कविता के बारे में – पहला भाग

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कविता के बारे में – पहला भाग
शिवराम

( शिवराम द्वारा कविता पर यह महत्तवपूर्ण आलेख कुछ समय पूर्व ही लिखा गया था. १ अक्टूबर को उनके निधन पश्चात अभी हाल ही में यह ‘अलाव’ के नवंबर-दिसंबर’२०१० अंक में प्रकाशित हुआ है. यह आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां छः भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है पहला भाग. )

आजकल कविताएं खूब लिखी जा रही हैं। यह आत्माभिव्यक्ति की प्रवृत्ति का विस्तार है और यह अच्छी बात है। काव्यकर्म, जो अत्यन्त सीमित दायरे में आरक्षित था, वह अब नई स्थितियों में व्यापक दायरे में विस्तृत हो गया है। हमारे इस समय का महाकाव्य एक महाकवि नहीं रच रहा, हजारों कवि रच रहे हैं। जीवन के विविध विषयों पर हजारों रंगों में, हजारों रूपों में कविता प्रकट हो रही है। हजारों फूल खिल रहे हैं और अपनी गंध बिखेर रहे हैं। यह और बात है कि मात्रात्मक विस्तार तो खूब हो रहा है, लेकिन गुणात्मक विकास अभी संतोषजनक नहीं है। कविता लिखी खूब जा रही है, लेकिन अभी पढ़ी बहुत कम जा रही है। यूं तो समग्र परिस्थितियां इसके लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन हमारे कवियों के काव्य-कौशल और कविता की गुणवत्ता में न्यूनता भी इसके लिए जिम्मेदार है। उसकी आकर्षण क्षमता और इसके असर में कमियां भी इसके लिए जिम्मेदार है। यही चिन्ता का विषय है। इस सचाई को नकारने से काम नहीं चलेगा। इसे स्वीकार करने और इस कमजोरी से उबरने का परिश्रम करना होगा। यूं तो और बेहतर की सदा गुंजाइश रहती है तथा सृजनशीलता सदैव ही इस हेतु प्रयत्नरत रहती है, लेकिन फिलहाल हिन्दी कविता जिस मुकाम पर खड़ी है, इस हेतु विशेष प्रत्यनों की जरूरत है।

मुख्य रूप से तो यह कवियों का ही दायित्व है कि वे अपने काव्यकर्म के प्रति अधिक दायित्वपूर्ण हों, अपनी काव्य साधना को और अधिक सारगर्भित और प्रबल करें। अपने चित्त को और समृद्ध करें, और अधिक समर्थ काव्यभाषा अर्जित करें, और अधिक असरदार अंदाजेबयां विकसित करें। लेकिन साथ ही यह हमारे समीक्षकों और संपादकों का भी दायित्व है कि वे कविता के इस आत्मसंघर्ष में कवियों और कविता की मदद करें। विध्वंसक आलोचना से कोई लाभ नहीं होने वाला है, तो मिथ्या प्रशंसाओं से भी कोई लाभ नहीं होने वाला है। दोनों ही हानिकारक हैं। यह संतोष की बात है कि इन विषयों पर विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में बातचीत शुरू हुई है। इस बातचीत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। अपने पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों से मुक्त होकर इसे स्वस्थ बहस का रूप लेने दिया जाये। विमर्श जैसी चर्चाओं से कुछ नहीं होने वाला है, निष्कर्षों तक पहुंचें। आखिरकार साहित्य को, कविता को भी, हाशिए से जीवन के केन्द्र में लाने का प्रण और उस हेतु संघर्ष हमें ही करना होगा।

दुःखद यह है कि अभी हमारे कवियों में येन-केन-प्रकारेण प्रकाशित होने और चर्चित-स्थापित-सम्मानित होने की अवसरवादी प्रवृत्ति कुछ ज्यादा ही व्याप्त है। हमारा समीक्षा कर्म अभी भी उखाड़-पछाड़ और स्थापन-विस्थापन की मित्रता-शत्रुतापूर्ण व्यक्तिवादी गुटवादी प्रवृत्तियों से मुक्त नहीं हो पा रहा है। दायित्वबोधी समीक्षा का विकास ठहरा पड़ा है, उसे फिर गतिशील करने की जरूरत है। हमारे अनेक संपादक तो संकलनकर्ता जैसे हैं। अपनी पहचान के उद्देश्य, मित्रताएं निभाने व अन्यान्य दायित्वहीन व्यवहारों में संलग्न हो जाते हैं।

