शिवराम : संक्षिप्त जीवन-वृत्त

सामान्य

शिवराम का संक्षिप्त जीवन-वृत्त
( a short biography of shivram )

कुछ साथियों की मांग और शिवराम का जीवन-वृत्त नेट पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इस बार शिवराम का संक्षिप्त जीवन-वृत्त यहां प्रस्तुत किया जा रहा है. उनके निधन पश्चात, विभिन्न ब्लॉग्स और साइट्स पर प्रस्तुत की गईं पोस्टों के लिंक भी यहां नीचे दिये जा रहे हैं. सभी का आभार. जहां के लिंक्स छूट गये हैं, उनका भी आभार और यहां नहीं होने के लिए क्षमा.  शिवराम के कुछ छाया चित्र भी हैं.

 

 

 

 

 

 

शिवराम : जीवन-वृत्त

पिता : शंकर लाल स्वर्णकार
माता : कलावती देवी
जन्म स्थान :
करौली ( राजस्थान )
जन्म तिथि :
23 दिसंबर, 1949
09 सितंबर,1946 ( स्कूल और विभागीय प्रमाणपत्र में अंकित )
निधन :
01 अक्टूबर, 2010 कोटा ( राजस्थान )
शिक्षा :
मैकेनिकल इंजीनियरिंग में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, अजमेर से 1968.
कला स्नातक, बारां से 1978.
विधी स्नातक अंतिम वर्ष में दो पर्चों से अधूरा 1986.
कला स्नातकोत्तर, कोटा से 2008.
‘रचनाकार विजेन्द्र : एक आलोचनात्मक अध्ययन’ पर पी.एच.डी के लिए नामांकित, रूप-रेखा प्रारूप समर्पित, 2010. अधूरी रह गई.

हिंदी साहित्य, दर्शनशास्त्र, इतिहास और राजनैतिक अर्थशास्त्र का निरंतर अध्ययन. मार्क्सवाद-लेनिनवाद पर गंभीर अध्ययन और गहरी पकड़.

आजीविका :
दिसंबर 1969 से जून 1970 तक प्रशिक्षण के बाद 4 जुलाई 1970 से दूरसंचार विभाग में संचार सहायक ( आर.एस.ए. ) के पद पर पदस्थापित.
प्रथम नियुक्ति भवानीमंड़ी, तत्पश्चात रामगंजमंड़ी, बारां और फिर कोटा.
1995 में मुंबई में प्रशिक्षण के बाद 1996 में कोटा में ही कनिष्ठ दूरसंचार अधिकारी के पद पर नियुक्ति.
मई 2006 में उपमंड़ल अभियंता के पद पर कार्यालयीन नियुक्ति.
30 सितंबर 2006 को दूरसंचार सेवाओं से सेवानिवृत्त.

दूरसंचार विभागीय सक्रियता :

1971 में ही रामगंजमंड़ी में ही कर्मचारी यूनियन से जुड़ाव बना। बारां तक कर्मचारी यूनियन की गतिविधियां दूसरी प्राथमिकता पर थीं। पहली प्राथमिकता पर साहित्य, नाटक और अध्ययन रहा। परिस्थितियां कुछ ऐसे मोड़ लेती गईं कि कोटा तक आते-आते विभागीय कर्मचारी आंदोलन पहली प्राथमिकता हो गया। विभिन्न आंदोलनों और कार्यवाहियों का कुशल नेतृत्व करते रहे। डाकतार कर्मचारी समन्वय समिति के संयोजक रहे। इन्हीं आंदोलनों के दौरान विभिन्न विभागों की श्रमिक-कर्मचारी यूनियनों, ट्रेड़ यूनियनों से संपर्क बने, संयुक्त कार्यवाहियों की श्रृंखलाएं शुरू हुईं। इन्हीं की संयुक्त अभियान समिति के जिला संयोजक का दायित्व निभाया। कोटा को B-2 श्रेणी में सम्मिलित किए जाने की मांग पर एक व्यापक श्रमिक-कर्मचारी आंदोलन को संगठित एवं संचालित करने में केन्द्रीय नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। इस हेतु गठित श्रमिक कर्मचारी समिति के वे महासचिव चुने गये और केन्द्र व राज्य सरकार के अन्य विभागों के कर्मचारी आंदोलनों को भी नेतृत्व प्रदान किया।

