अ..अ..अनुलोम कर रहे थे, बस जरा सा व..वि..विलोम हो गया

सामान्य

अ..अ..अनुलोम कर रहे थे, बस जरा सा व..वि..विलोम हो गया

कई दिनों तक उल्टेलाल जी नहीं दिखे, हमें उनकी चिंता हुई कि कहीं काली रात के हंगामे में उनके साथ कुछ ज़्यादा ही बुरा न गुजर गया हो. सलाह हमारी थी, तो हम एक उच्च आध्यात्मिक और सभ्य गिल्ट महसूस रहे थे. एक अलसुबह पता चला कि उल्टेलाल जी रात से ही जूते हाथ में लिये हमें खोज रहे हैं, तो एकबारगी तो हमारी भागने की इच्छा हुई, और उल्टेलाल जी के प्रकोप से बच सकने के लिए पत्नी को आदेश दे दिया कि जल्दी से अपना एक सफ़ेद सलवार सूट और बड़ी-सी सफ़ेद चुन्नी निकाल कर हमें दे दे. अब हालात ऐसे हो गये हैं कि मुंह छिपाए बगैर काम नहीं चलेगा, अभी तो निकल लें फिर देखेंगे.

हमारे संस्कार ऐसे ही तो सिखाते नहीं है कि होनी को कौन टाल सकता है, जिससे बचने की कोशिश कर रहे थे वही सच सामने आ गया, पोल एक दिन खुलनी थी खुल गई, होनी होकर रही. परंपरा भी यही सिखाती थी कि काठ की हांडी को सोच समझ कर ही काम में लेना चाहिए, न कि बार-बार चढ़ाना और चूल्हे पर सीधा रख देना चाहिए. फिर भी हमनें जोश और गलतफहमियों में यही किया और फंस गये, कहां उल्टेलाल जी को सलाह देदी. गये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास. चौबे जी चले थे छब्बे जी बनने, दुबे जी रह गये. कई मुहावरे और कहावतें हमारे छुटमगज़ में ऊपर-नीचे हो रही थीं. खिसक ही रहे थे कि घर के पिछवाड़े उल्टेलाल जी के हत्थे हम चढ़ ही गये, उन्होंने हमें रंगे हाथों, सलवार चुन्नी के पीछे भी पहचान ही लिया और हमारी गिरेबान पकड़ ली, ” क्यों भाईजी, कहां भागे जा रहे हो. हमें वहां भूखों फंसाए दिए, लाठियां भंजवा दी और ख़ुद चुपचाप खिसक लेना चाह रहे हो.”

हम मिमियाए, “न न नहीं…ब भ भा भाई जी, हम तो ऐसे ही अ..अ..अनुलोम कर रहे थे, बस जरा सा व..वि..विलोम हो गया. ब..ब..बस्स.” हमने अपना थूक गटका और बोले, “हमें पता चला कि आप हमें ढूंढ रहे है तो हमने सोचा कि ख़ुद जाकर आपसे मिल लें और पूछे कि मामला क्या है?” वह गुर्राए, “वाह जी, फिर ये भाभी जी के पीतांबर क्यों कर ड़ाले हुए हैं?” हमने बात पलटने की कोशिश की, “ये तो..व..व्वो क्या है कि…अ..आप बताईये, सुना उस रात कुछ हंगामा-संगामा सा हो गया था?”

