हुसैन की पेंटिंग भारतमाता और अदालत का फ़ैसला

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हुसैन की पेंटिंग भारतमाता और अदालत का फ़ैसला

हाल ही में कतर की नागरिकता के मद्देनज़र हुसैन पर और हुसैन के बहाने काफ़ी कुछ लिखा गया है। कलाक्षेत्र से जुडे होने के नाते मैं भी इसके कई पहलुओं में अपनी दिलचस्पी रखता हूं।
फिलहाल इस पर अपना अभिमत रखने से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह लग रहा है कि हुसैन से ही संबंधित एक मामले को यहां पेश किया जा सके।

हुसैन के खिलाफ़ अश्लीलता और अपमान के आरोपों वाली तीन याचिकाओं ( ११४/२००७, २८०/२००७ और २८२/२००७) जिनमें कि बहुउल्लेखित और चर्चित भारतमाता वाले चित्र वाली याचिका भी शामिल है, पर दिल्ली हाईकोर्ट ने ८ मई २००८ को फ़ैसला सुनाते हुए, खारिज कर दिया था। इस फ़ैसले में  न सिर्फ़ कला पर वरन और भी कई मानसिकताओं पर पुरजोर टिप्पणियां की गई हैं

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय किशन कौल द्वारा, कला की गहराईयों, कलाकार के नज़रिये, अन्य देशों के कानूनों और न्यायिक मतों, भारत में ही पूर्व मामलों, कलात्मक स्वतंत्रता और अश्लीलता, सामयिक मापदंडों, सौन्दर्यबोध अथवा कलात्मक प्रवृति, साहित्यकारों/कलाविदों की राय, अभिव्यक्ति की आज़ादी, आम आदमी की कसौटी, सामाजिक उद्देश्य या मुनाफ़ा, और दायित्वों की कड़ी कसौटी के मापदंड़ों पर इस मामले को कसते हुए, दिये इस फ़ैसले के कुछ उद्धरणों और चित्र की व्याख्याओं को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इससे हो सकता है कि हमारे दृष्टिकोण और नज़रिए को एक अलहदा आयाम मिल सके

इस फ़ैसले की मानक मूल अंग्रेजी प्रति को यहां देखा जा सकता है। उदभावना के अंक ८५ में छपे इसके श्री सुनील सोनी द्वारा किये गये अनुवाद से ये उद्धरण साभार लिये गये हैं।

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९७. इस मामले की गहराई से पड़ताल के चलते वह आरोपित पेंटिंग नीचे प्रस्तुत की जा रही है:

पेंटिंग ऊपर दी हुई है…..

९८. अश्लीलता पर भारत और विदेशों में बने कानूनों की कसौटियों पर ऊपर विचार विमर्श किया जा चुका है और वे स्पष्ट हैं। इन कसौटियों के मुताबिक मेरे विचार में यह पेंटिंग भादंवि की धारा २९२ के तहत अश्लील नहीं है। न तो यह पेंटिग कामोत्तेजक है और न ही कामवासना को बढावा देती है। न ही उसे देखने वाला कोई व्यक्ति भ्रष्ट अथवा पतित हो सकता है। दूसरे शब्दों में यह पेंटिंग किसी भी व्यक्ति में कामवासना नहीं भड़काती और न ही उसे भ्रष्ट करती है। इसके बावज़ूद कि कुछ लोग बुरा महसूस करेंगे कि तथाकथित भारतमाता को नग्न दिखाया गया है, पर मेरी राय में इसे अश्लीलता की कसौटी पर ठीक ठहराने के लिए कोई तर्क नहीं है। यह पेंटिंग जिसमें भारत को एक मानवाकृति में दिखाया गया है, किसी अवधारणा का नग्न चित्र होने के नाते किसी तरह से आम आदमी को शर्मिंदा नहीं करती। क्योंकि वह उसका कलात्मक मूल्य भी नहीं खोती।

