सोसायटी की सुरक्षा खतरे में है – रवि कुमार

सामान्य

सोसायटी की सुरक्षा कितनी खतरे में है
( यह कविता तो शायद कतई नहीं है )

रवि कुमार, रावतभाटा

सब बढिया चल रहा है

रसोई ठीक है
संतुलित आहार प्रदान का कल्पवृक्ष
पत्नी लगभग खुश है
गहनों और साड़ियों के नये चलन
आनंद के वायस बनकर उभरते हैं
आपसी समझदारी की ज़िंदा मिसाल

ठंड़ में गर्म और गर्मी में ठंड़ के इंतज़ाम हैं
पसीने की चिपचिप
कभी-कभी की बात रह गई है
हर तरह की मुद्रा के लिए
एक अदद कुर्सी का इंतज़ाम है

कुछ किताबें भी हैं
लिखने के लिए सफ़ेद झक कागज़
मूड़ बनाने के लिए बहुत कुछ
कई रिश्तेदार विदेशों में हैं
हमारी भी पहुंच हो ही रही है

बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में हैं
कई ट्यूशनें और कोचिंगें हैं
ढेर सारी प्रतियोगिताएं और अवसर हैं
वे माथा भी नहीं खाते
अगर समय निकल भी आता है उनके पास
टीवी है, ड़ीवीड़ी है
कार्टून्स है, हॉलीवुड़ है
फ़ैशन के नये चलन और मल्टीप्लेक्स मॉल है

हमारे पास ऑफ़िस है
व्हाइट कॉलर जॉब है
दमकते-महकते साथी हैं
( श्शsss……कई हसीन लड़कियां भी हैं,
इनका फ़िगर कभी-कभी पत्नी से उबकाई…छोडिए..
ये अंदर की बात है….
चर्चा तो सिर्फ़ बाहरी बातों की ही होती हैं ना…)

भविष्य सुरक्षित है
कई बीमा पॉलिसियां हैं
ढ़ेरों बचत योजनाओं में निवेश
सेंसेक्स है, शेयर्स हैं
बैंक हैं, लोन हैं
कई प्लॉट्स हैं, फ़्लैट्स हैं
मदद के लिए ज्योतिष विज्ञान है
अंगूठियां हैं, रत्न हैं
नवरात्राएं हैं, व्रत-पूजाएं हैं

कभी-कभी की ग्लानि के लिए
मानसिकता पर आने वाली उबकाइयों के लिए
सुनहरा अतीत है
गर्व करने के लिए धर्म है
हमारी महान संस्कृति और परंपराएं हैं
आदर्श धार्मिक आख्यान हैं
मंदिर हैं, भगवान हैं
उनकी कृपा बनी हुई है

सब कुछ बढिया चल रहा है

एकाध कष्ट हो जाते हैं कभी-कभी
सेंसेक्स ऊपर नीचे होने लगता है
सारा निवेश खतरे में लगने लगता है
ऊपर बताए दंद-फ़ंदों में
हमेशा जान सी उलझी रहती है
जरा सी इधर-उधर की सूचना
कितनी समस्याएं पैदा कर देती है
ये टेक्स बचाने की तिकड़में
संपत्ति छिपाने के जुगाड़
पत्नी की आंखों में दिखती व्यर्थता
बच्चों की त्यौरियां
बॉस से अनबन
साथियों से मनमुटाव

उस पर यह व्यवस्था
कहीं कुछ ठीक नहीं रहता
घर और ऑफ़िस से बाहर ऐसा लगता है
नर्क में रह रहे हैं
तरह-तरह के गंदे लोग
गंदगी, अव्यवस्था
बगैरा-बगैरा

कभी लगता है मज़े हैं
कभी लगता है तकलीफ़े हैं

और ज़िंदगी की ऐसी भारी उथल-पुथलों के बीच
ये खबरें भी ना
ये कुछ लोग भी ना

पता नहीं क्या तकलीफ़ हैं इन्हें
कोई हड़ताल करने लगता है
कोई बेवज़ह आंदोलन करने लगता है
कितना नुकसान करते हैं ये लोग

कोई हमारे धर्म के पीछे पड़ा है
कोई हमारी संस्कृति के
कोई चोरी करता है
कोई लूटपाट
कोई आतंकवादी बन जाएगा
कोई नक्सली

कितना ड़र-ड़र जाते हैं हम लोग
पत्नी को रात-रात नींद नहीं आती
बच्चे अजीब-अजीब से सवाल पूछने लगते हैं

ये साले नेता भी कुछ काम के नहीं हैं
कितना समय लगता है वरना
इन सबको को तो तुरंत मार देना चाहिए
जड़ से ही उखाड़ फैंकना चाहिए

देश का विकास नहीं होने देंगे ये लोग

इन सालों के पास कोई और काम नहीं है क्या
कल-परसों ही हमारे चौकीदार को मार दिया किसी ने
बेचारा गरीब आदमी था

सोसायटी की सुरक्षा कितनी खतरे में है

०००००
रवि कुमार

18 responses »

  1. रवि दादा क्या गज़ब लिखते हो. सच्चे महिल की सच्ची तस्वीर कर डाली है.समाज की असल कहानी कहती कविता दिल को भा गयी. भाई टिप्पणी करके को पहली बार दिल कर रहा है की जी भर कर लिखू यही पर. फिर आप कहोगे कविता पे लेख लिखा डाला
    APNI MAATI
    MANIKNAAMAA

  2. कल ही पढ़ी थी आपकी कविता रात में, पर टिप्पणी नहीं कर पाई. कभी-कभी टिप्पणी करना बेमानी लगता है.
    और…कविता क्या प्रेम और सौन्दर्य से ही उपजती है…छटपटाहट से नहीं ?…अभी जनपक्ष ब्लॉग पर पढ़ा था कि कविता कहने की पहली शर्त आदमी होना है.

  3. रवि जी आप जगाते भी हैँ और डराते भी हैँ. कल ही अप्नी सारी पौलिसी चेक कर्नी पडेगी .
    क़िस्सा कोताह…………… बहुत उम्दा रचना. और हाँ…. ये कविता ही है

  4. शिल्‍प के बारे में तो अपना ज्ञान ज़ीरो बटा सिफर है…लेकिन कथ्‍य में बेचैनी है और दम है, इतना दमखम के साथ कह सकता हूं….।
    वैसे, लगती तो मुझे यह कविता ही है…. 🙂

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s