कविता के बारे में – चौथा भाग

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कविता के बारे में – चौथा भाग
शिवराम

( शिवराम द्वारा कविता पर यह महत्तवपूर्ण आलेख कुछ समय पूर्व ही लिखा गया था. १ अक्टूबर को उनके निधन पश्चात अभी हाल ही में यह ‘अलाव’ के नवंबर-दिसंबर’२०१० अंक में प्रकाशित हुआ है. यह आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां छः भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है चौथा भाग. )

देखिए : कविता के बारे मेंपहला भाग, दूसरा भाग, तीसरा भाग

आचार्य शुक्ल कविता को हृदय की मुक्तावस्था कहते हैं। इसका अर्थ शायद कवि मित्रों ने यह लगा रखा है कि हृदय में जो भी है, जैसा भी है, उसे जैसे जी में आए मुक्त होकर अभिव्यक्त करो, यही कविता है। पारिभाषिक शब्दावली की अमूर्तता बड़ी समस्याओं को जन्म दे सकती है। अमूर्तन की यही तो विशिष्टता है कि उसमें व्यवहारकर्ता अपने भावों-विचारों को रूपायित करके देखने लगता है और इस प्रक्रिया में उसमें मनचाहा अर्थ भी भर लेता है। अपने सत्यभ्रम को और अधिक दृढ़तापूर्वक अपने चित्त में प्रतिष्ठित कर लेता है। इस प्रकार उसके भाव बोध की विकास प्रक्रिया अवरूद्ध और जड़ हो जाती है। अमूर्तन का यही तो खतरा है। एक कुशल कवि अमूर्तन का उपयोग भी करता है, लेकिन अपनी अभिव्यक्ति को आकर्षक, असरदार और मूर्त करने के लिए। पाठक या श्रोता के भावबोध तक अपना भाव-बोध सम्प्रेषित करने के लिए, पाठक या श्रोता के निजी भावबोध को जड़ता प्रदान करने के लिए नहीं। शुक्ल जी का इस जुमले से अभिप्राय अभिव्यक्ति की सहजता से लिया जाना चाहिए। जिसका अर्थ है चित्त में अर्जित अंतर्वस्तु को बलपूर्वक किसी रूपविधान में मत कसो, उसे सहजता से अपना स्वरूप ग्रहण करने दो। यह कथ्य के अनुकूल उपयुक्त रूप की तलाश का मूल मंत्र है।

एक बात तो यह समझ लेनी चाहिए कि जिस प्रकार का चित्त विभाजन अभी तक कलाओं की दुनिया में व्यवहृत होता रहा है, उससे वास्तविकता को समझने में बड़ी कठिनाई होती है और वह तथ्यपरक और तर्कसंगत नहीं है, अवैज्ञानिक है। मस्तिष्क को विचारों और हृदय को भावों का भण्डार और व्यवहारकर्ता समझना, विचारों और भावों की दो दुनिया होने का भाव बोध उत्पन्न करता है। तथ्य यह है कि हृदय मात्र पम्प है जो रूधिर के सर्क्युलेशन की क्रिया के लिए आवश्यक दबाव बनाता है, लेकिन यह भावों के साथ व्यवहारकर्ता अवयव नहीं है। जिसे हम चित्त कहते हैं, वह मस्तिष्क में अवस्थित होता है और समस्त संवेदन, कल्पना, चिन्तन का क्षेत्र वही है। वहीं भाव उत्पन्न होते हैं और वहीं विचार उत्पन्न होते हैं। भाव और विचार निरंतर परस्पर क्रिया व्यवहार करते हैं। विचार भावाविष्ट होते रहते हैं और भाव विचाराविष्ट होते रहते हैं। विचारों और भावों की दो अलग-अलग, दूर-दूर, विपरीत दुनिया नहीं होतीं। वे निरंतर संश्लेषण की क्रिया में रहते हैं। उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। उनमें द्वन्द्व चलता है, वे इस द्वन्द्व में एक-दूसरे को अपने अनुकूल बनाते हैं और बनते हैं। इस संघर्ष का अभीष्ट संश्लेषण होता है।

