यथार्थवाद और रोमांसवाद

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यथार्थवाद और रोमांसवाद

शिवराम

( शिवराम का यह आलेख मधुमति में प्रकाशित हुआ था, वहीं से यह साभार लिया गया है.)

यथार्थवाद और रोमांसवाद के सम्बन्धों पर विचार व्यक्त करते हुए, गोर्की ने लिखा है- “साहित्य में दो मूलभूत धाराएँ या प्रवृत्तियाँ मानी जाती हैं: रोमांसवाद और यथार्थवाद। यथार्थवाद का अर्थ है लोगों तथा उनकी जीवन स्थितियों का ऐसा सच्चा चित्रण जिस पर रंग-रोगन न लगाया गया हो। रोमांसवाद की कई परिभाषाएँ प्रस्तुत की गई हैं, परन्तु अभी तक ऐसी कोई ठीक-ठाक तथा व्यापक परिभाषा नहीं निकली जो साहित्य के सभी इतिहासज्ञों को संतुष्ट कर सके। रोमांसवाद में दो सर्वथा विरोधी प्रवृत्तियों में भेद करना चाहिए। एक है ‘निश्चेष्ट’ और दूसरी ‘सक्रिय’। निश्चेष्ट रोमांसवाद मनुष्य के जीवन को रंग चुनकर उसे संतुष्ट करने अथवा उसके आस-पास की दुनिया से उसका ध्यान हटाने की कोशिश करता है और उसे आन्तरिक जगत् के निष्फल आत्मदर्शन ‘जीवन की न हल होने वाली पहेलियाँ’ जैसे प्रेम, मृत्यु तथा अन्य अविचार्य समस्याओं के चिन्तन में उलझाता है। ये ऐसी समस्याएँ हैं जिन्हें चिन्तन तथा मनन से नहीं बल्कि विज्ञान द्वारा ही हल किया जा सकता है। सक्रिय रोमांसवाद मानव के जीवन संकल्प को दृढ करता है, आस-पास के जीवन और उसके सभी प्रकार के उत्पीडन के विरुद्ध विद्रोह भावना जगाता है।”

यहाँ गोर्की द्वारा ‘निश्चेष्ट’ और ‘सक्रिय’ नामकरणों या विशेषणों पर मतभेद हो सकता है। लेकिन रोमांसवाद की ये दो प्रमुख प्रवृत्तियाँ निर्विवाद हैं।

एक ऐसा रोमांसवाद जो आस-पास की दुनिया से अर्थात वस्तु जगत से, अर्थात जीवन के यथार्थ से मनुष्य का ध्यान हटाने की कोशिश करता है। दूसरा ऐसा रोमांसवाद जो मनुष्य के जीवन-संकल्प को दृढ करता है और उसके सभी प्रकार के उत्पीडन के विरुद्ध भावना जगाता है। यह दूसरे प्रकार का रोमांसवाद, यथार्थवाद न होते हुए भी सामाजिक यथार्थवाद का ही सहचर है।

