बच्चे और फूल – कविता

सामान्य

बच्चे और फूल
( a poem by ravi kumar, rawatbhata )

बच्चे और फूल – पूर्वार्ध

बच्चों को फूल बहुत पसंद हैं
वे उन्हें छू लेना चाहते हैं
वे उनकी ख़ुशबू के आसपास तैरना चाहते हैं
उन्हें तितलियां भी बहुत पसंद हैं

बच्चों को उनके नाम-वाम में
कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती
वे तो चुपके से कुछ फूल तोड़ लेना चाहते हैं
और उन्हें अपने जादुई पिटारे में
समेटे गए और भी कई ताम-झाम के साथ
सुरक्षित रख लेना चाहते हैं
वे फूलों को सहेजना चाहते हैं

वे चाहते हैं
कि जब भी खोले अपना जादुई पिटारा
वही रंग-बिरंगा नाज़ुक अहसास
उन्हें अपनी उंगलियों के पोरों के
आसपास महसूस हो
वे इत्ती जोर से साँस खींचें
कि वही बेलौस ख़ुशबू
उनके रोम-रोम में समा जाए

वे शायद ऐसा भी सोच सकते हैं
कि यदि फूल होंगे उनके पास
तो आएंगी अपने-आप
उनके पास तितलियां

फूल और तितलियां
अक्सर उनकी चेतना में गड्डमड्ड हो जाते हैं

जब फूल उनकी नज़र में होते हैं
वे देख-सुन नहीं रहे होते हैं
चेतावनियां और नसीहतें
ना वे फँस पा रहे होते हैं
सभ्यता और संस्कारों के मकड़जाल में

दरअसल
जब फूल उनके दिमाग़ में होते हैं
तब उनके दिमाग़ में कुछ और नहीं होता

इधर-उधर
यूं ही दौड़ते-भागते
फूलों के आसपास मंडराते
बच्चे
सिर्फ़ बड़ों से नज़रे बचाना चाहते हैं
०००००

बच्चे और फूल – उत्तरार्ध

बच्चे उदास हैं
उनके जादुई पिटारे में सहेजे फूल
मुरझा गए हैं
नहीं शायद
वे सोच रहे हैं कि मर गए हैं

वे सदमें में हैं
कल्पनालोक घायल है
रंग खो गए हैं कहीं
ख़ुशबुएं संड़ांध मारने को हैं

सारी चेतावनियां और नसीहतें
उनकी आँखों में उतर आए पानी में
फूलों और तितलियों के साथ
बेतरतीबी से चिलक रही हैं

जादुई पिटारे की रहस्यमयी दुनियां
कुछ समय के लिए ख़ामोश हो गई है

बच्चे आख़िरकार बच्चे हैं
फूलों को फिर से देखते ही
कौंध उठती हैं उनकी आँखों में वही चमक
उनके कल्पनालोक में
उन्हें सहेजने के
नये-नये इंतज़ामात कुलबुलाने लगते हैं

वे फिर से
नज़रे बचाकर पहुंच जाना चाहते हैं
फूलों और तितलियों के पास

कुछ सिरफिरे कहते हैं
फूलों और ख़ुशबुओं को सहेजना
आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है
इस दुनियां को बचाए रखने के लिए।
०००००

रवि कुमार

23 responses »

  1. बहुत सुंदर कविता।

    कुछ इस से भी बड़े सिरफिरे हैं

    जो बच्चों के सो कर उठने के पहले ही
    तोड़ लेते हैं सारे फूल
    और चढ़ा आते हैं पत्थरों पर
    जिन्हें वे प्रतिमाएं कहते हैं।
    तितलियाँ आती हैं
    उदास लौट जाती हैं
    बच्चे आते हैं
    मायूस लौट जाते हैं।

  2. @ वे शायद ऐसा भी सोच सकते हैं
    कि यदि फूल होंगे उनके पास
    तो आएंगी अपने-आप
    उनके पास तितलियां

    फूल और तितलियां
    अक्सर उनकी चेतना में गड्डमड्ड हो जाते हैं

    जब फूल उनकी नज़र में होते हैं
    वे देख-सुन नहीं रहे होते हैं
    चेतावनियां और नसीहतें
    ————-
    बच्चे
    सिर्फ़ बड़ों से नज़रे बचाना चाहते हैं

