कविता के बारे में – तीसरा भाग

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कविता के बारे में – तीसरा भाग
शिवराम

( शिवराम द्वारा कविता पर यह महत्तवपूर्ण आलेख कुछ समय पूर्व ही लिखा गया था. १ अक्टूबर को उनके निधन पश्चात अभी हाल ही में यह ‘अलाव’ के नवंबर-दिसंबर’२०१० अंक में प्रकाशित हुआ है. यह आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां छः भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है तीसरा भाग. )

देखिए : कविता के बारे मेंपहला भाग, दूसरा भाग

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की बात याद आती है – ‘‘यदि मनुष्य लहलहाते हुए खेतों और जंगलों, हरी घास के बीच घूम-घूम कर बहते हुए नालों, काली चट्टानों पर चांदी की तरह ढलते हुए झरनों, मंजरियों से लदी हुई अमराईयों, पटपर के बीच खड़े झाड़ों को देखकर क्षणभर लीन न हुआ, यदि कलरव करते हुए पक्षियों के आनन्दोत्सव में उसने योग न दिया, यदि खिले हुए फूलों को देखकर वह न खिला, यदि सुन्दर रूप देखकर पवित्र भाव से मुग्ध नहीं हुआ, यदि दीन-दुखी का आर्तनाद सुन न पसीजा, यदि अभागों और अबलाओं पर अत्याचार होते देख क्रोध से न तिलमिलाया, यदि हास्य की अनूठी उक्ति पर न हॅंसा तो उसके जीवन में रह क्या गया।’’ आचार्य शुक्ल की चिन्ता रही है कि अपनी ही जिन्दगी के क्रिया-व्यापारों की आपाधापी और तनाव में ऐसा न हो कि प्रकृति से, शेष सृष्टि से ही मनुष्य की दृष्टि फिर जाए, वह मनुष्य और मनुष्यता के प्रति ही संवेदन शून्य हो जाए। शुक्ल जी की मानें तो कविता मनुष्य को, कवि को भी, पाठक को भी – आत्मकेन्द्रितता-निजबद्धता से मुक्त करती है, समग्र सृष्टि की ओर उन्मुख करती है, और नहीं करती है तो वह काहे की कविता है।

बेशक कविता का एक प्रयोजन यह भी है कि वह प्रकृति और जीवन के सौन्दर्य के प्रति मनुष्य की रागात्मकता की रक्षा, विकास और विस्तार करे। लेकिन वह यहीं तक सीमित नहीं है, अन्यथा वह सौन्दर्य के आनन्दबोध तक सिमट सकती है। इसीलिए शुक्ल जी, इस उद्धरण के बाद के हिस्से में दीन-दुखियों के प्रति करूणा और अत्याचार के विरुद्ध क्रोध के प्रति भी मनुष्य की रागात्मकता की रक्षा, विकास और विस्तार को भी कविता के प्रयोजन के रूप में उल्लेखित करते हैं। जब जीवन में सुन्दर कम बचा हो और हर ओर असुन्दर फैला हो, अभाव, बेचैनी, तनाव, असमानता, अपमान, अज्ञान फैला हो, जीवन की आपाधापी में शेष सृष्टि मन से अक्सर ओझल हो जाती हो, हमारे व्यवहार से विनोद, हॅंसना और चुहल गायब हो रहे हों तो यथास्थिति से विद्रोह और यथास्थिति के कारकों पर क्रोध कविता के प्रयोजन के केन्द्र में आने लगता है।

यादवचन्द्र की एक कविता उद्धृत कर रहा हूं – ‘‘नील गगन में / मनिहारिन घनश्याम नटी का / पुरना-जुड़ना कितना सुन्दर! / नील गगन में / गोरी-गोरी बगुलों की नागर पाँतों का / फिरना-तिरना कितना  सुन्दर / ……… बोल, बोल रे पागल मनुवा / कितना सुन्दर! कितना सुन्दर!! / नील गगन में अट्टहास प्रेतों का / कोरस-मृत्युनाश का / और मंगलाचरण अनय का / घोर असुन्दर! / नील गगन में बजे नगाड़ा / नखतयुद्ध का, महाप्रलय का / कुंठा, भय का / घोर असुन्दर! / नील गगन में गंध चिराइन, धुँआ विषैला / सूरज, चाँद, सितारों का काला पड़ जाना / घोर असुन्दर! / ……… घोर असुन्दर से सुन्दर की रक्षा करना / काव्य धर्म है / आप कहां हैं? / घोर असुन्दर का वर्जन कर सुन्दर गढ़ना / मुक्ति युद्ध है / आप कहां हैं? / मुक्ति युद्ध में आप कहां हैं ??’’