यहाँ यह कहना भी आवश्यक लगता है कि यथार्थ और कल्पना एक दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। शत-प्रतिशत यथार्थ या शत-प्रतिशत कल्पना जैसी कोई अंतर्वस्तु नहीं होती। साहित्य और कलाओं में ही क्यों जीवन के किसी भी क्षेत्र में कल्पना का अनिवार्य महत्त्व है। कल्पना मानव मस्तिष्क की अद्भुत प्रवृत्ति है, एक विलक्षण क्षमता साहित्य में, अन्य विधाओं की बात छोडए, रिपोर्ताज तक में कल्पना का योग रहता है। कल्पना भी यथार्थ से एक दम विलग नहीं होती। वह यथार्थ-ज्ञान आधारित भी होती है और निर्भर भी।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब कल्पना यथार्थ को अविश्वसनीय बनाने या विकृत करने लगती है। विकृत अथवा अविश्वसनीय अंतर्वस्तु वाली रचना अपने ललित-आलंकारिक या अन्य रोचक सौन्दर्य के कारण मनोरंजक भी हो सकती है। लेकिन साहित्य का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना तो नहीं होता। उसका उद्देश्य तो जीवन को, उच्च आदशोँ, बेहतर संस्कृति और उन्नत सभ्यता की ओर प्रवृत्त करना भी होता है। यह तभी सम्भव है जब वह जीवन संकल्प को दृढ करे, सभी प्रकार के उत्पीडन तथा भेदभाव के विरुद्ध विद्रोह जगाए, जीवन के उन्नयन की आकांक्षा जगाए। कल्पना को, यथार्थ को प्रभावी और सामाजिक बनाने में योगदान करना चाहिए। साहित्य न तो फोटोग्राफिक चित्र जैसा यथार्थ होता है, न हो सकता है। वह यांत्रिक यथार्थवाद नहीं होता। हमारी आँखें और हमारा मस्तिष्क जब किसी दृश्य पर केंद्रित होते हैं, तो वे कैमरे की तरह दृश्य की हर चीज को अंकित नहीं करते। स्मृति में वही अंकित होता है जिसे हमने सायास फोकस किया होता है। स्मृति की तरह विस्मृति भी मानव मस्तिष्क की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। सायास अंकित किया हुआ भी स्मृति से विस्मृत हो सकता है, क्षीण या धुँधला हो सकता है। विषय वस्तु के बारे में कितना भी ज्ञान प्राप्त कर लें, कुछ न कुछ शेष रह ही जाता है, जिसकी रचना प्रक्रिया के दौरान आवश्यकता महसूस होती है। इस आवश्यकता को कल्पना से अर्जित किया जाता है। रचना में लालित्य और रूप-विधान के लिए भी कल्पना की आवश्यकता होती है। इसलिये सवाल कल्पना के महत्त्व को नकारने का नहीं है। जितनी संवेदनशीलता जरूरी होती है, उतनी ही कल्पनाशीलता भी रचनात्मकता के लिए जरूरी होती है। सामाजिक यथार्थवाद कल्पना के महत्त्व को न नकारता है, न कम करके देखता है। बस बात इतनी है कि कल्पना का प्रयोग किस लिये किया गया है। ‘निश्चेष्ट’ रोमांसवाद की दिशा में या ‘सक्रिय’ रोमांसवाद का दिशा में, या सामाजिक यथार्थवाद की दिशा में? उसे यथार्थ का पूरक और सहयोगी होना चाहिए। न कि, उसे भ्रम, अयथार्थ या यथार्थ विमुख करने में प्रवृत्त।

जिसे गोर्की ने ‘निश्चेष्ट’ रोमांसवाद कहा है, वह भी यथार्थ जीवन से चुने हुए रंगों से ही निर्मित होता है। वह भी यथार्थ, जीवन से चुने हुए विषयों-प्रश्नों के माध्यम से ही, मनुष्य का यथार्थ से ध्यान हटाने का प्रयत्न है। वास्तविक दुनिया से ध्यान हटाने की कोशिश, यथास्थिति की निर्विघ्नता का ही अभीष्ट सिद्ध करती है। वर्तमान समाज वर्गविहीन सम-समाज नहीं है। वह जाति, वर्ण, नस्ल, राष्ट्रीयता और वर्ग आधारित भेदभाव से युक्त समाज है। समाज की यथास्थिति किसी के लिए हितकर है तो किसी के लिए अहितकर। इसलिये यथास्थिति किस वर्ग के हित में है और किन वगोँ के हितों के विरुद्ध है, यह भी एक ठोस यथार्थ है। वर्तमान यथास्थिति की सुरक्षा के अर्थ है। बहुलांश श्रमजीवी उत्पादक जनों की दरिद्रता, विपन्नता, उपेक्षा पिछडेपन और बेचारगी की सुरक्षा, शोषकों-उत्पीडकों और परजीवी स्वामी वर्ग के वैभव और प्रभुता की सुरक्षा। जो साहित्य इस वास्तविकता से ध्यान हटाकर वास्तविक सामाजिक जीवन से विछिन्न स्त्री-पुरुष प्रेम और व्यभिचार के प्रसंगों अथवा जन्म मृत्यु की आध्यात्मिकता अथवा इस संसार को असार या मिथ्या सिद्ध करने की दार्शनिकता अथवा मनुष्य-संसार से अलग प्रकृति और किसी कल्पना लोक में सुख की तलाश करने को ही प्रवृत्त होता है, वह इस अन्यायपूर्ण यथास्थिति का सहयोग करता है। यथास्थिति को ईश्वर की इच्छा के रूप में प्रतिष्ठित करना तो यथास्थिति के किसी भी अस्वीकार को धर्म और ईश्वर विरोधी बना देना है। ये सभी प्रवृत्तियाँ यथास्थिति का पक्ष-पोषण करती हैं और प्रभु वगोँ की मदद करती हैं।

