एदुआर्दो गालेआनो

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उरुग्वे में जन्में एदुआर्दो गालेआनो ( १९४० ) ने लेखन की शुरुआत प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं में लिखने से की और इसी वज़ह से सैन्य तानाशाही के दमन का शिकार बनकर देश छोड़ने को मजबूर होना पड़ा. लेखन और सक्रिय भागीदारी से उन्होंने सामाजिक बदलाव के संघर्षों में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई और वे महत्त्वपूर्ण समकालीन लातिन अमरीकी लेखकों में शुमार किए जाते हैं.

स्पेनिश से पी.कुमार मंगलम द्वारा अनुवादित उनका महत्त्वपूर्ण आलेख “लिखने के लिए” समयांतर के अक्तूबर’२०११ अंक में प्रकाशित हुआ था. इसमें उन्होंने लेखन और साहित्य से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को लातिन अमेरिकी संदर्भों में उठाया है, जो अपने कलेवर में सार्विक रूप ग्रहण कर लेते हैं. यहां उस आलेख के कुछ ऐसे ही सार्विक अंश प्रस्तुत किए जा रहे हैं.

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“जब भी कोई लिखता है तो वह औरों के साथ कुछ बांटने की जरूरत ही पूरी कर रहा होता है। यह लिखना अत्याचार के ख़िलाफ़ और अन्याय पर जीत के सुखद अहसास को साझा करने के लिए होता है। यह अपने और दूसरों के अकेले पड़ जाने के अहसास को ख़त्म करने के लिए होता है। यह माना जाता है कि साहित्य ज्ञान और समझ को फैलाने का ज़रिया है और यह पढ़ने वालों की भाषा और आचरण पर असर डालता है। लेकिन ‘बाकी लोगों’ और ‘दूसरों’ जैसे शब्द बड़े हे भ्रामक हैं, खासकर संकट के समय जब सही और ग़लत की पहचान जरूरी हो जाती है तब तो ऐसे भ्रामक शब्द झूठे भी हो सकते हैं। दरअसल, लिखा उन्हीं के लिए जाता है जिनके नसीब या बदनसीबी के साथ जुड़ाव महसूस किया जाता है। ये वो लोग हैं जो न ढंग का खा सकते हैं न सो सकते हैं, वे इस दुनिया के सबसे दबे-कुचले, अपमानित और इसलिए सबसे भयंकर विद्रोही लोग हैं।

इनमें से ज़्यादातर पढ़ना नहीं जानते हैं। थोड़े से पढ़े-लिखे लोगों में से कितनों के पास इतना पैसा है कि वे किताबें खरीद सकें? तब कोई भी क्या सिर्फ़ यह कहकर कि वह “आम लोगों” ( जो अभी के दौर में एक भ्रामक लेकिन बहुत प्रचलित रहने वाला शब्द है ) के लिए लिख रहा है, इस भयंकर सच्चाई से मुंह मोड़ सकता है?”

“सवाल यह है कि हम जैसे लोग जो बेआवाज़ लोगों की आवाज़ बनना चाहते हैं वे इस भयानक माहौल में कैसे काम करें? जब डंडे और बाज़ार के ज़ोर से सबको गूंगा-बहरा बनाया जा रहा है तब क्या हम अपनी बात सुना सकते हैं? आज के हमारे लोकतंत्र दरअसल चुप्पी और डर पैदा करने वाले लोकतंत्र हैं। ऐसे में लेखकों के लिए जो भी थोड़ी से जगह बची है क्या वह व्यवस्था के आगे समर्पण और इसलिए इनकी हार का सबूत नहीं है? हमारी लेखकीय आज़ादी की सीमा क्या है और हम इससे किन लोगों को फायदा पहुंचा रहे हैं? न्याय और आज़ादी के लिए भूख तथा खुले प्रत्यक्ष-परोक्ष दमन करने वाली व्यवस्था के ख़िलाफ़ बात करना और लिखना है तो बहुत अच्छा लेकिन सत्ता हमें यह छूट किस हद तक और कब तक देती है? ऐसे और भी कई सवाल हैं।”