वे हम पर चढ़ बैठे, “आप तो कहे थे कि कुच्छौ नहीं होने वाला है, आप भी जाकर चहरा चमका लीजिए, धन-धंधे में बरकत होगी…आप तो हमें फंसवा दिये यार! लट्ठ पड़े जो अलग, किरकिरी हुई जो अलग और सबसे ऊपर चहरा चमकने की बजाए उस पर कालिख पुत गई. बूहूहू…इच्छा हो रही है यही तुम्हारा एनकांउटर कर दें.” हमारे तो ड़र के मारे हाथ पैर कांपने लगे, बांई आंख कुछ ज़्यादा ही फड़कने लगी. हमने फिर से बात संभालने की कोशिश की, “पर आप समझने की कोशिश तो कीजिए, ऐसी भी कोई बात थोड़े ही बिगड़ी है…यह सब तो चलता रहता है..बल्कि कहें तो असल संघर्षों की राह तो यही है, जिसके खिलाफ़ आप आंदोलन करें और वह आपके लिए पलक-पांवड़े बिछाए…ऐसा तभी हो सकता है कि जबकि आपकी सीधी-असीधी मिलीभगत हो…अब लट्ठ पड़े हैं तो यह तय हो जाएगा कि आप वाकई सरकार के खिलाफ़ हैं और व्यवस्था परिवर्तन करके रहेंगे…ही..ही.”

उन्होंने हमें चमकाया, “लेकिन हमें सरकार के खिलाफ़ कहां जाना था, हमें तो सिर्फ़ चहरा चमकाना था और जीत दिखाकर निकल जाना था…धन-धंधे में बरकत करनी थी, जैसा कि आप बताए थे.” हम मिमियाए, ” देखिए उल्टेलाल जी, अब सब कुछ योजनानुसार थोड़े ही होता है, कुछ गड़बड-सड़बड़ भी हो जाती है कभी…वो क्या है कि अभी तक पुलिस को सेवा में, सुरक्षा में सलामी देते देखा था…ऐसा बर्बर दमन कहां देखे…उफ़ वाकई वह एक कयामत वाली रात थी…कितना जुल्म ढ़ाया गया…च्च..च्च.”

वे दहाड़ पड़े, “ये च्च..च्च करके हमें लल्लू मत समझिये जी, आप भले नहीं जानते हों पर हम बखूबी जानते हैं कि पुलिस क्या चीज़ है और पुलिसिया दमन क्या होता है. पूरे देश में जो आम आदमी का, मजदूरों का, भूमिहार किसानों का, आदिवासियों का, उनके विरोधों पर जो गज़ब का ड़ंड़ा चलाया जाता है, सरेआम गोलियां चलाई जाती हैं, उसको देखते हुए तो ऐसा लग रहा था कि जैसे कि शैतान बच्चे को हल्की सी ड़ांट पिलाई जा रही हो. बर्बर दमन…क्या खूब कही आपने.” हम उन्हें टोके, “परंतु उल्टेलाल जी दमन तो दमन ही है, भले लाख भटकाव हों, भले रहनुमा सिर्फ़ चहरा चमकाना चाह रहे हों, पर आम जनता जो इन विरोधों से जुड़ती है, वह तो वाकई उन नारों के नाम पर, उन मुद्दों के नाम पर, उन तकलीफ़ों और उनसे मुक्ति के नाम पर ही उनके पीछे होती है. इसलिए उनका दमन तो दमन ही है, आखिर वे शांतिपूर्ण सत्याग्रह ही तो कर रहे थे…इसे कैसे आप हल्के में ले सकते हैं?”

एकबारगी तो उल्टेलाल जी थोड़ा नरम से पड़े, फिर उल्टा पड़े, “यह भली कही आपने, वाह जी क्या खूब सत्याग्रह. सत्य की टांग तो पहले ही तोड के आये थे, पहले ही दिन सत्य की तो हवा निकाल दी गई, अब बचा केवल आग्रह का हठ, मौका मिल गया उसे खत्म करवाने का. झूंठ के दम पर कहीं सत्याग्रह चला करते हैं, भली कही आपने. और ऐसे सत्याग्रही कैसे जो जरा सी घुड़की मिलते ही अपने सत्य और आग्रह का परिधान वहीं छोड, श्वेतांबर पहन भाग निकले. अरे सत्याग्रही तो वह जो सत्य के लिए, दमनकारी के सामने सीना तान कर खड़ा हो जाए. का गाते रहे थे कुछ पुराने लोग वह कि…सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजुए क़ातिल में है…”

