शिवराम की नाट्य कला : गटक चूरमा, पुनर्नव

सामान्य

शिवराम की नाट्य कला:गटक चूरमा, पुनर्नव

डॉ.मलय पानेरी

हिन्दी में नाटकों का इतिहास उथल-पुथल भरा रहा है। आरम्भ के हिन्दी-नाटक सिर्फ विधागत भेद को प्रस्तुत करते रहे हैं। अन्य विधाओं के समान तत्त्वों के अतिरिक्त, किन्तु महत्त्वपूर्ण तत्त्व मंचीयता के आधार पर नाटक अपनी अलग पहचान बना पाया। हिन्दी नाटक में आए बदलावों ने नाटक को नयी पहचान अवश्य दी परन्तु अपेक्षित प्रेक्षक वर्ग इससे जुड नहीं पाया। फिर भी यह स्वीकार योग्य है कि प्रतीकात्मकता और बौद्धिकता ने नये नाटकों की उन्नति की जिससे मंच और भी सम्भावनापूर्ण हुआ है।

आधुनिक रंग-शैली और सहज लोक-परम्परा के बीच बडा अंतराल रहा है। यही अंतराल नाटक को प्रेक्षक से दूरी प्रदान कर रहा था। इसका मुख्य कारण तरह-तरह के नये प्रयोग एवं कथानक में प्रतीकात्मकता का समावेश रहा है। इस अंतराल को नाटक की गुणवत्ता कम करके नहीं पाटा जा सकता था, इसीलिए नये प्रयोगशील नाटककारों ने जनाभिरुचिपरक नाटक तैयार किये। इस श्रेणी के नाटककारों में राजस्थान के प्रयोगशील नाटककार शिवराम का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है।

शिवराम ने कई जन-नाटक लिखे हैं। वे बहुत लोकप्रिय भी हुए हैं। उनके ‘गटक चूरमा’ जन-नाटक संग्रह में चार नाटक संगृहीत हैं। इसमें संगृहीत नाटकों की सबसे अहम विशेषता यह है कि ये व्यापक कथ्य लिये हुए हैं और रंगमंच के बहुत अनुकूल भी। इन नाटकों में शिवराम का यह उद्देश्य स्पष्ट दिखता है कि शास्त्रीयता अथवा बहुत अधिक तात्त्विक सचेष्टा के बगैर भी नाटक अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है। इस प्रदर्शनकारी विधा का यही लक्ष्य है कि अपनी योग्य प्रस्तुति से जन-जन तक इसकी पहुँच हो। ‘गटक चूरमा’ नाटक के माध्यम से नाटककार ने यह संदेश दिया है कि आज धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर आमजन का भावनात्मक शोषण किया जा रहा है, जो गलत है। हर वर्ष के सांख्यिकीय आंकडे बताते हैं कि हमारे देश में साक्षरता और शिक्षा की दर प्रतिशत बढ रहा है, किन्तु जहाँ जन-जागरूकता की बात आती है, हमें फिर पीछे सरकना पडता है। आखिर धर्म और ईश्वर के नाम से हो रही इस जन-नचाई का अंत कब होगा। नाटक में भोपा का कथन बहुत प्रासंगिक है, जहाँ वह अपनी भोपी से कहता है, ‘ऐ भोपी, ये तू क्या कहती है, रामचन्द्र जी के नाम पर आजकल जो रामलीला चल रही है, उसे देख के तो बडे-बडे रावण भी दाँतों तले अंगुली दबाते हैं.. वाल्मीकि और तुलसीदास ने उत्तम पुरुष की मर्यादा वाला चरित्र् गढ और आज उसके नाम पर ऐसा ताण्डव…नहीं भोपी, इस समय में कोई और बात कर…।’’ अर्थात् भगवान् के नाम पर बात करना भी किसी विवाद को जन्म देने जैसा ही है। नाटककार ने बहुत कुशलता से यह बताया कि है कि यहाँ की जनता इन्हीं चोंचलों में उलझी रहती है और उधर वैश्विक स्तर पर हम क्या नुकसान भुगत रहे हैं उस ओर हमारा ध्यान ही नहीं है। या यों कहें कि उन असली मुद्दों से हमारा ध्यान हटाकर हमें व्यर्थ की उलझनों में फँसा रखा है।

आज व्यापारिक सम्प्रभुता वाले राष्ट्र किस तरह से अपनी शर्तों के अनुसार हमारे यहाँ पसर कर हमारा शोषण कर रहे हैं, किन्तु किसी भी स्तर पर जनता की ओर से प्रतिरोध की कोई आवाज नहीं सुनाई दे रही है। इसीलिए पूँजीवादी शोषण-नीति के हम निरन्तर शिकार हो रहे हैं। उत्पाद की आसान उपलब्धता और सस्ताई हमें बहुत बडा घाटा दे रही है। शिवराम ने इन नाटकों में विदेशी कम्पनियों के मकडजाल से आजाद होने का संदेश दिया है।

