भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के विरोध में अनशन

सामान्य

धन-धंधे में बरकत होती रहनी चाहिए

हमारे एक मित्र हैं, उल्टेलाल. खूब सोचविचार कर, जानबूझकर हमसे टकराए, और बोले कि वे कल अनशन पर रहेंगे. हम चौंक गये और पूछा, “क्या भई कल रामलीला में दिल्ली जा रहे हो?” वे ठंड़ी सांस लेकर बोले, “कहां भई, अपनी ऐसी ‘एसी’ वाली किस्मत कहां? जाने की तो बड़ी इच्छा थी, और चले ही जाते पर ससुरा मुद्दे हमारे खिलाफ़ हैं सो कैसे जा सकते हैं?”

बात हमारे छुटमगज़ में नहीं घुस पा रही थी सो हार मान कर पूछ ही बैठे कि भई बताओ तो मामला क्या है? दिल्ली नहीं जा रहे हो, पर अनशन करोगे, मतलब. मुद्दे आपके खिलाफ़ कैसे हैं?

वे यही इंतज़ार कर रहे थे, तुरंत हमारे छुटमगज़ पर चढ़ बैठे. पहले बोले, “भई हम कल अनशन करेंगे, एक घंटा समर्थन में और बाकी पूरा समय विरोध में.” हमारे चहरे की फ़क्क हालत देखते ही उनका जोश बढ़ गया, पहेलियां सी बूझते हुए बोले, “एक मांग हमें जंची अरे वही शिक्षा को मातृभाषा में दिये जाने वाली, वो का है कि हमारे गांवडैल बच्चों के दिमाग़ में ये ससुरी अंग्रेजी घुसती ही नहीं, ससुरे पास ही ना होते अगर ये ग्रेडिंग-स्रेड़िग शुरू करके सरकार सभी को पास नहीं कर रही होती. हमें ये ठीक लग रहा है इसलिए हम समर्थन में एक्को घंटा अनशन कर लेंगे, बाकी सारी मांगे हमें पच नहीं रहीं इसलिए हम इस आंदोलन के विरोध में बाकी समय अनशन करेंगे.”

हमने भी एक ठौ ठंड़ी सांस ली और पूछने की हिम्मत की, “उल्टेलाल जी, ऐसी कौनसी मांग है जो आपको नहीं पच रही, भई आपको तो हर मामले में उल्टा बोलने की आदत है. आप तो हमेशा विरोध पर ही उतारू रहते हैं” वे शायद ऐसी ही कुछ उम्मीद किये थे तुरत बोले, “भई, एक्को मांग पर समर्थन भी तो किये हैं.” हमने कहा, “उसे छोडिए, आप तो यह बताइए कि आपको तक़लीफ़ किस बात से है?”

उल्टेलाल सूतजी की तरह बोलने लगे, “हम भ्रष्टाचार वाले मुद्दे की बात कर रहे हैं भई, अब बताईये हज़ार-पांच सौ के नोटो को बंद करने की बात कर रहे हैं, और हमारे घर में अभी चलिए कम हैं, पर बीस-पचास नोट तो पड़े रहते ही हैं, ससुरी बड़ी चपत लग जाएगी, यार! ” हम अपना ज्ञान बघारे, “भई उल्टेलाल, ऐसा थोड़े ही है कि एकदम अचानक से बंद हो जाएंगे.” वे बोले, “अरे भई, इनका कोई भरोसा है? बंद कर दिये तो? और यह छोडिए, ससुरा हम जैसे छोटे लोगों की समस्या आप नहीं समझ रहे हैं. बड़े लोग तो नेट-वैट, चैक-शैक से काम चला लेते हैं, हम तो सारा धंधा कैश में करते हैं भाई, अब क्या पार्टियों से बोरियां भरकर सिक्के लिया दिया करेंगे? इसलिए हम तो इसके खिलाफ़ हैं भाई.”