“….लेखक एक संस्कृति उद्योग के दिहाड़ी मजदूर हैं जो भद्र अभिजात वर्ग की उपभोक्तावादी जरूरतों को पूरा करते हैं, वे ख़ुद भी इसी तबके से आते हैं और इसी के लिए लिखते हैं। यही लेखकों की नियती है कि उनका लिखना ले-देकर सामाजिक गैरबराबरी कायम रखने वाली विचारधारा द्वारा तय सीमा के भीतर ही होता है। साथ ही, हम जैसे लेखक जो इन हदों को तोड़ना चाहते हैं उनका भी यही हाल है।

हम जैसे समाज में रहते हैं वहां आबादी के बड़े हिस्से की रचनात्मक क्षमताओं और संभावनाओं को लगातार ख़त्म किया जा रहा है। कुछ नया रचने-गढ़ने का काम जो जीने के दर्द को साझा करने और मौत से लड़ने के लिए जरूरी है अब चंद पेशेवर ‘विशेषज्ञों’ या ‘बुद्धिजीवियों’ के भरोसे छोड़ दिया गया है। हम जैसे कितने ऐसे ‘बुद्धिजीवी’ लातिन अमेरिका में हैं? हम लिखते किनके लिए हैं और किनकी बात करते हैं? हमारा लिखा किन लोगों की आवाज़ बनना चाहिए? तालियों की गड़गड़ाहट और पुरस्कारों के सपने से आगे बढ़कर हमें ये सवाल ख़ुद से पूछने होंगे। क्योंकि कभी-कभी हमारी तारीफ़ सबसे ज़्यादा वही करते हैं जिन्हें हमारे लिखने से कोई ख़तरा नहीं महसूस होता।

दरअसल, लिखना कुछ-कुछ मौत से लड़ने जैसा है। यह लड़ाई है हमारे अंदर और बाहर फैली मुर्दा उदासी और बेरुखी के ख़िलाफ़। लेकिन यह आने वाली पीढ़ियों के काम तभी आ सकता है जब यह अपनी पहचान के लिए संघर्षरत समुदाय की जरूरतों से ख़ुद को जोड़ लेता है। मेरी समझ में एक लेखक का मौत की तरह तारी होती उदासी से ख़ुद को बचाना और अपने लिखे की ताकत पहचानना ही बाकियों को उनकी पहचान देता है। इस तरह, इंसानियत की इस लड़ाई में कला और साहित्य हथियार लेकर चलने वाले अगुआ पंक्ति के सिपाही की तरह हैं, किसी राजा के आरामगाह की चीज़ नहीं।”

“थोपी गई बाहरी संस्कृति के हाथों अपनी पहचान हारने और अपने पसीने, खून और सपने की कीमत पर पूंजी और मुनाफ़ा बनाती-बांटती व्यवस्था को ज़िंदा रखने वाले ऐसे ही लोगों के लिए ‘मास कल्चर’ का झुनझुना तैया किया गया है। यह और कुछ नहीं बल्कि ‘मास’ के लिए ‘कल्चर’ के नाम पर लोगों के बोलने, विचारने, कुछ कहने और करने की भावनाओं को नियंत्रित करना ही है। जनता के लिए पेश यह ‘मास कल्चर’ सच देख सकने की हमारी क्षमता को ही कुंद करता है और बदले में हमें कुछ करने, बनाने और नया रचने के झूठे अहसास से भर देता है।

यह जाहिर है कि यह लुभावना मास कल्चर हमें अपनी अस्मिता को पाने की दशा में आगे नहीं बढ़ाता, उल्टे अलग-अलग तरीक़े से हमें एक खास ढंग से जीने को बाध्य करता और खरीददार बनाता यह मास कल्चर हमें इस लड़ाई से ही अनजान और उदासीन बना देता है। शासक वर्ग द्वारा विकसित देशों से सीधे-सीधे आयातित और ‘वैश्वीकरण’ और ‘विश्व-सभ्यता’ करार दिए गए बेचने-खरीदने और मुनाफ़ा कमाने की संस्कृति को ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ का नाम दे दिया गया है। हमारे दौर की यह तथाकथित ‘विश्व सभ्यता’ बाज़ार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खुली छूट और टी.वी. तथा अन्य संचार माध्यमों के फैलते जाल से चुनिंदा विकसित देशों के हित साधने वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था के शिकंजे का पूरी दुनिया पर कसते जाने का ही दूसरा नाम है। यही चुनिंदा और दुनिया के मालिक बने बैठे देश पूरी दुनिया को मशीनें, पेटेंट और साथ ही इस पूरी व्यवस्था को चलाने के लिए कुछ मंत्र भी बेचते हैं जिसे वह ‘विचारधारा’ का नाम देते हैं।”

