शुभशक्ति – आयशा खातून की बाँग्ला लघुकथा

सामान्य

यहां-वहां जो अच्छा लगा…
( अभी नया आए ‘वागर्थ’ के अंक-१७७ में प्रकाशित आयशा खातून की बाँग्ला लघुकथा ‘शुभशक्ति’ जिसका कि हिंदी रूपांतर – सुशील क्रांति ने किया है. पर नज़र अटकी. पता नहीं क्यूं अच्छी लगी. लगा इसे यहां पेश किया जाना चाहिए…)

अज्ञात चित्रकार

( इस चित्र के चित्रकार का नाम नहीं मालूम…साभार)

शुभशक्ति

नवमी की रात दरअसल रात होती ही नहीं। चौबीस घंटे कैसे गुजर जाते हैं पता ही नहीं चलता। एक पंडाल से दूसरे पंडाल तक ही नहीं, कलकत्ते के राजपथों से लेकर गलियों तक ठुँसी हुई भीड़ के साथ सब जागते रहते हैं। दूर-दूर तक बस रंग-बिरंगी पोशाकें और लोगों के मुण्ड ही मुण्ड दिखते हैं। देखने से ऐसा लगता है जैसे नक्षत्रों से भरा आकाश। जहाँ तक नज़र जाए बस धुआँ और उसमें से झाँकता हुआ रूपहला चाँद सुन्दरी बुढ़िया का ललाट सा प्रतीत होता है।

पण्डालों में त्रिनारी ( दुर्गा – लक्ष्मी – सरस्वती ) का दर्शन और बाहर सैकड़ों सुसज्जित रमणियों का उन्मुक्त दर्शन करवाकर ड्रेस डिजाइनर अपनी सार्थकता का अनुभव करते हैं। स्त्रियाँ, जिन्हें केन्द्रित करके इन चार दिनों में कई-कई सौ करोड़ रुपये राख कर दिए जाते हैं उसी नारी के सम्बन्ध में स्नातकोत्तर के छात्र-छात्राएँ अध्ययन के दौरान जान लेते हैं कि वह अपने सौतिया डाह में किस प्रकार जला करती थी। वही नारी आज इतनी क्षमताशील कैसे हो गई कि एक हाथ में त्रिशूल लेकर असुर के पत्थर के मानिन्द सीने को बेध डालती है तो दूसरे हाथ से उसके घने और उलझे हुए केश को मुट्ठी में जकड़ लेती है। किसके केश है ये – इतने उलझे हुए – जिनमें कंघा तक नहीं चल सकता? हत्या क्यों? आखिर असुर ने मांगा क्या था? कुछ नहीं, बस अपना हक माँगा था। अपनी मेहनत का फल। हक़ माँगो तो मौत! तब के जमाने में भी ऐसा ही होता था?

प्रगतिशील विचारधारा के पिता ने अपनी छोटी बच्ची को समझाने की कोशिश की। मैंने पढ़ा है कि अशुभ शक्ति अगर पाशविक शक्ति की हत्या न करे तो सब कुछ धूल में मिल जाएगा। सो तो सही है – मगर सोच कर देखो तो बेटी कि अगर इस व्यक्ति को अशुभ शक्ति का प्रतीक मानें तो यह किसे सांकेतिक करता है? लड़की थोड़ी देर ख़ामोशी से पिता की ओर देखती है, फिर कहती है – पिताजी, असुर से यहां मतलब आदिवासी से तो नहीं है? पिता ने कहा – चलो बेटी, घर चलते हैं, बहुत रात हो गई।

आयशा खातून
मंगलम, प्रथम तल, ३६-३७/३ बोटानिकल गार्ड़न रोड़, हावड़ा -७१११०३

०००००

प्रस्तुति – रवि कुमार

15 responses »

  1. असुर से यहां मतलब आदिवासी से तो नहीं है? पिता ने कहा – चलो बेटी, घर चलते हैं, बहुत रात हो गई।
    हक मांगने वाला —-
    असुर
    अंतिम पंक्ति ने तो हिला दिया.

  2. हिन्दू मिथकों का सौन्दर्य है कि विधर्मियों को भी नई दृष्टि प्रदान करते हैं। इस समाज की सहिष्णुता है कि भड़कते नहीं, उससे भी सार ग्रहण करते हैं। ‘मेहनत का फल’ और ‘आदिवासी’ निरूपण से मैं सहमत नहीं हूँ। लगता है देवी पाठ फिर करना पड़ेगा 🙂
    खातून जी के मजहब की महानता है कि न तो उन्हें उस परम्परा में नारी विमर्श सूझेंगे और न ही कर्बला और रमजान के महीने से कोई नई दृष्टि या निरूपण ही मिलेंगे।

    • ओहो…गिरिजेश जी,
      मुआफ़ कीजिएगा…पता ही नहीं…हमारी यह सहिष्णुता किस श्रेणी में रखी जाएगी…
      हमारा ध्यान…खातून जी के नाम और मज़हब पर गया ही नहीं…

      हम तो उसमें सौन्दर्य…और आदिवासी विमर्श ही सूंघ पाए…

      आपकी सूक्ष्म सहिष्णु दृष्टि का भी कायल हो जाने को जी चाहता है…

  3. बहुत अच्छी लगी कहानी…एक मिथक को नये दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हुयी…बच्चों के अटपटे प्रश्नों पर किस तरह उन्हें चुप करा दिया जाता है…? बचपन में ही तर्क को कुचलकर आस्था की घुट्टी पिला दी जाती है.
    अगर हम सहिष्णु होने का दावा करते हैं तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिये कि कहानी किस धर्मानुयायी ने लिखी है, अगर वह आपके तर्क को सन्तुष्ट करती है तो ठीक, अगर आपकी आस्था पर चोट करती है तो नहीं ठीक…यही तो सहिष्णुता है.

  4. लेखक के विचार स्वातन्रय और स्वच्छंन्दता की अभिरक्छा के नजरिये से भले ही आयशा खातून की कहानी को सराहा जा सकता है लेकिन हिन्दु -सहिष्णुता को आधार बनाकर उनके धार्मिक कथानकों पर आलोचनात्मक विचार प्रकट करके हिन्दु जन भावनाओं को ठेस पहुंचाना मुझे तो उचित नहीं लगता।

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