‘बोलो, बोलो – हल्ला बोलो’ नाटक में भी नाटककार ने जनविरोधी शक्तियों पर प्रहार किया है। वे जनता को प्रतिरोध के लिए तैयार करना चाहते हैं। जन-चेतना का विकास ही ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा सकता है। क्योंकि जब तक निरंकुश ताकतों को समुचित जवाब नहीं मिलेगा तब तक इस देश से और दुनिया के दूसरे देशों से अराजकता समाप्त नहीं हो सकती। मदारी और जमूरा पात्रें से नाटककार ने जन-सोच को उकेरा है। नाटककार ने यह स्पष्ट किया है कि इन षड्यंत्र्कारी व्यवस्थाओं को यदि खत्म करना है तो जन सामान्य को सामुदायिक भूमिका के लिए तैयार रहना चाहिए।

आज स्पेशल इकॉनोमिक जोन (SEZ) के नाम पर कृषि भूमि और निर्भर किसान को आर्थिक प्रलोभन देकर समाप्त किया जा रहा है। कहने को ये छोटी-छोटी समस्याएँ हैं, किन्तु इनके दुष्प्रभाव दीर्घकालिक हैं। ये आने वाली पीढयों तक को परावलम्बी बनाकर छोडेंगे। दूसरी समस्या और भी भयावह लगती है, वह है अमीरी और गरीबी की बढती खाई। पूँजीवादी राष्ट्र ऐसी ही व्यवस्था लाने के लिए तत्पर बैठे हैं, जिसमें उनका मुनाफा बढता रहे। आज इसी मुनाफे की मानसिकता ने इंसानियत को खत्म कर दिया है। जनता को दिखाया कुछ जा रहा है और मिल कुछ और ही रहा है। इसीलिए नाटककार को यह कहना पडा है, ‘‘जमूरा, ये ग्लोबल साँप है। सारी दुनिया में कहीं भी जा सकता है। यह हर जगह मिल सकता है।’’ यहाँ नाटककाकर सावधान करता है कि जनान्दोलनों के अभाव में ऐसे विषधरों की ही सत्ता स्थापित हो जाएगी।

जब हम विश्व गाँव की बात कर रहे हैं तब भी हालात ये हैं कि आर्थिक-वैभिन्य लगातार बना हुआ है। समतामूलक समाज की व्यवस्था तो जैसे दूर की कौडी हो गई है। इस संग्र्रह को अतिरिक्त महत्त्व देता यह ‘ढम, ढमा-ढम-ढम’ नाटक अपने कथानक को कुछ इस प्रकार समेटे हुए है कि उसमें बहुत सहज तरीके से पात्रें का उपयोग किया गया है। सभी प्रमुख पात्र्, जो किसी न किसी रूप से सरकारी तंत्र् से जुडे हुए हैं, वे काँइयाँ ही हैं। उनका काँइयाँपन वर्तमान व्यवस्था की पोल से है। प्रथम और द्वितीय समूह जनता का प्रतीक है। ये समूह शोषित जनता की स्थिति को अभिव्यक्त करते हैं। जनता का यह मत है कि गरीबी भाग्य की देन नहीं है वरन् जुल्म की पैदायश है। गरीबी की निर्मिति की गई है ताकि शोषण का सिलसिला निरन्तर जारी रहे। नाटककार ने इस कटु सच्चाई को इसलिए उजागर किया है कि जनतांत्र्कि नागरिक अधिकारों के प्रति जनता को चेतस् किया जा सके।

इस संग्रह के अन्तिम नाटक ‘हम लडकियाँ’ के माध्यम से रचनाकार ने समाज में स्त्रियों के जीवन की विडम्बित स्थितियों का रेखांकन करते हुए उनका महत्त्व प्रतिपादित किया है। स्त्रियों की स्थिति में सुधार महज कुछ भाषणों और सुधारवादी नारों से सम्भव नहीं है, उसके लिए बहुत जरूरी यह है कि ये सब व्यवहार में भी क्रियान्वित हों। समग्रतः इस नाटक से शिवराम एक विचार समाज को देना चाहते हैं। नारी-उत्थान की प्रक्रिया इसी तरह से आगे चलती रहेगी तो ही कुछ स्थिति तक समाज से दोयम दर्जे की मानसिकता कम होगी और आज की आवश्यकता यही है। स्त्री सशक्तीकरण के लिए समाज स्तर पर भी परिवर्तन की जरूरत है। स्त्री-सुधार की गत्यात्मकता बढाने का दायित्व पुरुष और आज के समाज पर अधिक है।