हमारे इस समय में जब मनुष्य घनघोर संकट में है, कविता का पूरी तरह या अधिकतर प्रकॄति सौन्दर्य में ही रमे रहना भी मनुष्य के प्रति उसकी रागात्मकता को प्रश्नचिन्हित करता है। कविता अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप नहीं है तो फिर क्या है? प्रेमचन्द इसीलिए कहते हैं साहित्य मनोरंजन की वस्तु नहीं है। इसीलिए साहित्य को और खासकर कविता को, मनोन्नयन के रागात्मक उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए। यह मनोन्नयन पाठक ही नहीं कवि का भी। यदि काव्य प्रक्रिया कवि के चित्त को उन्नत और समृद्ध नहीं करती तो ऐसी काव्य प्रक्रिया में खोट है। डॉ. रामविलास शर्मा ठीक कहते है कि ‘‘उसकी ( कविता की ) शक्ति मानसिक वातावरण प्रदान करने की होती है। वह हमारे चित्त को संस्कारित करती है। वह जीवन के सत्य को उद्घाटित करने के साथ सुन्दर जीवन का स्वप्न भी रचती है। इसलिए कविता मनुष्य की मित्र है। वह निरर्थक शब्द उगलने वाली मशीन नहीं है।’’

यदि हमारी कविता यह काम ठीक ढंग से कर रही है तो वह हाशिए पर क्यों चली गई, वह जीवन के केन्द्र में क्यों नहीं है? शासक शोषक वर्गों की साजिश और उनके प्रकाशन-वितरण-मीडिया तंत्र के साहित्य विरोधी हो जाने का तर्क पर्याप्त नहीं है। यह ऐसी ही बात है कि हम इसलिए पराजित हुए क्योंकि शत्रु ने हमें पराजित कर दिया। सवाल पराजित होने का भी नहीं है। पराजयों की ही श्रृंखला में विजय होती है। सवाल है हम लड़ते हुए पराजित हुए या जिनसे लड़ना था उनकी ही कृपा की आकांक्षा लिए छले गए और बिना लड़े ही हार गए। इसलिए सवाल यह है कि हम घोर असुन्दर की शक्तियों के विरद्ध सुन्दर के पक्ष में खड़े हैं या नहीं और हम इस मुक्ति यु्द्ध में शामिल हैं या नहीं।

मूल्यहीनता ही कविता को विचारधारा और सौन्दर्य की पक्षधरता से मुक्त रखने की मनोस्थिति बना सकती है। जिसके पास मूल्य बोध नहीं, जीवन मूल्यों और कला मूल्यों का अपना पक्ष नहीं, विवेक नहीं वह न तो ढंग का घसियारा हो सकता है, न ही ढंग का कवि। नई कविता अभिव्यक्तिन्मुख नए भावुक जनों को बहुत आसान दिखाई देती है, अपनी निजबद्ध कच्ची भावुकता को कैसे भी बयान कर दो और वह कविता हो गई। ऐसी कविताएं विपुल मात्रा में आ रही है और पत्रिकाओं में व पुस्तक रूप में खूब प्रकाशित भी हो रही है। इस कच्ची भावुकता की निजबद्ध कविताओं की भीड़ में पुष्ट, समृ्द्ध और समर्थ कविता, जो बहुत कम लिखी जा रही है, ओझल हो रही है। किसी भी कवि की सभी कविताएं स्तरीय नहीं होतीं, बड़े कवियों की कमजोर कविताओं की भी कमी नहीं है और निजबद्ध कच्ची भावुकता की प्रारम्भिक कविताएं भी तिरस्करणीय नहीं हैं, उनमें भी अनेक कविताएं अच्छी बन जाती हैं, लेकिन वे एक कवि की कविताई का प्रारम्भिक प्रस्थान हैं।