बाद में जे.टी.ओ. बनने के बाद वे दूरसंचार आफिसर्स एसोसिएशन में भी सक्रिय रहे। संचार निगम एक्जीक्यूटिव एसोसिएशन ( इंडिया ) कोटा के संरक्षक रहे। वे संचार क्षेत्र के विभिन्न संगठनों के बीच एकता की कड़ी तो बने रहे ही, कोटा शहर में भी श्रमिक-कर्मचारी संगठनों की एकता के सूत्रधार बने रहे। 30 सितंबर 2006 को वे 36 वर्ष दो माह एवं 26 दिन की सेवाएं देने के पश्चात सेवानिवृत्त हुए।

सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक सक्रियता :

रामगंजमंड़ी, जो कि कोटा-स्टोन की खानों के कारण श्रमिक-बहुल इलाका है, ( 1970 ) में उन्होंने अपना पहला नाटक ‘आगे बढो’ लिखा और श्रमिक-समुदाय के ही पात्रों और अभिनेताओं को लेकर इसके प्रदर्शन किए। वहीं एक निःशुल्क संध्या विद्यालय भी खोला। वैचारिक मित्रों की संख्या बढ़ी और ‘जागृति मंड़ल’ नाम की एक संस्था बनाकर आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी इसी नाटक ‘आगे बढ़ो’ की प्रस्तुतियां की। यह नाटक जिसकी की आगे भी आपातकाल के बाद तक प्रस्तुतियां होती रहीं, अभी भी अप्रकाशित है। यहीं उन्होंने एक छोटी पुस्तिका ‘शाश्वत धर्मयुद्ध और एक कार्यक्रम’ लिखी, जो मित्रों द्वारा मिलकर छापी और इलाके में वितरित की गई। नाटकों से शुरू हुई छोटी-छोटी गतिविधियां, जन आंदोलनों का रूप लेने लगीं। श्रमिक समुदाय में थोड़ी चेतना जागृत हुई, तो उनके यूनियन बनाए जाने का अनुरोध और दवाब बढ़ा तो कोटा के ट्रेड़ यूनियन आंदोलन के लोकप्रिय श्रमिक नेता परमेन्द्र नाथ ढंढा से संपर्क हुए, मजदूर संगठन बने और पूरे क्षेत्र में जबरदस्त आंदोलन फैल गया। नाटकों और सहित्य की जनआंदोलनों में इस तरह की प्रभावी भूमिका से गुजरने के बाद यही उनका मूल रास्ता बन गया।

आपातकाल से पहले ही 1974 में ‘जनता पागल हो गई है’ नाटक लिखा गया। इसका पहला प्रदर्शन झालावाड़ महाविद्यालय में हुआ, और सव्यसाची ने इसे ‘उत्तरार्ध ’ में छापा। तभी से इस नाटक के प्रदर्शन शुरु हुए, जो अभी तक जारी हैं। इसी दौरान उनका स्थानान्तरण बारां कस्बे में हुआ। यहां कार्यवाहियों को अधिक व्यापक क्षितिज मिला। बढ़ते संपर्कों और कठिन परिस्थितियों ने आवश्यकता पैदा की कि समाज के विभिन्न मोर्चों पर एक साथ सक्रिय हुआ जाना चाहिए और फिर इन सभी मोर्चों की आपसदारी और सक्रियता की इकट्ठा ताकत से व्यापक हस्तक्षेप किये जाने चाहिएं। ‘अभिनव’ जन सांस्कृतिक मंच का गठन हुआ, साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखलाएं शुरू हुईं। नाटक, कवि सम्मेलन, साहित्यिक और विचार गोष्ठियां। संभाग के ग्रामीण अंचलों मे किसान सभाओं के संगठन बनें, इनके बीच जाने के लिए एक मोबाइल थियेटर भी बनाया। एक मेटाडोर में शिवराम अपने नाट्य दल और थोड़े से साज़ो-सामान के साथ आसपास के इलाकों में कुछ दिनों के लिए निकल जाते और गीतों तथा नाटकों की प्रस्तुतियां होती।