इसलिए तथ्य यह है कि भाव और विचार द्वन्द्वात्मक एकता के अभीष्ट को हासिल करने की प्रक्रिया में रहते हैं। भाव बोध और मूल्य बोध, जिजीविषा-चिन्तनशीलता और संवेदनशीलता तथा कल्पनाशीलता जन्य मानवीय व्यवहार के परिणाम हैं। भावबोध और मूल्यबोध की प्रकृति भिन्न है लेकिन वे इस भिन्नता से अभिन्न होने के द्वन्द्व की प्रक्रिया में रहते हैं। जब हम विचार, विचारधारा या मूल्य चेतना के विरूद्ध खड़े होते हैं तो इस प्रक्रिया को सायास भंग करने की असफल चेष्टा कर रहे होते हैं।

ऐसी दशा में विचारहीनता और मूल्यहीनता ही व्यक्ति का मूल्यबोध बन जाता है और उसका भाव बोध इसी मूल्य बोध से संश्लिष्ट होकर पंगु और क्षय ग्रस्त हो जाता है, अतार्किक। ऐसा भावबोध भी सर्वदा तिरस्करणीय नहीं होता क्योंकि सामान्य मानवीय मूल्यबोध तो मनुष्य के साथ सदैव रहता ही है, जब तक कि वह अमनुष्य ही नहीं हो जाए। उसमें भी आकर्षण हो सकता है, उसका भी सौन्दर्य हो सकता है। बल्कि कई बार जब मनुष्य की शांति की आकांक्षा प्रधान होती है तो उसे अतार्किक भावुकता ज्यादा अच्छी लगने लगती है। ऐसी रचनाओं का भी अपना महत्व होता है। लेकिन भाव बोध की इस सीमित स्थिति को कविता का आदर्श नहीं माना जा सकता। ऐसी कविता पाठक का मनोरंजन तो करती है लेकिन मनोन्नयन नहीं करती, उसकी मुक्ति को दिशा नहीं देती।

मनोरंजन भी कलाओं का एक उद्देश्य होता है लेकिन मात्र मनोरंजन व्यक्तित्व के विकास का कारक नहीं होता। वह उसकी मानसिक थकान को कम करता है, थोड़ी देर के लिए ही सही तनाव को कम करता है, अवसाद को कम करता है, मन को प्रफुल्ल करता है, उमंगित और उत्साहित भी करता है। लेकिन मनोन्नयन अर्थात् सौन्दर्यबोध और मूल्य बोध का निरंतर विकास व्यक्ति का अभीष्ट होना चाहिए।

वर्तमान युग में ज्ञान की भूमिका बहुत विस्तृत हो गई है। प्रकॄति और सृष्टि तथा मानव मन की विभिन्न क्रियाओं के रहस्यों से अब पर्दा काफी उठ चुका है। इस ज्ञान से वंचित रहकर आज के जीवन से प्रभावशाली व्यवहार नहीं किया जा सकता। ज्ञान की अभिव्यक्ति के दूसरे अनेक माध्यम हैं, साहित्य में भी अनेक विधाएं हैं। ज्ञान की अभिव्यक्ति के लिए कविता उचित माध्यम भी नहीं है। लेकिन हमारी संवेदनाओं को, जीवनानुभूतियों को ज्ञानात्मक बनाए बिना, कविता की समृद्ध और समर्थ अंतर्वस्तु हासिल नहीं की जा सकती। ज्ञान का विरोध, जीवन का विरोध है। जाहिर है वह कलाओं का, कविता का भी विरोध है – अवरोध है। कोरे मूल्य बोध और भाव बोध से भी कलाओं का उत्कृष्ट सृजन नहीं हो सकता। सौन्दर्यबोध भी उसकी एक जरूरी शर्त है।

