कविता के बारे में – दूसरा भाग

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कविता के बारे में – दूसरा भाग
शिवराम

( शिवराम द्वारा कविता पर यह महत्तवपूर्ण आलेख कुछ समय पूर्व ही लिखा गया था. १ अक्टूबर को उनके निधन पश्चात अभी हाल ही में यह ‘अलाव’ के नवंबर-दिसंबर’२०१० अंक में प्रकाशित हुआ है. यह आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां छः भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है दूसरा भाग. )

कविता के बारे मेंपहला भाग

रचना की अंतर्वस्तु का जन्म आभ्यन्तरीकृत जीवनानुभवों के आलोडन-विलोडन से अर्थात् मंथन से होता है। चिन्तनशीलता और कल्पनाशीलता, विवेक और अंतर्दृष्टि इस मंथन के उद्यम को संचालित करती हैं। वैयक्तिक से निर्वैयक्तिक होने, जगबीती के आपबीती और आपबीती के जगबीती के रूप में अनुभूत होने, अर्थात् सामान्यीकरण होने की प्रक्रिया चलती है। संवेदनाओं के ज्ञानात्मक और ज्ञान के संवेदनात्मक होने की प्रक्रिया चलती है। इस प्रक्रिया के बिना रचना की अंतर्वस्तु अस्तित्वमान नहीं होती। यह प्रक्रिया जितनी समृ्द्ध और परिपूर्ण होती है, उतनी ही समृद्ध और परिपूर्ण अंतर्वस्तु अस्तित्वमान होती है। जाहिर है सूचनात्मक संवेदनाओं और अनुभूतियों अर्थात् विपन्न अनुभवों से समृद्ध रचना जन्म नहीं लेती। सूचनात्मकता की स्थिति को तत्सम्बन्धी जीवन-वास्तव के सघन ज्ञान तक ले जाना चाहिए और फिर उसके आभ्यन्तरीकरण की सायास साधना रचनाकार का स्वभाव होना चाहिए, यह यांत्रिक काम नहीं है, संवेदनात्मक भावात्मक काम है।

विवेक और अंतर्दृष्टि जितने समृद्ध और वैज्ञानिक होंगे चिन्तनशीलता और कल्पनाशीलता की सक्रियता जितनी तीव्र और तार्किक होगी, आभ्यन्तरीकृत जीवन-वास्तव का मंथन उतना ही बेहतर होगा, उतनी ही बेहतर अंतर्वस्तु अस्तित्वमान होगी। यही काव्य प्रतिभा है जो परिवेश से विरासत के रूप में भी मिलती है और जिसे अर्जित और समृद्ध भी किया जाता है। तत्पश्चात् अंतर्वस्तु रूपग्रहण की प्रक्रिया में आती है। रचनाकार पहले अनुकूल विधा तय करता है, फिर अपने पास उपलब्ध उस विधा के विभिन्न रूप विधानों के साथ अंतर्वस्तु का सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है, उसकी प्रभावशाली अभिव्यक्ति हेतु शिल्प और भाषा के प्रयोग करता है। उपलब्ध पारम्परिक रूप विधान उपयुक्त नहीं लगते तो नए रूप विधान तलाशता है। इस प्रक्रिया में चेतन या अचेतन में, उसकी अभिव्यक्ति के दूसरे सिरे पर कौन हो यह प्रश्न भी उपस्थित होता है और इसका उत्तर भी भाषा, शिल्प तथा रूपविधान को निर्धारित करता है।

उपयुक्त रूपविधान का निर्धारण नहीं हो पाने के कारण या अभिव्यक्ति का अवसर नहीं बन पाने के कारण, चित्त में अनभिव्यक्त अंतर्वस्तु भी संचयित होती रहती हैं। चेतन और अचेतन मन उपयुक्त रूप विधान की निरंतर खोज में लगे रहते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि किसी रूप विधान ने रचनाकार को आकर्षित किया और उसने उस फार्म में रचना उपस्थित कर दी। उसने ग़ज़ल लिखना चाहा या गीत या दोहा लिखना चाहा और लिख दिए। इस प्रक्रिया में भी होता यह है कि उपर्युक्त फार्म की तलाश में चित्त में संचयित अनाभिव्यक्ति अंतर्वस्तुओं के पुंज में से अनुकूल अंतर्वस्तु अनुकूल फार्म से समंजित होने लगती है। ऐसा लगता है गोया अंतर्वस्तु तो अपने आप आ जाती है, मुख्य बात तो फार्म की तलाश है। यह इस रूप में सच भी है कि अंतर्वस्तु के निर्माण की प्रक्रिया चित्त का स्वभाव है – वह स्वतः अनायास भी चलती रहती है, रचनाकार को सायास तलाश तो अनुकूल फार्म की ही करनी होती है। रचनाकार जितना अधिक समर्थ और समृ्द्ध होता है, उतना ही उसे सायास प्रयत्न कम करने होते हैं, सहज प्रवाह में रचना अवतरित सी होने लगती है।