“हालात यह हैं कि सिर्फ़ कुछ ही लोग सुख-सुविधाओं के पहाड़ पर बैठे हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि बाकी सारे लोग नीचे रहकर उन्हें देखें और किसी दिन ऊपर पहुंच जाने का सपना देखते रहें। यहां गरीबों को अमीरी, गुलामों को आज़ादी, हारे हुओं को जीतने और जिनकी हड्डियां तक चूस ली गई हैं उन्हें दुनिया पर राज करने के सपने बेचे जाते हैं। गैरबराबरी पैदा करने वाली व्यवस्था को बनाए रखने की जरूरत का अहसास टी.वी., रेडियो और फिल्में कराती हैं जो दिन-रात सबकी समझ में आ सकने वाले अंदाज़ में व्यवस्था का संदेश फैलाती रहती हैं। हर एक मिनट में बीमारी और भूख से एक बच्चे की हत्या करने वाली यह व्यवस्था हमें अपने हिसाब से ढाल लेने और इस अन्याय का हिस्सा बनाने के सभी उपाय करती है। हमें यह सिखाया जाता है कि दुनिया हमेशा से ऐसी ही रही है और सबकुछ ठीक चल रहा है। शासन करने वाला दल ही देश हो जाता है और विरोध की आवाज़ उठाने वालों को बड़ी ही आसानी से गद्दार या विदेशी जासूस करार दिया  जाता है। ‘जंगल के कानून’ को ‘कानून का राज’ घोषित कर दिया जाता है ताकि लोग सबकुछ क़िस्मत का खेल मानकर चुपचाप बैठे और सहते रहें।”

“रोज जब टी.वी. और सिनेमा के पर्दे पर हारने वाले को ‘कमज़ोर’ और हराने वाले ‘मजबूत’ बताए जाते हैं तब यह इतिहास में दर्ज़ कुछ देशों द्वारा दूसरे देशों को खोखला कर कमज़ोर बना देने के अनेकों ‘बहादुर’ और ‘मजबूत’ कारनामों को जायज़ ठहराने के लिए ही होती हैं। पैसे की बर्बादी, भद्दा प्रदर्शन और अच्छे बुरे का खयाल न करते हुए सिर्फ़ अपना मतलब निकालना अब कोई बुरी बात नहीं बल्कि ‘कामयाब’ इंसान की पहचान मानी जाती है। यहां सब कुछ खरीदा, बेचा, किराये पर लिया और खाया-पचाया जा सकता है। यहां तक कि आत्मा भी।….टी.वी. और सिनेमा के पर्दे देशों की सामाजिक समस्याओं और ज़मीनी राजनीतिक हालात से कोसों दूर बनावटीपन और अश्लीलता की एक अलग ही दुनिया रचते हैं। पश्चिमी देशों से लाए गए टी.वी. कार्यक्रम योरोप और अमेरीका छाप लोकतंत्र का पाठ पढ़ाते हैं और वह भी बंदूक और फास्ट फूड की जय-जयकार के साथ।”

“देशों की आबादी का बड़ा हिस्सा काम की तलाश में भटक रहे नौजवानों का है जिनके गुस्से के किसी दिन फूट पड़ने का डर सरकार चला रहे लोगों की नींद उड़ाए हुए है। यहीं से इस संभावित आक्रोश को कुंद करने की सारी साजिशें शुरू हो जाती हैं। नशे की लत लगाकर युवाओं को उनके समाज से ही काट देना और कुछ कर गुजरने की इच्छा-शक्ति ख़त्म कर देना लगातार किए जा रहे ऐसे ही उपायों में से एक है। इसलिए बेतहाशा बढ़ रही आबादी को रोकने की बजाए, यहां लोगों के सोचने-समझने की क्षमता ज़्यादा कारगर तरीक़े से नियंत्रित की जाती है।….पुरानी, बदलाव की घोर विरोधी और पुलिसिया दमन पर टिकी सरकारों वाले देशों में नई पीढ़ी का व्यवस्था में कोई दखल ही नहीं है।”