यदि वह वहां से आगे बढ़ने और निजबद्धता से ऊपर उठकर विश्व दृष्टि, उच्च मानवीय मूल्य और श्रेष्ठ कला मूल्यों से पुष्ट समृद्ध और समर्थ कविता की मंजिल तक पहुंचने की साधना में रत ही नहीं हो, ज्ञान और कलाओं के विविध अनुशासनों और परम्परा के बोध की ललक ही नहीं हों और इस हेतु ठीक दिशा में प्रवृत्त ही नहीं हो, कविता के सामाजिक सरोकारों और दायित्वों को ही समझना नही चाहता हो, तो यह अपने चित्त में अंकुराए काव्य-भाव को अंकुर ही बने रहने देना है। ठीक है, अंकुर का भी अपना सौन्दर्य होता है लेकिन उसमें फूल और फल तो तभी लगेंगे जब हम उसे पौधा या वृक्ष बनने की दिशा में विकसित होने दिया जाएगा। अच्छा और पर्याप्त खाद-पानी देंगे, हवा-रोशनी देंगे, खरपतरवारों से बचाएंगें। ये सब काम सायास करने होते हैं। यह भी हम जानते ही हैं कि अंकुर, अंकुर ही बना नहीं रह सकता। यदि वह विकसित नहीं होगा तो मुरझाएगा, सूख जाएगा।

( अगली बार – लगातार – चौथा भाग )

०००००
आलेख – शिवराम
प्रस्तुति – रवि कुमार

10 responses »

  1. पिंगबैक: Tweets that mention कविता के बारे में – तीसरा भाग « सृजन और सरोकार -- Topsy.com

  2. बड़े बड़े कवियों ने भी कमजोर कवितायें लिखी हैं और उनकी सभी कवितायें अच्छी नहीं हैं। यह हरेक रचनाकार के लिये सत्य है बल्कि हरेक कलाकार, चाहे वह किसी भी विद्या में सृजन क्यों न करता हो, के लिये यह बात सत्य है। फिर अच्छी कविता के साथ यह बात तो है ही कि अच्छे भाव वाली कविता स्व:स्फूर्त सृजन का परिणाम होती है, बाद में भले ही कवि अपनी भाषा प्रवीणता और कविता गढ़ने की कुशलता के आधार पर उसे कैसे ही माँज ले। बिल्कुल अ ब स से शुरु करी हुयी कविता में प्रयास दिखायी दे जाते हैं। जो भाव अपने आप लादे वही कविता दिल को छूती है।

  3. बेशक कविता का एक प्रयोजन यह भी है कि वह प्रकृति और जीवन के सौन्दर्य के प्रति मनुष्य की रागात्मकता की रक्षा, विकास और विस्तार करे। लेकिन वह यहीं तक सीमित नहीं है, अन्यथा वह सौन्दर्य के आनन्दबोध तक सिमट सकती है।
    अच्छी कविता के साथ यह बात तो है ही कि अच्छे भाव वाली कविता स्व:स्फूर्त सृजन का परिणाम होती है, बाद में भले ही कवि अपनी भाषा प्रवीणता और कविता गढ़ने की कुशलता के आधार पर उसे कैसे ही माँज ले। बिल्कुल अ ब स से शुरु करी हुयी कविता में प्रयास दिखायी दे जाते हैं। जो भाव अपने आप लादे वही कविता दिल को छूती है।

    भाई रवि जी कविता वाकई सिर्फ़ मनोरंजन का साधन नहीं वो तो समाज, परिवेश, प्रकृति और मनुष्य से जुडी हर भावनाओं को श्रेष्ठ बनाने का प्रयत्न करती है या प्रयत्नशील रहती है | मैं एक बार फिर आभारी हूँ आपका एक अत्यंत विचारशील और मनन करने के योग्य पोस्ट साथ ही उन कवियों के लिए चुनोती जो सिर्फ़ कविता को सिर्फ़ मनोरंजन का ही साधन समझते है या सिर्फ़ लिखने के लिए ही लिखते है |
    हालांकि मैंने सोचा था कि सम्पूर्ण भाग पढ़ने के बाद ही प्रतिक्रिया दूंगा लेकिन ऐसा नहीं कर सका |
    क्योंकि हर भाग अपने आप में पूरा लगता है जो एक दिशा में आपको चलने के लिए प्रेरित करता है

  4. जिसके पास मूल्य बोध नहीं, जीवन मूल्यों और कला मूल्यों का अपना पक्ष नहीं, विवेक नहीं वह न तो ढंग का घसियारा हो सकता है, न ही ढंग का कवि।

    सत्य वचन. बहुत सुन्दर आलेख. अगली कड़ी का इंतजार है|

  5. पिंगबैक: कविता के बारे में – अंतिम भाग « सृजन और सरोकार

  6. सौन्दर्य और अपनी बातों को जिनका सृजनात्मकता से कोई संबंध नहीं से भरी कविताएँ बहुत आ रही हैं…लेकिन वे सब कविताएँ ही तो हैं न…लेकिन उद्देश्य की ओर इशारा बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक है, इस लेख में बताए के अनुसार…

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