देखना ख़ुद को दर्पण में, कैमरे की नज़र से…

सामान्य

देखना ख़ुद को दर्पण में, कैमरे की नज़र से
( self photographs by ravi kumar, rawatbhata )

अभी कुछ दिनों पहले जयपुर प्रवास के दौरान एक अलसुबह, जबरदस्ती कराए गये स्नान के बाद, खिडकी से आती धूप की एक लहर के साये में ख़ुद को दर्पण में देखा. हाथ में कैमरा था, उसने भी अपनी नज़र ड़ाली…और ये छायाचित्र नमूदार हो गये…

देखिए, धूप का साया कैसी अभिव्यंजना रचता है…
साधारण को कैसी असाधारण आभा से भर देता है…

छाया चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छाया चित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

छायाचित्र - रवि कुमार, रावतभाटा

००००००

रवि कुमार

35 responses »

  1. पिछली बार आपकी कविता पढी थी ब्लॉगचर्चा में, तो बहुत अच्छी लगी थी. आज आपके छायाचित्र देख रही हूँ, खुद से खुद की फोटो लेना एक रोचक अनुभव रहा होगा.

  2. बहुत खूब! देखने से जान-पहचान और पक्की होती है. कभी सामने पड़ेंगे तो नमस्ते तो की जा सकती है न, चित्र का सन्दर्भ देकर. लेकिन आप दोनों ही इतने गंभीर क्यों दिख रहे हैं? कैमरे के सामने हैं, ज़रा मुस्करा दीजिये! मतलब यह कि यह सिलसिला यहाँ पर रुकना नहीं चाहिए बल्कि कुछ और चित्र आयें, मुस्कराहट के साथ.

  3. बहुत प्रभावशाली …. परन्तु ये बात मुझे भी खटक रही है ….. आप का गंभीर होना जायज़ लगता है पर … सहधर्मिणी का ?? …. असर पूरा है

  4. बाबा रे बाबा आप तो ऎसॆ ना थॆ मतलब बदला रूप आसानी से पचता नही है गम्भीरता आप का आंतरिक गुण है
    छायाचित्र बहुत अच्छे है श्वेत- श्याम छायाचित्रो का समावेश भी करे।

  5. भाई रवि जी,
    आपके छायाचित्रों में या तो बनावटी हंसी है या फिर गहन ख़ामोशी भाई जिंदगी बहुत ही सुन्दर है इसलिए कभी कभी नहीं हमेशा खुश और मुस्कुराते रहे क्योंकि आप कवि है अगर एक कवि अपने छायाचित्रों में आँखों में गहन उदासी के भाव दिखायेगा तो आपके अनुसरण करने वालें भी आप से उदासी ही लेंगे दुनिया को बदलने के जज्बात नहीं
    पर आपकी एक कला और देखने को मिली छायाचित्र अच्छे है
    आपको प्रत्यक्ष तो नहीं देखा पर हाँ छाया चित्रों ने आपमें दिलचस्पी और बड़ा दी
    लगता है अब मिलना ही पड़ेगा आपसे

  6. jarur i nahi khwabon ki dord main sahmil hona ,jaruri nahi itihas ke pannon main khona,jaruri hai ti bus itna , ……………………………….pl… complete it , its a request……….arey laila majnu ki auladon sudhar jao is desh ko tumhari jarurat nahi ,jarurat hai t oh sirf ( talwar uthalo gandhi ji….) ki…… samjhe , neta bhi bolne lage hain , rastrya ka nirman dikhawe main nahi hai. kar dikhane main hai. mujhe mail naa karen its fake mail address o.k. , main hi milti rahungi or tumhe chadati or chidati rahungi….o.k. sorry.for comments , per yeh mut sochna sorry ,bol diya ,to comment nahi honge . theek huay ,dadi choti wale laila , majnu…….

  7. kuch sishe jhuth bolten hai,
    kuch rahen manjil milgayi si hoti hai,
    magar ye soch kar thahar jana nahi ,
    kuch kadam aur chal kuch tasveeren aur le,
    ye jindgi hai dardo-gam ka safer,
    sayad laut kar phir mulakat ho na ho ,
    to yaad rakh tere pyare aur bhi hai ,
    tere camera ki nazar ko taraste aur bhi hai,
    magar ye soch kar…….kuch rahen manjilon si….

  8. raviji,jabardasti karwaye gaye snaan ka kya rahasya hai yeh spasht kiya jana chahiye tha.Isme koi shak nahi ki yeh
    dussahas Smt ravikumar ke siva kaun kar sakata hai. Mana aap iske liye gussa the tatha aapki muskurahat gayab thi per madam ko aapne muskarane se kyo rok diya? Bahut nainsafi hai.

  9. Ravi Ji,

    Shukriyaa ki aapne apna keemati waqt nikaala aur mere blog par aa kar aapne ati mahatavpoorn tippani ki.

    Ek baat clear kar dena chahunga, mere blog ka naam “my own creation” hai however, jo post maine lagaayi hai, main bhi jaanta hoon ki meri nahi hai isiliye maine pehle likh diya tha ki mere ek mitr ne bheja tha aur maine socha ki apne blogger mitron se saanjha kar loon.

    Ek baar phir shukriya aapka aage bhi aate rahiyega.

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