सुबह का रंग भूरा – कहानी

सामान्य

सुबह का रंग भूरा
लघु-पत्रिका समयांतर में प्रकाशित कहानी : साभार

( ‘सुबह का रंग भूरा’ ( माटिन ब्रुन ) नाम की दस्तावेज सरीखी कहानी के लेखक हैं फ्रांक पावलोफ़।  फ्रांसीसी लेखक पावलोफ़ पेशे से मनोविज्ञानी हैं और बाल अधिकारों के विशेषज्ञ हैं। यह कहानी मूल रूप से फ्रांसीसी में लिखी गई थी।

एक सर्वसत्तावादी समाज किस तरह से सोच-विचार के तरीकों से लेकर रहन-सहन और जीवनशैलियों की स्वाभाविकता में ख़लल और आख़िरकार डकैती डाल कर गिरवी बना लेता है, ‘माटिन ब्रून’ मनुष्य जीवन में ऐसी राजनैतिक सामाजिक सांस्कृतिक दुर्घटनाओं, विपदाओं की सूचना का दस्तावेज़ है। स्वेच्छाचारी, निरकुंश और फ़ासिस्ट चरित्र वाला ब्राउन स्टेट जब बन रहा होता है तो क्या ‘गुल’ खिलते हैं, इस कहानी में एक सामान्य जीवन गतिविधी के अंडरकरेंट में मचे उत्पात की उतने ही अंडरकरेंट व्यंग्य के साथ झांकी देखने को मिलती है।

सब कुछ सामान्य तो है, लेकिन कितना कुछ बदल जाता है देखते ही देखते, जैसे एक सुबह की रंगत। ये कहानी यथास्थितिवाद से जूझने और निकलने का एक अनिवार्य पाठ मानी गयी है। )

सुबह का रंग भूरा

चार्ली और मैं धूप में बैठे थे। हम दोनों में से कोई ज़्यादा बात नहीं कर रहा था। बस दिमाग़ में आ रहे ऊलजलूल ख़यालों के बारे में परस्पर बतिया रहे थे। ईमानदारी से कहूं, तो मैं उसकी बात पर बहुत ध्यान नहीं दे रहा था। हम कॉफ़ी की चुस्कियां ले रहे थे और समय सुखद गति से व्यतीत हो रहा था। हम दुनिया की गतिशीलता को निहार रहे थे। वह मुझे अपने कुत्ते के बारे में कुछ बता रहा था। किसी इंजेक्शन के बारे में जो उसे कुत्ते को देना पड़ा था। लेकिन तब भी मैंने वाकई ज़्यादा गौर नहीं किया।

बेचारे जानवर की तकलीफ़ दुखद थी। हालांकि ईमानदारी से कहें तो उसकी उम्र पन्द्रह साल थी, जो कुत्ते के लिए एक भरी-पूरी आयु है,इसलिए तुमने सोचा था कि वह् इस बात से वाकिफ़ है कि कुत्ते को किसी दिन जाना ही है।

‘देखो,’ चार्ली ने कहा, ‘मैं उसे भूरे रंग का तो नहीं बता सकता था।’

‘हां जाहिर है। वह आख़िर एक लेब्राडोर था, वो काला लेब्राडोर ही तो था न ? ‘खैर छोड़ो, उसे हुआ क्या था ?’

‘कुछ भी नहीं। बस यही कि वो भूरा कुत्ता नहीं था। बस इतना ही।’

‘क्या ? तो उन्होंने अब कुत्तों पर भी शुरु कर दिया है।’

‘हां।’

पिछले महिने बिल्लियों के साथ ऐसा हुआ था। मैं बिल्लियों के बारे में जानता था। मेरे पास भी एक थी। एक आवारा बिल्ली जिसे मैंने पाला था। काले और सफ़ेद रंग की एक नन्हीं सी गंदी-सी बिल्ली। मैं उसे पसंद करता था। लेकिन मुझे उससे छुटकारा लेना पड़ा।