यथार्थ में कल्पना भी आवश्यक रूप से शामिल होती है। यथार्थवाद वास्तविकता और संभावित की द्वन्द्वात्मक एकता को अनिवार्य मानता है। वास्तविकता और संभावित की यह द्वन्द्वात्मक एकता जब समाज के श्रमजीवी जन-गण के व्यापक हिस्सों के हितार्थ और यथास्थिति के हर उत्पीडन, हर भेदभाव के विरुद्ध विद्रोह जगाने की दिशा में लक्षित होती है तो वह सामाजिक यथार्थवाद है। न वह कल्पना के विरुद्ध है, न प्रेम और मनोरंजन के और न ही रंग-रोगन के। यथार्थ की आलोचना जिसे आलोचनात्मक यथार्थवाद कहा गया, को वह अनुपयोगी तो नहीं मानती, लेकिन अधूरा मानती है। यथार्थ की आलोचना जरूरी है लेकिन बेहतर संभाव्य के स्वप्न और इस हेतु प्रयत्नों के बिना केवल आलोचना, नैराश्य और अवसाद को भी जन्म दे सकता है। इसीलिए सामाजिक यथार्थवाद आलोचना से आगे बेहतर संभाव्य की प्राप्ति की आकांक्षा और प्रयत्नों पर भी जोर देता है।

समाज और जीवन का हर यथार्थ सामाजिक यथार्थ नहीं होता। समाज और मनुष्य की विकृतियों और पतनोन्मुख प्रवृत्तियाँ भी यथार्थ हैं, लेकिन वह सामाजिक यथार्थ नहीं है। हमें विभ्रम और यथार्थ में, पतनशील और प्रगतिशील में, वैयक्तिक और सामाजिक यथार्थ में फर्क करना आना चाहिए। कलाएँ जीवन के सौन्दर्य और मनुष्य के सौन्दर्यबोध के विकास के लिए होती हैं। साहित्य उच्च मानवीय मूल्यों के पक्ष में चेतना निर्माण का काम भी करता है। पतनोन्मुखता और ह्रासशीलता उनका अभीष्ट नहीं हो सकता। वह सिर्फ मनोरंजन का हेतु नहीं है, वह संस्कारित भी करता है। साहित्य में रोचकता और रंजकता से सामाजिक यथार्थ का विरोध नहीं है।