९९. कलाकार/याचिकाकर्ता के नज़रिए से इस पेंटिंग को समझने के प्रयास से पता चलता है कि कैसे चित्रकार ने एक अमूर्त अभिव्यक्ति के जरिए एक राष्ट्र की अवधारणा को व्यथित स्त्री के रूप में दिखाया है। कोई संदेह नहीं कि राष्ट्र की अवधारणा लंबे समय से मातृत्व के विचार से जुड़ी हुई है। लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि चित्रकार ने इसे नग्न रूप में अभिव्यक्त किया है, अश्लीलता की कसौटी पर सही नहीं उतरती है, क्योंकि इस कसौटी में कहा गया है कि सैक्स अथवा नग्नता अकेले को ही अश्लील नहीं ठहराया जा सकता। यदि पेंटिंग को संपूर्णता में देखा जाए तो यह साफ़ होता है कि प्रतिवादियों के वकील की जो दलील कि यह नग्न है, उसके विपरीत किसी भी देशभक्त भारतीय के मन में इसे देखकर घृणा का भाव नहीं उठेगा और न ही इसमें आंखों को चुभने वाली कोई चीज़ है। तथ्य यह है कि जिसे नग्नता के रूप में अश्लीलता कहा जा रहा है, उसकी वज़ह से पेंटिंग में भौंचक्काकर देने वाला कलाबोध आ गया है, जबकि नग्नता इतनी गैरमहत्वपूर्ण हो गई है कि उसे आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है

१००. कभी हैंस हॉफमैन ने कहा था और मैं जिसका उल्लेख कर रहा हूं : “कोई भी कलाकृति अपने आपमें एक दुनिया होती है, जो कलाकार की दुनिया की संवेदनाएं और भावनाएं प्रतिबिंबित करती है”। इसे ही दूसरे शब्दों में एड़वर्ड़ हॉपर ने कहा है : “महान कला किसी भी कलाकार की अंदरूनी ज़िंदगी की बाहरी अभिव्यक्ति होती है”। यदि ये बातें ठीक हैं तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि याचिकाकर्ता हमारे राष्ट्र की बढ़ती हुई अव्यक्त पीड़ा से व्यथित है और उसने उसे कैनवास पर उतारने का प्रयास किया है। इस पेंटिंग में कलाकार की सृजनशीलता का साक्ष्य है। उसमे एक महिला के आंसुओं या अस्तव्यस्त, उलझे हुए खुले बालों के जरिए एक चित्रकार हमारे देश के दुःखी और हताश चहरे की तस्वीर खींचना चाहता है, जो कि घोर वेदना और व्यथा के दौर से गुजर रहा है। इसमें एक महिला के दुःख को उसके लेटने के तरीके जिसमें उसने अपने चहरे को हाथ से ढ़ंका हुआ है, आंखें बंद की हुई हैं और उनमें एक आंसूं छलक रहा है, से व्यक्त किया गया है। महिला को नग्न दिखाना भी उसी अभिव्यक्ति का हिस्सा है और उसका मकसद किसी दर्शक की कामवासना को भड़काना नहीं है, बल्कि उसके दिमाग़ को झकझोरकर रखना है ताकि वह भारत की वेदना से जुड़ सके तथा इसके लिए दोषी व्यक्तियों से घृणा करने पर मजबूर हो। जो भी व्यक्ति पेंटिंग को देखेगा, उसकी प्रतिक्रिया आंसुओं में, मौन या इससे मिलती-जुलती होगी, परंतु कामवासना के रूप में तो कतई नहीं हो सकती। इस पेंटिंग की कई व्याख्याएं हो सकती हैं। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि वह पेंटिंग एक हताशा से भरे हुए भारत को दिखाती है जो कई समस्याओं से घिरा है, मसलन भ्रष्टाचार, अपराधीकरण, नेतृत्व का अभाव, बेरोजगारी, गरीबी, अधिक आबादी, निम्न जीवनस्तर, सिद्धांतों एवं मूल्यों का क्षरण आदि। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि भारतमाता को वंचना से जूझ रहे एक रूपक के तौर पर चित्रकार ने प्रयुक्त किया हो, क्योंकि जिस समय पेंटिंग बनाई गई, उस वक्त देश में भूकंप से काफ़ी बरवादी हुई थी। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि हिमालय की श्रेणियों को एक महिला के खुले बालों और रंगों के उदात्त उपयोग द्वारा दर्शाया गया है। यह कलाकृति को कलाबोध प्रदान करता है।

