कविता के बारे में – अंतिम भाग

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कविता के बारे में – अंतिम भाग
शिवराम

( शिवराम द्वारा कविता पर यह महत्तवपूर्ण आलेख कुछ समय पूर्व ही लिखा गया था. १ अक्टूबर को उनके निधन पश्चात अभी हाल ही में यह ‘अलाव’ के नवंबर-दिसंबर’२०१० अंक में प्रकाशित हुआ है. यह आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां छः भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है अंतिम भाग. )

देखिए : कविता के बारे मेंपहला भाग, दूसरा भाग, तीसरा भाग, चौथा भाग, पांचवा भाग

चेतना और स्वभाव, ज्ञान और संस्कार के आधार पर लोग भिन्न-भिन्न सामाजिक और सौन्दर्य बोध की विविध स्तरीय स्थितियों में विद्यमान हैं। कवि भी, पाठक और श्रोता भी। जाहिर है हर कविता हरएक के लिए सम्प्रेष्य और असरदार और रोचक नहीं हो सकती। कवि कविता के माध्यम से जिनके समक्ष अभिव्यक्त होना चाहता है, वे रचना प्रक्रिया के दौरान चेतन-अचेतन मन में उसकी अभिव्यक्ति के दूसरे सिरे पर होते हैं। यह बात उस कविता के पाठकों की श्रेणी तय करती है। यदि हम वृहद् पाठक संसार तक अपनी कविता को पहुंचाना चाहते हैं तो हमारी कविता के दूसरे सिरे पर हमें इस वृहद् पाठक संसार को रखना होगा। अतिप्रबुद्धजनों या सुधीजनों से हम सम्बोधित हैं तो जाहिर है वह रचना आमतौर पर उन्हीं के लिए होगी।

यह तथ्य कविता के रूपविधान के, उसकी काव्यभाषा के, उसके शिल्प और शैली के निर्धारण में बड़ी भूमिका अदा करता है। यहां तक कि अपने मनोजनगत में से अंतर्वस्तु के चयन में भी बड़ी भूमिका अदा करता है। कवि हर जीवनानुभव और उससे उपजी हर अंतर्वस्तु को, खासकर आत्मसंघर्ष से प्रस्फुटित अंतर्वस्तु को, हर किसी को सम्बोधित करने के लिए उपयुक्त नहीं पाता और ऐसी अंतर्वस्तु सीमित पाठकों से सम्बोधित होने की प्रक्रिया में, अथवा सम्बोधन रहित आत्माभिव्यक्ति की प्रक्रिया में, ऐसा संश्लिष्ट रूप भी ग्रहण कर सकती है जो वृहद पाठक समूह के लिए सहज सम्प्रेष्य नहीं हो। ऐसी कविता को भी खारिज करना ठीक नहीं। लेकिन ऐसी कविता को उत्कृष्ट मानकर और उसे मानक बनाकर प्रस्तुत करना भी ठीक नहीं।

कविता, समय की सामाजिक जरूरत के अनुरूप अपनी दिशा और अपना स्वरूप ग्रहण करती है। कविता जीवन और समाज से निरपेक्ष नहीं होती, वह उसमें हस्तक्षेप करती है और अपने वैयक्तिक अभिव्यक्ति के दबावों के साथ सामाजिक दायित्वों की आवश्यकता के अनुसार भी ढलती है। ब्रिटिश हुकूमत के काल में कविता किस तरह लोक जागरण का माध्यम बनी, भक्तिकाल में कविता किस तरह लोक जागरण का माध्यम बनी यहां उसकी सूचना और व्याख्या की जरूरत नहीं है।

हमारे वर्तमान समय में भी वैश्विक मानव समाज और उसके अंतर्गत भारतीय मानव समाज जिस प्रकार के संकट में फंस गया है और अमानवीयकरण की दिशा में दौड़ रहा है वह भयावह है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद पतनशीलता की चरम अवस्था में पहुंच गया है, भारत जैसे बहुत से देशों में सामंती मूल्य और संस्कारों की जड़ता ने इसे और गहरा दिया है। मनुष्य प्रजाति और सम्पूर्ण पृथ्वी के ही विनाश की चिन्ता गहराने लगी है। यही वे स्थितियां है जिनमें हम आम तौर पर मनुष्य और समाज तथा उसकी विभिन्न सत्ताओं की संवेदनहीनता की शिकायत करते पाए जाते हैं। कवियों को भी वर्तमान मनुष्य विरोधी यथास्थिति से मुक्ति और वैकल्पिक समाज व्यवस्था के बारे में सोचना और तय करना चाहिए। लक्ष्य निर्धारित होगा तो उसकी दिशा भी निर्धारित होगी।