वर्तमान जीवन यथार्थ बहुत जटिल और संश्लिष्ट है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक अध्ययन और ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों की दृष्टि व समझ जीवन यथार्थ को जानने-समझने के लिए जरूरी है। देखा, भोगा या सूचित हुआ यथार्थ वास्तविक और समग्र यथार्थ का एक बहुत छोटा अंश होता है। साथ ही वर्तमान जीवन यथार्थ अतीत, इतिहास और परम्परा की आगे की एक कडी है, इसलिए इतिहास बोध और परम्परा का ज्ञान भी उसे समझने के लिए जरूरी है। साथ ही आज का यथार्थ भविष्य की आधार कडी भी है, इसलिये भविष्योन्मुखता और समाज के विकास क्रम में अगले चरण और उसकी सम्भाव्यता व जरूरतों का ज्ञान भी उसे समझने के लिए जरूरी है। यह भी कि जीवन यथार्थ के जटिल होने का यह आशय भी नहीं है कि उसे रहस्यवादी और अज्ञेय बना दिया।

गोर्की जिसे ‘सक्रिय’ रोमांसवाद कहते हैं वह सामाजिक यथार्थवाद के निकट और अनुकूल है। गोर्की साहित्य में ‘क्रांतिकारी रोमांसवाद’ के पक्षधर है। यह ‘सक्रिय’ रोमांसवाद का क्रान्तिकारी विकास ही हैं जाहिर है ऐसी रोमांसवादी रचनाओं को जो मनुष्य का यथार्थ जीवन से ध्यान नहीं हटाती, जो जीवन से कुछ रंग-रूप-सौन्दर्य चुनकर मनुष्य को केवल आत्मविभोर कर देने तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव के जीवन संकल्प को दृढ करती हैं, अन्याय और उत्पीडन के हर रूप के विरुद्ध विद्रोह जगाती हैं, उन्हें कैसे नकारा जा सकता है। वैसे उन रचनाओं को ऐसी रचनाओं से श्रेष्ठ कहा जाएगा जो इसके साथ सामाजिक परिवर्तन की क्रांतिकारी आकांक्षा और जरूरतों से सम्पृक्त है। भविष्य के नक्शे की समझ से भी जो युक्त है और बेहतर भविष्य की आकांक्षा तथा क्रांतिकारी चेतना को विकसित करती है।

रोमांसवाद अप्राप्य की प्राप्ति और सम्भाव्य बेहतर की आकांक्षा से पैदा होता है। रोमांसवाद पैदा क्यों होता है और क्यों एक रचनाकार अभिव्यक्ति का रूमानी ढंग अपना लेता है, ये महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं। गोर्की इन्हें समझने के लिए एक उदाहरण देते हैं- “साथियों, अगर आप इस प्रश्न पर विचार करें कि लिखने की प्रेरणा क्यों होती है तो यथार्थवाद और रोमांसवाद का सम्बन्ध आपको अधिक स्पष्ट हो जाएगा। इस प्रश्न के दो ही उत्तर हो सकते हैं, जिसमें से एक मुझसे पत्र व्यवहार करने वाली, एक मजदूर की पन्द्रह वर्षीय बेटी ने किया है। अपने एक पत्र में उसने लिखा है- ‘मैं 15 वर्ष की हूँ। परन्तु इस अल्पायु में ही मुझमें लेखक की प्रतिभा जागृत हो उठी है। जिसका कारण दारुण-नीरस जीवन है।’…ताकि ‘दारुण नीरस जीवन’ को अपनी कल्पना से कुछ सुन्दर बनाया जा सके। सवाल उठता है-ऐसे जीवन की स्थितियों में आदमी किस चीज के बारे में लिख सकता है?…अगर मुझे पत्र लिखने वाली किशोरी की प्रतिभा का सचमुच ही विकास हुआ-जिसकी मैं हार्दिक कामना करता हूँ- तो वह शायद रोमानी स्वर में लिखेगी। वह आपने ‘दारुण-नीरस जीवन’ को सुन्दर काल्पनिक वस्तुओं से सजाने सँवारने का प्रयास करेगी तथा लोग वास्तव में जैसे हैं, उन्हें उससे बेहतर रूप में चित्रित करेगी।”

