जिन्हें लौटना हो, वे लौट जाएं – कविता पोस्टर – रवि कुमार

सामान्य

जिन्हें लौटना हो, वे लौट जाएं – शिवराम
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

इस बार का कविता-पोस्टर है, शिवराम की कविता पंक्तियों का.

०००००

रवि कुमार

23 responses »

  1. जिनकी दृष्टि में हों मंजिलें
    जिन्हें सफर से हो इश्क
    वे चलें हमारें साथ।

    दो टूक बेलाग अभिव्यक्ति! क्या बात !!

  2. Blog manager is denying it as presaid verson and says alongwitjh that duplicate comment is deleted with the name Rr.R.Ramkumar which I rectified in very next comment and it is published.

    जिनकी दृष्टि में हों मंजिलें
    जिन्हें सफर से हो इश्क
    वे चलें हमारें साथ।

    दो टूक बेलाग अभिव्यक्ति! क्या बात !!

  3. इतनी दूर निकल आए हैं
    लौटा भी नहीं जा सकता
    पीछे छूट गए किनारे से
    नजदीक है
    आगे का किनारा

    पहुँच सकें या नहीं
    इसी पर चलना
    अब तो है आखिरी
    मकसद अपना।

  4. कामरेडों से सीधा और बेलाग संवाद करती ये पंक्तिया कोई उम्र और संघर्ष के ताप से ताया कवि ही लिख सकता है! कामरेड शिवराम तक हमारा सलाम भी पहुंचाईये…भोपाल के बाद मिलने का कोई संयोग बना ही नहीं…देखिये फिर कब मिलना होता है!

  5. साथी शिवराम का अचानक जाना वाकई आघात पहुंचाने वाली खबर है। बेहतर दुनिया का सिर्फ सपना ही नहीं देखने बल्कि उस सपने को जीने वाले शिवराम अपने संकल्‍पों, उम्‍मीदों से हमेशा इस दुर्गम समय में भी मशाल जलाए हुए और उसकी रोशनी फैलाते मिलते थे। उनकी कविताएं, नाटक, आलेख सबकुछ एक महान निधि है हम सबके लिए। उनका जाना उनके संघर्षों के करीबी साथियों के साथ-साथ पूरे आंदोलन की भारी क्षति है। साथी शिवराम की पंक्तियां दोहराते हुए उन्‍हें श्रद्धांजलि…
    रात इतनी भी नहीं है सियाह

    चंद्रमा की अनुपस्थिति के बावजूद
    और बावजूद आसमान साफ नहीं होने के
    रात इतनी भी नहीं है सियाह
    कि राह ही नहीं सूझे

    यहाँ-वहाँ आकाश में अभी भी
    टिमटिमाते हैं तारे
    और ध्रुव कभी डूबता नहीं है
    पुकार-पुकार कर कहता है
    बार बार
    उत्तर इधर है, राहगीर!
    उत्तर इधर है

    न राह मंजिल है
    न पड़ाव ठिकाने

    जब सुबह हो
    और सूरज प्रविष्ठ हो
    हमारे गोलार्ध में
    हमारे हाथों में हों
    लहराती मशालें

    हमारे कदम हों
    मंजिलों को नापते हुए

    हमारे तेजोदीप्त चेहरे करें
    सूर्य का अभिनन्दन।

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