“सत्तर के दशक में योरोप और अमेरिका की ठहरी और पुरानी पड़ चुकी व्यवस्थाओं के ख़िलाफ़ हुए युवा संघर्षों के नारे, उनके प्रतीक, उनका मिजाज़ और सपने अब बाज़ार के कब्ज़ें में है। नया संसार उभारने वाली छवियां अब ‘आज़ादी’ के नारे साथ बेची और खरीदी जाती हैं। इसी तरह, उनका संगीत, उनके पोस्टर, बाल बनाने और कपड़े पहनने का उनका खास अंदाज़ अब नशे की लत में सपने ढूंढ़ने वाली पीढ़ी और ‘तीसरी दुनिया’ में ऐसे ही सामानों के फैल रहे कारोबार में काम आ रहे हैं।….उद्योगप्रधान समाज के द्वारा राजनीतिक-आर्थिक सच्चाइयों से पूरी तरह काट दिए गए तबके की दबी-छुपी बेचैनियों से जन्मी इस भ्रामक ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ का हमारी अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है। यह तो अधिक से अधिक लोगों को कुछ कर दिखाने का भ्रम ही देती है…यह सभी सामाजिक बंधनों और जिम्मेदारियों को नकार कर हमें आस-पास की सच्चाइयों से दूर कर देती है, और होता यह है कि सबकुछ यूं ही चलता रहता है और हम अपनी ही रची इस नकली दुनिया के खयालों में खोए रह जाते हैं जो हमें बिना लड़े और तकलीफ़ झेले सबकुछ पाने की ख़ुशफहमी से बांधे रखता है।”

“तो लोगों को झकझोरकर जगा देने और उन्हें आस-पास की सच्चाई से रू-ब-रू करने का काम कैसे किया जाए? जब दुनिया इस दौर के कठिन हालात से रू-ब-रू है तो क्या साहित्य हमारे काम आ सकता है?….ऐसे समय में जब हम अपनी अलग-अलग इच्छाओं और सपनों के साथ एक-दूसरे को सिर्फ़ फायदे और नुकसान के नज़रिए से देख-समझ और परख पा रहे हैं तब सबको साथ लेकर चलने और दुनिया की तस्वीर बदलने का ख़्वाब संजोने वाले साहित्य की क्या भूमिका हो? हमारे आस-पास के हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लिखना और कुछ नहीं बल्कि एक के बाद दूसरी समस्याओं की बात करना और उनसे भिड़ना हो गया है। तब हमारा लिखना किन लोगों के ख़िलाफ़ और किनके लिए हो?….हम जैसे लेखकों की क़िस्मत और सफ़र बहुत हद तक बड़े सामाजिक बदलावों की जरूरत से सीधे-सीधे जुड़ा है। लिखना इस बदलाव के लिए लड़ना ही है क्योंकि यह तो तय है कि जब तक गरीबी, अशिक्षा और टी.वी. तथा बाकी संचार माध्यमों के फैलते जाल पर बैठी सत्ता का राज कायम रहेगा तब तक हमारी सबसे जुड़ने और साथ लड़ने की सभी कोशिशे बेकार ही रहने वाली हैं।”

“जब किसानों-मज़दूरों सहित आबादी के बड़े हिस्से की आज़ादी ख़त्म की जा रही है तब सिर्फ़ लेखकों के लिए कुछ रियायतों या सुविधाओं की बात से मैं सहमत नहीं हूं। व्यवस्था में बड़े बदलावों से ही हमारी आवाज़ एलीट महफ़िलों से निकलकर खुले और छिपे सभी प्रतिबंधों को भेद कर उस जनता तक पहुंचेगी जिसे हमारी जरूरत है और जिसकी लड़ाई का हिस्सा हमें बनना है। अभी के दौर में तो साहित्य को इस गुलाम समाज की आज़ादी की लड़ाई की उम्मीद ही बनना है।”