मेरे कहने का मतलब है कि उनके पास भी तर्क हैं। बिल्लियों की आबादी बेकाबू हो रही थी। और जैसा कि सरकारी वैज्ञानिक कह रहे थे कि मुख्य चीज़ है भूरी बिल्लियों को ही पालना। ताज़ा प्रयोगों के मुताबिक भूरे पालतू जानवर दूसरों के मुकाबले हमारी आधुनिक शहरी ज़िंदगी के लिहाज़ से ज़्यादा अनुकूल है। वे कम गंदगी करते हैं और खाते भी बहुत कम हैं। किसी भी हालत में, बिल्ली आख़िर बिल्ली है और भूरे रंग से इतर रंग वाली बिल्लियों से छुटकारा पाकर एक बार में ही समस्या का निदान कर लेना ही समझदारी की बात है।

सैनिक पुलिस आर्सेनिक की गोलियां मुफ़्त दे रही थी। आपको यह करना होता था कि उनके खाने में गोलियां मिला दो और कहानी ख़त्म। एकबारगी मेरा दिल टूट् गया। लेकिन मै जल्द ही इससे उबर गया।

मुझे यह बात मान लेनी चाहिए कि ख़बर ने मुझे थोड़ा सा झिझोंड दिया था। मुझे नहीं पता था कि क्यों, खासकर। शायद इसलिए कि, वे अपेक्षाकृत बड़े होते हैं। या शायद इसलिए कि, वे मनुष्य के सबसे अच्छे दोस्त होते हैं, जैसा कि कहा जाता है।

खैर, चार्ली ने इस मामले में कदम बढ़ा ही दिए थे, और ये सही भी था। आख़िरकार इन चीज़ों के बारे में ज़्यादा माथापच्ची करने से कुछ होना-हवाना नहीं था। और जहां तक भूरे कुत्तों की बात है कि वे औरों से बेहतर हैं, मैं समझता हूं ये बात सही ही होगी।

हम दोनों के बीच ज़्यादा कुछ बात करने लायक नहीं बचा तो थोड़ी देर बाद हमने अपनी-अपनी राह ली। लेकिन दिमाग़ के एक कोने में मुझे लग रहा था कि कुछ अनकहा रह् गया है। बाकी का दिन इसी संदेह् के साये में गुजरा।

इस घटना को ज़्यादा दिन भी नहीं हुए थे कि चार्ली को ब्रेकिंग न्यूज़ देने की मेरी बारी आ गई। मैंने उसे बताया कि ‘डेली’ अब कभी नहीं छपेगा। ‘द डेली’, जिसे वह कॉफ़ी पीते हुए हर सुबह पढ़ता था।

‘ तुम कहना क्या चाह्ते हो ? क्या वे हड़ताल पर हैं ? क्या वे दिवालिया हो गये हैं या कुछ और ?’

‘नहीं, नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसका संबंध कुत्तों वाले मामले से है।’

‘क्या भूरे वाले ?’

‘बिल्कुल सही। एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब उन्होंने उस नये कानून के बारे में बात न की हो। बात यहां तक आ पहुंची कि उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। मेरे कहने का मतलब ये कि पाठकों को पता ही नहीं था कि वे और क्या सोचें। उनमें से कुछ ने अपने कुत्ते छिपाने शुरू कर दिए थे।’

‘लेकिन ये तो संकट को बुलावा है।’

‘हां, बिल्कुल्, और इसीलिए अब अख़बार पर पाबंदी लगा दी गई है।’

‘तुम मज़ाक कर रहे हो। रेसिंग का क्या होगा ?’

‘हूं, मेरे पुराने दोस्त, तुम्हें तो उस बारे में टिप्स आने वाले दिनों में ‘ब्राउन न्यूज़’ से लेनी शुरू करनी होगी। नहीं लोगे क्या। और कुछ भी नहीं है यहां। खैर घुड़दौड़ का उनका सेक्शन ऊपरी तौर पर इतना बुरा भी नहीं है।’

‘दूसरे बहुत आगे निकल गये हैं। लेकिन आख़िरकार तुम्हें किसी तरह का अख़बार तो मिल ही रहा है । यानि क्या चल रहा है ये जानने का तुम्हारे पास कोई जरिया तो रहेगा ही। क्यों ?’

