ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा

सामान्य

ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

roohom mein

मैं आऊंगा
जब चाक हो जाएगी हर राह
कि जब हर तरफ़ बिछी होंगी
बारूदी सुरंगें
और जबकि हमेशा के लिए
चुक जाएगी बारिश की उम्मीद

मैं आऊंगा
जब तुम्हारे सुर्ख़ लब तड़पने लगेंगे
एक तवील बोसे के लिए
कि जब तुम समझ चुकी होगी
चारों तरफ़ दीवारें होने का सबब
जबकि तुम तन्हाई में
कर रही होगी मौत की दुआ

मैं आऊंगा
फिर हम तुम गाएंगे मिलकर
ज़िंदगी का मुक़द्दस नग़्मा
और क़त्लगाह के
ख़ूं से सने हर सुतून पर
कर देंगे तहरीर
शबे-वस्ल की महक को

इससे पहले कि
हमारे मुख़ालिफ़ीन
सफ़्फ़ाकी से मुक़र्रर करें
हमारे लिए
सज़ा-ए-मौत

हम रूहों में तब्दील हो जाएंगे

०००००
रवि कुमार

तवील बोसा – लंबा चुंबन,  मुकद्दस – पवित्र,  सुतून – खंभा
तहरीर करना – लिखना,  शबे-वस्ल – मिलनरात्रि,  मुख़ालिफ़ीन – विरोधी,  सफ़्फ़ाकी – निष्ठुरता

19 responses »

  1. इससे पहले कि
    हमारे मुख़ालिफ़ीन
    सफ़्फ़ाकी से मुक़र्रर करें
    हमारे लिए
    सज़ा-ए-मौत

    हम रूहों में तब्दील हो जाएंगे
    बहुत गहरी अर्थानुभूति और एहसास का रूहानी सफर है आपकी कविता
    दिल के बहुत करीब आकर ठहर गयी

  2. रवि जी .इसी तर्ज पर कभी एक कविता मैंने भी पढ़ी थी….मै आऊंगा….उसका अंत कुछ इस तरह से था …मुझे पहचानना क्यूंकि मेरा चेहरा आम है…ओर हर आम चेहरा चाहता है उसे पहचाना जाये…..
    आपको पढ़कर उसी की याद आयी

  3. इससे पहले कि
    हमारे मुख़ालिफ़ीन
    सफ़्फ़ाकी से मुक़र्रर करें
    हमारे लिए
    सज़ा-ए-मौत

    हम रूहों में तब्दील हो जाएंगे

    मौत के पहले रूह में तब्दील होना इस कविता को दार्शनिक अर्थ दे गया!

  4. मैं आऊंगा
    जब तुम्हारे सुर्ख़ लब तड़पने लगेंगे
    एक तवील बोसे के लिए
    कि जब तुम समझ चुकी होगी
    चारों तरफ़ दीवारें होने का सबब
    जबकि तुम तन्हाई में
    कर रही होगी मौत की दुआ

    bahut hi sundar ati sundar majo aaygo thari sun

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