आपातकाल लगा, तब वे बारां में ही सक्रिय थे। ‘दिनकर साहित्य समिति’ का गठन किया गया, और एक साहित्यिक पत्रिका निकालने का निश्चय हुआ। आपातकाल के दौरान ही ‘उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के तमाम खतरे’ के संकल्प के साथ उन्होंने इस साहित्यिक पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ का प्रवेशांक प्रकाशित किया, और बाद में भी कई अंक आये। नाटक जारी थे ही, ‘जनता पागल हो गई है’ आपातकाल की परिस्थितियों में ज़्यादा माकूल हो कर उभरा और इसका प्रदर्शन उनकी मुख्य कार्यवाही बन गया। इसकी अंतर्वस्तु ने इसे आपातकाल के दौरान पूरे देश में ही काफ़ी लोकप्रिय बना दिया, इसके कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद हुए और हिंदी का यह पहला नुक्कड़ नाटक धीरे-धीरे सर्वाधिक खेले जाने वाला नाटक बन गया। शिवराम ने एक आपातकाल विरोधी नाटक ‘कुकडूं कूं’ लिखा और इसके प्रदर्शन किये, यह भी उस समय ‘उत्तरार्ध’ में छपा। ‘दुःस्वप्न’ तथा ‘ऑपरेशन जारी है’ नाटक भी इसी दौरान लिखे गये, ‘दुस्वप्न’ रतलाम से प्रकाशित ‘इबारत’ में प्रकाशित हुआ। कविताएं तथा जनगीत लिखने की शुरुआत हुई। उन्होंने आपातकाल के विरुद्ध तथा ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के लिए, एक व्यापक सांस्कृतिक मुहिम चलाई, जिसमें हिंदी क्षेत्र के अनेक महत्त्वपूर्ण साहित्यकार एकत्रित और सक्रिय हुए। इसी दौरान ‘जनवादी लेखक संघ’ के गठन की पूर्वपीठिका बनी तथा इलाहाबाद में जलेस के संविधान निर्माण में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। आपातकाल के दौरान और उसके बाद की परिस्थितियों में, बारां संभाग में एक व्यापक साहित्यिक-सांस्कृतिक हस्तक्षेप और किसान-छात्र-श्रमिक आंदोलनों का संघर्षमयी वातावरण तैयार हो गया।

रामगंजमंड़ी और बारां प्रवास के दौरान हासिल उपलब्धिया और अनुभव ही वे बुनियाद बनें, जिन्होंने शिवराम के भावी-जीवन की उस भूमिका का ताना-बाना बुना, जिसने उन्हें आम बुद्धिजीवी-साहित्यकारों एवं साम्यवादी नेताओं से भिन्न एक प्रखर विचारक, वक्ता एवं सक्रिय राजनैतिक-सामाजिक-संस्कृतिकर्मी के रूप में स्थापित किया।

1979 में उनका स्थानांतरण कोटा हो गया। नये सिरे से शुरुआत की चुनौतियां। यहां परिस्थितिवश विभागीय कर्मचारी आंदोलन प्राथमिकता पर आगया। नाटक उनका प्रिय औजार था ही, अवसर मिलते ही नये विभागीय साथियों को लेकर नाटकों का मंचन होता, नाटको के जरिए एक स्वस्थ राजनैतिक चेतना और संगठन की आपसदारी का निर्माण। शहर के अन्य कर्मचारी और श्रमिक संगठनों से संपर्क बने, गतिविधियां बढ़ी। स्थानीय और आसपास के अद्योगिक इलाकों के श्रम आंदोलनों में सक्रियता बढ़ती गई। ‘जन नाट्य मंच’ का गठन किया गया। नाटक, कहानी-पाठ, कवि-सम्मेलनों की श्रृंखलाएं शुरू हुईं। साहित्यिक गतिविधियां बढ़ी।

कोटा में ही माकपा के नेतृत्वकारी साथियों से संगत हुई, और उन्होंने क्रांतिकारी विचारों को व्यवहार मे लाने की कवायदों में विभिन्न मोर्चों पर यथासंभव कार्य जिम्मेदारियां निभाईं। आपातकाल के पश्चात माकपा पर हावी हुआ संशोधनवादी गुट धीरे-धीरे पार्टी को संसदवादी रूझान और वर्ग-सहयोगवादी रास्ते पर बढ़ा रहा था और वर्ग-संघर्ष तथा जनवादी क्रांति की राह के हामियों को साईड लाईन कर रहा था। वे लगातार इस पर चिंतित रहे और जनता की जनवादी क्रांति की राह की झंड़ाबरदारी करते रहे। अंततः पार्टी में चले अंदरूनी संघर्ष के पश्चात अधिकतर रेडिकल नेतृत्वकारी साथियों को बाहर कर दिया गया, या वे खु़द ही इन नीतियों का विरोध करते हुए बाहर आ गये। पार्टी और इससे जुडे संगठनों में विभाजन हुए, जन संघर्षों, आंदोलनों और नेतृत्व में हताशा व्याप्त हुई। शिवराम भी इससे अछूते नहीं रहे, और इसका असर उनकी क्रियाशीलता पर भी पड़ा। आखिरकार नये संगठन बनाए गये, बिखरे हुई चीज़ों को फिर से समेटने की कवायदें शुरू हुई और फिर से जन संधर्षों और आंदोलनों को खड़ा करने में वे अपनी भूमिका निभाते रहे।