कविता में संवेदना की तलाश की बातें होने लगी हैं। संवेदना की सबसे घनीभूत संरचना में भी यदि संवेदना की तलाश करनी पड़े तो इस समय की विकराल भयावहता के बारे में क्या कान पकड़कर बताने की जरूरत है। जिस व्यवस्था में मानव प्रजाति का तीन चैथाई से अधिक, तबाह हाल स्थितियों में जीने को विवश हों और शेष एक चैथाई लोग सुख-सुविधाओं के पहाड़ पर बैठे अमानवीय भोगवाद में लिप्त हों वे भी कोई उन्नत सांस्कृतिक जीवन नहीं जी रहे हों, उस व्यवस्था के विरोध में जन जागरण अभियान आज भी वैसी ही जरूरत बन गया है जैसे हमारे यहां भक्तिकाल या नव जागरण काल में बना था।

जाहिर है जन जागरण अभियान का एजेन्डा ऐसी कविता की मांग करता है जो व्यापक जन-गण को जागृत करे, सक्रिय करे, आन्दोलित करे। इसीलिए हमारे बहुत से विद्वान कवि और समीक्षक कविता के लोकान्मुखी और लोक प्रतिबद्ध होने की बात करते हैं। सामंती युग का लोक अलग था आज का लोक अलग है। मुक्ति का इस समय का मार्ग भी अलग है।

इस समय में विद्यमान जनविरोधी व्यवस्था से मुक्ति का मार्ग श्रमजीवी जनगण की जागृति से होकर गुजरता है। हमारे कवियों और कविता को इस दायित्व को स्वीकार करना चाहिए। इस दायित्वबोध के साथ कविताएं रची भी जा रही हैं, जरूरत है इसे केन्द्रीय धारा बनाने की और तमाम प्रकार के अवसरवाद तथा सुविधापरस्ती से मुक्त होने की। कविता फिर हाशिए पर नहीं जीवन के केन्द्र में होगी।

( समाप्त )

शिवराम के इस आलेख को एक साथ पूरा पढने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें…
आलेख – कविता के बारे में – शिवराम

इसी आलेख का pdf version यहां पर क्लिक करके डाउनलोड़ किया जा सकता है…
kavita ke bare mein – shivaram.pdf

०००००
आलेख – शिवराम
प्रस्तुति – रवि कुमार

8 responses »

  1. यदि हम वृहद् पाठक संसार तक अपनी कविता को पहुंचाना चाहते हैं तो हमारी कविता के दूसरे सिरे पर हमें इस वृहद् पाठक संसार को रखना होगा। अतिप्रबुद्धजनों या सुधीजनों से हम सम्बोधित हैं तो जाहिर है वह रचना आमतौर पर उन्हीं के लिए होगी।
    पूरी शृंखला पढी, काफी कुछ समझा। इस ब्लॉग की सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टियों में से एक है यह शृंखला। धन्यवाद!

  2. श्रंखला के लिये धन्यवाद!
    आशा तो यही है कि समाज के समस्याओं से घिरे हिस्से में कविता की प्रासंगिकता बनी रहेगी और लोगों को यह नींद से जगाती रहेगी जिससे वे अपने को शोषण से बाह्र निकाल सकें और समाज में व्यापक स्तर पर चेतना फैल सके।

  3. स्वार्थ भाई के पिछले भाग में कहे को यहाँ लिया ही गया है…कविता हमेशा एक वर्गविशेष के लिए रहती है…सामान्य जनता से कविता दूर अवश्य हुई है…शायद सामान्य जनता आज भी दोहों-चौपाई में सहज महसूस करती है, लय में, गेय कविता में उसकी आस्था घटी नहीं…यह होना चाहिए जरूर कि कविता वृहत जनता के लिए लिखी जाय, लेकिन जबरन लिखना भी फिर समस्या पैदा करेगा…बेहतर और गम्भीर शृंखला …हाँ फ़ाइलों के लिए आर्काइव डाट ओआरजी सबसे अच्छी है क्योंकि वहाँ कोई बन्धन नहीं है…वहाँ जाकर फ़ाइलों को रखा जा सकता है…

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