१०१. ………….इस संदर्भित पेंटिंग में नग्न महिला ऐसी मुद्रा या भंगिमा, में नहीं है और न ही उसके आसपास के वातावरण को इस तरह चित्रित किया गया है कि वह बददिमाग़ लोगों में सैक्सी भावनाएं जगाए, जिसे असम्मानजनक कहा जा सके, जैसी कि प्रतिवादियों की दलील थी।……….यदि भिन्न विचार लिया जाए कि अगर चित्रकार भारत को मानवीय रूप में दिखाना चाहता था तो यह अधिक उपयुक्त होता कि उसे साड़ी या किसी लंबे कपड़े इत्यादि से लपेट देता, परंतु केवल इतना ही उसे दोषी ठहराने में पर्याप्त नहीं है। यह अलग बात है कि कुछ लोग भारतमाता को न्यूड पेंट करने पर कुछ कट्टरपंथी तथा दकियानूसी विचार रखते हों। लेकिन याचिकाकर्ता जैसे व्यक्ति पर इसके लिए अपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जो संभवतः भारतमाता को चित्रित करने में और आज़ादख्याल हो। हमारे संविधान में दी गई आज़ादी, समानता और बंधु्त्व की संकल्पना  दूसरे विचारों के प्रति असहिष्णुता से नफ़रत करती है।………..

१०५. जिस चीज़ ने कुछ लोगों के दिमाग़ बंद कर दिये हैं, उन्हें स्वामी विवेकानंद का एक कथन अवश्य पढना चाहिए।
हम हर किसी को अपने मानसिक विश्व की सीमा से बांधना चाहते हैं और उसे
हमारे सिद्धांत, नैतिकता, कर्तव्यबोध और यहां तक कि उपयोगिता का बोध भी
सिखाना शुरू कर देते हैं। सारे धार्मिक संघर्ष दूसरों के ऐसे मूल्यांकन की देन हैं।
यदि हम सचमुच मूल्यांकन करना चाहते हैं तो यह ‘उस व्यक्ति के ख़ुद के आदर्श
के मुताबिक करना चाहिए, न कि किसी दूसरे के’। यह महत्वपूर्ण है कि दूसरों के
दायित्वों को उनकी नज़रों से देखा जाए और दूसरों के रीतिरिवाज़ों तथा प्रथाओं
को हमारे मापदंड़ों से नहीं देखा जाए
“।

१११. हम एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहां हमें आत्मावलोकन करने की जरूरत है, ताकि भीतर और बाहर दोनों देख सकें। ……आधुनिक भारत में समाज के मानदंड़ तेजी से बदल रहे हैं और इसलिए अब आधुनिकता के जमाने में हमें विभिन्न सोच-विचारॊं को खुले दिल से अपनाना चाहिए। लेकिन जहां कलाकार को अपनी कलात्मक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, वहीं वह वो सब करने के लिए स्वतंत्र नहीं है, जो सब वह चाहता है। एक वह कला है जो सुंदरता की अभिव्यक्ति है और दूसरी वह कला है जो अप-संस्कृति की फ़ूहड़ अभिव्यक्ति से भरे दिमाग़ की उपज है। इन दोनों कलाओं में फ़र्क करना होगा। अशिष्ट चीज़ो को बढ़ावा देने वाली कला को सभ्य दुनिया से हटाने की जरूरत है।

११४. मानवीय व्यक्तित्व तभी भरपूर फलेगा-फूलेगा और इंसानीयत उसी वातावरण में गहरी जड़ें जमा सकेगी और सुगंध दे सकेगी, जहां सभी मिलकर सहिष्णुता औए आज़ाद ख्याली का परिचय दें।

११५. हमारी सबसे बड़ी समस्या फिलहाल कट्टरपंथ है, जिसने लोकतंत्र की आत्मा का हरण कर लिया है। एक आज़ाद समाज में सहिष्णुता मुख्य विशेषता होती है। ख़ासतौर पर तब जब वह एक बड़ा और जटिल किस्म का समाज हो, जिसमें अलग-अलग मतों और हितों वाले लोग रहते हों। ……………यह समझा जाना चाहिए कि असहिष्णुता विचार-विमर्श और विचार की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाती है। इसका प्रतिफल यह होता है कि असहमतियां सूख जाती हैं। और तब लोकतंत्र अपना अर्थ खो देता है।