अनेक रचनाकार रचना के अनायास अवतरित होने, उतरने की बात करते हैं। यह अनायास कितने सायासों का समुच्चित प्रतिफलन है यह उनकी चेतना में नहीं होता है। जब मनुष्य का स्वभाव, कवि स्वभाव बन जाता है तो उसके चित्त में अचेतन तौर पर भी कविता की रचना प्रक्रिया चलती रहती है। सचेत रचनाकार इस अचेतन व्यवहार के प्रति भी सचेत रहता है। हमारा मूल्य बोध हमारे विवेक का स्थाई अंग बन जाता है और विवेक, चेतन और अचेतन दोनों रूपों में सक्रिय रहकर तय करता है कि – हमें क्या करना चाहिए, क्या नहीं? – सत्य और न्याय के हक में क्या है और क्या नहीं? मनुष्य और मनुष्यता के हक में क्या है और क्या नहीं? मेरा सामाजिक दायित्व क्या है? मेरा काव्य उद्देश्य क्या है? प्रगतिशीलता क्या है और पतनशीलता क्या है? आगे बढ़ने की दिशा कौनसी है और पीछे लौटने की कौनसी? आदि। यह भी कि – मेरा निजी हित क्या है और मेरे निजी हित में क्या नहीं है? मेरा लाभ किसमें है और किसमें नहीं? इस निजबद्धता से उभरे बिना कवि मन और कवि व्यक्तित्व निर्मित नहीं हो पाता। निजबद्ध कविताएं बड़ी कविताएं नहीं बनतीं, जैसे निजबद्ध आदमी बड़ा आदमी नहीं बनता।

न वस्तुपक्ष उपेक्षणीय है न कला पक्ष, न जीवन मूल्य उपेक्षणीय हैं न कला मूल्य। अच्छी रचना के लिए दोनों के प्रति सजगता अनिवार्य है। मूल्यहीनता की मनःस्थिति अच्छी कविता की जमीन नहीं होती। विवेक और अंतर्दृष्टि की भूमिका को नकारना काव्य विवेक के विरुद्ध खड़े होना है। काव्य विवेक के बिना कविता की बात कैसे की जा सकती है। ज्ञान की उपेक्षा या उसका उपहास मूर्खता की पक्षधरता है। कविता मूर्खता नहीं है, वह जीवन के अंधेरों में रोशनी का पुंज है। अज्ञान से ज्ञान और अंधेरों से उजाले की यात्रा में पथिक की टार्च है। कोरी भावुकता भरे बड़बोले बयान अब पर्याप्त नहीं है। शब्दों की बाजीगरी, भाषा के अमूर्तीकरण, रहस्य का आलोक, विचित्रता और अद्‍भुतपन के घटाटोप से अच्छी कविता नहीं बनती। कविता भाषिक संरचना और आकर्षक शिल्प से पहले एक अंतर्वस्तु की अभिव्यक्ति है, एक कथ्य है। सामाजिक जीवन में जितना भी बचा है उतने सौन्दर्य की हिफाजत तथा उसे और अधिक सरस और सुन्दर बनाने का स्वप्न हमारे चित्त की आँखों में निरंतर झिलमिलाते रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में व्याप्त विष को उलीचने का उद्देश्य हमारे ज़हन में लगातार जगमगाते रहना चाहिए। इसके बिना अच्छी कविता कैसे अस्तित्वमान होगी।

( अगली बार – लगातार – तीसरा भाग )

०००००
आलेख – शिवराम
प्रस्तुति – रवि कुमार

9 responses »

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  3. पिंगबैक: कविता के बारे में – पांचवा भाग « सृजन और सरोकार

  4. पिंगबैक: कविता के बारे में – अंतिम भाग « सृजन और सरोकार

  5. कविता के अनायास अवतरण पर, आध्यात्मिक आवरण पर बेहतरीन बातें…बहुत अच्छा लगा…अन्तिम अनुच्छेद छायावाद की आलोचना है, वहाँ घटाटोप है, अदृश्य के प्रति एक सनक है…

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