हमें अपना पिड़ छुड़ाना जरूरी लग रहा था तो बात पलटी और पूछे, “बाकी?” वे बोलते रहे, “भ्रष्टाचार के बगैर हमारा काम कैसे चलेगा भाईजी, हमारा तो जीना ही मुश्किल हो जाएगा. आप समझ नहीं रहे हैं, अभी हमें अपनी लुगाई का ड्राइविंग लाईसेंस बनवाना है, बच्चों के मूल निवास बनवाने हैं, दो मकानों की साई दे दी है, दो की राजिस्ट्री बाकी है, एकाध खेत-सेत लेने की भी इच्छा थी, भई हमें भी यह गणित समझ आ गया है कि ससुरे सभी बड़े लोग किसान क्यों हो जाते हैं अचानक? कहते हुए उन्होंने अपनी एक आंख दबाई, हम अपनी गरदन ऐसे हिलाए कि जैसे हमें भी गणित समझ आ गई हो और वे बोलते रहे, “आधे से ज़्यादा धंधा तो हमारा लुगाई के नाम चलता है, वह भी कोई बिल-सिल, टैक्स-वैक्स के बगैर, हम तो बर्बाद हो जाएंगे भाई, भ्रष्टाचार के बगैर ये सब कैसे होगा? अब का भाटे फुड़वाने का विचार है? इसलिए हम तो भ्रष्टाचार के साथ हैं, इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के विरोध में हम अनशन पर बैठने वाले हैं.”

हम अभी अपने छूटमगज़ को खुजला भी नहीं पाये थे कि वे कान में फुसफुसाए, “और भाई जी, हम तो प्लान किये थे कि थोड़ा बहुत कमा-समा कर एक ठौ खाता स्विस बैंक में भी खुलवा लेंगे, और आराम की गुजर-बसर करेंगे. ससुरा हमारा प्लान तो चौपट हुआ जा रहा है. खु़द तो खूब कमाए-समाए के, अरबों के वारे-न्यारै कर लिये, और अब हम जैसे आम आदमी के पीछे पड़े है, अपना चहरा चमकाए के खातिर.”

हम चुप थे, चुप ही रहना चाहिए था पर बोल उठे, “भई उल्टेलाल, अपन सिविल सोसायटी के लोग हैं, अपने को कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है. यह देश जैसे चल रहा था, वैसे ही चलता रहेगा. भई ताकतवर तो अपन जैसे ही महान लोग हैं, आपका भी कोई कुछ नहीं उखाड़ सकता. दोचार दिन का हो-हल्ला है जैसा कि आप कहे चहरा चमकाए की खातिर, जैसे पहले शांत हो गया था इस बार भी शांत हो जाएगा. व्यवस्था वैसे ही चलती रहेगी. आप भी बहती गंगा में हाथ धोइये, अपना चहरा चमकाइये. यक़ीन मानिए, चमके चहरे से धन-धंधे में और बरकत ही होगी.”

उनकी आंखों में एक चमक उभरी, तभी उनका फोन घनघना उठा उन्होंने उसे उठाया और कहते हुए वहां से निकल लिये, “का? पतंजलि फार्मेसी अप जा रहा है, ऐसा कीजिए हज़ार शेअर हमारे खाते में भी ड़ाल दीजिए.” और उनकी हों-हों हंसने की आवाज़ हमारे कानों में गूंजने लगी.

हमें पता नहीं कि पतंजलि फार्मेसी का शेअर है भी कि नहीं और लिस्टेड भी है या नहीं. फिर सोचा क्या फर्क पड़ता है, नहीं है तो हो जाएगा. धन-धंधे में बरकत होती रहनी चाहिए.

10 responses »

  1. दोचार दिन का हो-हल्ला है जैसा कि आप कहे चहरा चमकाए की खातिर, जैसे पहले शांत हो गया था इस बार भी शांत हो जाएगा.”
    लगता है मूलमंत्र तो यहाँ छिपा है, तभी तो भ्रष्टाचारी से लेकर सदाचारी (!!) तक सभी अनशन पर बैठने को आतुर नज़र आ रहे हैं.

  2. रवि जी,
    ध्यान रहे कि मांग मातृभाषा में भी शिक्षा की थी न कि मातृभाषा में ही शिक्षा की। यह एक तरह से फिर राजनीति और चोरों के पक्ष में बोलना था। मतलब लोहिया(राममनोहर लोहिया) नहीं लोहिया(मैथिली में कड़ाही को कहते हैं) की बात थी ये।

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