कोटा के साहित्यकारों के साथ मिलकर ‘विकल्प’ जन सांस्कृतिक मंच का गठन हुआ। इसके जरिए नियमित साहित्यिक गतिविधियां, कवि-गोष्ठिय़ां, विचार-गोष्ठियां शुरू हुईं। ‘अभिव्यक्ति’ का पुनः प्रकाशन शुरू किया गया। विभिन्न साहित्यकारों और लेखकों के बीच गतिविधियां बढ़ी और कई संयुक्त कार्यवाहियां की गईं। कोटा में कई बड़े कैनवास के साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम किये गये। राहुल सांकृत्यायन, भारतेंदु, फ़ैज, प्रेमचंद, सफ़दर आदि की जंयंतियों पर कार्यक्रमों और चर्चाओं की एक गतिशील परंपरा शुरू की गई। कर्मचारियों और श्रमिकों के बीच राजनैतिक शिक्षण और विचार के उद्देश्य से एक संस्था ‘श्रमजीवी विचार मंच’ की स्थापना की गई, जिसकी नियमित रविवारीय विचार गोष्ठियां साथियों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान का एक प्रमुख जरिया थीं।

नाटक और विभिन्न कला रूपों के जरिए सामाजिक हस्तक्षेप के लिए शहर के विभिन्न युवा और छात्र साथियों के साथ ‘अभिव्यक्ति’ नाट्य एवं कला मंच ‘अनाम’ का गठन किया और इसके जरिए नाट्य प्रस्तुतियों की श्रृंखलाओं को पुनर्जीवित किया। कई पुराने नाटकों का पुनर्लेखन किया, नये नाटक लिखे जिनका कि प्रथम मंचन अक्सर ‘अनाम’ के द्वारा किया जाता रहा। प्रदेशव्यापी सांस्कृतिक अभियान चलाए गये। कोटा में रंगकर्मियों की एकता स्थापित की और संयुक्त संगठन ‘रास’ रंगकर्मी एकता संघ के निर्माण में केन्द्रीय भूमिका निभाई। इसके जरिए कई नाट्य प्रस्तुतियों के कार्यक्रम किये और कोटा में ऑडिटोरियम के निर्माण हेतु आंदोलन चलाया गया। शहर की अन्य संस्थाओं के साथ भी वे निरंतर सक्रिय और संपर्क में रहते और प्रगतिशील मूल्यों के साथ होने वाली गतिविधियों में सक्रिय हस्तक्षेप करते। वे अपने संपर्क में आने वाले हर शख्स को गंभीरता और सह्र्दयता से लेते और भरसक उसके व्याक्तित्व निर्माण में सहायता करते, उसके प्रगतिशील पक्ष को उभारने का काम करते।

परिस्थितियों के मद्देनज़र देश में व्यापक सांस्कृतिक-साहित्यिक-सामाजिक अभियानों के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक देशव्यापी संगठन की आवश्यकता उन्होंने महसूस की, और लगातार संपर्कों और कोशिशों के बाद अंततः कई प्रदेशों के साथियों के साथ मिलकर ‘विकल्प’ अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक सामाजिक मोर्चा का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी बिहार के मूर्धन्य साहित्य-सांस्कृतिक कर्मी यादवचन्द्र ने संभाली और शिवराम इसके महासचिव बनाए गये। इसके बाद वे निरंतर इसकी गतिविधियों और विस्तार की जुंबिशों मे लगे रहे। उन्होंने प्रदेश के स्तर पर भी लेखकों और साहित्यकारों की संयुक्त कार्यवाहियों के आधार तैयार किये, इन्हीं उद्देश्यों के आधार पर एक प्रदेश स्तरीय संयुक्त मोर्चे का गठन किया गया, जिसके वे संयोजक रहे।

दूरसंचार विभाग से सेवानिवृति के पश्चात वे सीधी राजनैतिक कार्यवाहियों में कूद पड़े। माकपा से अलग होकर पूरे देश में विभिन्न रेडिकल साथियों, समूहों ने अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग ढ़ंग व नामों से कम्यूनिस्ट पार्टियां और ट्रेड़ यूनियन संगठन बना लिये थे। शिवराम की राजस्थान के अग्रणी साथियों के साथ पार्टी के गठन और निर्माण में भूमिका थी। उन्होंने अन्य प्रदेशों के संगठनों और साथियों से संपर्क साधने और साझा समझ विकसित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई और अंततः अपने विकास-क्रम में एक देशव्यापी पार्टी एम.सी.पी.आई. ( यू ) का गठन किया गया। वे इसके पोलित ब्यूरो सदस्य थे। हिंदी भाषी प्रदेशों के लिए निकाले जाने वाले पार्टी मुख-पत्र ‘लोकसंघर्ष’ का प्रकाशन-संपादन भी वे ही किया करते थे।

