पूर्ण सहमति तो एक अपवाद पद है

सामान्य

( ‘इतिहास बोध’ में छपी ईश्वरचंद्र पाण्डे की यह महत्वपूर्ण कविता यहां प्रस्तुत की जा रही है। देखिए किस नायाब तरीके से उन्होंने अपनी निराली दृष्टि को अभिव्यक्त किया है। आज के समय की अपेक्षा को बख़ूबी शब्द दिये हैं….यह अभी जनपक्ष में भी दी गई थी, यहां पुनः प्रस्तुत की जा रही है ताकि यहां के पाठक भी इससे महरूम ना रहें….)


असहमति

चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

अगर कहूंगा शून्य
तो ढूंढ़ने लग जाएंगे बहुत से लोग बहुत कुछ
इसलिए कहता हूं    खालीपन

जैसे     बामियान में बुद्ध प्रतिमा टूटने के बाद का
जैसे     अयोध्या में मस्जिद ढ़हने के बाद का

ढहा-तोड़ दिए गये दोनों
ये मेरे    सामने-सामने की बात है

मेरे सामने बने नहीं थे ये
किसी के सामने बने होंगे

मैं बनाने का मंज़र नहीं देख पाया
वह ढहाने का

इन्हें तोड़ने में कुछ ही घंटे लगे
बनाने में महिनों लगे होंगे    या फिर वर्षों
पर इन्हें बचाए रखा गया सदियों-सदियों तक

लोग जानते हैं इन्हें तोड़ने वालों को नाम से जो गिनती में थे
लोग जानते हैं इन्हें बनाने वालों के नाम से जो कुछ ही थे
पर इन्हें बचाए रखने वालों को नाम से कोई नहीं जानता
असंख्य-असंख्य थे जो

पूर्ण सहमति तो एक अपवाद पद है
असहमति के आदर के सिवा
भला कौन बचा सकता है किसी को
इतने लंबे समय तक

०००००

हरीशचन्द्र पाण्डे
प्रस्तुति – रवि कुमार

12 responses »

  1. इन्हें तोड़ने में कुछ ही घंटे लगे
    बनाने में महिनों लगे होंगे या फिर वर्षों

    सहमति और असहमति के बीच बहुत कुछ घटित हो जाता है.
    सुन्दर … बहुत सुन्दर

  2. बेहद उम्हा….
    शानदार….
    क्या बात है…..
    और हां इसके निहितार्थ के साथ ये कविता अपने भाई नीशू को समर्पित करता हूं….उम्मीद है वे इसे समझ पाएंगे…मैं उनकी असहमति का आदर करता हूं…और वे मेरी का शायद कर पाएंगे…..

    • jab khood se aadmi sangharsh kar raha hota hai to is baat se koi fark nahi padta ki uskey aas pass kya ho raha hai masjid ho ya buddha uskey samney hota hai shirf or shirf ek sach kaise bhee apny apko zinda rakhna hai isee liy vah vinash k saath bhee khada hota hai or nirman k sath bhee.

      • आपकी बात महत्वपूर्ण है…और विश्लेषण मांगती है…

        आखिर ऐसी क्या वज़हें हैं…?
        जिनके कारण कि अधिकतर आदमियों के लिए ज़िंदा रहने का सवाल…
        बाकी सवालों को पृष्ठभूमि में कर देता है…
        और उसे सिर्फ़ साथ खड़ा होने को मजबूर कर देता है….?
        निर्माण हो या विनाश…?
        ये च्वाइश उनके हाथ में क्यों नही है….?
        ये किन शक्तियों के हाथ में है…?

  3. ‘लोग जानते हैं इन्हें तोड़ने वालों को नाम से जो गिनती में थे
    लोग जानते हैं इन्हें बनाने वालों के नाम से जो कुछ ही थे
    पर इन्हें बचाए रखने वालों को नाम से कोई नहीं जानता
    असंख्य-असंख्य थे जो’

    –बचाने वालों की बात तो सचमुच गजब की है।

    असहमति-आलोचना ने ही बेहतर बनाया है संसार को या बना सकते हैं।

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