मैं चला था कि चार्ली के साथ इत्मिनान से कॉफ़ी पिऊंगा, और यहां मैं ब्राउन न्यूज़ का एक पाठक बनने की चर्चा में ही उलझा हुआ था। कैफ़े में मेरे पास बैठे और लोग अपने में व्यस्त थे जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं हो। मैं जाहिरा तौर पर खामख़्वाह हलक़ान हुए जा रहा था।

उसके बाद बारी थी लाइब्रेरी की किताबों की। इस बारे में कुछ ऐसा था जो सही नहीं था। ‘द डेली’ सरीखे संगठनों से जुड़े प्रकाशन संस्थानों को अदालत में घसीटा गया था और उनकी किताबें, पुस्तकालयों और किताबों की दुकानों से हटा ली गई थीं। लेकिन फिर दोबारा उनकी प्रकाशित हर चीज़ में कुत्ता या बिल्ली शब्दों का उल्लेख होता महसूस होता था। हमेशा ‘भूरे’ शब्द के साथ न भी हो, तब भी। तो उनकी मंशा जाहिर थी।

‘ये तो बिल्कुल बुड़बक बात है,’ चार्ली ने कहा। ‘कानून, कानून है। उसके साथ चूहे बिल्ली का खेल करने का कोई मतलब नहीं।’

‘भूरा,’ उसने जोड़ा, अपने आसपास देखते हुए कि कहीं कोई हमारी बातचीत सुन तो नहीं रहा है था। ‘भूरा चूहा।’

सुरक्षा के लिहाज़ से हमने वाक्याशों, या दूसरे खास शब्दों के पीछे ‘भूरा’ जोड़ना शुरू कर दिया था। हम ब्राउन पेस्टी के बारे में दरयाफ़्त करते, शुरू में ये थोड़ा अटपटा लगा लेकिन स्लैंग तो यूं भी हमेशा बदलता रहा है, इसलिए हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि हम अपनी बात के आख़िर में ‘भूरा’ जोड़े या कहें, भाड़ में जाओ। जो कि हम आमतौर पर कहते ही थे। कम से कम इस तरह् हमने कोई मुसीबत मोल नहीं ली थी, और यही तरीका हमें अच्छा लगता था।

यहां तक कि हमें घोड़ो पर भी जीत नसीब हुई। मेरा मतलब, ये कोई जैकपॉट या और कुछ नहीं था। लेकिन ये थी तो जीत ही। हमारी पहली भूरी विजय। और इस तरह बाकी हर चीज़ ओके लगने लगी।

चार्ली के साथ बिताया एक दिन मैं हमेशा याद रखूंगा। मैने उसे कप का फाइनल देखने के लिए अपने घर बुलाया था। और जैसे ही एक दूसरे से मिले, हम हंस पड़े। उसने नया कुत्ता लिया था। वह एक विशाल भारी जानवर था। पूंछ् की नोक से लेकर थूथन तक भूरा का भूरा। उसकी आंखें भी भूरी थीं।

‘है न गजब का !, ये मेरे पुराने कुत्ते से ज़्यादा दोस्ती वाला है। ज़्यादा स्वामीभक्त भी। मैं भी उस काले लेब्राडोर के बारे में क्या बातें लेकर बैठ गया था।’

जैसे ही उसने यह कहा, उसके नए कुत्ते ने सोफे के नीचे डाइव मारी और भौंकना शुरू कर दिया। और हर भूंक में मानो वह कहता था, ‘मैं भूरा हूं! मैं भूरा हूं! और कोई मुझे नहीं बताता कि मुझे क्या करना है!’

हमने उसे हैरत से देखा। और तभी सिक्का गिरा।

‘तुम भी ?’ चार्ली ने कहा।

‘मैं डर गया हूं।’

आप देखिए, उसी वक़्त मेरी नई बिल्ली कमरे में कूदी और आलमारी के ऊपर छिपने के लिए पर्दे पर जा चढ़ी। भूरे फर वाली बिल्ली। और वे भूरी आंखे जो लगता था, आप जहां-जहां जाते हैं, वे आपका पीछा करती रहती हैं। और इसलिए हम दोनों हंस पड़े थे। संयोग के भी क्या कहने!