इसलिए कथ्य अर्थात् अंतर्वस्तु की गुणवत्ता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है अंदाजे बयां, भाषा-शिल्प शैली का समग्र रूप सौन्दर्य। सुन्दर कथ्य की सुन्दर अभिव्यक्ति। मूल्य बोध, विवेक और विचारधारा का निषेध या उपेक्षा करके कविता को कलावादी जितना नुकसान पहुंचा रहे हैं, वस्तुवादी भी यदि अंदाजेबयां, भाषा, शिल्प, शैली के समग्र रूप-सौन्दर्य की उपेक्षा करते हैं तो उतना ही नुकसान पहुंचाते हैं। बेशक, क्या कहा जा रहा है यह प्रमुख है, लेकिन वह कैसे कहा जा रहा है यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जो कहा जा रहा है वह इस तरह कहा जाना चाहिए कि सुनने-पढ़ने वाला आकर्षित हो, उसके मर्म को छुए, उसे कहा गया सम्प्रेषित भी हो और उसे प्रभावित भी करे। कला की साधना के बिना यह कैसे सम्भव है।

( अगली बार – लगातार – पांचवा भाग )

०००००
आलेख – शिवराम
प्रस्तुति – रवि कुमार

8 responses »

  1. इस आलेख को यहाँ फिर से श्रृंखला बद्ध रीति से पढ़ रहा हूँ। मुझे तो लगता है कि ब्लागरों को इस आलेख में कविता को ब्लाग और कविताई को ब्लागरी समझ कर पढ़ना चाहिए। अच्छे ब्लाग लेखन के सारे गुर इसी में मिल जाएंगे।

  2. हृदय की मुक्तावस्था और सुन्दर अभिव्यक्ति के बीच संतुलन की बात बहुत सरलता से कही गयी है। आजकल कहीं सौन्दर्य के लाले हैं और कहीं पर आत्माहीन पिंजर को मात्राओं की बन्दिशों में बान्धकर वाहवाही की जा रही है। ऐसा करके ही कविता की हत्या की गयी है।

  3. कविता भी आयुर्वेद की तरह अलग अलग चित्त को अलग अलग ढ़ंग से मोहती है और अलग अलग व्यक्त्ति के भाव भिन्न भिन्न ढ़ंग से प्रकट हो सकते हैं, और यह कैसे रची जायेगी इसमें रचने वाले और यह कैसे ग्रहण की जायेगी इसमें पढ़ने वाले के चित्त की अवस्था का बहुत बड़ा योगदान होता है। कविता की गति, दिशा और विधा ह्रदय ही निश्चित करता है। बाद में उसे कैसे ही सजा लें या शोधित कर लें।
    अगर सभी लोग एक ही ढ़ंग से कविता करने लगेंगे, भले ही वह लय में हो, छंद युक्त्त हो सौंदर्यशास्त्र पर खरी उतरती हो, तो कविता धीरे धीरे मृतप्राय होती जायेगी।
    दूर हटो ए दुनिया वालो हिन्दुस्तान हमारा है… कितनी ही भावुक और अतार्किक लगे पर एक खास परिस्थिति में यह बहुत प्रभावशाली कविता है।
    कविता के सभी संभव रुपों से मिलकर ही काव्य संसार धनी हुआ है। इसमें किसी एक ही प्रकार की कविता का ही योगदान नहीं है।
    अकविता का भी योगदान है।

    • भाई स्वार्थ,
      आपके द्वारा अभिव्यक्त विचारों के संदर्भ में भी इस संपूर्ण आलेख में तार्किक विवेचन है. यह आलेख अक्सर उठने वाले इन्हीं विचारों के संदर्भ में ही शिवराम द्वारा लिखा गया था. उन्होंने कई संदर्भों को इस आलेख में समेटने की कोशिश की है.
      यदि आवश्यक हुआ तो लेखमाला के अंत में इस आलेख के निष्कर्षात्मक कथनों पर विचार-विमर्श किया जा सकता है.
      विचार प्रस्तुति के लिए आपका आभार.

  4. पिंगबैक: कविता के बारे में – अंतिम भाग « सृजन और सरोकार

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