    कवि भी ऐसे ही होते हैं

    उत्तरार्ध नहीं जमा।

  3. प्रसिध्द कवि राजेश जोशी की कविता ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ पढ़ा रहा था । इसी क्रम में अचानक आपके प्रष्ठ पर यह कविता पढ़ने को मिली। निस्संदेह आपका अंतर्जाल-पृष्ठ अवलोकनीय ही नहीं वरन समालोचनीय भी है। विस्तृत चर्चा अवश्य की जायेगी…….। – डॉ. रामकुमार सिंह

  4. दोनों कवितायें शानदार और भावपूर्ण हैं
    सच यही है कि इस बाज़ार ने बच्चों से उनका बचपना, फूलों से उनकी ख़ुशबू और मनुष्यों से उनकी मनुष्यता छीन ली है। इन्हें बचाने के अलावा कविता का आज और कोई संघर्ष नहीं हो सकता।

  5. भाई रवि, सुन्दर कविता उन्नीसवीं सदी कि क्योंकि आजकल बच्चे तितलियों ओर फूलों के बारे में ना ही सोचते है ओर ना ही उनके साथ खेलना पसंद करते है
    इक्कीसवीं सदी के बच्चे पिस्टल ,छुरे , बम आदि आदि घातक हथियारों से खेलना पसंद करते है इसलिए आज के हालात पर कविता सटीक नहीं बैठती |

    आपके लेखन में अभी भी अच्छे बच्चे ही घूम रहे हैं,उन्नीसवीं सदी के, कृपया इस सदी से बहार आइये ओर इक्कीसवीं सदी के बच्चों के बारें में लिखियें

    कविता सुन्दर ओर मेरे बचपन कि यादों को ताज़ा कर गयी इसके लिए धन्यबाद

    एक शेर याद आ रहा है शायर का नाम याद नहीं आ रहा है पर शेर कहता हूँ
    “मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्चा |
    बड़ो कि देखकर दुनियां बड़ा होने से डरता है ||”

    • भाई भगत,
      आपने एक कड़वा सच सामने रख दिया है…

      पर बच्चे तो बच्चे ही होते हैं…
      वे उन्नीसवीं…या इक्कीसवीं सदी के नहीं होते….
      वे लगभग एक से ही पैदा होते हैं…

      बाकि तो यह हम हैं…समाज…
      जो उनके मन में इन सदियों को अनुकूलित कर देता है….
      फूलों और तितलियों से बमों और बंदूकों की तरफ़ मौड़ देता है….

      और इसीलिए वे आज भी…
      जैसा कि इस कविता में है…
      वे बड़ों से नज़रें बचाना चाहते हैं…

      वैसे इन बच्चों, फूलों और तितलियों…
      असफलता और फिर से उठ खड़े होने के रूप में…
      और भी कई तात्कालिक अभिव्यंजनाओं का समावेश करने की कोशिश की थी…

      लगता है…संप्रेषित नहीं हो पाई….
      या फिर आप उम्दा व्यंग्य कर गये हैं….

  6. फूलों पर कविता नहीं लिखी
    कुछ पौधे लगाए क्‍यारियों में
    मिट्टी को गोंड-गोंड कर बनाया कोमल
    कि जड़े आसानी से फैल सकें
    उन्‍हें सींचा अपनी आत्‍मा के जल से
    पाले और धुएं से बचाया

    फिर खिले ढेर सारे फूल
    पर इसके पहले
    कि रंगों और खुशबुओं से वे रच पाते अपना महाकाव्‍य
    हत्‍यारों ने रौंद डाली क्‍यारियां
    कुचले गए फूल
    चारों तरफ फैल गई तेज खुशबू

    फूलों को मसलने वाले खूनी पांवों को
    शायद यह पता नहीं था
    फूल जितने रौंदे जाएंगे
    खुशबू उतनी तेज होगी!

  7. पिंगबैक: खिलखिलाते फूल « कला सृजन शिविर २०११

  8. इस कविता से अधिक तो द्विवेदी जी ने ही कह दिया-


    कुछ इस से भी बड़े सिरफिरे हैं

    जो बच्चों के सो कर उठने के पहले ही
    तोड़ लेते हैं सारे फूल
    और चढ़ा आते हैं पत्थरों पर
    जिन्हें वे प्रतिमाएं कहते हैं।
    तितलियाँ आती हैं
    उदास लौट जाती हैं
    बच्चे आते हैं
    मायूस लौट जाते हैं।”

    एक कहानी लिखी थी- मंत्र की शक्ति तितली-फूल उसमें भी आए थे और नंदन ने उसके लिए कुछ रूपये भी भेजे थे। बड़े हमेशा बाधक रहते आए हैं।

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