हिंदुस्तान जैसे देश में – मुक्तिबोध उवाच

सामान्य
हिंदुस्तान जैसे देश में….
( मुक्तिबोध उवाच…..)

”हिंदुस्तान जैसे देश में—जहां अनन्य भूमि है, रत्नगर्भा धरित्री है, उर्वर वसुंधरा है, निरभ्र आकाश है, भव्य गंभीर मेघराज हैं, और उत्तरस्त हिमालय नगाधिराज है, विद्युत-शक्ति, जल-शक्ति, भूमि-शक्ति है —-उस देश में अगर नौजवान की छाती की हड्डियां निकल आयें, चप्पल की कीलें पैर में लगातार छेद कर रही हों, चेहरे के बाल बढ़े हुए हों, और अगर वह एक पैसे की दो बीड़ी पीता हुआ किसी लड़की के मुखड़े को देख सिनेमा का एकाध फ़ोश गाना गुनगुना उठता हो, तो उसके दिल की कभी भभकती तो कभी फफकती हुई तमन्नाओं के ज्वार को देख कर हमें गुस्सा नहीं आता। उस पर गुस्सा करने वालों पर गुस्सा आता है।

बल्कि उन शक्तियों की कमर तोड़ने की इच्छा होती है, उन काली ताकतों को हमेशा के लिए ज़मीन में गाड़ देने के लिए भुजा उठ जाती है, जिन्होंने मनुष्यता के रत्नों, इन नौजवानों को इस तरह पीस डाला है।

………”जो समाज और जो राज्य नौजवानों को सतत उन्नतिशील पेशा नहीं दे सकता, वह राज्य और वह समाज टिक नहीं सकता। इतिहास के विशाल हाथ इस वक्त उसकी कब्र खोदने के लिए बड़ा भारी गड्ढा तैयार कर रहे हैं।”

– गजानन माधव मुक्तिबोध
(‘नया खून’, १९५२ में प्रकाशित और स्व.नेमिचंद जैन द्वारा संपादित ‘मुक्तिबोध रचनावली, खंड ६ में संकलित, पृष्ठ ;३६) 

12 responses »

  1. इतिहास के हाथ असमर्थ हो चले हैं । अग्नि अक्षर कागज पर नहीं उतरेंगे। प्रशीतित वायुमंडल के शीतल झँकोरों के कारण मन शांत बना रहता है।
    कुछ है जिसे होना चाहिए लेकिन हो नहीं रहा। उसके घटने की कोई आशा भी नहीं दिखती। मैं सचमुच निराश हूँ।

  2. इस लेख को कोर्स में पढ़ा था…आप देखिये प्रांजल हिंदी में कविता लिखने वाले मुक्तिबोध की यहां भाषा कितनी सहज है…क्यूंकि वह जानते हैं कि इसका पाठक कौन है और उसी की भाषा में उसे समझा रहे हैं…यह होती है लेखक की सही जनपक्षधरता और समझ…कि उसे पता है कि वह किसे संबोधित है

  3. सही कहा वाणीगीत ने। जब दशकों बाद भी किसी देश में कुछ प्रासंगिक बना रहे और खासकर वह आक्रोश की अभिव्यक्ति हो तब तो बड़े शर्म की बात है कि आज तक वह प्रासंगिक है…

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