कविता के बारे में – पांचवा भाग

सामान्य

कविता के बारे में – पांचवा भाग
शिवराम

( शिवराम द्वारा कविता पर यह महत्तवपूर्ण आलेख कुछ समय पूर्व ही लिखा गया था. १ अक्टूबर को उनके निधन पश्चात अभी हाल ही में यह ‘अलाव’ के नवंबर-दिसंबर’२०१० अंक में प्रकाशित हुआ है. यह आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां छः भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है पांचवा भाग. )

देखिए : कविता के बारे मेंपहला भाग, दूसरा भाग, तीसरा भाग, चौथा भाग

छंद, कविता की परम्परा का महत्वपूर्ण रूप विधान है। कविता होती ही छंदमयी है। जो नई कविता को छंद मुक्त समझते हैं या बनाने में लगे हैं वे कविता के मर्म को ही समझने से इंकार कर रहे हैं। नई कविता, कविता का नया छंद है, जिसकी अपनी गति है, अपनी लय है। यह पुराने मात्रात्मक, वर्णात्मक, बहर-ताल वाले छंदों से भिन्न है। यह छंद कुए, तालाब या झील की तरह नहीं, नदी की तरह है। इसमें पुराने छंद की सी नपी-तुली आवृत्ति और तुक विधान नहीं है, लेकिन इसमें आवृत्ति और तुक का निषेध भी नहीं है।

अब तक की काव्य परम्परा में जो भी श्रेष्ठ निपजा है, वह नई कविता के लिए, नई अंतर्वस्तु की आवश्यकतानुसार ग्रहणशील होना चाहिए। समस्त परम्परागत रूपविधान अनुपयोगी भी नहीं हो गए हैं, हमारी अंतर्वस्तु यदि किसी परम्परागत रूप में प्रभावी अभिव्यक्ति पा रही है तो पाने दिया जाना चाहिए। पुराने रूप विधानों के प्रति हमें जड़बुद्धि भी नहीं होना चाहिए, नई अंतर्वस्तु की जरूरतें उनमें परिवर्तन करती हैं, कुछ नवोन्मेष करती हैं तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। हम प्रयोगों के ही विरूद्ध खड़े हो जाएंगे तो कुछ नवीन कहां से साकार होगा। कुछ नवीन नहीं होगा तो विकास कहां से होगा। नया और बेहतर नया हमारा अभीष्ट होना चाहिए। यह और बात है कि कुछ बेहतर नया करना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है।

अभी भारतीय समाज की अंतर्वस्तु ही गुणात्मक रूप से नई नहीं हुई, मूलतः हम अभी भी सामंती जीवन पद्धति, संस्कारों और मूल्यबोधों से संचालित समाज में रहते हैं। काफी कुछ ऐसा भी है जो पहले नहीं था, नया है, तो ऐसा भी बहुत है जो परम्परागत पुराना है। अतः कविता परम्परागत पुराने रूप विधानों से कैसे मुक्त हो सकती है, जबकि उसकी अंतर्वस्तु परम्परागत जीवन-वास्तव से मुक्त नहीं हुई। हम आधुनिक भी हो रहे हैं और हम पारम्परिक भी बने हुए हैं। अभी भी वर्ण भेद, लिंग भेद, जाति भेद, धर्म भेद, भेद ही नहीं द्वेष के संस्कारों को हम और हमारा समाज भी ढो रहे हैं। वे भी जो अत्याधुनिक दिखाई देते हैं या होने का दावा करते हैं। अभी भी परिवार में वही पुरूष प्रधानता का भाव पुरूषों में ही नहीं स्त्रियों में भी बदस्तूर कायम है। अभी भी अतार्किक अंधविश्वास हमारे समाज का आधार बने हुए हैं। रूमानियत और भाव प्रवणता का पुराने ढंग का भाव बोध जीवन में बदस्तूर कायम है।

इसीलिए गीत-ग़ज़ल-दोहे व अन्य छंदों में भी कविता हो रही है और नई कविता के नए रूप विधान में भी। नए के विरोध में खड़े होना विकास के ही विरूद्ध खड़े होना है, तो परम्परा के विरुद्ध खड़े होना अपने अतीत की विराट यात्रा के श्रेष्ठ से वंचित होना है। यह जीवन एक अत्यधिक लम्बी क्रमिक यात्रा का वर्तमान है, जो अतीत से प्राप्त हुआ है और भविष्य की ओर उन्मुख है। अतीत के श्रेष्ठ को सहेजते हुए ही उन्नत भविष्य की ओर आगे बढ़ना सम्भव है। जड़ों के बिना फूल नहीं खिल सकते, फल नहीं लग सकते। जड़, तने, पत्तों से बेपरवाह माली फूलों और फलों की फसल नहीं ले सकता।

