जब मांगही मजुरिया ते लाठी मारहे

सामान्य

अभी एक कार्यक्रम में सीवान जाना हुआ. वहां गया के वासुदेव जी से कुछ मगही गीत सुनने को मिले. इनके तेवर अनोखे हैं. कम से कम मेरे लिए तो हैं ही. और समझने की उत्कंठा में उनसे सुन-सुन कर दो गीत लिख लिए. इन्हें यहां प्रस्तुत करने का मन हुआ. पढ़े और देखें कि प्रचलित मान्यताओं के विपरीत, लोक-चेतना अपने प्रतिरोधी रंग कैसे बिखेरती है. इनके भावार्थ भी साथ दिये गए हैं.

पहला गीत
अकिल से पहचान ले

सब दिन ठगवा ठग ले जाहऊ
अकिल से पहचान ले

डांक बाबा मुरगा मांगऊ, बरछी बाबा सुअरा
देवता मांगऊ पुआ-पुड़ी, देवी मांगऊ झटहा
अंत समय कोऊ काम न आवऊ
सब देवता धसका
सब दिन ठगवा….

पुजवा कई लहीं वेश होवेला, न छुटलऊ छोरा के फरका
माटी कोड़ के पीणी बनऊ लहीं, सिंदूरा से कई लहीं तिलका
बाल बचा मिल गोड़वा लाग लहीं
तैंयो न देवता बोलता
सब दिन ठगवा….

पढ़ल लिखेल पर देवता न आवऊ
मूर्खा बन गलऊ भगता
ढ़ोलक के ताल पर देहिया डुलावऊ
कह हऊ कि आगल देवता
सब दिन ठगवा….

{ यह कहा गया कि यह कबीर के एक मूल पद का मगही लोक-रूपांतरण है. भावार्थ : सारे दिन ठग लोग हमें ठग के ले जाते रहते हैं अतएव अक़्ल लगा कर पहचान लेना चाहिए. पहला पद – डांक बाबा मुर्गा मांगते हैं, बरछी बाबा सुअर ( यहां डांक बाबा और बरछी बाबा, क्षेत्र में प्रसिद्ध विभिन्न व्यक्ति हैं जिन पर कि देवता आते हैं ऐसा माना जाता है ) देवता पुआ-पुड़ी मांगते हैं और देवी झटका बलि मांगती हैं. पर अंत समय में कोई काम नहीं आता सब मिट्टी में धसक जाते हैं. दूसरा पद – छोटे लड़के की बीमारी फरका ( बेहोश होने, मूर्च्छा आने की ), पूजा करने से क्या ठीक हो सकती है? मिट्टी को सान-गूंद कर पिंड़ी बना ली और उस पर सिंदूर से तिलक लगा दिया है. बाल बच्चों के साथ मिलकर उसे दंड़वत करते हैं, फिर भी देवता है कि कुछ भी बोलता नहीं है. तीसरा पद – पढ़े-लिखे लोगों पर देवता नहीं आता, और मूर्ख लोग भगत ( पुजारी, ओझा ) बन गये हैं. ढ़ोलक की ताल पर अपनी देह को हिलाते हैं और कहते हैं कि देवता आगये हैं. }

दूसरा गीत
मांगही मजुरिया ते लाठी मारहे

भाषण में गरीब कहके शासन करहे
जब मांगही मजुरिया ते लाठी मारहे

हमरी चमड़ी से पापी लेहू रोज सिरौरे
उकरे तो पिटरौल बनाके मोटर-गाड़ी छोड़े
भूखल रोइत हमर बुतरू बादर फारहे
जब मांगही मजुरिया ते लाठी मारहे

आंधी पानी रउदा जाड़ा, सहली खेते में
टूसा से पत्तल ले जिनगी, जीली खेते में
ऊ तो कोहवर रोज रचावे, फैशन झाड़हे
जब मांगही मजुरिया ते लाठी मारहे

कुरसी पर भी उकरे पूता, किकरा से विपत सुनाऊं
धीरज के कपड़ा ले कब तक, हहरल लोर सुखाऊं
लेहूआएल अतरी पर पापी लेमो गरहे
जब मांगही मजुरिया ते लाठी मारहे

बैल के रोवां हम जुड़ावही, अपन हीसा देके
ऊ कंठी माला फेरे है, हमरो हीसा लेके
बहुत सतौले सुन अब हमरो राज आवहे
जब मांगही मजुरिया ते लाठी मारहे

