आसमान फिर सिमट रहा है

सामान्य

आसमान फिर सिमट रहा है
(a poem by ravi kumar, rawatbhata)

n2

आसमान जब भी उतरता है धरा पर
उसके पास होते हैं
सूरज, चाँद, सितारे
और एक असीमित फैलाव
उन्मुक्त उड़ान के लिए

धरा
चाँद सितारों से दमकती
अनन्त ओढ़नी को
क्षण भर भी अपने पर
लिपटे रहने के रोमांच में
अभिभूत हो उठती है

इस अभिभूत क्षण में
आसमान सिमटता है चुपचाप
झुकता है तेजी से
और धरा में समा जाता है

जब तक धरा
लौटती है आपे में
आसमान फैल चुका होता है
वैसे ही
दूर बहुत दूर
उसी निर्लिप्तता से

और धरा
एक हसीं ख़्वाब टूट जाने की तरहा
ठगी सी रह जाती है

हमें ऐसा ही लगता है
कितना मधुर मिलन हो कर चुका है
क्षितिज पर
धरा और आसमान का

उफ़
आसमान फिर से सिमट रहा है
एक और क्षितिज पर…

०००००
रवि कुमार

18 responses »

  1. कल्पना की अद्भुत उड़ान! ब्लॉग पर तो बहुत कम देखने को मिल रहे हैं… इसके लिए किताबों का आसरा लेना पड़ता है… जोड़-तोड़ का ताना-बना, ख्यालों का बानगी… वाह !

  2. और धरा
    एक हसीं ख़्वाब टूट जाने की तरहा
    ठगी सी रह जाती है

    उफ़
    आसमान फिर से सिमट रहा है
    एक और क्षितिज पर…

    ek behtreen abhivykati

  3. इस कविता को पढ़कर आसमान को मैनें अपने में सिमटते देखा है ???

    “…….कितना मधुर मिलन हो कर चुका है
    क्षितिज पर
    धरा और आसमान का…..”

    अंतर्मन की अतल गहराई में उतर गई ये कविता.

  4. अच्छी प्रस्तुति….बहुत बहुत बधाई…
    मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग “मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी”में पिरो दिया है।
    आप का स्वागत है…

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s