‘गटक चूरमा’ के सभी नाटक छोटे होते हुए भी एक गंभीर विचार-प्रक्रिया के वाहक हैं। शिवराम ने इन नाटकों में न तो अधिक पात्र् भरे हैं, न ही जटिल नाट्य- शिल्प गढा है। ये नाटक नाटकों की नयी शैली की स्थापना करते हैं। परम्परागत रंगमंच से दूर और अभिनव लोक-नाट्य परम्परा को विकसित करते ये नाटक नयी श्रेणी के प्रयोग से प्रेक्षक को अवगत कराते हैं।

शिवराम का मुख्य ध्येय आज के जड संस्कारों को बदलने का रहा है और यह बदलाव तभी पाया जा सकता है जब परिवर्तन को स्वीकार करने की मानसिकता बने। आमजन तक यह सोच पहुँचाने के लिए उन्हें साहित्य की इस प्रदर्शनकारी विधा पर अत्यधिक भरोसा है। इसीलिए उन्होंने मुँशी प्रेमचन्द, नीरज सिंह एवं रिजवान जहीर उस्मान की प्रसिद्ध कहानियों का नाट्य-रूपान्तर अपनी पुस्तक ‘पुनर्नव’ में प्रस्तुत किया है। मुँशी प्रेमचन्द की कहानी-कला और शिवराम की नाट्य-कला की तुलना नहीं करते हुए ही हम इन कहानियों (ठाकुर का कुआँ, सत्याग्रह, ऐसा क्यों हुआ) का नाट्य-रूपान्तर को स्वीकार कर सकते हैं। माध्यम और प्रकार के बदलाव के उपरान्त भी कहानियों की मूल भावना कहीं कम नहीं होती है। हाँ ! यह अवश्य है कि रूपान्तरकार विधा के अनुरूप कुछ छूटें लेता ही है तब ही रूपान्तरण अच्छा और ज्ञेय हो पाता है। नीरज सिंह की कहानी ‘क्यों ?’ ‘उर्फ वक्त की पुकार’ के रूपान्तरण में इस स्वतंत्र्ता को देखा जा सकता है। ऐसा इसलिए भी जरूरी होता है, क्योंकि कहानी का पाठक अकेला भी हो सकता है, किन्तु नाटक में दर्शक-समूह होता है इसलिए सामूहिक आवश्यकता का भी ध्यान रखना पडता है।

नाट्य रूपान्तर में संवाद-योजना और भाषा-शैली का विशेष ध्यान रखना पडता है। कहानी को नाटक बनाने में इन दो तत्त्वों के साथ अभिनय-पक्ष पर अधिक गंभीरता की जरूरत रहती है। शिवराम ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है इसीलिए ये कृतियाँ रंगमंच पर भी एक सार्थक उपलब्धि कही जाएँगी। प्रसिद्ध और प्रासंगिक कहानियों को पुनः नया कर (पुनर्नव) नयी विधा में पहचान देना रचनाकार के कौशल का ही परिणाम है।

निश्चित रूप से शिवराम ने अपनी इस पुस्तक में कहानियों के पाठक को भी दर्शक बनाने का दायित्व बहुत गंभीरता से निभाया है। पढने और देखने वालों में ज्यादा असर देखने वालों पर होता है। इस दृष्टि से भी ये रूपान्तरित नाटक जन-अभिरुचि के अनुकूल लगते हैं।

१.पुनर्नव २. गटक चूरमा /शिवराम//बोधि प्रकाशन एफ-77, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र,बाईस गोदाम,जयपुर
डॉ.मलय पानेरी, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, श्रमजीवी कालेज, उदयपुर-313001

3 responses »

  1. अच्छी समीक्षा। बस एक कमी रह गई। यह बताना कि इन दोनों पुस्तकों की कीमत पाठक की जेब के बूते की है। गटक चूरमा सिर्फ 35/-रुपए की और पुनर्नव सिर्फ 50/- रुपए की है, और इन्हें बोधि प्रकाशन से मंगाया जा सकता है।

  2. नाटक पढ़ना सुखद नहीं लगता…शायद मेरे चारों ओर के माहौल के कारण ऐसी स्थिति है…नाटक देखना शायद अच्छा लगे…लेकिन यहाँ दो बातें हैं…पहली बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवादी कम्पनियों के विरोध का अर्थ किस तरह या कैसे नाटककार ने लिया है?…स्त्रियों पर कल एनसीईआरटी की सातवीं कक्षा की पाठ्यपुस्तक में पढ़ने से कुछ आभास-सा हुआ…सरकार किताबें अच्छी भी छपवाती है…चूँकि आज तक तो ढंग से पढ़ा नहीं…इसलिए अब पढ़ने की कोशिश के दौरान स्त्री-समूह पर पढ़ना अच्छा और विचारणीय लगा…यहाँ भी स्त्रियों की बात की गई है…मेरी समझ में स्त्री की मुक्ति धर्म के साथ रहकर नहीं हो सकती…

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s