“इसी तरह, यह सोचना भी ग़लत होगा कि जीने के रोज के संघर्षों से जूझ रही बदहाल जनता सिर्फ़ साहित्य और कला के माध्यम से अपनी छीनी जा चुकी सृजन-क्षमता को दोबारा पा सकेगी। जीवन की कड़वी सच्चाइयों के मारे कितने ही प्रतिभाशाली लोग कुछ करने से पहले ही समय के अंधेरे में खो जाते हैं।….कभी न पूरे होने वाले सपने के जाल में फंसी और अपने आस-पास की सच्चाइयों से अनजान जनता आखिर बदलाव लाए तो कैसे? यह उम्मीद करना तो बेमानी ही होगा कि यह जनता अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की जरूरत ख़ुद ही समझ जाएगी। तो क्या ऐसे में लोगों को लड़ने की जरूरत का अहसास – चाहे प्रत्यक्ष हो या परोक्ष – साहित्य नहीं करा सकता? मेरी समझ से यह बहुत कुछ इस बात से भी तय होता है कि लेखक अपने लोगों की पहचान, उनके कामकाज और उनकी क़िस्मत को बनाने-बदलने वाले हालात के साथ कितनी गहराई से जुड़े हैं?”

“हमारी असली पहचान इतिहास से जन्मती और आकार लेती है जो पत्थर पर पड़े और सुरक्षित हो चुके पैरों के निशान की तरह समय के अलग-अलग पड़ावों से होकर गुजरे हमारे सफ़र का गवाह बना रहा है। लेकिन, इतिहास से यह जुड़ाव पुरानी चीज़ों और यादों से चिपके रहना नहीं है जो बड़ी आसानी से कट्टरता का रूप भी ले सकता है। इसी तरह, यह भी तय है कि अब तक दबी हुई पहचान कुछ खास तरह के कपड़ों, रीति-रिवाजों, और चीज़ों से हमारे दिखावटी मोह से भी जाहिर नहीं होती। ये सब तो विकास की दौड़ में हरा और पछाड़ दिए गए देशों के बाज़ारों में विदेशी पर्यटकों को लुभाने के काम ही आते हैं। हम वही हैं जो हम करते हैं, खासकर हम जो हैं उसे बदलने के लिए जो कुछ करते हैं। हमारी पहचान हमारे इन्हीं कामों और हमारे संघर्षों से बनती है। इसलिए पहचान की यह लड़ाई व्यवस्था के उन सभी रूपों से लोहा लेना है जो हमें सिर्फ़ एक आज्ञाकारी कामगार और खरीददार बनाती है। तब लेखक होने का मतलब इस चुनौती और प्रतिरोध की आवाज़ बनना ही है।”

“अपने दौर के तमाम संकटों और बदलाव की चाह को समेटे तथा सभी तरह के खतरों से भिड़ने वाला साहित्य ही नयी और बेहतर दुनिया की तस्वीर दिखा सकता है और ख़्वाब देखने की हिम्मत और हुनर वाले लेखकों के ज़रिए वह इस दुनिया को हासिल करने का रास्ता भी दिखा सकता है। जाहिर है, ….अन्याय और उदासी के माहौल में साहित्य का अपना एक अलग महत्त्व है।”