११७. ……………….कला की आलोचना हो सकती है, बल्कि एक नागरिक समाज में विभिन्न मत व्यक्त करने के कई मंच व तरीके हो सकते हैं। लेकिन अपराध न्याय प्रणाली को किसी कला के खिलाफ़ आपत्ति दर्ज़ करने के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए। इसे किसी अविवेकी के हाथ में औज़ार नहीं बनने देना चाहिए, जो इसका दुरुपयोग लोगों के अधिकारों के गंभीर उल्लंघन में करे। खास तौर पर सृजन क्षेत्र के लोगों के।………….
दुर्भाग्य से इस दिनों कुछ लोग हमेशा पलीता लगाते रहते हैं। और प्रदर्शन करने
जो अक्सर हिंसक हो जाता है, के लिए उत्सुक रहते हैं। मुद्दा दुनिया की कोई भी
चीज़ हो सकती है, कोई किताब, पेंटिंग अथवा फिल्म आदि हो सकती है, जिसने
उनके समुदाय की ‘भावना को ठेस’ पहुंचा दी हो। ऐसी खतरनाक प्रवृतियों पर
लगाम कसनी चाहिए। हम एक राष्ट्र हैं और हमें अनिवार्य रूप से एक दूसरे का
सम्मान करना चाहिए और सहनशीलता रखनी चाहिए
“। …………..

१२१. उपरोक्त नज़रिए से याचिकाकर्ता के खिलाफ़ आदेश दिया जाना और गिरफ़्तारी वारंट निकाला जाना रद्द किया जाता है और उनके खिलाफ़ दायर पुनरीक्षण याचिकाओं को मंजूरी दी जाती है……..

उपसंहार
१३०. विभिन्न नज़रियों के प्रति सहिष्णुता किसी का नुकसान नहीं करती। इसका मतलब सिर्फ़ आत्मनियंत्रण से है। लेखन, पेंटिंग अथवा दृश्य मीडिया के जरिए अभिव्यक्ति की विविधता बहस को बढावा देती है। किसी बहस को कभी बंद नहीं किया जाना चाहिए। ‘मैं सही हूं’ का अर्थ यह नहीं होता कि ‘तुम गलत हो’। हमारी संस्कृति विचार और कार्यों में सहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली है। इस फ़ैसले को लिखते वक्त उम्मीद है कि यह कला क्षेत्र के लिए खुली सोच और व्यापक सहिष्णुता की भूमिका बनेगा। ९० साल की उम्र के एक चित्रकार को उसके घर पर होना चाहिए–कैनवास पर चित्र उकेरते हुए

हस्ताक्षर
८ मई, २००८                                            न्यायमूर्ति संजय किशन कौल

०००००

प्रस्तुति – रवि कुमार

30 responses »

  1. इस फैसले के बावजूद मै यही मानती हूं कि हुसैन साहब अगर हमारे देश और देवी देवताओं के प्रति सम्मान जनक नजरिया अपनी कला में भी दिखाते और बहुसंख्यकों की भावना का ख्याल रखते तो ज्यादा अच्छा होता । क्यूं उनकी किसी भी पेंटिंग में पैगंबर साहब या खादिजा जी को नग्न नही दिखाया उन्होने ? विवेकानन्द जी के जिस कथन को श्रीमान जज साहब ने उध्दृत किया है उसी की दो लाइनों की तरफ मै ध्यान दिलाना चाहूंगी ।

    यह महत्वपूर्ण है कि दूसरों के दायित्वों को उनकी नज़रों से देखा जाए और दूसरों के रीतिरिवाज़ों तथा प्रथाओं को हमारे मापदंड़ों से नहीं देखा जाए“।

  2. आशा जी

    यह फ़ैसला एक रास्ता बताता है कि हुसैन की कला को कैसे देखें। उनके इस तथाकथित विवादित चित्र के संदर्भ क्या हैं और मकसद क्या हैं। विवेकानन्द के कथन का उल्लेख इस संदर्भ की व्यापकता को समझने के लिए ज़रूरी हो जाता है। बाकी मैं सही हूं का मतलब यह नहीं कि आप ग़लत हैं और आप सही हैं का यह मतलब नहीं कि मैं ग़लत हूं। बहस चले और बात चले। पत्थर न चले। एक अदालत कह रही है कि हुसैन भारत माता की व्यथा का चित्रण आपको झकझोरने के लिए कर रहे हैं और आप हैं कि हुसैन से ही भिड़े जा रही हैं। उन्हें खदेड़े जा रही है।

