यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म

सामान्य

यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म
( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhta )

यहां-वहां कई जगह आजकल बरतनों की खनखनाहट का दौर जारी है. दादी जी कहा करती थी रसोईघर से आती ऐसी आवाज़े बताती हैं कि कौरानी का ध्यान आज और कहीं है, किसी और बात पर नाराज़ी है और कहीं और उलझ गई है.

वर्तमान दौर की समस्याएं पुरजोर तरीके से हमारे सामने मुंह बाए खड़ी हैं. हमें अक्सर वह अनुपस्थित कारण समझ नहीं आता जो कि मूल में होता है, और हम दिखती सी या दिखाई जाती चीज़ों में उलझ कर अपना बचा खुचा तिया-पांचा करते रहते हैं, यह हमारे दादाजी कहा करते थे.

दादाजी नहीं रहे, पर दादी जी हैं जो अभी भी सब कुछ ठीक रहे, शांति रहे, चोंचों को चुग्गा-पानी मिलता रहे, बगिया में मीठा कलरव गूंजता रहे, इसकी लगातार प्रार्थना करती रहती हैं.

कुछ चोंचों को ज़्यादा चुग्गा-पानी नसीब हो रहा है, कुछ चोंचों के पास फ़ाकामस्ती का आलम है. चारों तरफ़ चीं-चां-चां-चूं छाई हुई है, लहुलुहान होना ही कहीं सुकून का वायस बना हुआ है. बाजों की बन आई है, इससे बेहतर अभीष्ट पूर्ति उन्हें और क्या नसीब हो सकती है.

बाजों और गिद्धों को साम्राज्य पूरी दुनिया को गिरफ़्त में ले रहा है. कबूतरों की शामत है.

अपनी-अपनी लुकाठी दबाए, हम अल्मस्त हैं.

एक कविता पोस्टर देखिए, और क्या कहा जाए….मज़ा लीजिए?

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०००००

रवि कुमार

25 responses »

  1. जैसे अयोध्या के एक सत्रह साल के लड़के ने कभी हाथ जोड़कर कहा था….कोई हमसे तो पूछे की हमें अयोध्या में क्या चाहिए …हमें कुछ नहीं चाहिए भाई….हमारे स्कूल खुलने दो…बस ऐसा इंतजाम करो.

  2. पीठ पर चढ़ी जनद्रोही राजनीति और कंधों पर लदा साम्राज्यी जुआ इन दोनों से ध्यान हटाने को ही बरतन खड़काए जा रहे हैं, लगातार और लगातार। बरतन वादकों को कब समझ आएगा, कि यह उन के बोझे का हल नहीं है।

  3. ये जमाना मूर्तिमान उलटबाँसी है।
    गिद्ध खतम हो गए,
    दुष्ट कबूतरों के शहरों पर हमले हैं।
    ..

    बरतन मॉल की रसोई में खड़कते हैं।..
    मॉल के सामने सड़क पर
    ईंट बिछौना ईंट तकिया डाल
    हेल्पर सोते हैं।

    राजनीति में नीति नहीं
    जन में विद्रोह नहीं
    आप जनद्रोहिता की बात करते हैं !

    कैसा धर्म कैसा साम्राज्य
    ?
    आज कल के अशोक भी
    धर पकड़ के समर तले
    जय जय करते हैं।
    किसकी?
    वही तो !
    अरे वही तो पेंच है।
    +++++++++++

    भाई. इस बकवासमय टिप्पणी को अपनी एक पोस्ट बना रहा हूँ।
    ..मेरे लिए अब आप भी उस ‘एलीट’ क्लास के मेम्बर हो गए जिसकी पोस्टों पर की गई टिप्पणियों को मैंने पोस्ट बना दिया है या अलग से पोस्ट ही लिख डाली है।

  4. दुनिया की दूषित राजनीती और बिगडैल धर्म की सांठ गाँठ
    सबको अपने कर्तव्यों से बिमुख किये हुए है
    सफल अभिव्यक्ति से परिपूर्ण आपके लेखन को नमन

  5. रवि भाई हम अपनी बोली मे कहते हैं आपको समझ तो आ जायेगी क्योंकि उसके शिवाय मुझे कुछ सूझ नही रहा,

    चुतिया बईठे गद्दी, साधु चले किनार
    सती बेचारी भुख मरे, लड़ूवा खाये छिनार

    ये वर्तमान स्थिति है, एक उम्दा पोस्ट के लिए बधाई

  6. पोस्टर और उस पर कविता तो शानदार है ही, आपकी इंट्रो बहुत जानदार है। दादा-दादी के जरिए जो बात आपने कही है, वह बहुत जरूरी है। खासतौर पर…हम दिखती सी या दिखाई जाती चीज़ों में उलझ कर अपना बचा खुचा तिया-पांचा करते रहते हैं…इस तिया-पांचा के मूल में जाने की प्रेरणा आप बखूबी दे रहे हैं।

  7. साम्राज्यी जुआ भी राम का और फैकने वाले भी राम के! देखें क्या होता है।
    जुआ फैंकने की बात करने वाले उसे दूसरे जुये से रिप्लेस कर देते हैं वही गड़बड़ है!

  8. रोचक…कविता के पहले आपका लेखन भी जबरदस्त रहा.

    सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
    दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
    खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
    दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

    -समीर लाल ’समीर’

  9. आपकी पोस्ट ने मन में उथल पुथल कर दी !
    कालेज समय के दिन याद दिला दिए

    बहुत सार्थक लेखन है
    साधुवाद

    सुख, समृद्धि और शान्ति का आगमन हो
    जीवन प्रकाश से आलोकित हो !

    ★☆★☆★☆★☆★☆★☆★☆★
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए
    ★☆★☆★☆★☆★☆★☆★☆★

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  10. समस्या के मर्म तक पहुच पाना ही एक रचनाकार कि रचना की सार्थकता है …. शेष तो तुकबंदी से ज्यादा कुछ नहीं ….. आपका प्रस्तुतीकरण अपने आप में अद्भुत होता है …. आभार आपका

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