“आबादी का बड़ा हिस्सा जब जीने के संघर्षों में लगा है तब कुछ लेखक ‘विशिष्ट’ होने का दावा करते हुए अपने लिए सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। कुछ ऐसे भी लेखक हैं जो सरकारी दमन की स्थिति में साहित्य को ही कोसते हुए सत्ता के साथ हो लेते हैं। मैं इन दोनों ही बातों के बिल्कुल ही ख़िलाफ़ हूं। लेखक न तो कोई भगवान होता है और न ही व्यवस्था की मर्जी का गुलाम। यह सही है कि हम आसपास की घटनाओं से प्रेरणा लेकर अपना साहित्य बुनते हैं लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि हम अपने को सिर्फ़ यहीं तक सीमित रखें। देखा जाए तो लिखना एक गतिविधी ही है, यह अपने आप में कोई जादुई चीज़ नहीं है, लेकिन जब एक लेखक हमें इस दुनिया का असली रंग देखने और बेहतर दुनिया बसाने का हौसला देने वाले लोगों और अनुभवों के साथ ला खड़ा करता है तब उसके लिखे का असर किसी जादू से कम भी नहीं होता। साथ ही, अगर उसका लिखा लोगों को विद्रोही और सत्ता के लिए ‘अपराधी’ बनाने के साथ-साथ उनकी सोच बदलता या उसे नए आयाम देता है तब वह बदलाव की लड़ाई का हिस्सा जरूर बन सकता है। संघर्षों से ऐसे सहज रूप से जुड़े लेखक अभिमान और ख़ुद को अच्छा साबित करते रहने की होड़ में नहीं रहते क्योंकि वे जानते हैं कि उनका सफ़र औरों से अलग और ज़्यादा कठिन है।”

“मेरे ख़्याल से सिर्फ़ अपनी सोच और अंतहीन उलझनों को जाहिर करने के लिए शब्दों की बाजीगरी करने वालों को लिखना छोड़ देना चाहिए। शब्द तो अपने पूरे अर्थ के साथ अन्याय के ऊपर ज़िंदगी जा जश्न मनाने वालों के लिखे में ही आकार लेते हैं। हमें पास बैठ कर बात करने वाले चाहिए, दूर बैठ कर तमाशा देखने वाले नहीं। हम बातचीत और मेलजोल बढ़ाने के लिए हैं सिर्फ़ तालियां पाकर, बाकी सबकुछ अपनी जगह छोड़कर, ख़ुश होने को मजबूर तमाशा दिखाने वाले नहीं। लिखना लोगों से मिलने की हमारी जरूरतें पूरी करता है, कुछ इस तरह से कि हमें पढ़ने वाले हमसे अपने जज़्बात शब्दों के ज़रिए साझा करें जिन्हें हम उम्मीदों और सपनों की शक्ल देकर उन तक पहुंचाएं।”

“साहित्य अपने-आप सबकुछ ठीक कर देगा यह मानना खामख्याली ही होगी। लेकिन बदलाव की लड़ाई में साहित्य की भागीदारी को सिरे से खारिज करना भी सरासर बेवक़ूफ़ी होगी। लिखते समय हम इस व्यवस्था से तय होती हमारी सीमाओं से अच्छी तरह वाकिफ़ होते हैं। सच कहें तो यही सीमाएं समाज की सच्चाइयों को हमारे सामने खोलती भी हैं। हम अपनी इन्हीं सीमाओं के साथ हताशा और निराशा से भरे इस दौर में व्यवस्था से भिड़ते हुए अंततः इन सीमाओं को भी ध्वस्त कर सकते हैं।….हमारे लिखने की सार्थकता तभी है जब हम अपनी बात बिना डरे, पक्के इरादे के साथ और बेबाकी से रख पाएं और एक बेहतर दुनिया का सपना देकर लोगों को लड़ने का हौसला दे पाएं। हमारी ख़्वाहिश ऐसी भाषा गढ़ने की है जो जनसंघर्षों से डरी और पराजित हो रही व्यवस्था की चाकरी करने वाले लेखकों की वाह-वाह और जय-जयकार के उलट कहीं ज़्यादा बेख़ौफ़ और खूबसूरत हो।”