उन्होंने एक लंबी सांस ली और चालू रहे, “और यह भी आप भली कह रहे हैं कि आम जनता, आप तो अपनी रोटियां यहीं से सैकते रहते हैं तो बैठे बिठाए कुछ भी सोचा कीजिए. हम गये थे वहां हमें तो कहीं भी आम जनता नहीं नज़र नहीं आई वहां पर, कुछ मेहनत से कटे शरीर और दिमाग़ से बीमार लोग थे जो घर और काम से फ़ालतू हैं और अपना टाम-टीपरा समेटे हर शिविर में पहुंच जाते हैं किसी चमत्कार की उम्मीद में, अधिकतर योग और दवाईयों के व्यवसाय से जुड़े और सीधे फायदा उठा रहे लोग थे जिनकी आजीविका अब इनकी चैन से जुड गई है और जो देश भर में संगठनों से जुडे हैं, पदाधिकारी हैं, व्हीप के अनुसार व्यवस्था करना जिनका धर्म सा हो जाता है, बाकी कुछ हम जैसे भी लोग थे जो चहरा चमकाए के खातिर, आप जैसे नकारा लोगों के बहकाये में आकर वहां पहुंच गये थे. और भईया इन माता-बहनों के बारे में का कहें ये बेचारी पुरुष सत्ता की मारी हर धार्मिक से लगते जमावड़े में सहारा सी खोजती पहुंच जाती है.”

उनकी सांस फूलने लगी थी, पर बोलना जारी था, “बताईये अब यदि इन सब पर भी दमन हुआ तो…सरकार को फिलहाल छोडिए…राज्य और व्यवस्था तो उनसे टकराव लेने वाली हर शक्ति का दमन करेगी ही…उससे प्यार और संवेदनशीलता की आकांक्षा रखना तो बेमानी है…पर आप ही बताईये, किसकी जिम्मेदारी ज़्यादा बनती है. इन सब भोले लोगों को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए इकट्ठा किया जाता है, दिन भर उनके सामने सच नहीं लाया जाता है उन्हें धोखे में रखा जाता है, और जब पुलिसिया दमन शुरू होता है तो छुप जाया जाता है, बेसहारा छोड़ कर भाग जाया जाता है. क्या यह सरेआम धोखाधड़ी और चार सौ बीसी का मामला नहीं है.” वे कहते हुए कहीं गुम से हो लिए दिखते थे, हमने मौका ताड़ा और वहां से चुपचाप खिसक लिए. बाद में पता चला कि उल्टेलाल जी आजकल खूब उल्टा-सुल्टा बकने में लगे हुए हैं.

कुछ दिनों बाद फिर मिले, हम मिलते ही बोले, “क्यों उल्टेलाल जी, आप फालतू ही उल्टी-उल्टी बातें बनाते रहते हैं. देखिए अनशन जारी है, कुछ ना कुछ होकर ही रहेगा, पूरे देश में उबाल है. अरे वे योगी हैं योगी, योगी लोग बिना कुछ खाए-पिए सैकड़ो साल निकाल सकते हैं, सरकार को आखिर झुकना ही होगा.” वे फिर भड़क उठे, “आप चुप कीजिए जी, लगता है आप तो मरवाकर ही दम लेंगे. वैसे ही अनशन टूटने का कोई ज़रिया नहीं निकल रहा है और आप ये अफ़वाहे और फैलाईये कि योगियों का भला कुछ बिगड़ा है. अरे अन्न नहीं पहुंचता काया में तो ब्रह्म छूटने लगता है. लगता है आप टीवी-सीवी नहीं देखते हैं, या फिर प्रोफ़िट-सोफिट ही देखते रहते हैं. पांच-सात दिन में ही टैं बोल गया योग-सोग, अब ऐलोपैथी के डॉक्टरों के भरोसे हैं और इज्ज़त बचाने की कोई तरकीब नहीं निकल रही है. एक वो थी इरोम शर्मिला-वर्मिला…ऐसा ही कुछ, सुना था उसे जबरन खाना देना पड़ता था…एकदम नकारा, अरे डॉक्टर तो भगवान होते हैं, उन्हें तो सहयोग करना चाहिए…जैसे कि अभी किया जा रहा है.” उन्होंने अपनी आंख दबाई, हम सिहर से उठे.