  3. कहीं बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। चित्रकारी को हर कोई अपने हिसाब से देखता और महसूस करता है। कुछ लोगों को राजनीति के लिए और देश की जनता को विभाजित करने के लिए टूल चाहिए। वे तलाशते हैं और उस का उपयोग करते हैं। हुसैन के चित्रों में कहीं अश्लीलता और किसी धर्म या प्रतीक के प्रति असम्मान मुझे नहीं दिखाई दिया। यदि हम अपने ही दिमाग में भरी चीजों को देखना चाहें तो वे तो आँख बंद कर देखने की कोशिश करें तो वहाँ भी दिखाई दे जाती हैं।

  4. बस यही तो खेद है कि यह कलाकारी और प्रतिभा मोहम्मद साहब के चित्रों के समय और तस्लीमा के आर्टिकल के समय कहां चली जाती है. कहां चले जाते हैं रविश जी, शुंगलू जी, सरदेसाई जी और तमाम बुद्धिजीवी. यह फोटो लगाकर अपने घर में पूजा कर सकते हैं तो कर लें, कोई आपत्ति नहीं. लेकिन मुस्लिमों को भी कार्टून बांटने की हिम्मत करें अगर वास्तव में धर्मनिरपेक्ष हैं तो.

  5. .. बच्चों के नाम ‘सद्दाम हुसैन’ या ‘यासिर अराफात’ सुन कर अजीब लगता है।
    न्यायालय के संज्ञान में शरणार्थी कश्मीरियों का न आना आपत्तिजनक लगता है। .. कल अपने ब्लॉग पर मुहम्मद पर कुछ कार्टून छाप दूँ तो आप लोग मेरे बचाव में आएँगे न ?
    .. बस ऐसे ही पूछ रहा हूँ।
    विवेकानन्द का उद्धरण तो असंगत है यहाँ – इस्लाम में नंगई की अनुमति नहीं है तो मौलवी को कपड़े में चित्रित करो और ब्राह्मण को उसी चित्र में एकदम नंगा क्यों कि हिन्दू धर्म में नग्नता के प्रति सहिष्णुता है। जरा उस चित्र के कथ्य पर कुछ प्रकाश डालेंगे चित्रकार महोदय !

  6. पता नहीं ये लोग इस देश के क़ानून की इज़्ज़त करते भी हैं या नहीं? बच्चों के नाम नाथूराम या प्रज्ञा नहीं रखे जायेंगे क्या अब? और तस्लीमा का समर्थन हमने कब नहीं किया …तब भी जब उसने मुस्लिम कट्टरपंथ पर लिखा और तब भी जब संघ गिरोह को बेनक़ाब किया।

  7. इस चित्र को देखकर मुझे भी कुछ आपत्तिजनक नहीं लगा, पर फिर भी ये तो सोचने वाली बात है कि हुसैन सिर्फ़ हिन्दू देवियों की ही नग्न तस्वीरें क्यों बनाते हैं ? अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सम्मान आवश्यक है, पर पता नहीं क्यों हुसैन की मंशा सही नहीं लगती. पता नहीं क्यों?

    • आराधना जी,
      पता नहीं ऐसे कितने ‘क्यों’ के जवाब हमें ढूंढने होते हैं….

      पता नहीं है…कि यदि यह नाम हुसैन नहीं होता…तो हमें पता चलता भी या नहीं…या हमारी प्रतिक्रिया तब क्या रही होती…पता नहीं क्या होता…क्यों होता?

      हम भी खोज में हैं….आप भी लगे रहिए…
      आखिर कब तक जवाब छिपे रह सकते हैं?

