हम कवि और हमारी कविताएं – रवि कुमार

सामान्य

हम कवि और हमारी कविताएं
( a poem by ravi kumar, rawatabhata )

कलाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

हम सभी संवेदनशील हैं
विचारशील भी
हमारा सौन्दर्यबोध
हर कुरूपता पर हमें द्रवित करता है

हमारे पास शब्द हैं
और कहने की बाजीगरी भी
हम लिख लेते हैं कविता

पर हमारी बदनसीबी
हमारा समय क्रांतिकारी नहीं है
यह इस नपुंसक दौर की
नियति ही है शायद
कि हमारी कविताएं
परिवर्तन का औजार बनने की बजाए
श्रेष्ठता बोध की तुष्टि का
जरिया बनकर उभरती हैं

पूंजी को चुनौती देती
हमारी कविताएं
धीरे-धीरे तब्दील होती जाती हैं
हमारी सबसे बड़ी पूंजी में

व्यवस्था के ख़िलाफ़ लिखी
अपनी इन्हीं कविताओं के जरिए
हम इसी व्यवस्था में
बनाना चाहते हैं अपना मुकाम

किसी प्रकाशक
या मूर्धन्य आलोचक की कृपा-दृष्टि
को टटोलते हम
श्रेष्ठ कवियों की गिनती में
शामिल हो जाना चाहते हैं

०००००
रवि कुमार

23 responses »

  1. पूंजी को चुनौती देती
    हमारी कविताएं
    धीरे-धीरे तब्दील होती जाती हैं
    हमारी सबसे बड़ी पूंजी में
    शायद यही सच है, क्योकि अब तो पूँजीवाद के खिलाफ लिखकर किसी पूँजीवादी के संरक्षण में चले जाने की परम्परा का अनुसरण हो रहा है. खुद को कविता में तब्दील कर देने के बजाय खुद कविता को अपने अनुरूप ढालने की विवशता है शायद. धार का सृजन धारदार ही कर पाता है.
    चिंता जायज है

  2. व्यंग्यात्मक शैली में बहुत जरुरी बात कही है रवि भैया,आपकी कवितायें तो मुझे वाकई आज के दौर में घट रही बेतुकी हरकतों पर करारा प्रहार प्रतीत होती है. आपकी कवितायें भले ही आपको एक अच्छे स्थान पर लेजाए मगर एक बात साफ़ है कि कवितायें साथ साथ ही अपना काम करती है.वे अपनी धार से वक्त-बेवक्त उद्धेश्य को पूरा करती है.यात्रा जारी रखें . बहुत कम ही लोग है जो ब्लॉग्गिंग को ऑरकुट सा नहीं समझते हुए सार्थक लेखन कर रहे हैं.आजकल मैं टिप्पणियाँ लम्बी और कम ही करता हूँ. बेबाकी से राय प्रकट करता हूँ और अपने लेखन पर सटीक राय मुझे मिले ,यही पसंद है. खैर,अब ख़त्म करता हूँ.
    सादर,

    माणिक
    आकाशवाणी ,स्पिक मैके और अध्यापन से जुड़ाव
    अपनी माटी
    माणिकनामा

  3. ‘पूंजी को चुनौती देती
    हमारी कविताएं
    धीरे-धीरे तब्दील होती जाती हैं
    हमारी सबसे बड़ी पूंजी में’
    ——- बहुत तीखे सच को लिखा है आपने !!!

  4. बहुत सही बात कही है आपने. जो कविता उद्वेलित नहीं करती वो कैसी कविता ? यहाँ मैं फिर अशोक जी द्वारा उद्धृत की गयी किसी की पंक्तियाँ दोहराना चाहूँगी कि आदमी होना कविता करने की पहली शर्त है.
    http://feministpoems.blogspot.com/2010/05/blog-post.html

  5. kya baat… bahut hi karaari chot..