वे बोलते रहे, “अब अनशन टूटना ही चाहिए भाई कैसे भी, कोई राह तो निकालनी ही होगी.  वे जिएं, भरपूर जिएं. सत्य को समझें, उसका दामन पकड़े फिर अपने आग्रह तय करें. तभी समुचित सत्याग्रहों या संघर्षों की राह पकड़ें. अन्न लें और औरों के अन्न की भी चिंता करें. भईया सच तो यही है कि अन्न ही ब्रह्म है, अन्न के बिना कुछ नहीं सूझता और अधिकतर लोगों के पास इसी की गारंटी नहीं है कि दोजून अन्न भी नसीब होगा कि नहीं. और फिर भी कुछ लोग इस अन्न की बात को छोड़कर पूरे देश को ब्रह्म में डूब जाने की राह पर ले जाना चाहते हैं…वाकई इस देश का तो भगवान ही मालिक है.” हमसे बोलते हुए नहीं बन रहा था, कहां बैठे-बिठाए फिर से उल्टेलाल जी के पल्ले पड़ गये थे. अब उन्हें कौन समझाए कि भई ये समझ का नहीं, आस्था से जुड़ा मामला बन जाता है, और तार्किक सोच के साथ इस पर बोल कर कौन आम खुशफहमियों के आगे बुरा बनने की जुर्रत करे. अपनी खुशनुमा चल रही ज़िंदगी और धन-धंधे में बरकत की संभावनाओं से कौन पंगा ले.

जिन्हें अन्न नसीब है, वे ब्रह्म की राह चलेंगे. और जिन्हें अन्न नसीब नहीं, वे अपनी अन्न की राह ख़ुद ढ़ूढ़ेंगे, ढ़ूढ़नी ही होगी लाख भटकावों के बावज़ूद. इसके सिवाय कोई विकल्प नहीं.

22 responses »

  1. इन सब भोले लोगों को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए इकट्ठा किया जाता है, दिन भर उनके सामने सच नहीं लाया जाता है उन्हें धोखे में रखा जाता है, और जब पुलिसिया दमन शुरू होता है तो छुप जाया जाता है, बेसहारा छोड़ कर भाग जाया जाता है. क्या यह सरेआम धोखाधड़ी और चार सौ बीसी का मामला नहीं है.
    wah!

  2. .
    .
    .
    वे जिएं, भरपूर जिएं. सत्य को समझें, उसका दामन पकड़े फिर अपने आग्रह तय करें. तभी समुचित सत्याग्रहों या संघर्षों की राह पकड़ें. अन्न लें और औरों के अन्न की भी चिंता करें. भईया सच तो यही है कि अन्न ही ब्रह्म है, अन्न के बिना कुछ नहीं सूझता और अधिकतर लोगों के पास इसी की गारंटी नहीं है कि दोजून अन्न भी नसीब होगा कि नहीं. और फिर भी कुछ लोग इस अन्न की बात को छोड़कर पूरे देश को ब्रह्म में डूब जाने की राह पर ले जाना चाहते हैं…वाकई इस देश का तो भगवान ही मालिक है.

    जिन्हें अन्न नसीब है, वे ब्रह्म की राह चलेंगे. और जिन्हें अन्न नसीब नहीं, वे अपनी अन्न की राह ख़ुद ढ़ूढ़ेंगे, ढ़ूढ़नी ही होगी लाख भटकावों के बावज़ूद. इसके सिवाय कोई विकल्प नहीं.