  8. मेरा तो यही मानना है कि हुसेन को हिन्दु धर्म के देवि देवताओं की नग्न तस्वीरें बनाने का कोइ अधिकार नहीं है खासकर तब जब वे अपने इस्लाम धर्म के पीर पेगंबरों की ऐसी ही तस्वीरें बनाने के मामले में भयभीत मेहसूस करते हों। हुसेन की पेन्टिग से जब हिन्दु धर्म के अनुयायी या उनका एक हिस्सा परेशानी मेहसूस करता है तो ऐसी कलाकारी जाए भाड में और हुसेन को दोष मुक्त करने का मतलब यह कदापि नहीं होना चाहिये कि अब हुसेन को हिन्दु देवि- देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाने का लाइसेन्स मिल गया है।

  9. रवि भाई, आपकी बात से सहमत हूं, लेकिन मैं पर्सेप्सन की बात कर रहा हूं । इस तरह की एक सोच है कि हिंदू देवी देवताओं के मामले मे हुसैन साहब जिद पकड़े हैं । साथ ही प्रिय भारतीय नागरिक जैसे भी हैं जो ध्यान से अपने घर और मंदिर मे देख ही नही रहे बस जिद दिखा रहे हैं । तीसरी तरफ सरकारें हैं जो हर निर्णय वोट बैंक के नज़रिये से लेती हैं न कि न्याय के , यही समस्या की जड़ है।

    हुसैन जी ने कतर को चुना , ऐसे में उन्हे उनकी नयी पूर्ण स्वतंत्रता मुबारक । भारत देश को कोई झेंप नहीं रखनी चाहिए, ऐसे पलायनवाद पर आंसू बहाने का कोई फ़ायदा नहीं , जो अपने अधिकारों के लिए लड़ना नही चाहता तो क्या कर सकते हैं ।

    उन्हे जान का खतरा था यह बात हास्यास्पद है |

  10. विवादस्पद मुद्दे जब भावनाओं के साथ जोड़ दिए जाते हैं, तो सारे तर्क फेल हो जाते हैं. इस तरह के मुद्दे पर जितनी कम बातें की जाये उतना ही देश और समाज के लिए अच्छा होगा. कलाकार की भावनाएं सही है या गलत हैं इसका कैसे पता चलेगा? लोग अपने चश्मे से ही सभी चीजों को देखते हैं.

  11. कला अभिव्यक्ति के हक में एक कलाकार की मजबूत पोस्ट । बधाई । हुसैन ने जो भी बनाया गिरजेश राव से पूछ कर नहीं बनाया और न ही भविष्य में बनायेंगे । भारतीय शिल्प और भित्ति चित्रों को बनाने के लिए किसी नागपुर के मुख्यालय से ’आदेश-निर्देश’ क्यों नहीं लिए गए ? इसलिए कि ’आदेश-निर्देश वाली जमात” हिटलर और मुसोलिनी को आदर्श मानने वाली रही है इसलिए इनकी सोच का मूल विदेशी है ।

  12. यह निर्णय विचारणीय

    ‘मैं सही हूं’ का अर्थ यह नहीं होता कि ‘तुम गलत हो’।

    ९० साल की उम्र के एक चित्रकार को उसके घर पर होना चाहिए–कैनवास पर चित्र उकेरते हुए।

    देषबंधु के प्रधानसंपादक का निबंध भी पठनीय है।

  13. यह बिल्कुल सही है कि किसी कलाकार की कला को उसके नज़रिये से ही देखा जाये तो समझा जा सकता है कि वो क्या कहना चाहता है। पर अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति में इस बात क भी ध्यान रखा जाना चाहिये कि किसी और की भावनाओं को ठेस ना लगे।

  14. हुसैन दूसरा शायद ही हो …….उनकी कला ने जीतना सफर तय किया है उसपर तो गौर करें ! उन्होने देवी -देवताओं की नग्न तस्वीरें नही बनाई ,उसे देखने वालों ने नग्न कर दिया …..अभिव्यक्ति की आजादी के साथ उनके भीतर के कलाकार को भी देखिये .कितने शर्म की बात है की इस उम्र मे उन्हे कतर की शरण लेनी पड़ी .