“लेकिन सवाल सिर्फ़ भाषा का ही नहीं है। सवाल यह भी है कि हम अपनी बात रखते कैसे हैं। प्रतिरोध की संस्कृति को अपनी बात रखने के लिए सभी मौजूद तरीक़े काम में लाने होंगे और संवाद के किसी भी माध्यम या अवसर को छोटा समझने की ‘एलीट’ सोच से बचना होगा। हमारे पास समय कम है, लड़ाई मुश्किल और करने को बहुत कुछ है। सामाजिक बदलाव के लिए लड़ रहे लोगों के लिए लिखना इस लड़ाई के बहुत से मोर्चों में से एक है। हम यह नहीं मानते कि साहित्य सिर्फ़ बुर्जुआ वर्ग के घरों की शेल्फों में सजाकर रखी जाने वाली कोई चीज़ भर है।….लोगों को सुपर मार्केट और हवाई ज़िंदगी की मदहोशी देकर सच से बेख़बर बना देने वाले संचार माध्यमों के फैलते-कसते जाल से लड़ती-भिड़ती अपनी आवाज़ बुलंद करती जनवादी पत्रकारिता एक बेहतर दुनिया का सपना देने वाली कितनी ही आवाज़ों के बलिदान की गवाह बनी है। अपनी रचनात्मकता और प्रभाव में यह किसी भी ‘महान’ और ‘बेस्टसेलर’ करार दिए गए उपन्यासों या कहानियों से कम नहीं है।”

“मुझे विश्वास है अपने काम पर और शब्द के अपने हथियार पर। मैं यह कभी नहीं समझ पाया कि भुखमरी और बेकारी के इस दौर में साहित्य की सीमाओं की दुहाई देने वाले लोग फिर लिखते ही क्यों हैं? या फिर यह भी कि क्यों लोग शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने या चंद नारों या पार्टी दस्तावेज़ों के लिए अपनी भक्ति दिखाने के लिए करते हैं? शब्द तो एक हथियार की तरह हैं, यह हम पर निर्भर करता है कि हम चाहें तो इससे व्यवस्था को उलट देने का हौसला दे दें या ‘सबकुछ अच्छा चल रहा है’ मानकर प्रकृति और ईश्वर का गुणगान करते रहें।”

“सच कहूं तो अभी के….साहित्य के लिए सबसे बड़ा काम बेहतर दुनिया की हमारी साझी समझ के ख़िलाफ़ बेधड़क और खुलेआम चल रहे सरकारीकरण और बाज़ारीकरण से शब्दों को बचाना है। क्योंकि आजकल ‘आज़ादी’ मेरे देश की एक जेल का नाम है और तानाशाह सरकारों ने ख़ुद को
‘लोकतंत्र’ घोषित कर रखा है। अब ‘प्यार’ इंसान का अपनी गाड़ी से लगाव और ‘क्रांति’ बाज़ार में आए किसी नये ब्रांड़ के धमाकेदार प्रचार के काम आ रहे हैं। अब हमें खास और मंहगे ब्रांड का साबुन रगड़ने पर ‘गर्व’ और फास्ट-फूड खाने पर ‘ख़ुशी’ का अहसास होता है। ‘शांत देश’ दरअसल बेनाम कब्रों की लगातार बढ़ते जाने वाली कतार है और ‘स्वस्थ’ इंसान वह है जो सबकुछ देखता है और चुप रहता है।”

“धीरे-धीरे….एक नए तरह का साहित्य आकार ले रहा है। ऐसा साहित्य जो लोगों को सबकुछ ख़त्म हो चुकने की उदासी नहीं बल्कि कुछ नया करने की ताकत दे रहा है। यह मार दिए गए हमारे लोगों को इतिहास में दफ़न नहीं करता बल्कि उन्हें हमारे सामने ला खड़ा करता है, यह सबकुछ भूल जाना नहीं बल्कि बल्कि इतिहास के पन्नों से बदलाव की हमारी साझा लड़ाई की वज़हें और जरूरतें ढूंढना सिखाता है। यही साहित्य लड़ने की हमारी परंपरा और उसके गवाह रहे अनगिनत लोकगीतों और कहानियों में गूंज रहे शब्दों का सच्चा साथी और पहरुआ है। अगर हम यह मानते हैं कि इतिहास सिर्फ़ यादें खरौंचने से कहीं ज़्यादा उम्मीद जगाने की कोई चीज़ है तो यह उभरता हुआ साहित्य उन तमाम सारे लोगों को हाथ दे सकेगा जो आज नहीं तो कल किसी भी तरह से उलटबांसियों से भरे हमारे इतिहास को बदल देने वाले हैं।”