    बेहतरीन!


    b

  3. क्या रवि जी,

    आप भी न…

    ‘स्वामी विवेकानंद’ तुल्य जैसे व्यक्ति के सात ‘जालियांवाला बाग़ कांड’ हो गया और आप अनुलोम-विलोम कर रहे हैं..

    जय हिंद….

  4. “जिन्हे अन्न नसीब नही है. वे अपनी अन्न की राह खुद ढूंढ लेँगे.”

    अच्छा
    60 सालो से तो अभी तक ढूंढ नही पाये.
    लगता है जब ऊपर पहुच जायेँगे तब ही उन्हे अन्न मिलेगा.

    क्यो कि जब तक वो नीचे है तब तक वो अन्न लूटने वाली इटली की देवी के प्रति अपनी चापलूसी और भक्ति प्रदर्शित करते रहेँगे.
    और जो उनको ऐसा करने से रोकेगा .
    उसपे वे टूट पड़ेगे. उसकी जान ले लेँगे .
    अपनी इटली की लुटेरिन देवी के खातिर.
    जय हो चापलूसी की.

  5. चेहरा चमकाने का मूलमंत्र छिपा है इस आलेख में पर अनुलोम से विलोम होने का खतरा अपवाद के तौर पर लेना होगा.
    जबरदस्त

  6. एक बापू थे जो इक्कीस इक्कीस दिनों तक एक नहीं अनेकों बार अनशन पर बैठ कर अंग्रेजों को छटी का ढूढ़ याद दिला देते थे जिन्हें कभी एमरजेंसी में हस्पताल में भर्ती होने की नौबत नहीं आई…एक बाबा हैं जो ढेढ़ दौ सो वर्ष जीने का दंभ भरते हैं और चार पांच दिनों के उपवास में ही पेड़ पर लटके पीले पत्ते की तरह कांपने लग गए…अब गिरे के तब गिरे की स्तिथि में…उन्हें शायद पता नहीं है के आज भी जैन समाज में सैंकड़ों आम स्त्री पुरुष बच्चे तेरह दिनों तक बिना खाए पिए हँसते खेलते व्रत करते हैं, बिना योग का सहारा लिए. हे जनता जनार्दन जागो.

    नीरज

  7. बोले तो एक दम मस्त व्यंग्य। जिन्हे अन्न नसीब नहीं वे अन्न की तलाश है और जिन्हे है वे ब्रह्म की राह में । अन्न नहीं पहुंचता काया मे तो भूखे भजन न होय गोपाला

  8. द्विवेदी जी की बात लगभग सहमत!

    श्याम जी ने खुद बकवास सा कुछ कर दिया है।

    नीरज जी की बात भी ध्यान देने लायक।

    रोहित भाई तो पहले भी मिल चुके हैं। इन लोगों की भक्ति में दखलंदाज़ी मत कीजिए रवि भाई!

    अब मैं कुछ कहता हूँ। सबसे अच्छी बात ये लगी कि इस पूरे आलेख और 20 टिप्पणियों में कहीं भी साफ-साफ नाम नहीं आया कि किसके बारे में ये सब कहा गया है।

    आखिर कौन से लोग थे जो अपने घर से दिल्ली चले गए थे कुछ कपड़े-लत्ते लेकर वह भी बिना पेट की चिन्ता किए? वही लोग जिनके लिए दो-चार दिन की कोई समस्या नहीं है। मजदूर और किसान के पास इतना समय कहाँ कि वह कई दिन मेहनत ना कर के यही सब करता रहे वह भी एक पूंजीवादी के साथ।

    शोर मचाना अलग बात है।

    मैंने तो सुना है कि अन्नो वै ब्रह्म:। आश्चर्य है कि अच्छी अच्छी बातें भी हमारे ही शास्त्रों में हैं!

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