  15. भारत को आस्था जो उसके रगों में इंजेक्शन की तरह भरी है, दीमक की तरह खा रही है। तसलीमा कितने ही उपनिषदों और प्रतिशाख्य का उदाहरण दें, उनका जवाब तर्क में नहीं जूते में दिया जायेगा।

    शुन्तारो तानिकावा ने एक बड़ी बात कही है,

    अगर प्रेम, और शरीर मानवीय चीज़ है तो अश्लीलता भी मानवीय है।

    मगर अश्लीलता से क्या तात्पर्य है, समझ नहीं आता, भारत माता की जगह अगर पिता होते हो “नग्न”… स्थिति के लिए “अश्लील”शब्द प्रयोग नहीं होता। ये बेवजह की खेंस बाजी है कि अपने आकाओं और मुहम्मद साहब का चित्र क्यूँ नहीं बनाते। और इस फालतू के पचड़ों में “धर्म”, “राजनीति” गड्डमड्ड हो रहे हैं, कला या राजनैतिक मामलों में धार्मिक हस्तक्षेप हर तरह से अतिवाद है।

    भारत की सारी सहिष्णुता जो सोई है सदियों से, इन फालतू की बहसों में आकर जोर शोर से हिस्सा लेती है। कलाकारों से मज़हब की बातें धूर्तता की हद है।

    बस स्वतंत्रता यही तक सीमित है॥

    हद है गोरखधंधे की…

    निशांत कौशिक

  16. आदमी “नग्नता” से कितना डरता है न..उसे अपने छद्म आवरण पर कितना विश्वास है…जिस तरह से “कमेन्ट देने वालों ने”…जो अतिवादी है… “नग्न” शब्द का प्रयोग किया….वो तो बहुत नाकाफी है…..और कोई भाषा का शब्द हो तो वो भी छोड़ दें वे यहाँ…पेंटिंग देखकर “नग्न” शब्द इतनी बार देखकर दिमाग में नहीं घुमा जितना कमेन्ट देखकर…दिखाई देने लगा…

  17. हुसैन का दोगलापन इस बात से ज़ाहिर होता है कि सिर्फ़ हिन्दु देवि देवताओं की पेंटिंग ही नग्न बनाईं है, कला की अभिव्यक्ति किसी भी भेदभाव से इतर होनी चाहिए | मैं खुद एक मुसलमान हूँ और ये मानता हूँ कि म फ़ि हुसैन ने सिर्फ़ नाम को ही नहीं कौम को भी बदनाम किया है | मज़हब ये कभी नहीं कहता | हमारे मज़हब में ज़मीन पे रहनें वालों के हकूक होते है | किसी के भी दिल और जज़्बात को ठेस पहुँचाना गुनाहे अज़ीम हैं |

  18. निशान्त कौशिक जी की बात बहुत पसन्द आई। कमलेश वर्मा जी की बात तो एकदम महत्वपूर्ण हो जाती है कि अगर इस चित्र का नाम कुछ और होता तब इतना हंगामा होता? बिलकुल नहीं होता। हमारे यहाँ देवियों के चित्र पर शोर हो सकता है लेकिन जीवित देवियों के चित्र पर नहीं। मुर्दों के पुजारी हैं लोग! बचपन से इस विवाद को पढ़ता रहा, भले ही कम लेकिन घोर आस्तिक होने पर भी अन्दर से कोई परेशानी नहीं हुई कभी। फिर भी सापेक्ष दृष्टि से देखते ही अगर कोई यह कहता है कि सरस्वती-दुर्गा आदि देवियों की तस्वीरें भी क्यों बनाई हुसैन ने, तब मुझे अस्वाभाविक नहीं लगता। उदार बनकर हम उनके इस सवाल को भी नजर अंदाज नहीं कर सकते। हम उदारवादी होने के नाम पर भी कई बार ठग लेते हैं दूसरों को। वैसे इसकी पूरी उम्मीद है कि अगर हुसैन मोहम्मद सहित हिन्दू देवियों-देवताओं की तस्वीर बना दें तब भी लोग कहेंगे कि मुस्लिमों के बनाओ, यह तुम्हारा मजहब है लेकिन हिन्दुओं के घर में ताका-झाँकी मत करो। अन्त में यह कि मौका तो हुसैन ने दिया ही है लोगों को बोलने के लिए। भारत माता की तस्वीर तो सही कला मानी जा सकती थी लेकिन सर्स्वती-दुर्गा आदि के साथ भी उनकी कला का प्रयोग सचमुच एक आस्थावान हिन्दू को परेशान करेगा ही।

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