वे साहित्य लेखन के क्षेत्र में भी निरंतर सक्रिय रहे। कई नाटक तो लिखे ही, कविताएं लिखी, दोहे लिखे, गीत लिखे, आलोचनाएं और समीक्षाएं लिखी, निबंध और संस्मरण लिखे, साक्षात्कार लिये और दिये। ‘अभिव्यक्ति’ में समसामयिक विषयों पर लिखे गये उनके संपादकीय चर्चा के विषय हुआ करते थे। उनके पास अपनी सामाजिक सक्रियता से संबंधित काफ़ी प्रकाशन थे और बाकी साथी प्रकाशन समूहों की मांग पर भी, सभी में किसी ना किसी विषय पर लगातार लेखन कार्य करते रहते। उनका इस तरह का बिखरा हुआ लेखन काफ़ी मात्रा में है। काफ़ी बाद में, अभी कुछ वर्षों पहले ही 2001 में उनके नाटक संग्रहों, ‘जनता पागल हो गई है’ और ‘घुसपैठिये’, का बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशन किया गया था। उसके बाद भारत विज्ञान समिति द्वारा उनके कुछ और नाटकों तथा लेखों का प्रकाशन किया गया। दो और नाटक संग्रह आए तथा अभी कुछ महिनों पहले ही उनकी तीन कविता पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं। अपने संपादन में शिवराम ने ‘अभिव्यक्ति’ के 36 अंक निकाले। हिंदी के पांच श्रेष्ठ नुक्कड़ नाटकों के एक संकलन में उनका नाटक संकलित हुआ, एन एस डी दिल्ली द्वारा ग्यारह नाटकों का संग्रह प्रकाशित करने की योजना में उनके दो नाटकों का चयन किया गया था। बिहार के एक छात्र ने उन के नुक्कड़ नाटकों पर शोध किया, और पी एच ड़ी की डिग्री प्राप्त की। फिलहाल वे अपने निबंधों और विभिन्न आलेखों की भी प्रकाशनार्थ पांडुलिपी तैयार कर रहे थे।

प्रकाशित पुस्तकें :

  • जनता पागल हो गई है ( नाटक संग्रह )  2001
  • घुसपैठिये ( नाटक संग्रह )  2001
  • रधिया की कहानी ( नाटक ) 2004
  • दुलारी की मां ( नाटक ) 2005
  • एक गांव की एक कहानी ( नाटक ) 2008
  • सूली ऊपर सेज़ ( SEZ पर विवेचनात्मक पुस्तक )
  • पुनर्नव ( नाट्य रूपांतर संग्रह )  अगस्त’2009
  • गटक चूरमा ( नाटक संग्रह )  अगस्त’2009
  • कुछ तो हाथ गहो ( कविता संग्रह )  अक्टूबर’2009
  • खु़द साधो पतवार ( दोहा संग्रह )  अक्टूबर’2009
  • माटी मु्ळकेगी एक दिन ( कविता संग्रह )  अक्टूबर’2009

शिवराम के निधन पश्चात की पोस्टें :

०००००

रवि कुमार

8 responses »

  1. प्रिय साथी, शिवराम जी से सर्वथा अपरिचित था, शायद हमारे तथाकथित साहित्यिक घेरे में उन जैसे जुझारू रचनाकारों को पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया है, वैसे मेरी समकालीन कार्यकर्ताओं-रचनाकारों के बारे में जानकारी सीमित ही है. हम लोग दिल्ली में कभी कभी नाटक करते हैं, अनियमित रूप से.. अब निश्चय ही शिवराम जी के नाटक खेलेंगे.. आपका ब्लॉग और खासकर कविता-पोस्टर बहुत पसंद आये.
    सादर
    इकबाल अभिमन्यु

  2. परिचय में परिवार या पुत्रादि का जिक्र भी आता तो अच्छा होता। वैसे मैंने सबसे पहले इनके बारे में भड़ास4मीडिया पर ही पढ़ा था। उस समय आपसे या अन्य चिट्ठों से परिचय न था। इस हिसाब से आपसे पहले मेरा परिचय उन्हीं से है। किताबें आदि आनलाइन आनी चाहिए।

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