अर्थात् रोमांसवाद भी जीवन के यथार्थ की ही व्युत्पत्ति है। यह रूमान जीवन की ‘दारुण-नीरस’ स्थितियों से मुक्ति का रूमान है। लेकिन यदि इस रूमान का सक्रिय रोमांसवाद या क्रांतिकारी रोमांसवाद और सामाजिक यथार्थवाद की दिशा में विकास नहीं होता है तो खतरा इस बात का है कि हमें एक काल्पनिक दुनिया गढने और उसीमें आत्मविभोर हो जाने में ही ‘दारुण-नीरस’ जीवन से मुक्ति का अहसास लगे। इस आभासी मुक्ति को ही हम वास्तविक मुक्ति समझने लगे। आत्मविभोरता और आत्मलीनता की यह स्थिति ‘दारुण-नीरस’ जीवन से मुक्त वास्तविक दुनिया के निर्माण के संघषोँ से विरत कर देती है और यथास्थिति के विरुद्ध संघर्ष को छोडकर व्यवहार में उसकी मदद ही करती है। इसीलिए गोर्की ‘निश्चेष्ट’ रोमांसवाद का विरोध करते हैं। वे उस यथार्थवाद का भी विरोध करते हैं, जो कल्पना संभाव्य को खारिज करता है, जो विकृतियों और अश्लील नग्नता में रसास्वादन की ओर प्रवृत्त करता है, जो असामाजिक भी होता है और मनुष्य विरोधी भी, जो यथास्थिति को बल प्रदान करता है और प्रगतिशीलता को बाधित करता है।

सामाजिक यथार्थवाद व्यक्ति और व्यक्तित्व निर्माण के विरुद्ध नहीं है। लेकिन, कैसा व्यक्ति और कैसा व्यक्तित्व? एक संवेदनशील श्रमशील, ज्ञानोन्मुख, जनतांत्र्कि, संघर्षशील, सामाजिक, गरिमामयी व्यक्ति और व्यक्तित्व अथवा संवेदनहीन, आत्मकेंद्रित, तिकडमी, अवसरवादी गैर-जनतांत्रिक, श्रमद्रोही, ज्ञानद्रोही, पलायनवादी, असामाजिक, गरिमा हीन व्यक्ति और व्यक्तित्व। व्यक्ति और व्यक्तित्व का विकास सामाजिक विकास से अविच्छिन्न है। व्यक्तिवाद, व्यक्ति को समाज के विरुद्ध अथवा समाज के प्रति संवेदनहीन बनाता है। वह किसी न किसी तरह की आत्मरति में ही सुख तलाश करता है, भौतिक या आध्यात्मिक या दोनों। आत्म मुग्धता और आत्मश्लाघा, आत्म श्रेष्ठता और आत्म प्रचार उसके व्यक्तित्व का भारी क्षय करते हैं। व्यक्तिवाद व्यक्ति के विकास का नहीं, उसके ह्रास का मार्ग है।

शिवराम

 

 

 

शिवराम

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प्रस्तुति – रवि कुमार

15 responses »

  1. अत्यन्त महत्वपूर्ण आलेख है। यह लेख पहले नहीं पढ़ा था। लेकिन इन्हीं बातों को शिवराम जी से अनेक बार सुना है। और लगता है यह तो अवचेतन तक में रच-बस गई हैं।

  2. प्रिय,

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  3. गोर्कि का त्तकालीन समय मे,उनकी यथार्थवादी रोमासं उनकी अपने युग की मानसिकता हो सकती है,जो उनकी लेखनी से अवतरित हुई होगी जो बोद्धिक क्षमता का एक अच्छा उदाहरण है,प्रन्तु इस विषय की सोच अनुभव,सामाजिक परिवेश,देश,और काल,तथा मानव के बोद्धिक स्तर पर भिन्न,भिन्न हो सकती है,अगर लेखक जो बाते मेने लिखी है,इन सब को आशिंक या पुर्ण रूप से जोड़ कर लिखते तो
    अच्छा लगता,यह मेरा विचार है,औरों की सोच हो सकता है,मेरे इस विचार से मेल खाती हो या ना हो ।