‘मैं भी बिल्ली वाला आदमी हूं वैसे। देखो कितनी प्यारी है, है न् ?’।

‘सुंदर,’ उसने अपना सिर हिलाते हुए कहा।

फिर हम टीवी की ओर मुख़ातिब हुए। हमारे दोनों भूरे जानवर अपनी आंखों के कोनों से एक दूसरे को होशियारी से घूर रहे थे।

मैं आपको नहीं बता सकता कि इतना सब होने के बाद आख़िर उस दिन फाइनल किसने जीता। मैं उस दिन को वास्तविक हंसी के दिन की तरह् याद रखता हूं। हमने वाकई महसूस किया कि शहर भर में जो बदलाव किये जा रहे थे उनके बारे में आख़िरकार चिंतित होने की कोई वज़ह नहीं थी। मतलब, आप वही करते थे जो आपसे अपेक्षित था। और आप सुरक्षित थे। शायद नये निर्देशों ने हरेक की ज़िंदगी आसान बना दी थी।

जाहिर है, मैंने उस छोटे बच्चे को भी अपने ख़्यालों में जगह दी थी जो उस दिन सुबह मुझे दिखा था। वह् सड़क के दूसरे किनारे पर घुटनों के बल बैठा रो रहा था। उसके सामने ज़मीन पर एक नन्हा-सा सफ़ेद कुत्ता मरा पड़ा था। मैं जानता था कि वह जल्द ही इस हादसे से उबर जाएगा। आख़िरकार ऐसा नहीं था कि कुत्तों की मनाही कर दी गई थी। उसे करना यह था कि भूरा कुत्ता लाना चाहिए था। आपको ठीक वैसा ही गोद में खिलाया जाने वाला पूडल मिल सकता था, जो वहां उस बच्चे के पास था। तब वह भी हमारी तरह होता। ये जानकर अच्छा लगता है कि आप कानून का सही पालन करते हैं।

और फिर कल, ठीक ऐसे वक़्त जब मुझे लगता था कि सब कुछ सही है, मैं बाल-बाल बचा वरना सेना पुलिस ने मुझे घेर लिया होता। भूरी पोशाक वाले लोग। वे कभी भी आपकों यूं ही नहीं जाने देते। ख़ुशकिस्मती से उन्होंने मुझे नहीं पहचाना क्योंकि वे इलाके में नये थे और हर किसी को अभी नहीं जानते थे। मैं चार्ली के घर जा रहा था। इतवार का दिन था, और मैं उसके घर ताश खेलने जा रहा था। मैं अपने साथ बीयर की कुछ बोतलें भी ले जा रहा था। आपको ताश के मज़ेदार खेल तो जब-तब खेलते ही रहने होंगे। मेज़ पर ताल बजाते हुए और कुछ चना-चबैना करते हुए दो-एक घंटे बिताने की ही बात थी।

जैसे ही मैं सीढ़ीयों पर चढ़ा, मुझे अपनी ज़िंदगी का पहला धक्का लगा। उसके घर का दरवाज़ा खुला पड़ा था और सेना पुलिस के दो अफ़सर दरवाज़े के सामने खड़े थे। वे लोगों से चलते रहने को कह रहे थे। मैंने ऐसे जाहिर किया जैसे कि मैं ऊपर की मंज़िल के किसी फ़्लैट में जा रहा हूं और सीढ़ीयों पर चढ़ गया। ऊपर से मैं लिफ्ट के जरिए नीचे उतर आया। बाहर सड़क पर फुसफुसाहटें शुरू हो चुकी थी।

लेकिन उसके पास तो भूरा कुत्ता है। हम सबने देखा है।

‘ठीक है, हां, लेकिन वे कह् रहे हैं कि पहले तो उसके पास काला था।’

‘पहले ?’

‘हां, पहले। आपके पास पहले से ही कोई भूरा कुत्ता न होना भी एक जुर्म है। और इस बात की जानकारी मिलना मुश्किल नहीं है। वे कुछ नहीं करेंगे सिर्फ़ पड़ौसियों से पूछ लेंगे, बस।’

मैं फौरन चला आया। मेरी गर्दन के पीछे पसीने की ठंड़ी धार रेंगती हुई गई।

अगर पहले आपके पास किसी और रंग का जानवर होना अपराध है तो सेना पुलिस किसी भी वक़्त मेरे भी पीछे लग जाएगी। मेरे ब्लॉक में सब जानते थे कि पहले मेरे पास एक काली-सफ़ेद् बिल्ली थी। पहले! मैंने इस बारे में तो कभी सोचा ही नहीं था।

