फिर भी हिस्से आएँ हमारे सिसकियाँ – शिवराम

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फिर भी हिस्से आएँ हमारे सिसकियाँ – शिवराम
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata)

शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

इस बार का कविता-पोस्टर है, शिवराम की ऐसी ही कविता पंक्तियों का.

बडे़ आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें……

०००००

रवि कुमार

16 responses »

  1. पहली 6 पंक्तियाँ गीत सी हैं। आत्मसम्मान और उदात्तता से भरपूर्। सातवीं पंक्ति असुविधाजनक यथार्थ लाती है तो आठवीं की तुक और छिपे भाव जैसे उपर की सारी 6 पंक्तियों को यथार्थ की आँच से यूँ सटाते हैं कि सारा आत्मसम्मान और उदात्तता बेहूदे मजाक से लगने लगते हैं।
    एक ही कविता में यूँ समेटना एक उपलब्धि है।

  2. कविता अद्भुत है…कुछ शब्दों में बहुत कुछ अभिव्यक्त करती. कविता पोस्टर बहुत सुन्दर है. धुँए के धुँधलके के बहाने बहते आँसू…!

  3. पेंटिंग अर्थगर्भा है । प्रकाश और प्रतिच्छाया का तूलिकाकरण गहन दृष्टि का परिचायक है।

    शिवराम की कविता को एक नई ऊंचाई और अर्थ प्रदान किया है चित्र ने। चूंकि कविता के साथ है इसलिए पोस्टर..वर्ना स्वतंत्र चित्र भी अस्तित्ववान है।

    आपका इंट्रो भी असरदार है और आत्मचिन्तन के आरोहअवरोह को सरगम में बदलता है।

    शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह है कि इन शब्दों ने हमारे सोचने के तरीके पर कुठाराघात किया है, हमें हमारी सीमाएं बताई हैं, और हमारी छाती पर चढ़ कर कहा है, देखो ऐसे भी सोचा जा सकता है, ऐसे भी सोचा जाना चाहिए.
    जाहिर है कविता इस तरह हमारी चेतना के स्तर के परिष्कार का वाइस बनती है.

  4. bhai ravi ji,
    badi jordar hasti hain aap.ye vichar banaya aapke blog ki khoobsoorti ne.aap ke rachnakaram ne sakh bhari.aankhon ko bada sakoon mila or dil ko mili rahat.badhai!
    bhai shivram ki kavita ho natak;mujhe hamesha hi prabhavit karte hain.yahan unhen padh kar achha laga.
    shandar sckeches ke liye sadhuwad!

  5. एक तो कविता भी बहुत असरदार ऊपर से आपके पोस्टर ने धार दी है जो सीधे अन्दर तक मार करती है . यदि बुरा ना मेने तो पूछ सकता हूँ ? आप पोस्टर किससे बनाते हैं ? जैसे वाटर कलर, आइल पेंट या कंप्यूटर से ?

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