ईश्वर एक बड़ी सुविधा है – हरीशचन्द्र पाण्डे की कविताएं

सामान्य

अभी ‘इतिहास बोध’ में हरिशचन्द्र पाण्ड़े की कविताओं से गुजरना हुआ। छोटे कलेवर की तीन बेहतरीन कविताओं को यहां साभार प्रस्तुत कर रहा हूं। शायद पसंद आएं।

ईश्वर एक बड़ी सुविधा है

चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

देवता

पहला पत्थर
आदमी की उदरपूर्ति में उठा

दूसरा पत्थर
आदमी द्वारा आदमी के लिए उठा

तीसरे पत्थर ने उठने से इंकार कर दिया
आदमी ने उसे देवता बना दिया

ईश्वर

उसकी आंखे बंद समझ
डंडी मार लो
बलात्कार कर लो
या गला रेत दो आदमी का
ईश्वर एक बड़ी सुविधा है

विचार

तुमने दिया एक विचार
और उसे फूलों से लाद दिया

तुमने अगरबत्ती दिखाई उसे
उसकी रक्षा के लिए कवच बनाए
उसके संकेत के लिए
लंबी पताका फहराई शीर्ष पर

उसकी पावनता की अक्षुण्णता के लिए
तुमने
ईंट-गारे से लेकर संगमरमर तक के आलय बनाए

उसकी आराधना में फूल चढ़े थे सबसे पहले
फिर जानवर चढ़े
और फिर आदमी ही आदमी

एक से अनेक तो हुए
मगर मूर्त न हुए विचार

मूर्ति हो गए

०००००

हरीशचन्द्र पाण्ड़े

प्रस्तुति – रवि कुमार

13 responses »

  1. एक से अनेक तो हुए
    मगर मूर्त न हुए विचार

    मूर्ति हो गए
    ****
    तीसरे पत्थर ने उठने से इंकार कर दिया
    आदमी ने उसे देवता बना दिया

    और इस तीसरे पत्थर ने न जाने कितनों को उठा दिया.
    और यह तीसरा पत्थर सिर्फ पत्थर न रहा, अनगिन को पथरा दिया.
    और यह तीसरा पत्थर उदर को भी नकार दिया आदमियत क्या है
    शानदार रचना, चौथा पत्थर यह रचना मील का पत्थर

  2. उसकी आंखे बंद समझ
    डंडी मार लो
    बलात्कार कर लो
    या गला रेत दो आदमी का
    ईश्वर एक बड़ी सुविधा है

    बहुत खूब! तीनों कवितायें सुन्दर हैं, विचारणीय भी.
    उसके अस्तित्व को नकारकर तो इससे भी बड़े-बड़े अपराध होते रहे हैं – आस्तिकों पर भी और नास्तिकों पर भी. धर्मविरोधी सत्ता भी कोई कम खतरनाक नहीं होती होती.

    • मालूम है ऐसे वाक्यों से पाला पड़ता है। सबसे पहले कुछ महान लोग ऐसे ही शुरू होते हैं कि बात तो ठीक है लेकिन नास्तिक भी ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं। इन महान लोगों से बचना चाहिए। बड़े खतरनाक किस्म के होते हैं ऐसे प्रशंसक।

  3. तीसरे पत्थर ने उठने से इंकार कर दिया
    आदमी ने उसे देवता बना दिया….
    Aah…shabdon ki mujhpe itni meherbani nahi..aapki rachnaon ki sanjeedgi maun kar deti hai..

  4. इंसान ने भगवान् को सच में बस एक सुविधा और सहूलियत बना लिया है. सब कहते हैं: ‘गंगा जी की एक डुबकी में सब पाप धुल जाते हैं’.

  5. आध्यात्मिक प्रबृत्ति है सो इतनी अंतर्मन तक उतरने वाली कवितायें न पढ़ी . ऐसी कवितायें पढ़ाने के लिए आभार . इन कविताओं पर चित्रित रेखा-चित्र लाज़वाब . फिर फिर फिर बधाई .
    [] राकेश ‘सोहम’

  6. तीनो कविताए लाजवाब है . मात्र 3-4 लाईन मे पान्डे जी ने इतना कह दिया जितना शायद 100 पन्नो मे भी कोई ना कह पाये .तीसरे पत्थर के बाद शायद भारत मे तो हर पत्थर ने ही उठने से इन्कार कर दिया .यही पाषाण मोह आज तक हमारा पीछा नही छोड रहा है .

    विजय सिंह मीणा , सहायक निदेशक (राजभाषा) , नागर विमानन सुरक्षा ब्युरो , जनपथ भवन नई दिल्ली 01
    मोबाईल 09968814674

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