कब आओगे – कविता – रवि कुमार

सामान्य

कब आओगे
( a poem by ravi kumar, rawatbhata )

खुलता है ख़त
और शब्द टपक पड़ते हैं
कब आओगे

पंछी चहचहाते हैं
वृक्ष झूमते हैं
गीत गाती है हवा
कब आओगे

मशीनों का थका देने वाला शोर
लगने लगता है मधुर संगीत
बोल फूट पड़ते हैं उसी ताल में
कब आओगे

वह सोचता है
हथेलियों की नाज़ुक छुअन को
फूल शरमाने लगते हैं
महसूसता है
नन्हीं सी किलकारी को
चांद बादलों की ओट में छिप जाता है

घर-भर की स्मृतियों के
चिलकते कोलाज़ में
उसे अपने कंधे
बहुत भारी लगने लगते हैं
वह टटोलता है
मनीआर्डर भेजने के बाद
जेब की बची अपनी हैसियत को
केंटीन के खाने की तरह
गले में अटकने लगता है वही सवाल
कब आओगे

कब आओगे की सदा
और किसी के इन्तज़ार में होने के
तल्ख़ अहसास के बावज़ूद
रविवार से रविवार
गुजरते रहते हैं महिने
वह भेज भी नहीं पाता एक जवाबी ख़त

वैसे एक ज़िम्मेदार
आदमी की हैसियत से
रोज़ सोने से पहले
वह सोचता है बिना नागा
घर जाने के बारे में

अब के त्यौहार पर तो जरूर

०००००
रवि कुमार

27 responses »

  1. वह सोचता है बिना नागा
    घर जाने के बारे में

    अब के त्यौहार पर तो जरूर
    ===
    प्रवास की शाश्वत तल्खी. शब्द शब्द शब्दविहीन भाव.
    बहुत सुन्दर

  2. आह … ये व्यथा है उन हज़ारों महानगरीय जंगल में खो गये मेहनत कशों की और दूर मुलुक में उनका इंतज़ार करते परिवार की … और अरमान तो इश्वर ने सब को बराबर दिए हैं
    संवेदनशील रचना …

  3. मैं बहुत कुछ नहीं कह पाउँगा क्यूँ कि, कविता में कविता लिखे होनी की वजह होती है, और वजह से ताल्लुक मानसिक,बौद्धिक,भावनात्मक तीनों क्षेत्रो से होने के बाद…शब्द कविता जैसे रूपों में ढल जाते हैं….मुझे बाहरी तौर पर पसंद आई कविता…मगर इस कविता के लिखे होने की वजह से जुड़ाव न होने के कारण…मै इससे खुद को कोशिश करके भी नहीं जोड़ सकता…जैसे आपने जोड़ा है कविता से खुद को…कविता का ये पड़ाव बहुत अच्छा लगा॥
    घर-भर की स्मृतियों के
    चिलकते कोलाज़ में
    उसे अपने कंधे
    बहुत भारी लगने लगते हैं
    वह टटोलता है
    मनीआर्डर भेजने के बाद
    जेब की बची अपनी हैसियत को
    केंटीन के खाने की तरह
    गले में अटकने लगता है वही सवाल
    कब आओगे

    वैसे एक ज़िम्मेदार
    आदमी की हैसियत से
    रोज़ सोने से पहले
    वह सोचता है बिना नागा
    घर जाने के बारे में

    अब के त्यौहार पर तो जरूर….

  4. वैसे एक ज़िम्मेदार
    आदमी की हैसियत से
    रोज़ सोने से पहले
    वह सोचता है बिना नागा
    घर जाने के बारे में

    अब के त्यौहार पर तो जरूर

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