कवि की विश्वदृष्टि, जीवनानुभवों की समृद्धि, उसका मूल्य बोध, जीवन मूल्य और कला मूल्य, उसकी काव्यभाषा, उसका परम्परा बोध और उसका काव्य कौशल, उसकी कविता की गुणवत्ता को निर्धारित करते हैं। यह सब अर्जित किए बिना, इन सबके उन्नयन हेतु सतत साधनारत रहे बिना नितान्त वैयक्तिक भावुक और सतही प्रतिक्रियाओं अथवा बयानों पर आत्ममुग्धता कवि के लिए वैसे ही है जैसे बीज का अंकुराना लेकिन समुचित विकास नहीं होना। उस पर भी यह और कि माटी की अनुर्वरता या खाद-पानी की कमी के बारे में सोचने के बजाए इस कुपोषित, अविकसित, मुरझाए से अंकुर के सौन्दर्य पर ही रीझते रहना। इसे ही सौन्दर्य का मानक समझना और समझाना।

जीवनानुभवों की विपन्नता किसी भी कलाकर्मी का सबसे कमजोर पहलू होता है। इसकी भरपाई वह तकनीक, शिल्प कौशल, भाषाई चमत्कार और कोरी कल्पना प्रवीणता से करने की कोशिश करता है। लेकिन इस कलाबाजी से काम बनता नहीं है। कविता में रूपाकर्षण भले ही उत्पन्न हो जाए, उसमें मर्मभेदी असर पैदा नहीं हो पाता। वह मनोरंजक हो सकती है लेकिन मनोन्नयनकारी नहीं हो पाती। वस्तुतत्व की भरपाई रूपविधान नहीं कर सकता। जीवनानुभव जीवन और समाज में सक्रियता के अनुपात में प्राप्त होते है। इसका कोई और विकल्प नहीं है।

( अगली बार – लगातार – दूसरा भाग )

०००००
आलेख – शिवराम
प्रस्तुति – रवि कुमार

18 responses »

  1. पिंगबैक: Tweets that mention कविता के बारे में – पहला भाग « सृजन और सरोकार -- Topsy.com

  2. दायित्वबोधी समीक्षा का विकास ठहरा पड़ा है, उसे फिर गतिशील करने की जरूरत है। हमारे अनेक संपादक तो संकलनकर्ता जैसे हैं। अपनी पहचान के उद्देश्य, मित्रताएं निभाने व अन्यान्य दायित्वहीन व्यवहारों में संलग्न हो जाते हैं।

    बहुत सटीक आकलन ..स्वीकार

  3. कविता के मर्म को उदघाटित करता शानदार लेख, आगे के अंशों की प्रतीक्षा रहेगी।

    ———
    समाधि द्वारा सिद्ध ज्ञान।
    प्रकृति की सूक्ष्‍म हलचलों के विशेषज्ञ पशु-पक्षी।

  4. पिंगबैक: कविता के बारे में – दूसरा भाग « सृजन और सरोकार

  5. जीवनानुभवों की विपन्नता किसी भी कलाकर्मी का सबसे कमजोर पहलू होता है। इसकी भरपाई वह तकनीक, शिल्प कौशल, भाषाई चमत्कार और कोरी कल्पना प्रवीणता से करने की कोशिश करता है। लेकिन इस कलाबाजी से काम बनता नहीं है।

    सत्य वचन!

  6. पिंगबैक: कविता के बारे में – पहला भाग (via सृजन और सरोकार) « Jkdhakar's Blog

  7. पिंगबैक: कविता के बारे में – तीसरा भाग « सृजन और सरोकार

  8. पिंगबैक: कविता के बारे में – चौथा भाग « सृजन और सरोकार

  9. बिलकुल इसी रूप में ये बातें मन को मथ रहीं थीं बहुत समय से…सो बड़ा ही सुखद लगा पढना…

    कविता ही क्या, किसी भी विधा में लिखने वालों को ये बाते अवश्य पढनी चाहिए और ध्यान में बिठानी चाहिए…

    आभार प्रस्तुत करने के लिए…

  10. पिंगबैक: कविता के बारे में – पांचवा भाग « सृजन और सरोकार

  11. पिंगबैक: कविता के बारे में – पांचवा भाग « सृजन और सरोकार

  12. पिंगबैक: कविता के बारे में – अंतिम भाग « सृजन और सरोकार

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