आज सुबह, ब्राउन रेडियो ने समाचार की पुष्टि कर दी। गिरफ़्तार किये पांच सौ लोगों में चार्ली भी था। अधिकारियों का कहना था कि भले ही उन लोगों ने हाल में भूरा जानवर खरीदा लिया हो लेकिन इसका ये अर्थ नहीं था कि उन्होंने वास्तव में अपने सोचने का तरीका भी बदल लिया हो।

‘किसी पुराने समय में ऐसे कुत्ते या बिल्ली का स्वामी होना जो समरूप नहीं है, एक अपराध है,’ उदघोषक ने ऐलान किया। फिर उसने जोड़ा, ‘ये राज्य के विरुद्ध अपराध है।’

उसके बाद जो हुआ वह और भी बुरा था। अगर आपने ख़ुद कभी कुत्ते या बिल्ली ना रखे हों लेकिन अगर आपके परिवार में किसी ने, आपके पिता या भाई या रिश्तेदार ने, अपनी ज़िंदगी में कभी भी ऐसे कुत्ते-बिल्ली पाले हों जो भूरे न रहे हों तो ऐसी स्थितियों में भी आप दोषी हैं। आप हर हाल में दोषी हैं।

मुझे नहीं मालूम कि उन्होंने चार्ली के साथ क्या किया।

ये पूरा मामला हाथ से निकल रहा था। दुनिया बौरा गई थी और मैं, भला मानुष सोच रहा था कि मैं अपनी नई भूरी बिल्ली के साथ सुरक्षित हूं।

जाहिर है, अगर वे पहले पाले गए जानवर के रंग को आधार बनाएं तो जिसे चाहें उसे गिरफ़्तार कर सकते हैं।

मैं उस रात पलक तक नहीं झपका सका। मुझे शुरू से ही ‘ब्राउंस’ पर संदेह् होना चाहिए था। जानवरों के बारे में उनका पहला कानून। मुझे उस समय कुछ कहना चाहिए था। आख़िरकार, वह मेरी बिल्ली थी, और कुत्ता चार्ली का था। हमें सिर्फ़ ये कहना चाहिए था ; नहीं। उनके सामने खड़ा हो जाना चाहिए था। लेकिन हम क्या कर सकते थे ? मतलब सब कुछ इतनी तेजी से हुआ। और फिर कामकाज भी था और दुनिया भर की दूसरी चिंताएं। और यूं भी हम कोई अकेले तो थे नहीं। हर किसी ने ऐसा किया था। अपने सिर झुकाए रखे। हम महज थोड़ी-सी शांति और तसल्ली चाहते थे।

कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है। ये तो सुबह का वक़्त है। बहुत सुबह। इस समय तो कोई राउंड पर नहीं आता। अभी तो उजाला भी नहीं फूटा है। अभी तो सुबह् का रंग भूरा है।

जोर-जोर से दरवाज़ा पीटना बंद करो। मैं आ रहा हूं…….

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लेखक : फ्रांक पावलोफ़
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अनुवाद : शिवप्रसाद जोशी
समयांतर के जून, २०१० अंक में प्रकाशित

7 responses »

  1. रवि जी,

    दुखद समाचार आज ही मिला। भौगोलिक दूरी भले ही हो, इस दुखद घडी में हम सब आपके साथ ही हैं। ईश्वर शिवराम जी की आत्मा को शांति दे! श्रद्धासुमन अर्पित हैं!

    मृत्युः सर्वहरश्च अहम उद्भवश्च भविष्यताम्।
    कीर्तिः श्रीर्वाक च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥
    (गीता में श्रीकृष्ण)

  2. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ “उम्र-कैदी” का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

  3. यह कहानी कई बार शुरू करने पर पचती नहीं थी। अब जाकर पढ़ पाया पूरा। अन्त में—-‘हमें सिर्फ़ ये कहना चाहिए था ; नहीं। उनके सामने खड़ा हो जाना चाहिए था। लेकिन हम क्या कर सकते थे ? मतलब सब कुछ इतनी तेजी से हुआ। और फिर कामकाज भी था और दुनिया भर की दूसरी चिंताएं। और यूं भी हम कोई अकेले तो थे नहीं। हर किसी ने ऐसा किया था। अपने सिर झुकाए रखे। हम महज थोड़ी-सी शांति और तसल्ली चाहते थे।’—–इतना ही याद रहा और यह कि भूरे रंग को लेकर सब कुछ बदल सा गया और बदल भी गया।

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