{ इस गीत को किसने लिखा पता नहीं, ऐसा कहते हैं कि उनके गांव के ही किसी पुराने बुजुर्ग ने इसे लिखा था. भावार्थ : भाषणों में गरीबों की बात करके, वे शासन करते हैं पर जब हम अपने काम की मज़दूरी मांगते हैं तो लाठी से मारते हैं. पहला पद – हमारी चमड़ी से वे पापी रोज लहू चूसते, खीचते ( सिरौते ) हैं, और उसका पेट्रोल बना कर अपनी मोटर गाड़ियां दौड़ाते हैं. हमारे बच्चे ( बुतरू ) भूखे रो-रोकर बादल फाड़े जाते हैं. दूसरा पद – हम तो आंधी, बारिश, धूप ( रउदा ), सर्दी सब खेत में सहते हैं. हम तो अंकुर ( टूसा ) से पत्तों तक की जिंदगी खेत में जीते हैं. और वह रोज अय्याशी ( कोहवर ) रचाते हैं, फैशन झाड़ते हैं. तीसरा पद – कुर्सी पर, सत्ता पर भी उन्हीं के बेटे बैठे हैं, किसको अपनी विपत्ती की बात सुनाई जाए. धीरज के कपड़े से कब तक अपने लगातार ( हहरल ) बह रहे आंसुओं ( लोर ) को सुखाते रहें. लहूलुहान आतों ( लेहूआएल अतरी ) पर पापी नींबू ( लेमो ) निचोड़ते हैं. चौथा पद – बैलों को हम अपना हिस्सा देके खुश रखते हैं ( रोवां जुड़ाना, रोम जोड़ना मुहावरा है जिसका अर्थ खुश रखना, आत्मा को प्रसन्न रखना है ), यानि जो हमारे लिए श्रम करते हैं उन्हें हम अपना भी हिस्सा देकर प्रसन्न रखना चाहते हैं. और वे हमारा हिस्सा लेकर, हड़प कर कंठी-माला फेरते हैं. बहुत सता लिया सुनले अब हमारा राज आनेवाला है. )

प्रस्तुति – रवि कुमार

10 responses »

  1. रवि जी,

    मैं पटना में रह रहा हूँ लेकिन मगही में यह गीत नहीं सुना कभी। पहला गीत और दूसरा गीत दोनों अच्छे हैं। आपने इनको लिखा कैसे? किसी से गवाकर? द्विवेदी जी ने आपका पता दिया।

    • भाई चंदन जी,
      वहां गया के वासुदेव जी से कुछ मगही गीत सुनने को मिले…..और समझने की उत्कंठा में उनसे सुन-सुन कर दो गीत लिख लिए…
      आपको अच्छा लगा, जानकर अच्छा लगा…

  2. आज चार महीने बाद फिर इसे पढ़ा और इसी के साथ आपके सारे लेख-कविताएँ पढ़ गया। आज मगही गीतों को देखा तो लगा कि हम कई शब्द जानते हैं लेकिन अर्थ तक पहुँच नहीं पाते(जबकि इन्हें भी हम जानते रहते हैं)…यहाँ कोहबर का अर्थ तो ठीक ही है लेकिन कोहबर शादियों में होता / होती है। विवाह के दौरान किसी खास कमरे को शायद कोहबर कहते हैं…माँ को पता होगा या स्त्री वर्ग को पता होगा ठीक से। इसपर एक उपन्यास भी याद आता है- ‘कोहबर की शर्त’ , यह उपन्यास वही है जिसपर नदिया के पार फिल्म बनी है। केशव प्रसाद मिश्र की रचना है यह। …टूसा का अर्थ भी कुछ हद तक जेहन में था लेकिन सही अर्थ आपसे ही मालूम हुआ…

    • कोहबर शादियों से जुड़ा हुआ शब्द ही बताया था…वासुदेव जी ने इसे समझाते हुए…शादी की रात…पहली मुलाकात…सुहागरात…जैसा कहा था…
      आप सही कह रहे हैं…पर यहां जब भावार्थ दे रहा था…तो जब प्रसंग देखा…कि शादी तो एक-दो-चार बार ही होती है.. 🙂 …वे जब इसे रोज-रोज रचा रहे हैं…तो इसके आगे…अय्याशी…लिखना ही उचित लगा…मतलब शब्दार्थ नहीं…भावार्थ…

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