    • विनय जी…आप इस आलेख की साहित्यिक प्रवृत्तियों के संदर्भों तक नहीं पहुंच पाए…आपने सही ही कहा है कि…अनुभव,सामाजिक परिवेश,देश,और काल,तथा मानव के बोद्धिक स्तर…के अनुसार आपकी अपनी सीमाएं हो सकती हैं…
      विचार और सोच आपके उल्लिखित संदर्भों के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं…परंतु वही सोच या विचार सच के अधिक करीब होते हैं…जो समकालीन सत्य को यथासंभव एक्यूरेसी के साथ स्पष्ट या व्याख्यायित कर सकते हों…
      यह भी एक विचार ही है…क्षमा चाहते हुए यहां रख मात्र दिये हैं…

      • धन्यवाद रवि जी,इस बात से में सहमत हूं,जो समकालीन सत्य को यथासंभव एकुयरेसी के

        साथ स्पष्ट या व्याखित कर सकतें हो,और क्षमा की तो कोई बात ही नहीं है,आपने स्पष्ट क

        करके बताया जिसके लिये में आपसे एकमत हूं ।

  4. विश्व-साहित्य का कोई भी ‘वाद’, सम्प्रति रोमांसवाद भी, अप्राप्य की प्राप्ति और सम्भाव्य बेहतर की आकांक्षा से पैदा हुआ है, क्योंकि सृजनमात्र से सरोकार रखने वाले कभी पतनोन्मुख हो ही नहीं सकते और ह्रासशीलता कभी भी उनका अभीष्ट नहीं हो सकता. इसी प्रकार जो रचनाधर्मी नहीं हैं, सृजन जिनका साध्य नहीं है, वे ही प्रायः पतनगामी सिद्ध हुए हैं.

    कमोबेश रोमांसवाद का एक उल्लेखनीय दौर भारतीय हिंदी साहित्य जगत में भी उदित हुआ. ‘निराला-महादेवी-पन्त-प्रसाद’ की चौकड़ी को जाननेवाले ‘छायावाद’ को कैसे विस्मृत कर सकते हैं. यह वाद भी कल्पना और यथार्थ की वह प्रवृत्ति है जो देश-कालगत वैशिष्ट्य के साथ संसार की सभी जातियों के विभिन्न उत्थानशील युगों की आशा, आकांक्षा में निरंतर व्यक्त होती रही है.
    छायावाद भी दो सर्वथा विरोधी प्रवृत्तियों – निश्चेष्ट या निष्क्रिय और सचेष्ट या सक्रिय – के बीच “बीती विभावरी जाग री……” का घोष करती है, क्योंकि छायावादियों ने भी महसूस किया था कि कल्पना यथार्थ को अविश्वसनीय बनाने या विकृत करने के लिए नहीं बल्कि जीवन-पथ को प्रशस्त करने के लिए सहचरी है.

    एक उत्कृष्ट आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद!

  5. अभीष्ट और वास्तविकताओं के बीच खाई होने की संभावनाएं निरंतर होती हैं…इसीलिए इनके प्रति सचेत रहना भी रचनाधर्मियों की अभीष्टता में हमेशा शामिल रहना चाहिए…

    आपने बेहतर और महत्त्वपूर्ण बात रखी….आभार…

  6. एक महत्वपूर्ण आलेख ….!!!!
    .वर्तमान साहित्य अतियथार्थ ओर बुने हुए यथार्थ के बीच झूल रहा है ……कल्पना हमेशा लेखक की धुरी है ओर रहेगी………कुछ कल्पनाये किसी यथार्थ का हिस्सा ही होता है ……वैसे बहुत सारे यथार्थ से अभी सामना बाकी है ……

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