    पूंजी को चुनौती देती
    हमारी कविताएं
    धीरे-धीरे तब्दील होती जाती हैं
    हमारी सबसे बड़ी पूंजी में

    व्यवस्था के ख़िलाफ़ लिखी
    अपनी इन्हीं कविताओं के जरिए
    हम इसी व्यवस्था में
    बनाना चाहते हैं अपना मुकाम

  6. .
    .
    .
    यह इस नपुंसक दौर की
    नियति ही है शायद
    कि हमारी कविताएं
    परिवर्तन का औजार बनने की बजाए
    श्रेष्ठता बोध की तुष्टि का
    जरिया बनकर उभरती हैं

    “जो रचना इस दुनिया को परिवर्तित करने में बिलकुल योगदान नहीं करती उस का कोई मूल्य नहीं।”

    जो कहना चाहता था वह आदरणीय द्विवेदी जी पहले ही कह चुके हैं।

    आभार!

  7. व्यवस्था के ख़िलाफ़ लिखी
    अपनी इन्हीं कविताओं के जरिए
    हम इसी व्यवस्था में
    बनाना चाहते हैं अपना मुकाम…
    virodhabhason se bhari duniya ki behrtreen rachna

  8. इस कविता के माध्यम से आपने बहुत कुछ कह दिया, हमें भी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया है. ये विडंबना ही है की आज के समय में कविता सौंदर्यबोध के एक पर्याय से अधिक कुछ नहीं, खैर.

  9. किसी प्रकाशक
    या मूर्धन्य आलोचक की कृपा-दृष्टि
    को टटोलते हम
    श्रेष्ठ कवियों की गिनती में
    शामिल हो जाना चाहते हैं

    सच लिखना कभी कभी कितना आसान भी होता है ना …….

    सत्या

  10. जैन साहेब, इमोशनल वीकनेस की जो बात आपने उठाई है, वह किस सन्दर्भ में है ? आपकी नज़र में, कवि का पूंजी के खिलाफ लिखते-लिखते कुछ ग्राहक, जो पूंजीवाद से नफरत करते हैं, बना लेना शायद इमोशनल वीकनेस नहीं होता, साईँटीफिक है ? रवि जी कवि हैं, एक सचेत कवि, जिन्हें कविता अन्दर से नहीं सूझती, बल्कि बाहर के पीड़ादायक तथ्य उनकी विषय-सामग्री होते हैं. वे केवल इमोशनल कवि तो हरगिज नहीं हैं. प्रतिबद्धता और अंधभक्ति में फर्क तो वे कर ही लेते हैं. एक अलग किस्सा हो सकता है कि उनकी प्रतिबद्धता कुछ लोगों की आँखों में किरकिरी की तरह चुभती हो .

    जहां तक औजारों का संबंध है, तो पूंजीवाद बहुत से बुद्धिजीवियों को मोटी पगार देकर व्यवस्था में फिट कर ही लेता है ताकि वे अपने भाईयों ‘सर्वहारा’ की पीठ में छुरा घोंप सके. लेकिन एक ऐसा समय भी आ जाता है जब पूंजीवाद द्वारा बुद्धिजीविओं को एडजस्ट करने की क्षमता निशेष हो जाती है. कहीं आपका डर इस अवस्था से तो नहीं उपजा ? जरा हमें भी बताये क्योंकि बताने से ही दुःख हल्का होता है.

  11. वो बशीर बद्र ने बहुत पहले लिखा था
    “दास्तान हो गई रकम बाबा”

    आज इसे देखकर ध्यान आया कि

    “पूंजी को चुनौती देती
    हमारी कविताएं
    धीरे-धीरे तब्दील होती जाती हैं
    हमारी सबसे बड़ी पूंजी में”

    फिर भी “पूंजी”शब्द का धड़ाधड प्रयोग जिस सन्दर्भ में किया जाता रहा है..वह पूंजी को हमेशा एक ही दृष्टिकोण में निरुपित करती है…पूंजी भी धन की एक स्थिति में जाकर पूंजी कहलाती है… हालांकि पूंजी सन्दर्भ यहाँ सही प्रयोग किया गया..लेखन उत्पादन साधन हो चला है…

    रचना ठीक लगी, नहीं लगी .. इसकी विवेचना सिर्फ कभी कभी कथ्य,बोध या अभिव्यक्ति से ही नहीं स्पष्ट की जा सकती…हालांकि सरोकार ज़रूर है रचना का….

    Nishant
    http://www.taaham.blogspot.com

  12. समय को नपुंसक कहना गलत तो नहीं सही तो कभी नहीं। यह समय हमने ही बनाया है। और कविताएँ बरबाद हो रही हैं जैसे अबलाएँ। हालत खतरनाक है। समाधान की तलाश है।

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