कुछ आधुनिक सा पुरातन बनाम पेंसिल घिसाई

सामान्य

कुछ आधुनिक सा पुरातन
( a pencil sketch by ravi kumar, rawatabhata )

बहुत पुरानी बात है, अक्सर पुरानी ही बातों का जिक्र किया जाता है. पर यह इतनी पुरानी भी नहीं, समय के सापेक्ष इस घटना को आधुनिक सा ही कुछ कह सकते हैं, परंतु वास्तव में यह पुरातन सा ही कुछ है…. हमारी शादी हुई, जैसे कि सबकी ही हुआ करती है…..

शादी के बाद….. कुछ आधुनिक सा, कुछ पुरातन सा ही रहते हुए, शामिले-हयात के शिकवे-शिकायतों को अपने हुनर से लाज़वाब करने के लिए……

उसके जन्मदिन पर पहली और आख़िरी बार, एक उपहार सा कुछ देने का मन बनाया…..और पेंसिल की घिसाई कर बनाया हुआ हम दोनों का एक चित्र नमूदार हुआ….

आज यह हमारी साझी विरासत में शामिल है, एक कमरे में टंगा हुआ है…और याद दिलाता रहता है कि इस चित्र की रचना प्रक्रिया की तरह ही, जिसमें दो अलग-अलग चित्रों को मिला कर एक किया गया था….हमें इस प्रक्रिया में लगातार बने रहना है……

इसी की छायाछवि प्रस्तुत है…..

रवि कुमार, रावतभाटा

०००००

रवि कुमार

26 responses »

  1. अपनी माटी सम्पादक has left a new comment on your post “कथाप्रधान पत्रिका-‘कथाबिंब’”:

    नमस्ते आपकी और आपके ब्लॉग की चर्चा हमारे चर्चा मंच
    http://www.charchamanch.blogspot.com/
    पर कल सुबह प्रकाशित कर रहे हैं,जरुर पढ़ें ,सलाह सुझाव भी दीजिएगा.
    आपका माणिक –
    सम्पादक
    अपनी माटी
    17,Shivlok Colony,Sangam Marg,
    Chittorgarh-312001,Rajasthan
    Cell:-9460711896,9351278266(SMS),
    http://apnimaati.com

  2. पिंगबैक: चर्चा मंच:- 252 (अपनी माटी सम्पादक ) | www.blogprahari.com

  3. बहुत सुन्दर स्केच किया है आपने. इतना सुन्दर कि भ्रम होता है कि यह फोटो है. , बिलकुल सजीव. बोलता हुआ. बहुत कीमती उपहार दिया आपने. हर कोई चाह कर भी ऐसा उपहार नहीं दे सकता।

    मेरी ओर से बधाई स्वीकार करें।

  4. पिंगबैक: इन दिनों चर्चा में -1 « अपनी माटी

  5. बहुत सुंदर बन पड़ा है यह चित्र। पर अनीता जितनी प्रफुल्लित हैं इसमें आप उतने ही अचंभित क्‍यों है। शायद अनीता जी को पाकर। चलिए जब दो सितारों का मिलना होता है तो ऐसा ही होता है। शुभकामनाएं।

  6. वाह भाई साहब! चित्रकार तो आप पुराने हैं लेकिन बालों का स्टाइल ( कोई हिन्दी शब्द सूझ ही नहीं रहा ) पहले भी वही था। बढ़िया…हम तो कला से दूर रहने वाले आदमी ठहरे लेकिन उपहार…खासकर इस उपहार को समझने के लिए जो दिमाग-दिल-बुद्धि-विवेक-मन चाहिए पता नहीं शामिले-हयात के पास था या नहीं…शिकायत नहीं कर रहा…बस यह बताना है कि…वैसे आप जानते ही हैं…कि ऐसे उपहार कम लोग पसन्द करेंगे…क्योंकि उपहार तो अब फ़रमाइश हैं न?

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