०००००
एदुआर्दो गालेआनो
प्रस्तुति – रवि कुमार

8 responses »

  1. क्योंकि कभी-कभी हमारी तारीफ़ सबसे ज़्यादा वही करते हैं जिन्हें हमारे लिखने से कोई ख़तरा नहीं महसूस होता।

    चुनिंदा और दुनिया के मालिक बने बैठे देश पूरी दुनिया को मशीनें, पेटेंट और साथ ही इस पूरी व्यवस्था को चलाने के लिए कुछ मंत्र भी बेचते हैं जिसे वह ‘विचारधारा’ का नाम देते हैं।”

    इसी तरह, यह सोचना भी ग़लत होगा कि जीने के रोज के संघर्षों से जूझ रही बदहाल जनता सिर्फ़ साहित्य और कला के माध्यम से अपनी छीनी जा चुकी सृजन-क्षमता को दोबारा पा सकेगी। जीवन की कड़वी सच्चाइयों के मारे कितने ही प्रतिभाशाली लोग कुछ करने से पहले ही समय के अंधेरे में खो जाते हैं।….कभी न पूरे होने वाले सपने के जाल में फंसी और अपने आस-पास की सच्चाइयों से अनजान जनता आखिर बदलाव लाए तो कैसे? यह उम्मीद करना तो बेमानी ही होगा कि यह जनता अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की जरूरत ख़ुद ही समझ जाएगी। तो क्या ऐसे में लोगों को लड़ने की जरूरत का अहसास – चाहे प्रत्यक्ष हो या परोक्ष – साहित्य नहीं करा सकता? मेरी समझ से यह बहुत कुछ इस बात से भी तय होता है कि लेखक अपने लोगों की पहचान, उनके कामकाज और उनकी क़िस्मत को बनाने-बदलने वाले हालात के साथ कितनी गहराई से जुड़े हैं?”

    मुझे विश्वास है अपने काम पर और शब्द के अपने हथियार पर। मैं यह कभी नहीं समझ पाया कि भुखमरी और बेकारी के इस दौर में साहित्य की सीमाओं की दुहाई देने वाले लोग फिर लिखते ही क्यों हैं? या फिर यह भी कि क्यों लोग शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने या चंद नारों या पार्टी दस्तावेज़ों के लिए अपनी भक्ति दिखाने के लिए करते हैं? शब्द तो एक हथियार की तरह हैं, यह हम पर निर्भर करता है कि हम चाहें तो इससे व्यवस्था को उलट देने का हौसला दे दें या ‘सबकुछ अच्छा चल रहा है’ मानकर प्रकृति और ईश्वर का गुणगान करते रहें।”

  2. आजकल ‘आज़ादी’ मेरे देश की एक जेल का नाम है और तानाशाह सरकारों ने ख़ुद को
    ‘लोकतंत्र’ घोषित कर रखा है। अब ‘प्यार’ इंसान का अपनी गाड़ी से लगाव और ‘क्रांति’ बाज़ार में आए किसी नये ब्रांड़ के धमाकेदार प्रचार के काम आ रहे हैं। अब हमें खास और मंहगे ब्रांड का साबुन रगड़ने पर ‘गर्व’ और फास्ट-फूड खाने पर ‘ख़ुशी’ का अहसास होता है। ‘शांत देश’ दरअसल बेनाम कब्रों की लगातार बढ़ते जाने वाली कतार है और ‘स्वस्थ’ इंसान वह है जो सबकुछ देखता है और चुप रहता है।”

    उम्मीद का दिया दिखते रहना चाहिए।

  3. “अपने दौर के तमाम संकटों और बदलाव की चाह को समेटे तथा सभी तरह के खतरों से भिड़ने वाला साहित्य ही नयी और बेहतर दुनिया की तस्वीर दिखा सकता है और ख़्वाब देखने की हिम्मत और हुनर वाले लेखकों के ज़रिए वह इस दुनिया को हासिल करने का रास्ता भी दिखा सकता है। जाहिर है, ….अन्याय और उदासी के माहौल में साहित्य का अपना एक अलग महत्त्व है।”
    बेहतरीन आलेख श्रम साध्य .

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