आपके जीवनानुभवों से, विवेक-अंतदृष्टि-कल्पनाशीलता और चिन्तनशीलता के व्यवहार से, आपके चित्त में जो अंतर्वस्तु अस्तित्वमान हुई है, जिसे अभिव्यक्त करने के लिए आपका चित्त छटपटा रहा है, वह जिस रूप विधान में अपनी अभिव्यक्ति को सहज पाती है, उसे उसमें ही आने दो। अंतर्वस्तु को अपना रूप सहजता से ग्रहण करने दो। हर अंतर्वस्तु को मनचाहे रूप में बांधने की कोशिश न रूप को प्रभावी रहने देगी न अंतर्वस्तु को। ऐसी जिद में कवि दोनों का ही क्षय करता है और अपने काव्यकर्म को हानि पहुंचाता है। लेकिन यह रूप सौन्दर्यबोधी हो, मार्मिक और आकर्षक हो, अंतर्वस्तु के असर को प्रभावी बनाने वाला हो। यही तो काव्य साधना है। इसीलिए कवि होना कठिन काम है। जबकि इसे अक्सर बेहद आसान समझ लिया जाता है।

विधाओं और रूप विधानों का वैमनस्यतापूर्ण विरोध खड़ा करना नादानी है, घातक है। जड़ता से प्रेम, विकास के विरूद्ध खड़े होना है। वैसे भी कौनसा परम्परागत रूप विधान है जो परिवर्तित नहीं हो रहा है। क्या आज जो गीत लिखे जा रहे हैं, वैसे ही लिखे जा रहे हैं जैसे छायावादी काल में लिखे जा रहे थे? क्या आज भी जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं वैसी ही लिखी जा रही है जैसी गालिब और मीर लिखते थे , और गालिब और मीर ने क्या वैसी ही ग़ज़लें लिखीं जैसी फारसी और अरबी की मूल ग़ज़लें हुआ करतीं थी। सब कुछ नहीं बदला, लेकिन बहुत कुछ बदला है।

नई कविता वक्त की जरूरत थी और अपने पूर्ववर्ती रूप विधानों के श्रेष्ठ तत्वों को समाहित किए हुए जन्मी थी। निराला की मुक्त छंद की कविताओं में गीत के तत्व मौजूद हैं। नई कविता यदि उतनी असरदार नहीं है, जितनी कि हम उम्मीद करते हैं, तो उसे असरदार बनाया जाए। न तो उसके विरूद्ध खड़ा हुआ जाए और न उसकी हर प्रवृत्ति को गौरवान्वित ही किया जाए। उसे ऐसी दिशा में मोड़ने का प्रयत्न करें कि वह अधिकाधिक असरदार बने। इस रूप विधान की क्षमताएं पूर्ववर्ती किसी भी रूपविधान से कमतर नहीं हैं और इस रूपविधान में उत्कृष्ट काव्य रचनाएं हुई हैं और हो रही हैं। छंद के अभ्यासी जो कवि नई कविता का उपहास करते हैं, वे अपने अद्यतन नहीं होने की हीनता को ढंकने की कोशिश करते हैं तो नई कविता के अभ्यासी जो कवि छांदस कविता का उपहास करते हैं वे परम्पराबोध और कविता के विकास क्रम के अपने अज्ञान को ढंकने की कोशिश करते हैं।

( अगली बार – लगातार – अंतिम भाग )

०००००
आलेख – शिवराम
प्रस्तुति – रवि कुमार

6 responses »

  1. नए के विरोध में खड़े होना विकास के ही विरूद्ध खड़े होना है, तो परम्परा के विरुद्ध खड़े होना अपने अतीत की विराट यात्रा के श्रेष्ठ से वंचित होना है। यह जीवन एक अत्यधिक लम्बी क्रमिक यात्रा का वर्तमान है, जो अतीत से प्राप्त हुआ है और भविष्य की ओर उन्मुख है। अतीत के श्रेष्ठ को सहेजते हुए ही उन्नत भविष्य की ओर आगे बढ़ना सम्भव है।

    कविता ही नहीं, जीवन का दर्शन पढने को मिल रहा है। हमारे साथ बांटने का आभार!

  2. पिंगबैक: कविता के बारे में – अंतिम भाग « सृजन और सरोकार

  3. अन्तिम वाक्य बहुत अच्छी बात कहता है…गीत-गजल-दोहे ही हैं अब पारम्परिक छन्दों में…लेकिन यह तो तय है ही कि छन्दमुक्त कविता ने कवियों की बाढ़ सी लाई है…वैसे नई कविता को भी लय में पढ़ा जा सकता है…

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s